गाजीपुर की पहली प्रोटेस्टियन चर्च का है गौरवशाली इतिहास
धनाभाव के चलते आज बदहाली पर बहा रही आंसू
अनीश कुमार उपाध्याय / गाजीपुर
नगर के प्रोटेस्टियन चर्च का गौरवशाली इतिहास है। यही वह स्थल है जहां ब्रिटिश हुक्मरानों के सिर श्रद्धा से झुक जाया करते थे। इस बात की गवाह है वहां पत्थरों पर खुदी इबारतें, उसकी दीवारें व मीनार। अफसोस...पूर्वांचल का यह पहला चर्च इन दिनों उपेक्षा का शिकार है। पूरे 22 बीघा क्षेत्रफल में स्थापित इस चर्च के लिए आज न कायदे का संपर्क मार्ग है और न ही स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था।
अनीश कुमार उपाध्याय / गाजीपुर
नगर के प्रोटेस्टियन चर्च का गौरवशाली इतिहास है। यही वह स्थल है जहां ब्रिटिश हुक्मरानों के सिर श्रद्धा से झुक जाया करते थे। इस बात की गवाह है वहां पत्थरों पर खुदी इबारतें, उसकी दीवारें व मीनार। अफसोस...पूर्वांचल का यह पहला चर्च इन दिनों उपेक्षा का शिकार है। पूरे 22 बीघा क्षेत्रफल में स्थापित इस चर्च के लिए आज न कायदे का संपर्क मार्ग है और न ही स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था।
वर्ष 1962 में बना जिले का इकलौता सेंट थॉमस चर्च है, जहां ब्रिटिश हुकूमत की कई बड़ी शख्सियतें प्रार्थना कर चुकी हैं। चर्च कंपाउंड में लगे पत्थर आज भी इसकी एतिहासिकता की कहानी को बयां कर रहे हैं। अपने जमाने में चर्चित हस्तियां यहां के कंपाउंड में दफन हैं। पत्थरों पर अंकित उनके नाम, पदनाम आदि इन हस्तियों के अतीत को अपने में समेटे हैं। इनमें तत्कालीन आईसीएस राबर्ट ओसवाल्ड डगलस, कैप्टन एन प्लैंटा गैनेट राबिन हुड होस्टिंगलस समेत गोरी हुकूमत के तत्कालीन जिला जज रहे एसिहेकिग्ड की धर्मपत्नी एली अलेक्जेंडर की स्मृति में चर्च की दीवारों पर पत्थर लगे हैं। पत्थरों पर यहां तक जानकारी दी गई है कि डगलस की मौत कालरा की वजह से हुई। पादरी रेवरेंट अभय सोंस ने बताया कि यह चर्च शुरू में प्रोस्टेटियन विचारधारा के मैथाडिस्ट संस्था के अधीन निर्मित हुआ था। तदुपरांत वर्ष 1978 में यह चर्च ऑफ नार्थ इंडिया संस्था से जुड़ा। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत में चर्च में वह सारी चीजें सुलभ थीं, जो होनी चाहिए। आजादी के बाद जब ब्रितानी यहां से कूच कर गए तो दिनोंदिन चर्च की दुर्दशा होती गई। यहां तक कि पादरियों के रहने वाली कोठी (पार्सनेज) आज बदहाल हो चुकी है। आलम यह है कि यहां की दीवारें, छत जर्जर हैं। वहीं पोर्टिको जमींदोज हो चुका है। रख-रखाव के बाबत जानकारी दी कि हर रविवार को होने वाली प्रार्थना सभा में शामिल होने वाले लोगों के सहयोग से मिली धनराशि से ही सारा कार्य कराना पड़ता है। पिछले वर्ष एक लाख 22 हजार रुपये से चर्च के एक ध्वस्त हिस्से का निर्माण कराया गया। स्वीकार किया कि चर्च ऑफ नार्थ इंडिया की इलाहाबाद ब्रांच से दो-तीन वर्षों के अंतराल पर थोड़ी-बहुत सहायता राशि जरूर मिलती है। इससे पर्याप्त कार्य नहीं कराया जा सकता। श्री सोंस ने कहा कि पुलिस अधीक्षक एल रविकुमार भी नियमित रूप से हर रविवार को चर्च पर प्रार्थना के लिए आते हैं। यहां के पाश्टर अभय सोंस ने बताया कि प्रतिवर्ष क्रिसमस, गुड फ्राइडे, ईस्टर व मंडे ईस्टर फेयर मनाया जाता है। चर्च कंपाउंड में रहने वाले लोगों की पुत्रियों की शादी भी यहीं होती है।
इनसेट...
हिंदू था पहला पादरी
चर्च के इतिहास में भारतीयों के लिए गौरव की बात यह है कि इस चर्च के पहले पादरी बनने का सौभाग्य ब्रिटिश हुकूमत में एक हिंदुस्तानी चंद्रिका प्रसाद को मिला। चर्च के वर्तमान पादरी रेवरेंट अभय सोंस ने बताया कि चंद्रिका प्रसाद पहले हिंदू थे। तदुपरांत ईसाई धर्म को अपनाया और वर्ष 1934 में पादरी बने। इसके पूर्व यहां किसी अन्य के पादरी होने का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता। ऐसे में इन्हें ही पहला पादरी माना जाता है।
(यह खबर दैनिक जागरण के वाराणसी संस्करण अंतगर्त गाजीपुर जिले में 28 जुलाई 2009 को प्रकाशित हुई थी।)
भृगु नगरी को आज भी दाढ़ी जैसे व्यक्तित्व की तलाश
जनता पार्टी के कभी अलंबरदार रहे चंद्रशेखर
वैश्विक व्यक्तित्व का अभी नहीं दिख रहा कोई प्रत्याशी
बलिया। लोकसभा चुनाव हो और दाढ़ी की चर्चा सियासी गलियारों में न गूंजे। शायद आगे के एक दशक तक ऐसा संभव भीनहीं है। दाढ़ी यानी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर का वैश्विक व्यक्तित्व आज के जनप्रतिनिधियों के लिए आदर्श है। यह दीगर है कि बलिया में उनकी विरासत पर उनके पुत्र ही काबिज हैं, फिर भी भृगुनगरी को आज भी दाढ़ी सरीखे व्यक्तित्व की तलाश है। चंद्रशेखर ने जिन संघंर्षों से यह मुकाम हासिल किया था, शायद कमजोर साहस वाला कभी का राजनीति से तौबा कर चुका होता।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण से राजनीतिक गुर सीखने वाले चंद्रशेखर भले ही आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें इस लोस चुनाव में लोगों की जुबां पर तैर रही हैं। उनका वैश्विक व्यक्तित्व, उनके विचार, उनकी राष्ट्रीय सोच, आज भी जनपदवासियों के जेहन में उसी तरह सुरक्षित है, जैसी चंद्रशेखर के जीवित रहते हुआ करती थी। चंद्रशेखर की असली परीक्षा जनता पार्टी के टूटने के बाद शुरू हुई। जुलाई 1979 में चौधरी चरण सिंह पार्टी से निकाले गए। इसी वर्ष अगस्त में मोरारजी देसाई ने नेता का पद छोड़ा। दिसंबर में लोस चुनाव में जनता पार्टी की पराजय के दो माह बाद जगजीवन राम ने अपना रास्ता नाप लिया। अप्रैल 1980 में पूर्व जनसंघ गुट के लोग भी भाजपा बनाकर अलग हो गए। जनता पार्टी का केवल ढांचा ही बच गया। इसका सारा दारोमदार चंद्रशेखर पर आ पड़ा। थोड़े दिन बाद ही राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। यूपी में जनता पार्टी को केवल तीन सीटें मिलीं। चंद्रशेखर ने फिर से पार्टी को खड़ा करने का बीड़ा उठाया। पहला पड़ाव था 1981 की शुरुआत में सारनाथ में जनता पार्टी का पहला अधिवेशन। पार्टी के पुर्नजन्म के चार साल बाद, जिसकी सफलता के लिए चंद्रशेखर और गिने-चुने साथियों ने व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर काम किया। इस सम्मेलन में उन्होंने पार्टी को नए सिरे से ढालने की कोशिश की। सारनाथ से ही चंद्रशेखर ने अपनी असली राजनीति शुरू की। बाद में जनता दल बना। बीपी सिंह के बाद चार माह के लिए चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। तदुपरांत समाजवादी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। मौत के दिन तक सांसद होने का गौरव भी उन्हें नसीब हुआ।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण अंतगर्त बलिया जिले में 21 मार्च 2009 को पृष्ठ सात पर प्रकाशित हुई थी।)
नारद गाथा: हर जगह डिमांड, किसी का पकड़ो साथ
धनबल-बाहुबल की होती पूजा
बलिया। विष्णुलोक से मृत्युलोक पर चुनाव का मजा लेने पहुंचे देवर्षि नारद भृगुनगरी में आकाश मार्ग से उतरे। पृथ्वी पर आते ही उन्होंने अपना रूप परिवर्तन कर आम आदमी की वेशभूषा धारण कर लिया। अचानक उनकी नजर आपस में कुछ बातचीत कर रहे लोगों पर जा टिकी। चुनाव संबंधी चर्चा चल रही थी। नारदजी तो आए थे चुनाव का मजा लूटने। सो, बेहिचक उस बैठक में शामिल हो गए। एक व्यक्ति बोल रहा था, समझ में नहीं आता किस नेताजी का दामन पकड़ा जाए। दूसरा बोला, अरे, इसमें क्या बात है, किसी का पकड़ लो। चुनाव है तो हर जगह डिमांड है। जिस झंडा-बैनर ढोओगे, मलाई काटने को मिलेगी। पहला बोला, नहीं यार, तू समझता क्यों नहीं। अब अपनी पहले वाली पार्टी में भी रहता हूं तो...विपक्षी इसमें आ गया है। बहुत बुराई की थी मैंने...। पहुंचा तो घास नहीं पड़ने देगा। दूसरा बोला, तो ठीक है, दूसरे किसी का भी झंडा-बैनर ढो लो। ...काफी देर तक उनकी जद्दोजहद सुनने के बाद नारदजी टोक दिए। बोले, रामायण काल में राम-रावण युद्ध हुआ था तो विभीषण ने अत्याचारी भाई का साथ छोड़ा था। महाभारतकाल में श्रीकृष्ण ने अपने रिश्ते के भाई के शिशुपाल का वध कर डाला था। ऐसे में सत्य का साथ दो, सब भला होगा। अचानक सभी का चेहरा तमतमाकर लाल हो गए। बोल पड़े, तुम्हारा नाम क्या है? देवर्षि नारद चौंके। बोले...न..न...नारद। बाप का नाम...ब्रह्मा। तीसरा बोला, ऐ भईया कुछ जाति-वाति भी है। सकपकाए नारद अभी कुछ बोलते कि उनमें से एक बोल पड़ा। ये राम-कृष्ण का युग नहीं है। यहां धनबल, बाहुबल, क्षेत्रवाद, जातिवाद की पूजा ज्यादा हो रही है।...वहां खड़ा दूसरा टोक पड़ा। ऐ भईया, यह कलियुग है और यहां सतयुग-द्वापर की बात मत सुनाओ, अपना रास्ता नापो। नारद आखिर करते भी क्या, चुपके से वहां से खिसकने में ही भलाई समझी। इसके बाद सभी आपस में बड़बड़ा रहे थे। कह रहा है, सत्य का साथ दो। अरे सच्चाई बची किसमें है। यदि बची भी है तो उन्हें मलाई काटने कौन देगा। कौन चुनाव में जेबखर्च चलाएगा। सारा काला धन इस चुनाव में ही सफेद रंग लेता है। खैर, इस पर नारद को •ागवान विष्णु की कही बात सहसा याद हो आई। उन्होंने कहा था, कि नारद आगे देखो होता है क्या? इस पर नारद भी हौले से मुस्कुराये और चल पड़े लोस चुनाव का मजा लूटने।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण अंतगर्त बलिया जिले में 21 मार्च 2009 को पृष्ठ सात पर प्रकाशित हुई थी।)
अमर उजाला एक्सक्लूसिव...
पानी में एक और जहर, कैसे जिएंगे
समूचे जनपद में भूगर्भीय जलस्रोत लगातार जहरीला होता जा रहा है। चौंकिए नहीं, सच यही है। जलस्रोतों में आर्सेनिक की अधिकता पहले से ही थी, अब मानक से पांच गुना अधिक आयरन मुसीबत बनने जा रहा है। बीते दिनों जल नमूनों की जांच के दौरान इसका खुलासा हुआ है। संबंधित इससे सकते में हैं, लेकिन पानी को जहर बनने से बचाया कैसे जाए इसकी कोई तरकीब उन्हें सूझ नहीं रही। जल निगम ने इतना जरूर कर दिया है कि उसने जांच रिपोर्ट शाासन एवं जिला प्रशासन के संज्ञान में ला दी है। अधिक आयरन युक्त पानी पीने का मतलब है बीमारियों को न्यौता देना। सीएमओ डॉ. केएम तिवारी की मानें तो इससे किडनी तक डैमेज हो सकती है।
जनपद के भूजल स्रोतों में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक पाए जाने से उपजी स्थिति पर अभी नियंत्रण हो ही नहीं सका है कि जल में पांच गुना अधिक आयरन की मात्रा ने संबंधितों में खलबली मचा दी है। मानक है प्रति लीटर जल में अधिकतम 1.00 मिलीग्राम आयरन का, लेकिन यह है प्रति लीटर 5.00 मिलीग्राम। जिले की कुल 11 बस्तियां आर्सेनिक के साथ-साथ आयरन की अधिकता के संकट से जूझ रहीं हैं। इसमें सोहांव ब्लॉक के गांव इटहीं, कुल्हड़िया, दुबहर ब्लॉक के आमघाट, घोरौली, चकरी (बघौली), सरयां, डुमरी तथा रेवती ब्लॉक के पकहां, पकहां भर टोला, उदहां, उदहां लक्ष्मीपुर टोला चिन्हित हैं। इन गांवों में मानक से पांच गुना अधिक आयरन पाया गया है। आर्सेनिक की अधिकता से 188 गांवों की 5156 में से 310 बस्तियां प्रभावित थीं। 11 बस्तियों के जलस्रोतों में आयरन की अधिकता पाए जाने के बाद दूषित पेयजल वाली बस्तियों की संख्या बढ़कर 321 हो गई है। जल निगम प्रथम प्रकल्प शाखा के सहायक अभियंता इस्लामुद्दीन ने बताया कि इसका खुलासा बीते दिनों लखनऊ भेजे गए नमूनों की जांच के दौरान हुआ। इसकी सूचना शासन समेत जिला प्रशासन को दे दी गई है। हालांकि एई का मानना है कि आर्सेनिक उन्मूलन कार्यक्रम के तहत आयरन की समस्या से भी निजात मिल जाएगी। उन्होंने जानकारी दी कि अधिक गहरे हैंडपंप एवं पानी टंकी सप्लाई में आर्सेनिक के साथ ही आयरन भी कम पाया गया है। स्वास्थ्य महकमे के पास अब तक ऐसी कोई सूचना नहीं है, लेकिन जानकारी को मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ.केएम तिवारी ने गंभीरता से लिया है। उनका कहना है कि आयरन की अधिकता से तमाम तरह की बीमारियां हो सकती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पानी के माध्यम से शरीर के भीतर जाने वाला आयरन किसी स्लो प्वाइजन से कम नहीं। इसकी अधिकता हुई तो यह किडनी डैमेज करने का सबब बन सकता है।
आर्सेनिक के बाद आयरन मिला पांच गुना अधिक
जल बना जहर
शरीर को होने वाला नुकसान
-दस्त की शिकायत बढ़ती है और शरीर में पानी की कमी हो जाती है।
-सीधा असर लीवर और गुर्दे पर। लीवर बढ़ सकता है। गुर्दे के भी क्षतिग्रस्त होने की आशंका।
-पाचन क्रिया प्रभावित होती है, उदर संबंधित बीमारियों का खतरा।
कितना खतरनाक है ज्यादा लोहा
-सीएमओ बोले, लीवर में संक्रमण की शिकायत होना आम बात है।
-आयरन रक्त निर्माण में आवश्यक तत्व है, जो 11 से 13 प्रतिशत ही होना चाहिए, उससे अधिक नहीं।
-शरीर के भीतर अधिक आयरन जाना स्लो प्वाइजन से कम नहीं।
बचाव का तरीका
-पानी उबालकर पीया जाए, क्लोरीन की गोली डालना बेहतर होगा।
-किसी बर्तन में निथारने पर भी पानी का आयरन नीचे बैठ जाता है।
-आयरनयुक्त चीजों के सेवन से परहेज भी बचाव है।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण अंतगर्त बलिया जिले में दो सितंबर 2007 को पृष्ठ तीन पर प्रकाशित हुई थी।)
यूपी : जल में जानलेवा आर्सेनिक की घुसपैठ
चिंताजनक
गंगा किनारे भूमिगत जल में भारी मात्रा में मिला रसायन
पेयजल सामान्य से नौ गुना के स्तर तक ज्यादा दूषित
नई दिल्ली। जीवनदायिनी गंगा के तटीय क्षेत्रों का भूमिगत जल जीवन के लिए गंभीर खतरा बन गया है। कारण है इस समूचे इलाके के भूमिगत जल में जानलेवा आर्सेनिक की बढ़ती घुसपैठ। हाल ही में गंगा किनारे यूपी के 14 जिलों में की गई जांच में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से नौ गुना तक ज्यादा पाई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक कारखाने के प्रदूषित पानी और शहरों की गंदगी बहकर गंगा में मिलने के कारण भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है।
आर्सेनिक नामक यह धीमा जहर शरीर के भीतर धमनियों में आक्सीजन के प्रवाह को घटाकर कई तरह की जानलेवा बीमारियों की वजह बनता है। हाल ही में भूमिगत जल के लिए गए नमूनों की जांच से पता चलता है कि इस इलाके का भूमिगत जल अब जहर में तब्दील हो रहा है। यूपी के 14 जिलों में गंगा किनारे के भूमिगत जल के लिए गए नमूनों में से पांच जिलों के 690 वाटर सैंपल में आर्सेनिक मिला। दर्जन भर सैंपल में तो आर्सेनिक की मात्रा 50 पार्ट पर बिलियन से ज्यादा पाई गई। सबसे ज्यादा मात्रा मेरठ के हस्तिनापुर ब्लॉक के गांव हस्तिनापुर नौरंगा में मिली। बलिया में तो पानी में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक निकला। यहां आर्सेनिक 50 से 450 पीपीबी तक है। मुरलीछपरा, बेलहरी, दुबहर, बैरिया एवं रेवती विकास खंड में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक है। हनुमानगंज, सोहांव और मनियर ब्लॉक में भी आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। कुछ सैंपल दोबारा जांच के लिए इंडियन टॉक्सिकोलाजी रिसर्च सेंटर लखनऊ भेजे गए हैं। जल निगम के स्थानीय निर्माण शाखा बलिया के एई इस्लामुद्दीन के मुताबिक 50 पीपीबी तक आर्सेनिक को खतरनाक नहीं माना जा सकता है। गाजीपुर के करंडा क्षेत्र में भूजल में आर्सेनिक से लोग पथरी, पीलिया सहित कई रोगों से पीड़ित हैं। यह खतरा अब वाराणसी और इलाहाबाद की ओर बढ़ रहा है।
(दिल्ली से हरीश लखेड़ा, मुरादाबाद से आशीष त्रिपाठी, बलिया से अनीश उपाध्याय, गाजीपुर से शैलेंद्र मणि त्रिपाठी)
(यह खबर अमर उजाला के सभी संस्करणों में 12 जुलाई 2007 को प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था।)
अमर उजाला एक्सक्लूसिव
अग्नि सुरक्षा को लेकर कितने तैयार हैं हम!
सुरक्षा के नाम पर फिसड्डी है फायर ब्रिगेड की व्यवस्था
पिछले वर्ष आग की तबाही में 15 की मौत
बलिया। फाल्गुनी अल्हड़ मस्ती के बीच एक भयावह त्रासदी है आग। पूर्वांचल में हर साल आग से करोड़ों की क्षति होती है। सैकड़ों की जान चली जाती है। सूर्य की तपिश से बचने के लिए जिस छप्पर की इस मौसम में ज्यादा जरूरत होती है, उसे आग छीन लेती है। तमाम गरीब खुले आसमान के नीचे आ जाते हैं। यह लंबे समय से चला आ रहा है। रूकने का नाम नहीं ले रहा। इसकी एक बड़ी सच्चाई है साधनों का नितांत अभाव। जिलों में कई इलाके ऐसे हैं, जहां आग लगने पर जब तक फायर ब्रिगेड पहुंचती है, तब तक सब कुछ स्वाह हो जाता है। बलिया जिले को ही लें, फिलवक्त फायर ब्रिगेड के कई संसाधन इलाहाबाद में लगे माघ मेला में चार फरवरी से ही गए हैं। संसाधन का जहां तक सवाल है वर्तमान में फायर ब्रिगेड के के पास दो बड़ी गाड़ियां (क्षमता 4000 लीटर), एक मीडियम (क्षमता 2200 लीटर) तथा डीजल पंप संचालित दो छोटी गाड़िया उपलब्ध हैं। इसी के बूते जिले के समूचे गांवों की आबादी और खेत-खलिहानों की सुरक्षा निर्भर है। महकमा की ओर से फायर सीजन मार्च माह से 30 जून तक माना जाता है। इस दौरान उभाव और बैरिया थाने पर फायर ब्रिगेड के कर्मी वाहन लेकर मुश्तैद रहते हैं। फरवरी से ही जहां आग की घटनाओं में इजाफा शुरू हो जाता है, वहीं महकमा मार्च से राहत एवं बचाव कार्य के लिए तत्पर होता है।
बचाव का इंतजाम न होने से हर साल मचती तबाही
बलिया। जनपद के ग्रामीण अंचलों में आग लगने पर तबाही तय है। जिला प्रशासन की ओर से आग पर काबू पाने की जो व्यवस्था है, वह बेमतलब है। कई दफा आग लगने पर जब तक फायर ब्रिगेड की गाड़ी पहुंचती है, आग सब कुछ नष्ट कर चुकी होती है।
बैरिया: द्वाबा विस के तमाम गांवों में आग पर काबू पाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से काई माकूल व्यवस्था नहीं हो सकी है। इब्राहिमाबाद में अग्निशमन केंद्र स्थापना का तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा भी की थी, बावजूद बरसों बाद भी इस पर अमल नहीं हो सका है। भरौली : आग की घटनाओं से बचाने के लिए हर साल नरहीं थाने पर अग्निशमन चौकी की स्थापना होती है, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो सका है। इसको लेकर क्षेत्रवासियों में आक्रोश है। सुखपुरा : थाना क्षेत्र में आग की घटना पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी आने का घंटों इंतजार करना पड़ता है। थाना पर गाड़ी मौजूद न होने से जिला मुख्यालय से फायर ब्रिगेड की गाड़ी मंगानी पड़ती है। बांसडीह : तहसील मुख्यालय बांसडीह पर फायर ब्रिगेड चौकी की स्थापना नहीं हो सकी है। रसड़ा और बलिया को छोड़ इस तहसील पर फायर ब्रिगेड की चौकी की स्थापना न होने से क्षेत्रवासियों में आक्रोश है। घोघा : इलाके में अभी पिछले दिनों ही कठबंधवा (बांसडीह नगर पंचायत के वार्ड नंबर 12) में अगलगी की घटना में रमाशंकर, रामदेव, सुदर्शन समेत एक दर्जन लोगों की रिहायशी झोपड़ियां जलकर खाक हो गई।
वर्जन...
सुरक्षा को लेकर कितना संवेदनशील है महकमा!
आग से सुरक्षा का जहां तक सवाल है, अग्निशमन दल इसके लिए सतर्क है। थोड़ी-बहुत दिक्कतें संसाधन की कमी की वजह से सामने आ रही है। यदि भरपूर संसाधन मिले तो वक्त रहते आग पर काबू पाया जा सकता है। जहां तक अग्निशमन चौकियों की स्थापना का सवाल है, यह उच्चाधिकारी तय करते हैं।
कुमार रमाशंकर तिवारी, अग्निशमन अधिकारी, बलिया
इनसेट...
अगलगी में क्या बरतें सावधानी
-बिजली प्रवाहित हो रही हो और स्पार्किंग से आग लगने का खतरा हो तो कनेक्शन काट दें।
-खलिहान गांव के नजदीक न बनाया जाए, अन्यथा आग लगने का खतरा बढ़ेगा।
-आग लगते ही सहयोग के लिए लोगों को पुकारें। खुद का बचाव करते हुए मदद करें।
-गैस सिलिंडर, पेट्रोल, डीजल आदि ज्वलनशील पदार्थों को तुरंत हटा दें।
-आग बुझाने को पानी, रेत अथवा धूल का प्रयोग करें। झुलसे व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाएं।
-आग लगने पर तत्काल इसकी सूचना निकटवर्ती थाना अथवा फायर ब्रिगेड को 101 पर दें।
इनसेट...
आग से बचाव के लिए रहें तत्पर
-आग से सुरक्षा के लिए गांवों के युवा आपस में अग्निशमन टोलियों की स्थापना करें। टोलियों में हर किसी का कार्य तय होना चाहिए।
-यह टोली आग बुझाने के संसाधन अथवा पानी वगैरह पहुंचाने वालों की हो। इस टोली में आग से बचाव करने के लिए लोगों की व्यवस्था करें।
-जल संसाधन का अभाव होने से दिक्कत होती है। कई गांवों में कुएं, पोखरे आदि पाट दिए गए हैं, जिससे पानी संचय नहीं हो पा रहा है। आग से सुरक्षा के लिए इनका संरक्षण जरूरी है। मकान ऐसे बनाए जाएं, जहां फायर ब्रिगेड के संसाधन पहुंचने की सुविधा हो।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण में छह फरवरी 2009 को पृष्ठ सात पर प्रकाशित हुई थी।)
याद आया 1998 की बाढ़ का कहर
चंद्रशेखर ने कहा था, बाढ़ और आग बलिया के लिए अभिशाप
पूर्व प्रधानमंत्री स्व.चंद्रशेखर ने शायद ठीक ही कहा था कि बलिया के लिए बाढ़ और आग अभिशाप है। तीन नदियों से घिरे जनपद में गंगा, घाघरा और टौंस कहर बन बरपती रही है और बलिया के विकास पर ग्रहण लगता रहा है। इस साल घाघरा नदी में आई प्रलंयकारी बाढ़ की विभीषिका देख सन 1998 की बाढ़ जेहन में एक बार फिर ताजा हो गई। तब सेना आ गई थी और पीएसी जवानों ने मोर्चा संभाल लिया था।
जनपद बलिया तीन दिशाओं से नदियों से घिरा हुआ है। बारिश के दिनों में गंगा, घाघरा और टौंस नदी उफान पर होती है। नदियों से इन दिनों में 23,000 घनमीटर प्रति सेकेंड की दर से जल प्रवाहित होता है। वर्ष 1970 में गंगा एवं घाघरा का एक साथ प्रकोप हुआ था। गायघाट पर गंगा नदी का जलस्तर 59.56 मीटर तक पहुंच गया था। वर्ष 1971 में जलस्तर हालांकि 58.24 मीटर ही रहा, लेकिन 1983 में गंगा जलस्तर में इजाफा हुआ और जलस्तर 59.73 मीटर पर पहुंच गया। 1983 में घाघरा का जलस्तर चांदपुर गेज स्थल पर 67.15 मीटर पर पहुंच गया। वर्ष 1986 में गंगा का जलस्तर 59.08 मीटर पर था। वर्ष 1987 में गंगा का जलस्तर 58.76 मीटर तथा घाघरा का जलस्तर 59.20 मीटर तक पहुंचा था। इस वर्ष लग•ाग 362 गांव तथा 39670 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्र•ाावित हुआ था। 1988 में बाढ़ से 210 गांव तथा 28051 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित हुआ था। 1990 में 46 ग्राम तथा 5695 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित हुआ। 1991 में गंगा का जलस्तर 59.38 मीटर और घाघरा का जलस्तर 59.34 मीटर था। वर्ष 1992 में गंगा का जलस्तर 59.01 अधिकतम मीटर तथा घाघरा का 57.26 मीटर रहा। वर्ष 1993 में गंगा का जलस्तर 59.1 एवं घाघरा का 60.1 मीटर तक पहुंच गया। इस वर्ष 300 ग्राम तथा 19471 हेक्टेयर क्षेत्रफल तबाह हो गया।
वर्ष 1998 में भारी बाढ़ में कुल 312 गांव प्रभावित हुए थे। हालात इतना भयावह था कि बचाव, राहत के लिए जिला प्रशासन को सेना एवं पीएसी जवानों की मदद लेनी पड़ी थी। अगले साल यानी 1999 में 221 ग्राम और वर्ष 2000 में 93 गांवों पर बाढ़ का कहर बरपा था। घाघरा नदी की विनाशलीला से बचने के लिए देवरिया के तुर्तीपार से लेकर श्रीनगर तक 77 किलोमीटर लंबे बांध का निर्माण किया गया है। इस बांध पर बाढ़ के जल पर नियंत्रण के लिए रेगुलेटर बनाए गए हैं। यह जब तक घाघरा का जलस्तर नीचा रहता है, यह रेगुलेटर खुले रहते हैं, लेकिन जैसे ही जलस्तर ऊपर उठता है, रेगुलेटर बंद कर दिए जाते हैं। सामान्य तौर पर वर्षाकाल में नदियों का जलस्तर उफान पर होता है। बाढ़ की विकराल स्थिति तब पैदा हो जाती है, जब गंगा एवं घाघरा में एक साथ बाढ़ आ जाती है। गंगा में जलस्तर नीचे होने से यदि घाघरा में बाढ़ आती है तो गंगा बाढ़ के जल को अपने में आत्मसात कर लेती है। बावजूद जब दोनों नदियां उफान पर होती हैं तो स्थिति भयावह हो जाती है।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण में प्रकाशित हुई थी।)







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