श्री गणेशाय नमः

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Thursday, January 12, 2012

हाथ खाली, दे ताली

बुनकरों की उम्मीदों पर फिरा पानी
केंद्र सरकार के 6234 करोड़ के पैकेज की हकीकत
हेंडीक्राफ्ट कारपेट को योजना में नहीं किया गया शामिल 
बदहाली की जिंदगी बिता रहे बुनकरों की दर्द-ए-दास्तां
यूपीए सरकार के खिलाफ लामबंद बुनकर सिखाएंगे सबक
केंद्र की यूपीए सरकार से बुनकरों को काफी उम्मीदें थीं। बुनकरों के लिए 6234 करोड़ का बजट की घोषणा सुनते ही बुनकरों की मानों मनमांगी मुराद मिल गई। वहीं जब हकीकत सामने आई तो वह खुद का ठगा हुआ महसूस करने लगे। उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया था। लिहाजा कल तक जो बुनकर अपने जवान बेटे को महानगरों को जाने से रोकने वाले थे, उन्हें कहना पड़ा। जा बेटा, कमाकर लौटना...!
अनीश कुमार उपाध्याय
केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने जब बनुकरों को 6234 करोड़ का राहत पैकेज देने की घोषणा की तो मानों उनकी मनमांगी मुराद मिल गई। बदहाली की जिंदगी बसर कर रहे बुनकरों के सपनों को मानों पंख लग गए। तमाम हसीन ख्वाबों में डूब-उतरा रहे बुनकरों को हालांकि यह संशय बरकरार रहा कि कहीं विस चुनाव को देखकर सरकार उन्हें फिर से छलने तो नहीं जा रही है? कारण कि पिछले दिनों पीएम मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में 2.350 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा के बाद उन्हें इसका कोई लाभ  नहीं मिला था। वही हुआ भी। बीते 19 नवंबर को हुई घोषणा के बाद बुनकरों को राहत के नाम पर एक धेला भी  नसीब नहीं हो सका है। उपेक्षा का आलम यह रहा कि केंद्र सरकार ने जो राहत दी, उसमें मूल बुनकरों को जगह न देकर केवल हैंडलूम के बुनकरों को ही लाभ दिया गया है। मूल हैंडीक्रॉप बुनकर इससे दूर कर दिए गए हैं। जबकि देश में सर्वाधिक हैंडीक्राप बुनकरों की ही तादाद है। लिहाजा चुनावी मौसम में खुद को छले जाने से वह  भी लामबंद होकर सबक सिखाने के मूड में हैं।
क्या है राहत पैकेज
बीते 19 नवंबर को केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने बुनकरों का लगभग 3884 रुपये प्रति बुनकर की कर्जमाफी समेत विभिन्न मदों व योजनाओं के लिए 6234 करोड़ रुपये पैकेज की घोषणा की। उन्होंने घोषणा के दौरान यह तीन बार दोहराया कि संपूर्ण घोषणाओं का जमीनी क्रियान्वयन हर हाल में होगा। इसकी मानिटरिंग वह खुद तथा संबंधित केंद्रीय सचिव संभालेंगे। वहीं उन्होंने बताया कि 15 हजार बुनकर सहकारी समितियों पर 50 हजार रुपये तक के कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। वहीं देश के 14 लाख निजी बुनकरों के भी 50 हजार रुपये तक के बैंक कर्ज माफ होंगे। इनमें तीन लाख बुनकर अकेले उत्तर प्रदेश के लाभान्वित होंगे। वीवर्स के्रडिट कार्ड योजना की शुरुआत करते हुए महज तीन फीसदी ब्याज पर दो लाख रुपये तक बैंक कर्ज देने की भी बात कही। तीन तरह के हैंडलूम क्लस्टर बनाने तथा 25 हजार लूम लगाने, वाराणसी, मुबारकपुर, बिजनौर, बाराबंकी में चार समूह, जिनमें हर को भारत सरकार की ओर से दो-दो करोड़ रुपये के अंश के साथ पांच हजार हथकरघे लगाने आदि का भी उन्होंने भरोसा दिया था। कुल मिलाकर सारी सुविधा हैंडलूम उद्योग को दी गई, हैंडीक्राफ्ट बुनकरों के हाथ कुछ नहीं लगा।
क्या है हकीकत
कालीन उद्योग में कभी डॉलर बेल्ट के नाम से विख्यात भदोही कारपेट इंडस्ट्री मौजूदा वक्त में विश्व आर्थिक मंदी की तपिश से झुलस रही है। कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक आज से करीब दो वर्ष पूर्व तक भारत से पूरी दुनिया को होने वाले कालीन का निर्यात 2200 करोड़ रुपये सालाना का था। इसमें 1800 करोड़ रुपये की कालीन अकेले भदोही (अब संत रविदासनगर) और मिर्जापुर से जाती थी। यही नहीं, अमरिका को भारत से होने वाले कालीन के निर्यात में 60 फीसदी हिस्सेदारी सिर्फ भदोही और मिर्जापुर की होती थी। वहीं आज यह घटकर बुमुश्किल से 30 फीसदी ही रह गई है। वाराणसी और प्रतापगढ़ के बीच बसे भदोही की समूचे एशिया में अपनी अलग धाक थी। वहीं मौजूदा हालात यह है कि यूरोप और अमेरिका में आई आर्थिक मंदी की आंच इस डॉलर बेल्ट में न सिफ महसूस की जाने लगी है, बल्कि अब तो यह स्थिति काफी दयनीय हो चुकी है। इसका एक कारण यह भी है कि कालीन लक्जरी आइटम है। भदोही, मिर्जापुर की बनी हैंड नाटेड, हैंड ओवन, फ्लैटी (दरी), हैंड टफटेड कारपेट की नजाकत ने हमेशा ही पूरी दुनिया में धूम मचाया, वही आज गर्त में जा रहा है।
हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी कमाई नहीं
भदोही जिले के जमुआ गांव के निवासी सुभाष विगत चार दशक से कालीन उद्योग में रत हैं। उनके बच्चे और सारा परिवार यही कार्य करता है। पूरा कुनबा मिलकर हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पा रहे। तीन हजार करोड़ रुपये के इस उद्योग में ऐसे 20 लाख लोग जुड़े हैं। इसमें जुड़े सभी की एक समान मजदूरी पर नजर डालें तो एक आदमी के पास महज एक हजार रुपये जाते हैं। इसमें से भी कच्चे माल का खर्च निकाल दें तो मजदूरों के पास इसका 40 प्रतिशत यानी महज 400 रुपये बचते हैं। इस कमाई में भी कई तरह की अड़चने हैं। कालीन निर्यातक, शिपिंग, ठेकेदार, दलाल आदि की कमाई को इसमे से अलग कर दिया जाए तो आंकड़ा यही होगा कि इनके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं बचती। लिहाजा बुनकरों के युवा बच्चे नौकरी की तलाश में परंपरागत कालीन उद्योग को छोड़कर निजी कंपनियों में नौकरी को बेहतर मानने लगे हैं। इससे तीन हजार करोड़ रुपये के परंपरागत कालीन उद्योग में मजदूरों की कमी के चलते भी संकट खड़ा हो गया है। भले ही इस पलायन को रोकने के लिए सरकार इन युवाओं, महिलाओं, युवतियों को प्रशिक्षण देने के लिए ट्रेनिंग सेंटर चलाने की कवायद कर रही है, लेकिन इतनी कम मजदूरी में कोई मजदूर काम करने के लिए तैयार होते नहीं दिख रहे।
सुंदर कालीन का सच
भारत के सुंदर कालीनों को देखकर कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि यह हाथ गुथी कविता है। अक्सर लोग सुंदर कालीन को देखकर यह सोचते हैं कि इसके काम को करने वाले भी सुंदर (खुशहाल) होंगे। निर्यातक भी कहते हैं कि वह इसके जरिए लाखों घरों का चूल्हा जलवाते हैं। लिहाजा सरकार को निर्यातकों को रियायत देनी चाहिए। सरकार भी कालीन उद्योग को महत्वपूर्ण उद्योगों का दर्जा तो देती है, लेकिन कभी सरकार या उसके नुमाइंदों पर इसका कोई असर नहीं है। केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने बुनकरों को जो राहत दी है, वह छल है। कालीन उद्योग की दो शाखाएं हैं। एक हैंडीक्रॉप और दूसरा हैंडलूम। दोनों उद्योग भी वस्त्र मंत्रालय के अधीन ही आते हैं। शासन ने जो बजट दिया है, वह केवल हैंडलूम व्यवसाय के लिए है। फिलहाल कोई सबसे अधिक परेशान है तो वह है हैंडीक्राप बुनकर। इनके घरों में कई-कई दिन चूल्हे नहीं जलते। मार्केट में इन्हें काम भी आसानी से नहीं मिलता। विदेशों में एक्सपोर्ट में भी कमी आई है।
पूर्व की घोषणा में नहीं मिली फूटी कौड़ी
कालीन उद्योग ग्रामीण रोजगारपरक योजना (कुटीर उद्योग) है। पांच से सात लाख बुनकरों का कुनबा इसी पर आश्रित है, जो बदहाल है। यूरोप में आई मंदी से कालीन उद्योग चौपट हो गया है। वर्ष 2009 में महिलाओं को इस क्षेत्र में लाने की पहल की गई। कारण कि पुरुषों की अपेक्षा महिला और लड़कियों के इस व्यवसाय में आने से इसके विकास होने की उम्मीद जगी थी। सरकार के ओर से तब 140 करोड़ रुपये का जो बजट दिया गया, उसमें 70 रुपये मिर्जापुर भदोही और इतनी ही रकम काश्मीर के बुनकरों को देने की बात हुई। दो वर्ष से अधिक बीत गया, पर इस पर आज तक सरकार ने अमल नहीं किया है। बुनकरों को इस मद में एक धेला भी नसीब नहीं हुआ। कालीन उद्योग एक तरह से उधार के धंधे पर चलता है। यानी माल उठने के बाद उसे बेचकर ही कालीन व्यवसायी कालीन कारीगरों को भुगतान करते हैं। टाइम गारंटी लोन 1994 में लागू हुआ, जिसे सरकार ने 2002 में बिना कारण बताए बंद भी कर दिया। ऐसे में वर्ष 2008 में बुनकरों ने एक बार फिर इसकी मांग उठाई, लेकिन इस पर केंद्र सरकार ने कोई अमल नहीं किया। 
भ्रष्टाचार की घुसपैठ
कुल मिलाकर कालीन उद्योग अकेले पूर्वांचल में 3500 करोड़ रुपये का विदेशी व्यवसाय मुद्रा देता था। मंदी के बावजूद यह करीब तीन हजार करोड़ का विदेशी मुद्रा देने वाला कारोबार है। रुपये के 20 प्रतिशत अवमूल्यन से इसमें गिरावट आई है। इतना लाभ देने के बावजूद बुनकरों के हिस्से में केवल फांकाकशी ही नसीब होती है। मूल बुनकरों की दशा में कोई सुधार नहीं है। सरकार ने वर्तमान में राहत पैकेज दिया भी है तो इसमें कालीन बुनकरों को दूर कर दिया गया है। इनके लिए भारत सरकार ने कोई कर्जमाफी भी नहीं दी है। वहीं घोषणाओं में जिसको लाभ मिलना बताया जा रहा है, वह भी लाभ से वंचित हैं। यदि बुनकरों की बातों पर यकीन करें तो हकीकत बस इतनी है कि घोषणाओं पर क्रियान्वयन या तो वक्त पर नहीं होता या इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार से सही पात्र को इसका लाभ नहीं मिलता।
खुदकुशी को विवश बुनकर 
बीते वर्ष वाराणसी के गौरगांव निवासी बुनकर सुरेश राजभर अपनी पत्नी हीरामनी एवं सात वर्षीय पुत्र छोटू की हत्या कर खुद फांसी पर झूल गया। कर्ज के बोझ तले दबे सुरेश के सामने जीने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था। मऊ के ग्राम अतरारी निवासी बुनकरों से विद्युत बकाया वसूली के लिए तहसीलकर्मियों ने जमकर उत्पीड़न किया। बुनकरों पर फर्जी मुकदमें लादे गए। इस मुद्दे पर सपा समेत अन्य विपक्षी दलों ने सूबे की सत्तासीन बसपा सरकार की मुखिया मायावती को घेरा, लेकिन बुनकरों की आत्महत्या की वजह भुखमरी मानने से सरकार ने इंकार कर दिया। चंदौली, मऊ, आजमगढ़, टाडा, मऊरानीपुर, ललितपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, भदोही एवं पिलखुआ के बुनकर गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। हथकरघा बुनकर दिहाड़ी मजदूर बन चुके हैं। पिछले एक वर्ष में लगभग छह हजार बुनकरों के रोजी-रोटी की तलाश में सूरत, मुंबई, कोलकाता, दिल्ली जैसी जगहों पर पलायन करने की सूचना है। 
इनसेट...
इतिहास के आइने में कालीन उद्योग
भारत में कालीन बनाने की परंपरा मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में शुरू हो गई थी। यह कालीन कई तरह से बनाये जाते थे। गुजरात के बड़ौदा में बने कालीन की खासियत यह थी कि इसे लगभग 20 लाख मोतियों, हीरा, नीलम, माणिक्य, पन्ना जैसी कीमती पत्थरों से सजाया जाता था। बसरा मोती के नाम से जाने जाने वाले छोटे प्राकृतिक मोतियों को ईरान की खाड़ी से निकाला गया था, लिहाजा इसे पर्ल कार्पेट भी कहा जाता था। इस कालीन को सजाने के लिए  सोने का भी प्रयोग होता था। 1860 के दशक में तैयार होने वाला यह कालीन लाल और नीले रंग से तैयार होता था। इसमें घुमावदार बेल-बूटे बनाए जाते थे। भदोही के कालीन का इतिहास करीब 250 साल पुराना है। 18 वीं सदी में भदोही जिले के माधोसिंह इलाके में आए ईरान के कालीन बुनकरों ने यह फन स्थानीय लोगों को दिया। 
इनसेट...
कहां-कहां बनते हैं कालीन
भारत में जम्मू-काश्मीर का नाम कालीन निर्माण में सबसे ऊपर है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात में भी उम्दा किस्म व डिजाइन के कालीन बनते हैं। कालीन की कई किस्मे हैं। हाथ से बना ऊनी कालीन, सिल्क कालीन, सिंथेटिक कालीन, ऊनी दरी की बाजारों में काफी मांग है। कारपेट डिजाइन के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट आफ कारपेट टेक्नालॉजी चौरी रोड भदोही (उप्र), इंडियन  इंस्टीट्यूट आफ कारपेट टेक्नालॉजी जम्मू एंड काश्मीर, श्री जेजे इंस्टीट्यूट आफ अप्लाइड आर्ट मुंबई, मुंबई विश्वविद्यालय, कॉलेज आफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स, जामिया मिलिया इस्लामिया जामिया नगर दिल्ली में प्रशिक्षण दिया जाता है।
वर्जन...
महिलाओं की बढ़े भागीदारी
सरकार ने जो राहत पैकेज घोषित किया है हकीकत यह है कि यह असली बुनकरों को लाभ नहीं पहुंचाएगा। यूपीए सरकार बुनकरों के कल्याण की दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। विवश बुनकर रोजी-रोजगार के लिए महानगरों को पलायन कर रहे हैं। वैसे भी कालीन व्यवसाय रेगुलर नहीं चलता। मजदूरी बढ़ी है, लेकिन बुनकरों की दशा में कोई सुधार की पहल नहीं हुई है। जरूरत है कि मूल कालीन बुनकरों को पावरलूम बुनकरों की तरह ही पैकेज का लाभ मिले। महिलाओं की इसमें भागीदारी बढ़ाई जाए। इनके लिए टेÑनिंग सेंटर खोले जाएं। वैसे हमारा संगठन इसके लिए आवाज उठा रहा है। सुधार प्रक्रिया जारी है।
ओएन मिश्रा,
अध्यक्ष, आल इंडिया कारपेट मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (एक्का)

चुनाव में सिखाएंगे सबक
हकीकत यही है कि छोटे बुनकरों जिन पर कालीन उद्योग की नींव टिकी है, उन्हें अब सरकार से कोई राहत की उम्मीद नहीं दिख रही। इंटरनेशनल मार्केट में बढ़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत के बुनकर बदहाल हैं। टर्की, चायना आदि कालीन के सबसे बड़े खरीददार हैं। यहां बिक्री में कई रुकावटे हैं। इन्हें दूर किया जाना चाहिए। नाराज बुनकर विधानसभा चुनाव में केंद्र की यूपीए सरकार को सबक सिखाएंगे। हालांकि अभी यह तय नहीं हो सका है कि बुनकरों को हमारा संगठन किस दल या प्रत्याशी को समर्थन देगा।
हाजी अब्दुल हादी अंसारी
मानद सचिव,
आल इंडिया कारपेट मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (एक्का)

राहत के नाम पर छल
केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने मूल बुनकरों से राहत के नाम पर छल किया है। यह बजट हैंडलूम व्यवसाय के बुनकरों को लिए है, हैंडीक्राफ्ट बुनकरों के लिए नहीं। हैंडीक्राफ्ट बुनकरों की भी आर्थिक स्थिति बदहाल है। बाजार में उनके लिए काम के अवसर नहीं है। एक्सपोर्ट में भी बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। पानीपत, जयपुर, राजस्थान, भदोही सभी जगहों पर एक सी स्थिति है। हकीकत यह है कि बुनकरों की लड़ाई लड़ने वाला कोई मजबूत संगठन नहीं है, जिससे यह अपनी आवाज सरकार के कानों तक पहुंचा सकें।
साजिद हुसैन,
कालीन व्यवसायी, भदोही

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