प्रकृति। जिसकी गोद में बसी हरियाली। ऊंचे पर्वत। झर-झर बहते झरने। कल-कल करती बहती नदियां। नदियों के किनारे साधना में लीन साधु-संत...। अद्भूत नजारा होगा है न...। पर जरा सोंचिए। जब इनकी जगह पर दूर-दूर तक केवल और केवल रेगिस्तान ही नजर आए। न कहीं हरियाली हो न नदियां, झील, तालाब, पोखरे वगैरह-वगैरह। तब जीवन नि:संदेह नीरस हो जाएगा। अगर ऐसा नजारा आने वाली आपकी पीढ़ियों को दिखेगा तो वे नि:संदेह आपको उस सम्मान की नजर से नहीं देख पाएंगे, जिसके आप हकदार है। यां यूं कहिए, जिसकी आपने आस लगा रखा है।
प्रकृति के अंधाधुंध दोहन, धरा से दिनोंदिन कम होती हरियाली, बांधों के जरिए नदियों के प्रबल, अथाह वेग को रोकने की कोशिश वगैरह-वगैरह ने प्रकृति के उस नजारों को रेगिस्तान के नजारों में बदलने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। अपने निजी स्वार्थ के लिए हम दिनोंदिन प्रकृति का इतना दोहन कर रहे हैं कि प्रकृति जितना उत्पादन कर रही है, उससे कई गुना हम अपने स्वार्थ के लिए उसे मिटाते जा रहे हैं। कहा जाता है कि किसी भी चीज को एक हाथ से दो तो दूसरे हाथ से लो। प्रकृति के साथ भी यह शत-प्रतिशत खरा उतरता है। पौध रोपेंगे तो वही विशालकाय वृक्ष बनेंगे। हरियाली देंगे, छाया देंगे और प्रकृति में जीवन के लिए वह हर चीजें उपलब्ध कराएंगे जिसकी धरती पर दिनोंदिन कमी आती जा रही है। पर्यावरण में आते बदलाव पर अंकुश लगेगा तो आकाश में बने ओजोन की परत में छेद की भी सहज ही भरपाई संभव हो सकेगी। प्रकृति की सुंदरता वैसे भी वह चीज है जिसने हर किसी का मन मोहा है। चाहें वह प्रकृति की गोद में बैठा कवि हो, कलाकार हो या फिर परिवार के साथ पिकनिक मनाने किसी पिकनिक स्पॉट पर निकला व्यक्ति। ऐसे में प्राकृतिक नजारे उसे सहज ही अपनी ओर खींचते हैं। कवियों की कल्पना को साकार रूप मिलता है तो किसी चित्रकार की कूची को सहज ही एक नया आयाम। प्रकृति की सुंदरता न सिर्फ बच्चों को भाती है बल्कि युवा, अधेड़, बुजुर्ग हर किसी की आंखों को वह शीतलता प्रदान करती है, जिसकी मनुष्य मानों लंबे अरसे से प्रतिक्षा करता हो। आखिर वह करे भी तो क्यों न करे। इस भागमभाग और महानगरीय जीवन ने उसे इतना व्यस्त कर दिया है कि उसे अब तो न प्रकृति की गोद में बैठने का अवसर है और न ही वह उसके लिए समय निकाल ही पाता है। आर्थिक प्रभुता वाले इस वक्त में प्रकृति को निहारने के लिए भले ही किसी के पास वक्त न हो, लेकिन उसके दिल से पूछिए वह हर वक्त इन नजारों को अपनी आंखों के झरोखों में कैद रखना चाहता है। ऐसे में जरूरत है तो बस और बस केवल प्रकृति की रक्षा का। इसके लिए हम सभी को संकल्प करना होगा कि प्रकृति की रक्षा हम उस मां की तरह करेंगे, जिसने हमे जन्म देने के साथ ही पालन-पोषण किया और उस काबिल बनाया कि हम खुद अपना भरण-पोषण कर सके। वक्त हमे पुकार रहा है कि प्रकृति की रक्षा की मुहिम में प्राण-प्रण से जुटो। इसे आंदोलन का रूप दो। नियम, कायदे, कानून सभी धरे रह जाते हैं। केवल और केवल व्यक्ति का आत्मविश्वास, उसकी अपनी सोंच और किसी कार्य के प्रति उसकी अपनी लगन ही उसे मुकाम देती है। प्रकृति की रक्षा की इस मुहिम में जुटने के लिए न किसी नारे की जरूरत है और न किसी आंदोलन की। अगर मौजूदा वक्त में जरूरत है तो केवल और केवल अपने आप में बदलाव लाने की। वक्त रहते सचेत होने की। अपने वंशजों को वैसी विरासत सौंपने की जिसमें हरियाली हो। झर-झर बहते झरने हो। अविरल प्रवाह के साथ बहती गंगा, गोमती, यमुना आदि नदियां हों। हिलोरे लेते समुद्र हों। इसे केवल एकमात्र संकल्प शक्ति से ही बरकरार रखा जा सकता है। अगर इसके बाद भी मानव नहीं चेते तो सभी प्राणियों में बुद्धिजीवी गिना जाने वाला मानव अपने इस अकाट्य सत्य से दूर हो जाएगा। तब इस धरा पर केवल बचेगा तो महाविनाश...!महाविनाश...!महाविनाश...! ...और इसके अलावा कुछ नहीं।

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