यूपी समेत पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बज गया है। यूपी में नये परिसीमन के आधार पर चुनाव होने हैं। इस परिसीमन ने न सिर्फ विभिन्न राजनीतिक दलों बल्कि कई प्रत्याशियों के माथे पर शिकन डाल दी है। क्या होगा इस नये परिसीमन का असर? क्यों है प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें। राजनैतिक दल बार-बार क्यों बदल रहे प्रत्याशी? सत्तासीन विधायकों का आखिर क्यों कट गया टिकट? एक रिपोर्ट...
चुनाव आयोग ने यूपी में सात चरणों में चार से 28 फरवरी के बीच विस चुनाव कराने का ऐलान कर दिया है। पंजाब, उत्तराखंड में 30 जनवरी को चुनाव होंगे। मणिपुर में 28 जनवरी और गोवा में तीन मार्च को वोट डाले जाएंगे। विस चुनाव समय से पहले होने से सत्ताधारी बसपा को काफी मायूसी है। उसे मलाल रहेगा कि राज्यसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीट पर कब्जा जमाने के लिए उसके पास उपलब्ध मौजूदा सख्या बल का उपयोग नहीं हो पाएगा। लिहाजा अब इस सदन में उसकी परफार्मेंस अगले विस चुनाव के नतीजों पर तय होगी। यही नहीं, फरवरी में चुनाव होने से जनता को लुभाने के लिए बसपा सरकार के हाथ औपचारिक रूप से बंध गए हैं। वहीं नए परिसीमन ने विभिन्न दलों का दिन का चैन और रातों की नींद छीन ली है।
माया के मंसूबों पर फिरा पानी
खुद सीएम मायावती के विभिन्न जिलों के औचक निरीक्षण करने के मंसूबे पर भी पानी फिर गया है। अब इसकी गुंजाइश नहीं रही कि वह बतौर सीएम ऐसा कर सकेंगी। आचार संहिता लागू होने से उन्हें अब पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से ही जनता को लुभाना होगा। वैसे भी बसपा को छोड़ बाकी प्रमुख दलों ने निर्वाचन आयोग से मांग की थी कि फरवरी माह में ही चुनाव होने चाहिए। बसपा जबकि अप्रैल माह में चुनाव चाहती थी। उसकी दलील थी कि मौसम और माध्यमिक शिक्षा परिषद की परीक्षाओं के कारण चुनाव फरवरी माह में कराना अनुचित होगा। इतना ही नहीं, बसपा सरकार ने दबाव बनाने के लिए बोर्ड परीक्षा की तिथि की घोषणा पहली मार्च से कर भी दी। खैर, इसके बाद भी बात नहीं बनीं और चुनाव की घोषणा कर दी गई है। हालांकि बसपा मुखिया को इस कोशिश से यह उम्मीद थी कि इस दौरान वह विरोधियों के हमले व अपने विधायकों पर लगे दाग को धो डालेंगी। कारण कि इससे उसे अप्रैल तक का वक्त मिल जाएगा। उधर, परिसीमन ने भी यूपी का चुनावी गणित गड़बड़ा दिया है।
परिसीमन का असर
यूपी में परिसीमन के बाद हो रहे 16 वीं विस चुनाव कई मायने में अहम होंगे। इसमें 403 में से 90 सीटें समाप्त हो गईं हैं। वहीं 126 सीटें पुर्नगठित हुई हैं या उन्हें नया नाम मिला है। इनका न केवल भूगोल बदला है, बल्कि जातीय समीकरण भी उलट-पुलट गए हैं। परिसीमन के बाद बिछ रही चुनावी बिसात में अब सभी दल बदले हुए जातीय समीकरण के हिसाब से अपनी गोटियां सेट करने की जुगत में लग गए हैं। पिछले लोस चुनाव में भी सियासी दलों को नए परिसीमन के हिसाब से अपनी रणनीति तय करनी पड़ी थी। वहीं अब पहली बार विस चुनाव में यह चुनौती एक बार फिर खड़ी हो गई है। बदले हुए जातीय समीकरणों के आधार पर लोस चुनाव का अनुभव तो दलों को है, लेकिन अब विस सीटों में बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा समेत सभी दलों को जमीनी हकीकत का पूरा अनुभव नहीं है।
सियासी दलों की चिंता का कारण
सियासी दलों को चिंता इस बात को लेकर है कि वह बदले हालात में किस तरह प्रत्याशी तय करें, ताकि सीट के जातीय गणित के हिसाब से भी दांव सटीक बैठे। लिहाजा वह इसे लेकर दुविधा में है कि क्षेत्र का भूगोल बदलने से उनका वोटों पर कितना प्रभाव होगा? किस बिरादरी के कितने वोट, किस सीट पर निर्णायक हैं? व्यक्तिगत तौर पर सीटिंग विधायकों व अन्य दावेदारों के सामने भी यही मुश्किलें हैं। हकीकत में परिसीमन से कई दावेदारों की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उनके लिए भी परिसीमन से प्रभावित सीटों पर अपने जौहर को दिखाने के लिए अधिक प्रयत्न करना पड़ेगा। यही नहीं, अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों का भूगोल बदलने से समीकरण भी बदल सकते हैं।
नया परिसीमन, नई रणनीति
पहली बार आरक्षित सीटों पर शानदार सफलता पाने वाली बसपा के लिए नए परिसीमन के बाद बनी सीटों पर नए सिरे से रणनीति बनाना अब जरूरी दिख रहा है। यही चुनौती अब बाकी दलों के लिए भी है। यही वजह है कि पार्टियों को भी प्रत्याशी का नाम तय करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जिन सीटिंग विधायकों की सीट खत्म हो गई है, उनके अपनी दावेदारी दूसरी सीट पर पक्की करने के लिए भी ‘अपनों’ से जूझना पड़ रहा है। टिकट वितरण को लेकर दावेदारों में इसी वजह से ऊहापोह की स्थिति है। बतौर बानगी यदि भाजपा को ही लें तो पार्टी के सामने आज सबसे बड़ी समस्या उम्मीदवारों के नाम तय करने को लेकर है।
नहीं निकल पा रहा नतीजा
चुनाव आयोग ने फरवरी में मतदान की तारीखों का ऐलान कर दिया है, लेकिन भाजपा अभी तक आधी सीटों के लिए भी उम्मीदवारों का नाम तय नहीं कर सकी है। प्रदेश के नेता राज्य की सभी सीटों के लिए कई दौर में बैठक कर बहस-मुबाहिसा कर चुके हैं, लेकिन नतीजा नहीं निकला है। अब सभी को अगले सप्ताह होने वाली पार्टी के केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक का इंतजार है, जिसमें शेष बचीं सीटों के लिए नामों का निर्धारण होगा। वहीं न सिर्फ बसपा, बल्कि फरवरी में चुनाव की घोषणा ने भाजपा के सामने भी असंमजस की स्थिति पैदा कर दी है। इससे भाजपा की चुनावी रणनीति भी गड़बड़ा गई है। वैसे संगठन, प्रबंधन और प्रचार अभियान में तो काफी आगे है, लेकिन उम्मीदवार तय करने में उसका पिछड़ना राजनीति की दृष्टि से उचित नहीं माना जा रहा है।
लक्ष्य से पिछड़ रही भाजपा
केंद्रीय कोर ग्रुप की बैठक में हुई समीक्षा और प्रदेश के नेताओं की लगातार हो रही औपचारिक बैठकों में भाजपा अब खुद महसूस कर रही है कि वह शुरूआत में तय अपने ही लक्ष्य से पिछड़ रही है। नेतृत्व की सोच फिलहाल तीसरे पायदान पर खड़ी पार्टी को दूसरे नंबर पर लाने की थी, लेकिन अब उसे इसको लेकर संशय दिख रहा है। रणनीति के जानकारों की मानें तो पार्टी अपनी ताकत अधिकतम दोगुना कर सकती है। दरअसल बीते साल बिहार में मिली बड़ी सफलता से उत्साहित भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए भी उसी रणनीति पर काम शुरू किया था। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी भी जमीनी मजबूती पर जोर दे रहे हैं और संगठन को बूथ स्तर से लेकर राज्य स्तर तक मजबूती के लिए तमाम तैयारियां करा रहे हैं, लेकिन यह हकीकत है कि वह अभी तक यूपी में कोई एक उम्दा नेता पेश नहीं कर सके हैं। वहीं उम्मीदवारों के चयन में देरी भी उन्हें जोरदार झटका दे सकती है।
क्या है परिसीमन
संविधान के अनुच्छेद 82 के अधीन, हरेक जनगणना के बाद कानून द्वारा संसद एक परिसीमन अधिनियम को अधिनियमित करती है। उसके बाद केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग का गठन करती है। आयोग परिसीमन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को सीमांकित करती है। देश में चार बार परिसीमन हुआ। पहली बार 1952, दूसरी बार 1963, तीसरी बार 1973, फिर 2002 में परिसीमन हुआ। तदुपरांत प्रदेश में 2009 में लोकसभा चुनाव भी नये परिसीमन के आधार पर कराये गये थे।
परिसीमन का सर्वाधिक असर
इसका सबसे ज्यादा असर हरदोई जिले में रहा है। यहां की नौ में से छह सीटों का अस्तित्व मिट गया है। बदलाव के नजरिये से गोरखपुर और जौनपुर दूसरे नंबर पर प्रभावित जिले हैं। यहां पांच-पांच सीटों का वजूद मिट गया है। मुरादाबाद, बाराबंकी, बलिया मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में चार-चार विस सीटों का नाम या तो बदल गया है, या खत्म हो गया है। वहीं मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जिले में चार-चार नई सीटों का का गठन हुआ है, जबकि बाराबंकी और बलिया में नई सीटों की संख्या तीन-तीन हैं। वाराणसी ऐसा जिला रहा जहां परिसीमन में समाप्त तीन सीटों के स्थान पर पांच नई सीटें बनीं। बलरामपुर, बांदा, कौशांबी, ललितपुर, महोबा, पीलीभीत और संत रविदासनगर में न कोई पुरानी सीट खत्म हुई और न ही कोई नई सीट गठित हुई।
आरक्षित सीटों पर असर
नहटौर (बिजनौर), धनौरा (ज्योतिबा फूले नगर), मिलक(रामपुर), कास्ता (खीरी), गोपामऊ, सांडी, बालामऊ (हरदोई), मोहना (उन्नाव), बाबागंज (प्रतापगढ़), आलापुर (अंबेडकरनगर), जैदपुर (बाराबंकी), बलहा (बहराइच), महादेवा (बस्ती), कपिलवस्तु (सिद्धार्थनगर), घनघटा (संत कबीरनगर), खजनी (गोरखपुर), बेल्थरारोड (बलिया), अजगरा (वाराणसी), कोरांव (इलाहाबाद), रसूलाबाद (रमाबाईनगर), आगरा ग्रामीण (आगरा) और बलदेव (मथुरा) की नई सीटें आरक्षित घोषित की गर्इं। वहीं नजीबाबाद (बिजनौर), रसड़ा (बलिया), मेजा (इलाहाबाद), गोवर्द्धन (मथुरा), चरथावल (मुजफ्फरनगर) आदि सीटें जो पहले आरक्षित थीं, इस बार अनारक्षित हो गई हैं। वहीं तीन सीटें जो पहले अनारक्षित थीं, अबकी आरक्षित हो गई हैं।
इनसेट...
जिले और नए विस: एक नजर में
बलिया : बेल्थरारोड, फेफना, बैरिया
गाजीपुर : जंगीपुर
वाराणसी : पिंडरा, अजगरा, शिवपुर
जौनपुर :बदलापुर, मल्हनी, मुंगरा बादशाहपुर, जफराबाद
सोनभद्र : घोरावल, ओबरा
मिर्जापुर : मड़िहान
इलाहाबाद : फाफामऊ, फूलपुर, कोरांव
फतेहपुर : अयाहशाह, हुसैनगंज
गोरखपुर : कैपियरगंज, गोरखपुर शहर, गोरखपुर ग्रामीण, खजनी, चौरीचौरा
कुशीनगर : खड्डा, तमकुहीराज, कुशीनगर
देवरिया : पत्थरदेवा, रामपुर कारखाना
मऊ : मधुबन
आजमगढ़ : फूलपुर, पवई, दीदारगंज
चंदौली : सकलडीहा, सैयदराजा
जेपीनगर : धनौरा, नौगांव, सादात
मुरादाबाद : मुरादाबाद ग्रामीण, मुरादाबाद नगर, बिलारी, असमौली
विजनौर : बढ़ापुर, नहटौर, नूरपुर
रामपुर : स्वार, चमरव्वा, मिलक
बदायूं : शेखुपुर
बरेली : मीरगंज, बिथरी चैनपुर, बरेली
शाहजहांपुर : कटरा
खीरी : पलिया, गोला कोकरन्नाथ, कस्ता
सीतापुर : महोली, सेवता
हरदोई : सवाइजपुर, गोपामऊ, सांडी, बिलग्राम मल्लावा, बालामऊ
उन्नाव : मोहान
लखनऊ : बख्शी का तालाब, लखनऊ उत्तर
रायबरेली : हरचंदपुर, ऊंचाहार
प्रतापगढ़ : बाबागंज, विश्वनाथगंज, रानीगंज
सुल्तानपुर : सदर, लंभुआ
अंबेडकरनगर : आलीपुर
फैजाबाद : गोसार्इंगंज
बाराबंकी : कुर्सी, बाराबंकी, जैदपुर
बहराइच : बलहा, मटेरा, प्यागपुर
श्रावस्ती : श्रावस्ती
गोंडा : मेहनौन, तरबगंज, गौरा
बस्ती : रुदौली, बस्ती सदर, महादेवा
संत कबीरनगर: घनघटा
सिद्धार्थनगर : कपिलवस्तु
झांसाी : झांसी नगर
कानपुर नगर : बिठूर, किदवईनगर, महाराजपुर
कानपुर देहात : रसूलाबाद, अकबरपुर रनियां, सिकंदरा
औरैया : दिबियापुर
कन्नौज : तिर्वा
फर्रूखाबाद : अमृतपुर, भोजपुर
चित्रकूट : चित्रकूट
एटा : अमांपुर, मारहरा
आगरा : आगरा दक्षिण, आगरा उत्तर, आगरा ग्रामीण
फिरोजाबाद : सिरसागंज
मथुरा : बलदेव
महामायानगर : सादाबाद
अलीगढ़ : छर्रा
गौतम बुद्ध नगर: नोएडा
गाजियाबाद : लोनी, साहिबाबाद, धौलाना
मेरठ : मेरठ दक्षिण
बागपत : बड़ौत
मुजफ्फरनगर : शामली, बुढ़ाना, पुरकाजी, मीरापुर
सहारनपुर : बेहट, सहारनपुर नगर, रामपुर मनिहारन, गंगोह
महाराजगंज : नौतनवां
इनसेट
खत्म हुए तथा नाम बदले गए विस क्षेत्र: एक नजर में
बिजनौर : सेवहारा, अफजलगढ़
ज्योतिबाफुले नगर : गंगेश्वरी
मुरादाबाद : बहजोई, मुरादाबाद पश्चिम, मुरादाबाद, मुरादाबाद देहात
रामपुर : स्वाटरांडा, शाहाबाद
बदायूं : उसहैत, बिनावर
बरेली : सान्हा, बरेली सिटी, कांवर
शाहजहांपुर : निगोही
खीरी :हैदराबाद, पेला
हरदोई : बेनीगंज, अहरौरी, बावन, पिहानी, बिलग्राम, मल्लावां
उन्नाव : हड़हा, हसनगंज
लखनऊ : महोना
रायबरेली : सतांव, डलमऊ
प्रतापगढ़ : गड़वारा, वीरापुर, बिहार
सुल्तानपुर : जयसिंहपुर, चांदा
अंबेडकरनगर : जहांगीरगंज
फैजाबाद : सोहावल
बाराबंकी : सिद्धौर, मसौली, नवाबगंज, फतेहपुर
बहराइच : फखरपुर, चर्दा
श्रावस्ती : इकौना
गोंडा : सादुल्लानगर, मुजेहना, डिविसर
बस्ती : नगर पूर्व, बस्ती, रामनगर
संतकबीरनगर : खेसहरा, हैसर बाजार
गोरखपुर : धुरियापार, कोडीराम, मुंडेरा बाजार, गोरखपुर, मानीराम
सिद्धार्थनगर : नौगढ़
महाराजगंज : लक्ष्मीपुर, श्याम देउरवा
जौनपुर : बरसठी, बयालसी, रारी, खुटहन, गड़वारा
कुशीनगर : नौरंगिया, सेवरही
देवरिया : कसया, गौरीबाजार
औरैया : अजीतमल
गाजीपुर : दिलदारनगर, सादात
आजमगढ़ : फूलपुर, सरायमीर
बलिया : सीयर, चिलकहर, दोआबा, कोपाचीट
चंदौली : धानापुर, चंदौली
वाराणसी : चिरईगांव, कोलअसला, गंगापुर
मिर्जापुर : राजगढ़
इलाहाबाद : झूंसी, नवाबगंज
फतेहपुर : किशुनपुर, हसवा
कानपुर नगर : जनरलगंज, सरसौल, चौबेपुर
कानपुर देहात : राजपुर, सरवन खेड़ा, डेरापुर
इटावा : लखना
कन्नौज : उमर्दा
फर्रुखाबाद : कमालगंज, मोहमदाबाद
चित्रकूट : कर्वी
मऊ :नत्थूपुर
हमीरपुर : मौदहा
झांसी : झांसी
जालौन : कौंच
मैनपुरी : घिरौर
एटा :सकीट, सोरो, निधौलीकला
आगरा : दयालबाग, आगरा पूर्व, आगरा पश्चिम
मथुरा : गोकुल
हाथरस : सादाबाद, सासनी
अलीगढ़ : गंगीरी
बुलंदशहर : अगौता
मेरठ : खरखौदा
बागपत : खेकड़ा, बरनावा
मुजफ्फरनगर : कांधला, जानसठ, मोरना, बघना
सहारनपुर : सरसावां, नागल, हरोड़ा, मुजफ्फराबाद

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