श्री गणेशाय नमः

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Sunday, May 19, 2013

यूं न भोजपुरी को बिसराएं


अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
भोजपुरी लोकभाषा एवं जनभाषा है। इसमें जनजीवन के संवेदनात्मक अनभूतियों का काफी मार्मिक, विश्वसनीय चित्रण दिखता है। हालांकि वर्तमान में एक ऐसा दौर चल पड़ा है, जिसमें भोजपुरी को नितांत ही फूहड़, अश्लील माना जा रहा है। इससे उसका अतीत और भविष्य अंधेरे में जाता दिखने लगा है। हकीकत में ऐसा भोजपुरी को बढ़ावा देने के नाम पर किया जा रहा है, जिससे उसे बढ़ावा तो नहीं मिल रहा, बल्कि कभी अपनी मीठी जुबान से लोगों के कानों में मिश्री घोलने वाली भाषा आज तिरस्कार की नजरों से ज्यादा देखी जा रही है। यदि हम भोजपुरी भाषा में बनी फिल्मों की चर्चा करें, तो इसकी शुरूआत होती है वर्ष 1963 में, जब विश्वनाथ शाहाबादी ने भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ से की थी। हालांकि एक समय ऐसा भी आया, जब भोजपुरी क्षेत्र के कई कवि, लेखक, कलाकार मुंबई की सिनेमाई चमक-दमक में स्टार बनकर उभरे।

मोती बीए का जलवा 

मोती बीए
देवरिया के बरहज के मोती बीए को हिंदी फिल्मों में भोजपुरी गीतों के प्रचलन कराने का श्रेय दिया जाता है। यह वह काल था, जब इस भाषा की मिठास को देश के कोने-कोने के लोगों ने न सिर्फ सराहा, बल्कि जमकर गुनगुनाया भी। जनवरी 1961 में नजीर हुसैन की अगुवाई में ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण की योजना बनी और महज दो साल बाद वर्ष 1963 में यह फिल्म बनारस में प्रदर्शित हो गई। इसके बाद तो मानों भोजपुरी के स्वर्णिम काल की शुरुआत का बोध होने लगा। इसके बाद एक-एक कर कई भोजपुरी फिल्में सुनहले पर्दे पर आने लगी। इनमें ‘विदेशिया’, ‘लागी नाही छूटे रामा’, ‘नईहर छूटल जाय’, ‘हमार संसार’, ‘बलमा बड़ा नादान’, ‘सीता मईया’, ‘सईयां से अइसे मिलनवा’, ‘भौजी’, ‘गंगा’ आदि फिल्मों की धड़ाधड़ प्रस्तुति के बाद अन्य फिल्म निर्माताओं का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ और इसी थीम पर आज भी कई फिल्में बन रही हैं।

फिल्मों में भोजपुरी की भूमिका 

बानगी के तौर पर ही लें तो ‘नदिया के पार’ भोजपुरी फिल्म की थीम पर ही माधुरी दीक्षित-सलमान खान अभिनीत ‘हम आपके हैं कौन’ फिल्म बनी है। हां, इतना जरूर है कि इसमें गंवई संस्कृति को न दर्शाकर आधुनिक शहरी जीवन को दिखाया गया है। ‘विदेशिया’ में भोजपुरी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाटककार व कवि भिखारी ठाकुर को गाते दिखाया गया है, जो आज भोजपुरी समाज के लिए अपने आप में एक दुर्लभ दस्तावेज है। अगर भोजपुरी को सिनेमा जैसा माध्यम नहीं मिला होता, तो भोजपुरी के शेक्सपीयर माने जाने वाले इस महान नाट्यकर्मी को परदे पर जीवित देखने का मौका भोजपुरियों को शायद ही मिल पाता। हालांकि यह भी सत्य है कि भोजपुरी सिनेमा के पहले दौर में जो फिल्में प्रदर्शित हुईं, उनमें अधिकांश का मकसद समाज में व्याप्त दहेज, नशाखोरी, छुआछूत, आर्थिक विषमता और पूंजी की संस्कृति पर प्रहार करना था। 

द्विअर्थी संवादों ने किया बेड़ा गर्क

आज जब हम 21 वीं सदी की भोजपुर की दशा और दिशा पर गौर करें, तो आज के कलाकार जैसे वह चाहें मनोज तिवारी हों, निरहुआ या फिर गुड्डू रंगीला। इन भोजपुर गायकों ने अपनी गायकी में द्विअर्थी संवादों का ऐसा घाल-मेल किया है कि कभी मिठास की पहचान रही, भोजपुरी आज अश्लीलता का दर्जा पा चुकी है। जिन्हें आज भी मोती बीए, बलेसर, भरत शर्मा, शारदा सिन्हा याद हैं, उनके लिए भोजपुरी आज भी कानों में मिश्री घोलने वाली मीठी बोली ही है। अगर भोजपुरी भाषा की तह में जाएं, तो एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि वैश्वीकरण के दौर में भोजपुरी ने अपने मूल्यों की स्वीकार्यता के लिए ऐसा सब कुछ किया है। यहां बाजारवाद को ऐसा चलन चल पड़ा है कि यहां जो बिकने लायक लगा, उसे ही गाया गया और सुनहले पर्दे पर उसे ही परोसा गया। यह भी सच है कि यदि भोजपुरी की अश्लीलता और द्विअर्थी गीत अगर बिकते हैं, तो इसकी सरलता, संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई को चाहने वाले न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी बड़ी संख्या में है।

आखिर क्यों नहीं मिला मुकाम 

भोजपुरी में सबसे बड़ी कमी इसमें प्रकाशित उच्च श्रेणी के साहित्य का अभाव है। भोजपुरियों को अपनी भाषा के प्रति इतना अनुराग होने पर भी यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इस भाषा को वह मुकाम आज तक नहीं मिल सका, जिसकी यह अधिकारिणी है। यह सही है कि आज के दौर में चाहें वह कस्बाई, नगरीय या महानगरीय संस्कृति में रचा-बसा शहर हो, वहां आपको भोजपुरी कैसेट बजते आसानी से सुनने को मिल सकते हैं। चाहें उसे बजाने वाले पूर्वांचल के गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, बनारस, गाजीपुर, मऊ या फिर बिहार राज्य के वाशिंदे ही क्यों न हो, आज अश्लील और फूहड़ गाने ही ज्यादा सुने जाते हैं। आखिर इसके श्रोता करें भी तो क्या, सच्चाई यह है कि आज शारदा सिन्हा, भरत शर्मा जैसे गायक मिल ही कहां रहे हैं, जिन्होंने अच्छे गीतों को रचा। इस समय जो भोजपुरी के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है, उससे भोजपुरी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि हर जगह की सभ्यता और संस्कृति पर इसका दुष्प्रभाव साफ देखा जा सकता है। इन गानों को सुनने वाला श्रोताओं में अधिकांश वह है, जो अपनी श्रम शक्ति बेचता है। उसके जीवन में मनोरंजन का कोई दूसरा साधन उपलब्ध नहीं है। रिक्शा चालक, आटो चालक, ट्रक चालक, मजदूर ऐसे गानों को तेज कानफाड़ू आवाज में सुनना अपनी शान समझता है। ऐसे में समाज के जागरूक लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे समाज में इस अपसंस्कृति के खिलाफ आगे आएं।

भोजपुरी भाषा का इतिहास

भोजपुरी हिंदी के बाद दूसरे भारतीय भाषाओं के बीच सबसे बड़ी है। हालांकि इसे अभी प्रतीक्षा है, जब भारत सरकार एक आधिकारिक भाषा के रूप में भोजपुरी को पहचान देगी। भोजपुरी भाषा का इतिहास सातवीं सदी से शुरू होता है। करीब 1100 वर्ष पूर्व गुरु गोरखनाथ ने गोरख बानी की रचना की थी। संत कबीरदास, जिनका जन्म 16 जुलाई 1297 को हुआ था, उनका जन्म दिवस विश्व भोजपुरी दिवस के रूप में भारत में मनाया जा रहा है। जहां तक भोजपुरी भाषा के नामकरण का सवाल है, तो इसका नामकरण बिहार राज्य कें आरा (शाहाबाद) जिले में स्थित भोजपुरी नामक गांव के नाम पर हुआ है। पूर्ववर्ती आरा जिले के बक्सर सब डिविजन (अब बक्सर जिला अलग हो गया है) में भोजपुर नाम का एक बड़ा परगना है, जिसमें  नवका भोजपुर  और पुरनका भोजपुर  दो गांव हैं। मध्य काल में इस स्थान को मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने बसाया था। उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर भोजपुर रखा था। इसी कारण इसके पास बोली जाने वाली भाषा का नाम भोजपुरी पड़ गया।

पांच करोड़ लोगों की है भाषा

भोजपुरी भाषियों की संख्या भारत की समृद्ध भाषाओं बंगला, गुजराती और मराठी आदि बोलने वालों से कत्तई कम नहीं है। इस दृष्टि से इस भाषा का महत्व काफी अधिक हो जाता है। भोजपुरी भाषाई परिवार के स्तर पर एक आर्य भाषा है और मुख्य रुप से पश्चिम बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी झारखण्ड क्षेत्रों में बोली जाती है। आधिकारिक और व्यवहारिक रूप से भोजपुरी हिंदी की एक उपभाषा या बोली है। भोजपुरी अपने शब्दावली के लिए मुख्यत: संस्कृत एवं हिंदी पर निर्भर है। कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण कर लिए हैं।भोजपुरी जानने-समझने वालों का विस्तार विश्व के सभी महाद्वीपों पर है। इसका मुख्य कारण है ब्रिटिश राज के दौरान उत्तर भारत से अंग्रेज जब इन्हें मजदूर के रूप में ले गए, तो उनके वंशज अब भी वहीं हैं। इनमें सूरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो, फिजी आदि देश प्रमुख है। भारत के जनगणना आंकड़ों के अनुसार भारत मे लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। पूरे विश्व मे भोजपुरी जानने वालों की संख्या लगभग पांच करोड़ है। इसके अलावा कलकत्ता (अब कोलकाता) नगर में बंगाल के ‘चटकलों’ में, असम राज्य के चाय बगानों में और बंबई के अंधेरी और जोगेश्वरी नामक स्थानों में लाखों की संख्या में भोजपुरी भाषी लोग रहते हैं। इतना ही नहीं, मॉरिशस, फिजी, ट्रिनीडाड, केनिया, नैरोबी, ब्रिटिश गाइना, दक्षिण अफ्रीका, बर्मा (टांगू जिला) आदि देशों में काफी बड़ी संख्या में भोजपुरी लोग रहते हैं।

अपनी लिपी करनी होगी विकसित

भोजपुरी भाषा में निबद्ध साहित्य हालांकि अब तक प्रचुर मात्रा में नहीं उपलब्ध है और अभी तक भोजपुरी की अपनी न तो कोई लिपी विकसित हो सकी है और न ही इसकी कोई डिक्सनरी ही है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि भोजपुरी जल्द ही अपना मुकाम पा जाएगी। वर्तमान में जो प्रयास हो रहे हैं, वह नाकाफी है। जब तक समूचा भोजपुरी समाज जागेगा नहीं और भोजपुरी को उसका असली हक दिलाने के लिए अपना योगदान नहीं देगा, भोजपुरी को मुकाम मिलना कठिन ही नहीं, असंभव होगा। हालांकि यह सत्य है कि अनेक सरस कवि और लेखक भोजपुरी भाषा को समृद्ध करने की कोशिश में जुटे हैं। भोजपुरिया या यूं कहें भोजपुरी प्रदेश के निवासी लोगों को अपनी भाषा से बड़ा प्रेम है। कई पत्र-पत्रिकाएं आज भोजपुरी भाषा में देवनागरी लिपी में लिखी जा रही हैं। भोजपुरी सांस्कृतिक सम्मेलन वाराणसी इसके प्रचार में लगा है। विश्व भोजपुरी सम्मेलन समय-समय पर आंदोलनात्मक, रचनात्मक और बैद्धिक तीन स्तरों पर भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में निरंतर जुटा हुआ है। देवरिया (यूपी), दिल्ली, मुंबई, कोलकता, पोर्ट लुईस(मारीशस), सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और अमेरिका में भी इसकी शाखाएं खोली जा चुकी हैं।

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