श्री गणेशाय नमः

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Monday, November 15, 2010

विकास के पायदान पर विश्व का एक बड़ा समुदाय भूखा-नंगा

अनीश कुमार उपाध्याय
विश्व के गरीब देशों में भूख का शिकंजा दिनोंदिन कसता ही जा रहा है। नवीनतम आकड़ों से पता चलता  है कि विश्व में भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। बतौर बानगी जनवरी  2009 में यह संख्या 96.3 करोड़ थी जो बीते अक्टूबर माह में बढ़कर एक अरब के आंकड़े पर पहुंच गई है। इसका अर्थ हुआ विश्व में पिछले तीन महीनों में चार करोड़ अतिरिक्त लोग भूख  की चपेट में आ गए हैं। वर्तमान आर्थिक संकट की वजह से खाद्य स्थिति और भी खराब हुई है। इसकी वजह से कीमतों में नाटकीय उछाल आया है।  खास यह कि विश्व समुदाय की ओर से ऐसा अभी तक कोई  संकेत सामने नहीं आया है कि इस भयावह स्थिति से निपटने के कोई प्रयास निकट भविष्य  में किए भी जाएंगे।
वर्ष 2007 में खाद्य संकट के प्रारंभ  होने के पूर्व विश्व भर में गंभीर रूप से भूख से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या 85 करोड़ से कुछ कम थी और यह  1990 के आरंभ से कमोबेश स्थिर बनी हुई थी। वर्ष 2007 और 2008 में अंतर्राष्ट्रीय खाद्य एवं तेल के मूल्यों में हुई अचानक वृद्धि से कई देशों में  ’खाद्य दंगे’ भी हुए। इसके परिणामस्वरूप  भूख को मिटाने के शताब्दी विकास लक्ष्य को भी खतरा पैदा हो गया। वैश्विक बाजारों में  अनाजों की कीमतों में कमी के बावजूद गरीब देशों में या तो उनकी ऊंची कीमतें यथावत बनी  हुई हैं अथवा उनमें बढ़ोत्तरी ही हुई है। अनेक अध्ययनों ने यह तो स्पष्ट  किया है कि खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के कारण 2008 में अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर गंभीर कुपोषण में एकाएक वृद्धि तो दर्ज नहीं की गई है, परंतु इसने गरीबों की जीविका और भोजन के वैविध्यता पर लगातार  प्रभाव डाला है।
यह भी स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान खाद्य संकट के फलस्वरूप विकासशील देशों  में 25 वर्षों से जारी उस प्रवृत्ति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है जिसके अंतर्गत धीमी गति से ही सही परंतु कुपोषित व्यक्तियों  की संख्या में कुल जनसंख्या के अनुपात में गिरावट आ रही थी। नब्बे के दशक के प्रारंभ  में भूख से पीड़ित व्यक्तियों का प्रतिशत कुल जनसंख्या के 20 प्रतिशत पर पहुंचने के पीछे का कारण कृषि में घटता निवेश था। इसकी वजह से  खाद्य पदार्थों के उत्पादन में कमी आई और मूल्यों में वृद्धि हुई। इसी प्रवृत्ति ने 2007 में गंभीर रूप ले लिया।
खाद्य वस्तुओं के बढ़ते वैश्विक मूल्य ने कई अन्य समस्याओं को भी जन्म दिया।  इसके परिणाम स्वरूप घरेलू खाद्य मूल्यों में भी तेजी आई। वर्ष 2005 में जहां अल्प पोषित व्यक्तियों की संख्या 85
करोड़ थी, वहीं वह 2008 में बढ़कर 96.30 करोड़ पर पहुंच गई। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें जहां खाद्य निर्यातक देशों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी, वहीं दूसरी ओर ऐसे अधिकांश देश जो कि खाद्य पदार्थ खरीदते हैं, के लिए वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतों के परिणाम स्वरूप इन देशों के  छोटे किसानों, ग्रामीण श्रमिकों और शहरी गरीबों पर अतिरिक्त  संकट आ जाएगा। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि वार्षिक मंदी के काल में बढ़ते खाद्य  मूल्यों के आत्मघाती परिणाम निकलेंगे, कारण कि परिवारों को जिंदा रहने के लिए संघर्ष  करना पड़ेगा। इससे मौसमी कुपोषण की मार में भी अतिरिक्त वृद्धि होगी। इससे भूख और कुपोषण  का दुश्चक्र भी प्रारंभ हो जाएगा।
ग्रामीण गरीबों के लिए मंदी का समय और भूख पर्यायवाची हैं। मौसमी मंदी वह समय  होता है जबकि जमा किया हुआ अनाज समाप्त हो जाता है और नई फसल आने में थोड़ा समय होता  है। खाद्य पदार्थों के मूल्य में उतार-चढ़ाव, संस्थागत  ऋ ण तक पहुंच का न होना और भंडारण की अपर्याप्त सुविधा के कारण किसानों को बाध्य होना  पड़ता है कि वे पूर्व में लिए गए ऋ ण की अदायगी और फसल को कीड़ों इत्यादि से नष्ट होने से बचाने के लिए अपनी पैदावार (फसल) को कम कीमत पर बेच दें। इसी किसान को कुछ महीनों बाद बाजार में अधिक दाम चुकाकर दुबारा वही अनाज खरीदना पड़ता है। लिहाजा वह आर्थिक रूप से काफी टूट जाता है।
विकासशील विश्व में हर तरफ गरीब मौसमी कहर के इस वार्षिक चक्र का शिकार बने  रहते हैं। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों का सामना वैश्विक तौर पर गरीब परिवार पहले  तो भोजन की गुणवत्ता को कमतर करके और बाद में उसकी मात्रा घटा कर करते हैं। इससे उनके शरीर में न केवल पोषक तत्वों की कमी हो जाती है बल्कि उनका प्रतिरोधी तंत्र भी कमजोर  हो जाता है। खाद्य असुरक्षा किसान परिवारों को नुकसानदेह और स्थाई हानि वाले तरीके अपनाने  को विवश करती है। यथा संपत्ति या पशुओं को बेचना। ऊंची ब्याज दर पर ऋ ण लेना या अपनी  भूमि और भविष्य की पैदावार को रेहन या गिरवी रखने का जोखिम उठाना।  इस तरह से ग्रामीण गरीब अपने आज के लिए अपने भविष्य  को दांव पर लगाने के लिए मजबूर हो जाता है। इससे उसकी भविष्य की जीविका पर भी असर पड़ता  है। अच्छी पैदावार के बावजूद उसकी सामान्य स्थिति में सुधार नहीं आता क्योंकि उसे अपना पिछला घाटा पूरा करना होता है। अतएव परिवार पर भविष्य के प्रति जोखिम बना ही रहता  है।
अनाज संकट से भूख और कुपोषण की वर्तमान स्थिति पर और भी गंभीर प्रभाव पड़ेंगे।  इतना ही नहीं यदि इसे समाप्त करने के तुरंत प्रयत्न नहीं किए गए तो वैश्विक संकट खड़ा  हो जाएगा। बिगड़ैल और लापरवाह पश्चिम को समझना चाहिए कि अंतहीन भूख की इस समस्या से  पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता से वह भी बच नहीं पाएगा। हम वैश्विक भूचाल के मुहाने पर खड़े हैं और भूख की इस त्रासदी और खौफनाक स्थिति से बाहर आने के लिए तात्कालिक मदद  की आवश्यकता है।
इस दिशा में अब तक की वैश्विक प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही   है। इस समस्या से  मिशनरी भावना से ही निपटा जा सकता है। विश्व खाद्य सुरक्षा के लिए जून 2008 में हुए एक उच्च स्तरीय सम्मेलन में संयुक्त राष्टÑ  संघ समेकित प्रयास (यूएनसीएपफए) का अनुमान था कि वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की बहाली के लिए प्रतिवर्ष 25 से 40 अरब अमेरिकी डालर की आवश्यकता है। वहीं संरक्षणवादी अनुमानों के अनुसार  प्रभावशाली ढंग से भूख से विश्व व्यापी संघर्ष के लिए ‘अनिवार्य  न्यूनतम पैकेज’ के लिए प्रतिवर्ष 60 से 70 अरब अमेरिकी डालर की आवश्यकता होगी।
उच्चस्तरीय सम्मेलनों के बावजूद वैश्विक नेताओं ने खाद्य समस्या से निपटने  के लिए मात्रा 12.3 अरब डालर के अनुदान के  लिए हामी भरी और उसमें से अब तक केवल एक अरब ड ालर का दान ही प्राप्त हो पाया है। हाल  के इतिहास में किसी अन्य वैश्विक अपील में वादा किए गए और वास्तविक रूप से प्राप्त  धन में कभी भी इतना अंतर नहीं दिखाई पड़ा था। दुखद तो ये कि वर्ष 2008 के बीते दो वर्ष के करीब हो चुके हैं, लेकिन यह वादा कोरा ही रह गया है। जो मिला उससे भूख नहीं मिटाई जा सकती। ऐसे में इसका मिलना और न मिलना बराबर था। हां, इस निराशाजनक राशि ने एक बार फिर यह दर्शा  दिया है कि वैश्विक कार्यसूची में ‘भूख’ कहीं नहीं है और आज भी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अस्थायी खाद्य मदद देकर मात्रा  हस्तक्षेप करने का ही इच्छुक है।
इससे यह खतरनाक संदेश भी  जा रहा है कि अमीर देश भूख के प्रति गंभीर नहीं हैं। वैश्विक  भूख से निपटने के लिए  गंभीर प्रयत्न और प्रभावशाली हस्तक्षेप हेतु पर्याप्त धन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। अंतर्राष्ट्रीय दबाब समूहों का कर्तव्य है कि वे राजनीतिक नेताओं और नीति  निर्धारकों का ध्यान इस ओर दिलाते रहें कि भूख और कुपोषण का भार सभी प्रकार से विकास  पर पड़ेगा और इसके परिणाम स्वरूप वैश्विक नेतृत्व के लिए आवश्यक है कि वह भूख से निपटने  के लिए तत्काल प्रभावशाली एवं सामूहिक प्रयासों की गंभीर तात्कालिक आवश्यकता को समझे। यह आज के समय की नैतिक अनिवार्यता भी है।