श्री गणेशाय नमः

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Monday, August 15, 2011

आजादी का पहला शहीद


-सेना से दूर मंगल पाण्डेय के वंशज
-भ्रष्टाचार के चलते हक तलाश रहे वंशज
-दमखम के बावजूद नहीं बन पा रहे सैनिक
-कई बार प्रयास के बावजूद मिली असफलता
-मंगल को लेकर उठे कई बार विवाद

‘‘जिन्होंने भारत को आजाद कराने के लिए ब्रितानी हुकूमत का डटकर मुकाबला किया। जिन्होंने अपने परिवार की चिंता किए बगैर अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम सहे। जिन्होंने भारत  की आजादी के लिए अपनी पहली शहादत दी। आज अगर वे जिंदा होते तो नि:संदेह आजाद भारत में उनका शीश शर्म से झुक जाता। आजादी की जंग के पहले शहीद मंगल पाण्डेय के वंशजों के लिए इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी कि जिस सैनिक ने भारत  की आजादी के लिए जंग का पहला शंखनाद किया, आज उनके वंशज उसी सेना से दूर हैं। मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र सेना में भर्ती होने का दमखम तो रखते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते उनकी इस हसरत पर पानी फिर चुका है। प्रस्तुत है मंगल पाण्डेय के परिवार की ऐसी ही दर्द-ए-दास्तां व मंगल पाण्डेय की अनछुए पहलुओं को पेश करती एक रिपोर्ट...’’
आजादी की जंग का वह पहला शहीद, जिसने ब्रितानी बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को आजाद कराने के लिए अपनी आहुति दे दी, उसके वंशज आज सेना से दूर हैं। ऐसा नहीं है कि अमर शहीद मंगल पाण्डेय के वंशज सेना में जाना नहीं चाहते। इस परिवार के युवाओं में सेना में जाने की छटपटाहट तो है, लेकिन भ्रष्टाचार के चरम ने उनकी इन हसरतों पर पानी फेर दिया है। इतना ही नहीं, मंगल पाण्डेय के नाम पर बना स्मारक भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ा है। घर की दशा दयनीय है। टूटे-फूटे आवास में जिंदगी गुजार रहे मंगल के वंशजों को आज भी किसी रहनुमा की तलाश है।
बलिया से लौटकर अनीश कुमार उपाध्याय
कौन हैं मंगल पांडेय के वंशज
मंगल पांडेय का पैत्रिक गाँव नगवा
 (बलिया) स्थित घर, जहाँ आज भी
उनके वंशज रहते हैं।
आम तौर पर ये तो सभी जानते हैं कि आजादी की जंग में सेना में रहकर विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बलिया जिले के नगवां गांव निवासी सुदिष्ट पाण्डेय के पुत्र अमर शहीद मंगल पाण्डेय अविवाहित थे। लेकिन उनके दो सगे भाई थे। बड़े भाई नरेंद्र पाण्डेय व छोटे भाई ललित पाण्डेय। ललित पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: महावीर पाण्डेय व महादेव पाण्डेय हुए। महावीर पाण्डेय के एकमात्र पुत्र थे बरमेश्वर पाण्डेय। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में मंगल पाण्डेय से प्रेरित बरमेश्वर भी आजीवन अविवाहित रहते हुए अपना जीवन देश के नाम उत्सर्ग कर दिया। वहीं महादेव पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: महेश पाण्डेय व सुरेश पाण्डेय। सुरेश पाण्डेय के चार पुत्र क्रमश: विजय कुमार पाण्डेय, अजय कुमार पाण्डेय, नरेंद्र कुमार पाण्डेय और अनिल कुमार पाण्डेय। इनमें नरेंद्र पाण्डेय सेना में रहे और 17 वर्ष 20 दिन की सेवा के उपरांत पहली मार्च 2001 को सेवानिवृत्त हो गए। वहीं महेश पाण्डेय के इकलौते पुत्र रघुनाथ पाण्डेय इन दिनों केंद्रीय विद्यालय नैनीताल के प्रधानाचार्य पद पर हैं। इसके साथ ही इनका पूरा कुनबा नैनीताल में ही बस गया है। बलिया जिले के नगवां गांव में अब रहते हैं मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र विजय कुमार पाण्डेय व अजय कुमार पाण्डेय। विजय 58 साल के बुजुर्ग हैं। इनके दो पुत्र क्रमश: अरविंद कुमार पाण्डेय (30) व विपिन कुमार पाण्डेय (24) हैं। अजय 50 साल के हैं और इनके दो पुत्र क्रमश अनूप (20) व अनुज (18) हैं। अनूप बीफार्मा तो अनुज पालिटेक्निक कर बेरोजगारी की दशा में उत्तरांचल के उधमसिंह नगर में खेती कर रहे हैं। वहीं नरेंद्र पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: शशांक (20) जो बलिया स्थित सतीश चंद्र कॉलेज से बीए फाइनल कर रहे हैं तो दूसरे सौरभ  पाण्डेय (13) महर्षि वाल्मिकी बाल विद्यालय काजीपुरा में पढ़ रहे हैं।
सेना के लिए किसने किया कितना प्रयास
मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र (वर्तमान में बुजुर्ग हो चुके)विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि उन्होंने भी सेना में जाने की काफी कोशिश की, लेकिन हर बार छांट दिए गए। इतना ही नहीं मेरे पुत्र अरविंद कुमार पाण्डेय का पुलिस में एसआई के लिए फिजिकली चयन होने के बाद भी लिखित परीक्षा में छांट दिया गया। अजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि वे उधम सिंह नगर में पुलिस भर्ती  के लिए गए थे, लेकिन उनका चयन नहीं हुआ। खास यह कि सभी ने खुद को मंगल पाण्डेय का वंशज बताते हुए छूट की भी वकालत की, लेकिन अधिकारियों ने कोई तवज्जो नहीं दिया। परिजनों ने आरोप लगाया कि सेना में जाने के लिए भी इस परिवार के कई युवा कतार में लगे, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते उन्हें सेना में भर्ती नहीं किया गया। अनिल कुमार पाण्डेय ने बताया कि वे भी सेना में भर्ती होने के लिए कई बार बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत हुए, लेकिन उन्हें सेना में नहीं लिया गया। उन्होंने बेबाक आरोप मढ़ा कि खुद सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उनसे धन की मांग की, जिस पर उन्होंने खुद को मंगल पाण्डेय का वंशज बताते हुए  इसे देने से इंकार किया तो उसका कहना था कि तमगा लेकर घूमते फिरो, सेना में नहीं जाओगे। हास्यास्पद बताया कि सेना ने उन्हें मेडिकली अनफिट करार दिया, जबकि वे पूर्ण रूप से स्वस्थ थे और आज भी हैं।
इतिहास के आइने में मंगल पाण्डेय
मंगल पाण्डेय का जन्म 19 जुलाई 1827 को तत्कालीन गाजीपुर जनपद के बलिया तहसील अंतर्गत नगवां गांव के टोला बंधुचक में सुदिष्ट  पाण्डेय व जानकी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। वे तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के 19 वीं नेटिव इंफेंटरी रेजीमेंट के सिपाही थे। 1857 में भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में विद्रोह शुरू करने का श्रेय बलिया के नगवा गांव निवासी  मंगल पाण्डेय को ही है। कारतूस में गाय व सूअर की चर्बी को लेकर 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डेय का क्रोध भड़क उठा। उसने परेड ग्राउंड में ही अपने साथियों को विद्रोह के लिए ललकार लगाई। अंग्रेज सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने जब मंगल को गिरफ्तार करने का हुक्म सैनिकों को दिया तो कोई भी सैनिक आगे नहीं बढ़ा। वहीं मंगल ने ह्यूसन को गोली मारकर वहीं पर ढेर कर दिया। इसके बाद सामने आए लेफ्टिनेंट बॉब को भी मंगल ने गोली से उड़ा दिया। इस दौरान जब मंगल अपनी बंदूक में कारतूस भर रहे थे तो इतने में एक अग्रेज अफसर ने उन पर गोली चलाई लेकिन निशान चूक जाने पर मंगल ने उसे भी तलवार से मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद अंग्रेज अफसर कर्नल वीलर ने मंगल को गिरफ्तार करने का आदेश दिया, लेकिन किसी सैनिक ने इस पर अमल नहीं किया। अंत में कर्नल हिअर्सी के दबाव में आकर मंगल ने स्वयं अपनी बंदूक से खुद को गोली मार ली। इसके बाद उन्हें अस्पताल भेजा गया, जहां मंगल कुछ दिनों के बाद स्वस्थ हो गए। इसके  बाद कोर्ट मार्शल और अंत में फांसी की सजा मुकर्रर की गई। अंत में आठ अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी गई। यहीं से भड़की आजादी की आग ने अंत में देश को आजाद करके ही दम लिया।
शिवभक्त थे मंगल पाण्डेय
शिव मंदिर जहाँ मंगल पांडेय पूजा करते थे।
कट्टर हिंदू ब्राह्मण होने के साथ ही मंगल पाण्डेय एक शिवभक्त भी थे। आज भी उनकी ओर से पूजित शिवलिंग सहसा ही इसका बोध कराता है। मौजूदा घर के ठीक सामने बने एक छोटे से शिवालय में उक्त शिवलिंग स्थापित है। इस शिवलिंग की पूजा मंगल पाण्डेय सेना में भर्ती होने से पहले तथा जब तक वे गांव आते रहे हमेशा करते थे। शिव में उनकी अटूट आस्था थी और इसके लिए वे घंटो शिव पूजा भी किया करते थे। आज ये मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में जरूर है, लेकिन आज भी इस मंदिर में गांव के लोग पूजापाठ करते हैं।
कुश्ती के शौकीन थे मंगल पाण्डेय
मंगल पाण्डेय के बारे में बुजुर्गों की यादों को जेहन में समेटे आज भी बुजुर्ग उस प्रसंग को कहते नहीं अघाते। मंगल के बारे में कुरेदते ही वे मंगल की वीरता का बखान नम आंखों से करने लगते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि अमर शहीद मंगल पाण्डेय कुश्ती के शौकीन थे और अखार में क्षेत्र में नामी-गिरामी अखाड़ा था। यहां मंगल पाण्डेय कुश्ती लड़ने आया करते थे। कहा जाता है कि यहीं पर कभी लोरिक-संवरू नामक वीर भी अखाड़े में कुश्ती लड़ते थे और इसी वजह से इस गांव का नाम अखार पड़ गया। आज भी उनकी यादों को सहेजते हुए युवा क्लब अखार की संयोजक रणजीत कुमार सिंह की देखरेख में अखाड़ा व व्यायामशाला चला रहा है। अखार निवासी 85 वर्षीय वृद्ध गिरनारी सिंह बताते हैं कि उनके दादा स्व.गोगा सिंह बताते थे कि मंगल पाण्डेय पड़ोसी गांव नगवां से अखार में कुश्ती लड़ने आया करते थे। 80 वर्षीय बृज बिहारी सिंह ने बताया कि मंगल पाण्डेय हमारे बाबा के परम मित्र थे। जब भी वे गांव आते उनसे मिले बगैर वापस नहीं जाते थे। 70 वर्षीय संत विलास सिंह ने बताया कि उनके बाबा बसावन सिंह से मंगल पाण्डेय ने कुश्ती के कई गुर भी सीखे थे।
मंगल को लेकर खड़े होते रहे विवाद
अमर शहीद मंगल पाण्डेय को बलिया व फैजाबाद जिले का निवासी होने को लेकर प्राय: विवाद उठता ही रहा है। हालांकि अब यदि मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र की मानें तो उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खंडपीठ ने मंगल पाण्डेय को नगवा का निवासी होना मान लिया है। हालांकि पूर्व में नगवां स्थित मंगल पाण्डेय की मूर्ति का लोकार्पण करने पहुंच तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मंच से घोषणा की थी कि हर स्तर से प्रमाणित हो चुका है कि मंगल पाण्डेय मूल रूप से बलिया जिले के नगवा गांव के ही निवासी थे। ऐसे में इस विवाद में कोई दम नहीं है।
जीवन पर आधारित फिल्म भी रही विवादित
बहुविवादित फिल्म ‘मंगल पाण्डेय: द
राइजिंग’का विरोध करते
बलियावासी और भाजपा नेतागण
वर्ष 2006 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मंगल पाण्डेय के जीवन चरित्र पर आधारित बहुविवादित फिल्म ‘मंगल पाण्डेय: द राइजिंग’ में उनकी जन्मभूमि बलिया को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया गया था। साथ ही कई तथ्यों को गलत ढंग से परोसा गया। इसमें मंगल पाण्डेय को शराब पीते फिल्माया गया था। जबकि मंगल पाण्डेय शराब को छूते तक नहीं थे और खाटी ब्राह्मण थे। भले ही फिल्म निर्माता की इसके पीछे फिल्म को मसालेदार बनाने की थी, लेकिन महानायक पर लगे इस लांछन से समूचे देश में बखेड़ा खड़ा हो गया। बलिया भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां पर पुलिस को विरोध के चलते लाठी चार्ज भी करना पड़ा। भारी विरोध के बाद आखिरकार उस फिल्म से इस अंश को काटना ही पड़ा।
मंगल का स्मारक उपेक्षित
भारत के प्रथम शहीद मंगल पाण्डेय की स्मृति में बलिया जिले में दो जगहों पर स्मारक के रूप में उनकी भव्य  प्रतिमा स्थापित की गई है। इनमें एक उनके पैतृक गांव नगवां तो दूसरा नगर के कदम चौराहे पर स्थित है। शहीद मंगल पाण्डेय स्मारक सोसायटी नगवां का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के निर्देशन में   स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. तारकेश्वर पाण्डेय के सहयोग से किया गया। मंगल पाण्डेय के व्यक्तित्व व कृतित्व को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए शहीद मंगल पाण्डेय के नाम पर इंटरमीडिएट कालेज, शोध संस्थान, संग्रहालय, पुस्तकालय आदि की स्थापना की गई। विद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य होने का गौरव संस्था के अध्यक्ष व पूर्व नगर विकास मंत्री स्व.विक्रमादित्य पाण्डेय को प्राप्त हुआ। जब तक स्व.विक्रमादित्य पाण्डेय जीवित रहे, स्मारक की देखरेख में कहीं कोई कमी नहीं आने दी। वहीं वर्तमान में ये सभी स्मारक उपेक्षित हो गए हैं।
हर साल होता भव्य आयोजन
बलियावासियों के लिए यूं कहें तो बगावत और बगावती तेवर दोनों शान है। भृगु बाबा की तपोस्थली बलिया में स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी फेहरिश्त है। हर साल मंगल पाण्डेय के बलिदान दिवस आठ अप्रैल को उनके पैतृक गांव नगवां में भव्य  आयोजन किया जाता है। शहीद स्मारक में आयोजित इस कार्यक्रम में तमाम दिग्गज राजनीतिज्ञ यथा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव, पूर्व नगर विकास मंत्री विक्रमादित्य पाण्डेय, पूर्व नगर विकास राज्यमंत्री नारद राय, नगर विकास मंत्री नकुल दूबे सरीखे तमाम दिग्गज सहभागिता करते रहे हैं।
...जब उपेक्षित हुर्इं मंगल पाण्डेय की पौत्रवधू
प्रथम शहीद मंगल पाण्डेय की
पौत्रवधू 
तेतरी देवी
जरा सोंचिए तब क्या स्थिति हो, जब किसी परिवार के ही सदस्य के बलिदान दिवस पर भव्य आयोजन किया जा रहा हो और उनकी पौत्रवधू को सुरक्षाकर्मी उक्त स्थल पर जाने से ही रोक दिया जाए। वर्ष 2005 में ऐसा ही वक्त आया। आठ अप्रैल 2005 को जब नगवां स्थित स्मारक स्थल पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन था और तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव बतौर मुख्य अतिथि वहां पहुंचे थे तो घर की सबसे बुजुर्ग महिला यानी मंगल पाण्डेय की पौत्रवधू तेतरी देवी कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंची। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पहचाना नहीं और लाख अपना पता बताने पर भी आयोजन स्थल पर नहीं जाने दिया। इसको लेकर जब आयोजन स्थल पर हंगामा हुआ और मुलायम सिंह यादव को इसकी भनक  लगी तो वे खुद वहां पहुंचे और सुरक्षाकर्मियों को फटकारते हुए तेतरी देवी को मंच पर लेकर पहुंचे और उन्हें सम्मानित किया।
मंगल के अनुज के नाम पर मिलीं सुविधाएं
भले ही मंगल पाण्डेय के वंशजों को मंगल के नाम पर सुविधाएं न मिलीं हों, लेकिन उनके अनुज बरमेश्वर पाण्डेय के नाम पर थोड़ी-बहुत सुविधाएं जरूर मिलीं हैं। बरमेश्वर पाण्डेय ने भी आजादी की जंग में सक्रिय योगदान निभाया था। तब के बलिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इन्हें अपना कप्तान चुन लिया था और वे आजीवन कप्तान साहब कहे जाते रहे। वे 1930 से 1942 तक सक्रिय रूप से अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे। दर्जनों बार जेल गए और यातनाएं सही। इन्हीं के नाम पर इनके वंशजों को थोड़ी-बहुत सुविधाएं मिलतीं हैं। यूं कहें तो नैनीताल में जमीन वगैरह मिली है, लेकिन मंगल पाण्डेय के नाम पर कुछ भी मयस्सर नहीं हुआ।
वर्जन बाक्स...
हमें गर्व है
‘‘ जब मेरा ब्याह नगवां गांव में तय हुआ और ये बताया गया कि वे अमर शहीद मंगल पाण्डेय के पौत्र की अर्द्धांगिनी बनने जा रही है तो उन्होंने तत्काल विवाह के लिए हामी भर दी। विवाह के बाद जब वे ससुराल नगवा पहुंची तो मंगल गीतों में पूर्वजों में मंगल पाण्डेय का नाम लेकर भी गीत गाए जाते थे और आज भी गाए जाते हैं। सांझी-पराती (मंगलाचरण) में भी मंगल पाण्डेय का नाम लिया जाता है। मुझे गर्व है कि मैं उनकी पौत्र की वधू हूं। शिकायत है तो बस इतनी कि वर्तमान शासन में वह सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं, जिनके उनके वंशज हकदार हैं। इससे शर्मनाक क्या होगा कि मंगल पाण्डेय को जन्म स्थली को लेकर विवाद खड़ा कर दिया गया था। खैर, अब हकीकत में यह स्वीकार कर लिया गया है कि मंगल पाण्डेय बलिया के वासी थे।
तेतरी देवी
मंगल पाण्डेय की पौत्रवधू ’’

समूचे देश के लिए आदर्श हैं मंगल पाण्डेय
‘‘ अमर शहीद मंगल पाण्डेय वास्तव में न सिर्फ बलिया बल्कि समूचे देश के लिए एक आदर्श हैं। उन्होंने उस वक्त अंग्रेजों के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार किया, जब कोई उनके खिलाफ बोलने का साहस तक नहीं करता था। जहां तक मंगल पाण्डेय के वंशजों को सुविधा देने का सवाल है, शासन स्तर से जो सुविधाएं मिलती हैं उन्हें दिया जाता है। आगे भी अगर मंगल पाण्डेय के वंशजो को शिकायत होगी तो वे नि:संदेह उनसे कह सकते हैं।
मधुकर द्विवदी
जिलाधिकारी, बलिया’’
नहीं हो सका विकास
‘‘ आजादी की जंग में पहली शहादत देने वाले गांव में विकास की वह धारा प्रवाहित नहीं हो सकी है, जो काफी पहले हो जानी चाहिए थी। शासन तथा प्रशासन स्तर से विकास को लेकर कभी भी रुचि नहीं ली गई। यहां तक कि गांव का स्मारक भी सुरक्षित नहीं है। गांव स्तर से ही प्रतिमा व स्मारक की साफ-सफाई व रंग-रोगन कराया जाता है। मंगल पाण्डेय द्वार के लिए खंड विकास अधिकारी दुबहर से मिलकर वार्ता की गई है। उन्होंने मनरेगा के तहत इसे जल्द बनवाने का भरोसा दिया है।
विनोद कुमार गुप्ता
ग्राम प्रधान नगवां’’
नहीं मिली सुविधाएं
‘‘ वक्त के साथ मंगल पाण्डेय का गांव एक नक्सल प्रभावित गांव हो चुका है। इसके बाद भी इस गांव को शासन-प्रशासन स्तर से वो सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं, जिसका ये गांव हकदार है। गांव में पुलिस चौकी की स्थापना की मांग लंबे अरसे से की जाती   रही है, लेकिन इस पर आज तक अमल नहीं हो सका है। स्मारक तक जाने के लिए आज तक पक्की सड़क नहीं है। ये सड़क निजी जमीन को लेकर खड़े विवाद के चलते है। प्रशासन इसे खत्म करने की कोशिश तक नहीं कर रहा है।
भुनेस्वर पासवान
पूर्व प्रधान, नगवां ’’
हो रहा हरसंभव  प्रयास 
‘‘ अमर शहीद मंगल पाण्डेय बलिया के लिए आदर्श हैं। इनकी यादों को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए जितना हो सकता है, समिति संघर्षरत है। मंगल पाण्डेय के वंशजों को हरसंभव मदद देने में समिति कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती। हमेशा समिति विभिन्न आयोजनों के जरिए इनके परिवार को सम्मानित करती रही है और आगे भी करती रहेगी। ’’
शशिकांत चतुर्वेदी
अध्यक्ष,मंगल पाण्डेय स्मारक समिति
नगवां (बलिया)।

1942 में भी दिखी झलक
‘‘ अमर शहीद मंगल पाण्डेय ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही थे, न कि अंग्रेजी सेना के। जब मंगल पाण्डेय ने बगावत की थी, तब विक्टोरिया ने उसे अपने कब्जे में नहीं लिया था। मंगल पाण्डेय ने न सिर्फ देश की आजादी बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसी बगावत का तेवर 1942 की क्रांति में भी देखा गया। मंगल पाण्डेय को उनका स्थान दिलाने के लिए समिति संघर्षरत है और 1987 से शुरू संघर्ष आज भी अनवरत जारी है। हालांकि वर्ष 1980 में मंगल पाण्डेय का डाक टिकट भी जारी हो चुका है। दुखद ये कि मंगल पाण्डेय के स्मारक के नाम पर एक धूर भी जमीन नहीं मिली है। जो जमीन है वह या तो समिति की है या निजी।
राजकुमार पाण्डेय
मंत्री
शहीद मंगल पाण्डेय स्मारक समिति
कदम चौराहा (बलिया)’’

स्मारक के संरक्षण में कब-कितना खर्च
वर्ष धनराशि (लाख रुपए में)
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1986-87 4.44
1988-89 2.00
1990-91 2.66
1991-92 5.40
1992-93 0.78125
1994-96 4.00
2004-05 2.58
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कुल खर्च 21.86125
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