श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Saturday, January 14, 2012

अनोखी चाल!

माया ने मैदान से आउट किए जीते मोहरे
अकेले बलिया जिले बदल दिए सभी जीते प्रत्याशी
पहले आठ विस की जगह अब रह गए केवल सात
परिसीमन से खत्म चिलकहर का 45 साल का सफरनामा
नये चेहरे पर हाथी ने चला दांव, विपक्षी बने घनचक्कर
अमूमन किसी  भी दल से विधायक की कुर्सी पाने वाले अपने टिकट को लेकर आश्वस्त रहते हैं। संकट में वे रहते हैं जो पिछले चुनाव में मात खा चुके होते हैं। वहीं बसपा ने तो अबकी ऐसा बदलाव किया है, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। पार्टी ने अपने जीते विधायकों को भी अपनी पार्टी का टिकट नहीं दिया है। इस अनोखी चाल का क्या होगा असर। एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
क्रिसमस की पूर्व संध्या पर चुनावी बिगुल बज गया, लेकिन केंद्र तथा यूपी की राजनीति में अपना जोरदार दखल रखने वाला यूपी के पूर्वी छोर पर बसे बलिया जिले में राजनीतिक भूचाल का नजारा था। यहां एक झटका तो परिसीमन ने ही दे दिया कि कुल 45 वर्षों के सफरनामे के बाद चिलकहर विस का लोप हो गया था, जबकि अबकी बसपा ने यहां से अपने पूर्व में जीते सभी मोहरों को भी मैदान से हटाकर नये चेहरों पर अनोखा दांव लगा दिया है। इसकी न तो किसी राजनीतिज्ञ को उम्मीद थी और न ही जनता को ऐसा होने का भरोसा। यहां से अबकी मायावती ने न सिर्फ अपने पूर्व में जीते विधायकों का पत्ता गोल कर दिया है, बल्कि हर विस में अबकी नया चेहरा उतारा है। लिहाजा अबकी यहां विस का घमासान कैसा होगा, इसको खुद को उम्दा रणनीतिकार बताने वाले भी पेशोपेश में आ गए हैं।
इतिहास बन गया चिलकहर विस
बलिया में सन 1967 के चुनाव से पूर्व परिसीमन के बाद अस्तित्व में आये विधानसभा चिलकहर के 45 वर्षों के सफरनामे की समाप्ति की घोषणा तो वैसे पहले ही हो गई थी, लेकिन निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा के साथ ही यह क्षेत्र हमेशा के लिए इतिहास बन गया। चार दशकों से अधिक के सफर में इस विधानसभा ने वैसे तो 12 बार चुनाव में प्रतिनिधि दिये, पर बहुतेरे बार चेहरे नहीं बदले। बलिया में 45 वर्ष में सात लोग ही यहां की विधायक की कुर्सी पर बारी-बारी बैठते रहे। यहां के मतदाताओं ने सर्वाधिक पांच बार रामगोविंद चौधरी पर अपना भरोसा जताया। दो बार जगन्नाथ चौधरी को मौका मिला। वहीं शेष सभी पांच लोग एक-एक बार ही विस की ड्योढ़ी लांघ सके। इनमें रामगोविंद चौधरी व जगन्नाथ चौधरी को अपनी-अपनी सरकारों में मंत्री बनने का सुअवसर मिला। बावजूद इसके क्षेत्र को कभी वह मान-सम्मान व विकास की धार नहीं मिली जिसका वह हकदार था।
सनातन रहे अंतिम विधायक
विधानसभा चिलकहर के अस्तित्व के बाद चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों की बात करें तो वहां के सबसे पहले विधायक होने का गौरव कामता सिंह को प्राप्त है। विधानसभा के अंतिम विधायक का तमगा सनातन पांडेय के नाम रहा। वर्ष 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी के कामता सिंह निर्वाचित हुए। उसके बाद 1969 व 1974 में कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी के हाथ विधायकी रही और वे राज्यमंत्री भी बने। वर्ष 1977, 1980, 1985, 1989 व 1991 में जनता पार्टी के रामगोविंद चौधरी के नाम ही इस विधानसभा की जिम्मेदारी रही। 1993 के चुनाव में बसपा के संग्राम सिंह यादव ने रामगोविंद को हराकर कुर्सी हथिया ली। 1996 के चुनाव में विधायक तो बसपा का ही हुआ पर इस बार चेहरा छोटेलाल राजभर का रहा। 2002 के चुनाव में इस पर भगवा रंग चढ़ा और पार्टी के जुझारू नेता रामइकबाल सिंह विधायक हो गये। वर्ष 2007 के निर्वाचन में साइकिल लेकर आये सनातन पांडेय ने यहां जीत दर्ज की और परिसीमन के बाद अस्तित्व समाप्त होने पर इन्हें ही अंतिम विधायक होने का एक कीर्तिमान मिल गया।
चिलकहर को मिल चुकी है दो बार लालबत्ती
विधानसभा चिलकहर को दो बार लालबत्ती मिली। सबसे पहले कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी को 1974 में सूबे की कैबिनेट में राज्यमंत्री बनने का मौका मिला तो 1991 में जनता पार्टी के रामगोविंद चौधरी को मुलायम सिंह यादव की सरकार में काबीना मंत्री बनने का सुअवसर मिला। अबकी खास यह भी रहा कि बसपा ने 2012 के लिए सबसे पहले अपने उम्मीदवारों की विधानसभा क्षेत्र प्रभारी के रूप में घोषणा कर दी थी, पर बसपा सुप्रीमों ने अपने खास अंदाज में पूर्व निर्णय में तब्दीली करते हुए फेफना से आलोक कुमार सिंह झुनझुन को हटाकर भारती सिंह, रसड़ा से केदार वर्मा को किनारे कर उमाशंकर सिंह तथा नए सुरिक्षत क्षेत्र बिल्थरारोड से अपने पुराने सिपाहसालार घूराराम को बाहर कर जोनल कोआर्डिनेटर छट्ठू राम को उम्मीदवारी सौंप दी।
विधायकों के मैदान से हटने का असर
पिछले विधानसभा चुनाव में यूं कहें तो समूचे बलिया जिले में बसपा की ही लहर थी। यही वजह रही कि यहां की कुल आठ विधानसभाओं में से अकेले छह विजेता बसपा के रहे। केवल दो चिलकहर और कोपाचीट (अब फेफना विस) पर सपा की साइकिल ने चाल भरी। चिलकहर से सनातन पांडेय और कोपाचीट से अंबिका चौधरी ने जीत दर्ज की। इसके बावजूद यदि बसपा मुखिया मायावती ने अपने सारे उम्मीदवार बदल दिए हैं तो इसके पीछे वह रिपोर्ट है जो जिले से बसपा सुप्रीमों तक पहुंची थी। सूत्रों ने बताया कि यहां से किसी बसपा के अच्छे ओहदे पर काबिज लोगों ने रिपोर्ट की थी कि अगर बसपा ने दुबारा इन पूर्व में जीते प्रत्याशियों पर दांव खेला तो पार्टी का बेड़ा गर्क हो सकता है। लिहाजा पार्टी मुखिया ने आनन-फानन में यहां से नए चेहरों पर ही दांव खेलना वाजिब समझा। ऐसे में वह भी दरकिनार हो गए, जिन्होंने पार्टी की साख अपने विस में बनाई थी।
गलत भी नहीं थी रिपोर्ट
बसपा मुखिया को जो रिपोर्ट दी गई थी, चुनाव के रणनीतिकारों की मानें तो वह गलत भी नहीं थी। वैसे भी यह जीते विधायक कई बार अपनों के बीच यह कहते नहीं अघाते थे कि उन्होंने ‘मैडम’ को बढ़िया पैकेज देकर टिकट पाया है। लिहाजा इन जनप्रतिनिधियों ने पूरे पांच साल तक न तो क्षेत्र में विकास को तवज्जो दी थी और न ही पार्टी कार्यकर्ताओं को। जीत के वक्त जो जनता इनके रूप में अपना उद्धारक देख रही थी, पूरे पांच साल बीतने के बाद भी इसके कोई लक्षण उनमें नहीं दिखे। द्वाबा में आर्सेनिक का मुद्दा रहा हो या समूचे जिले की जर्जर और बदहाल सड़कों का। चिकित्सकीय सुविधा का सवाल हो या फिर पुल, पुलिया आदि के निर्माण का। किसी बसपा विधायक ने इस ओर रंचमात्र  भी  ध्यान नहीं दिया। जनता अपना दुख-दर्द लेकर इनकी दरबार में पहुंचती तो वहां या तो उनसे मुलाकात नहीं होती और अगर होती भी थी तो वे उनसे बात करने तक में रूचि नहीं लेते थे।
वैसे भी थी जनता में नाराजगी
राजनीति की उर्वरा जनपदीय माटी पर चुनाव पूर्व वर्ष 2011 में सियासी चालें तेज रहीं। सभी राजनीतिक दलों ने साल भर दांव चले। बीते चुनाव में प्रदेश के निर्णय संग बलिया ने भी आठ विधान सभा सीटों में से छह बसपा की झोली में डाल दी थी, लेकिन पार्टी ने इस आधार पर जिले को तवज्जो नहीं दी थी। यहां की जनता को वैसे भी  उम्मीद थी कि सपा की तरह बसपा से इतने सारे विधायक यदि एक साथ जाएंगे तो बलिया जिले का मान बसपा भी जरूर रखेगी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जिले की आठ सीटों में से आधा दर्जन विधायक देने के बाद  भी एक अदद मंत्री तक नसीब नहीं हुआ था जिले को। एकमात्र छट्ठू राम ही ऐसे नेता रहे, जिन्हे पैक्सफेड के चेयरमैन (राज्यमंत्री का दर्जा) का पद पाया। वहीं सपा शासनकाल में सपा मुखिया ने जिले से जीते कुल चारों विधायकों को मंत्री बना दिया।
विभिन्न दलों की राजनीति
सपा से अलग हुए अमर सिंह ने पूर्वांचल राज्य की मांग को लेकर जन स्वाभिमान यात्रा की शुरूआत की और बलिया से ही उन्होंने अपनी लोकमंच की फिजा बनाई। सपा इस वर्ष को बसपा के तीव्र विरोध और सरकार की कमियों को सामने लाकर साल भर आंदोलित रही। इसमें खाद, बिजली, पानी के सवाल पर सरकार को घेरने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव भी बलिया आए। इसके अलावा बाद के आंदोलनों में शिवपाल सिंह यादव ने भी शिरकत की। वहीं बलिया जिले में बसपा के इस उलटफेर का लाभ भाजपा को मिलने की आशंका रणनीतिकार जता रहे हैं। कारण कि द्वाबा (अब बैरिया) के पूर्व में विधायक और खाद्य तथा रसद राज्यमंत्री रहे भरत सिंह पहले से काफी सशक्त हो गए हैं, वहीं चिलकहर के खत्म होने के बाद रसड़ा विस से भाजपा के टिकट पर भाग्य आजमा रहे फायरब्रांड नेता रहे रामइकबाल सिंह की दावेदारी मजबूती मानी जा रही है।
कांग्रेस भी मार रही हाथ-पांव
सूबे में कांग्रेस ने अपने हाथ-पांव मारने के क्रम में बलिया पर भी विशेष ध्यान दिया। केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के बैरिया कार्यक्रम में शिक्षक नेता सुरेंद्र सिंह को शामिल किया। कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी साल भर जनपद के कार्यक्रमों में पार्टी की संभावनाएं तलाशती रहीं। पार्टी के युवराज राहुल गांधी ने भी 22 जुलाई को कार्यक्रम बना जनपद के युवाओं से सीधा संवाद किया और अपनी स्टाइल से लोगों के बीच भी पहुंचे। युवा जिलाध्यक्ष राघवेंद्र सिंह को युवाओं पर भरोसा करने का विश्वास दिलाया तथा पार्टी की पुख्ता जमीन तैयार करने की कोशिश की। इस सारी कवायद के बावजूद कांग्रेस किसी भी नये चेहरे को मैदान में उतारने से गुरेज ही करती रही। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी अपनी जन स्वाभिमान यात्रा के माध्यम से जनता में पार्टी के प्रति संभावना टटोली व माहौल बनाया।
छोटे दलों की बल्ले-बल्ले
बैरिया और फेफना में कांग्रेस, सदर और सिकंदरपुर में भाजपा को छोड़कर परिसीमन के बाद अब आठ की जगह सात हुई सीटों पर सभी सियासी दलों ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। भासपा और कौमी एकता दल ने भी इस बीच अपने गठबंधन पर संजीदा रुख अपनाया है। लोकमंच ने भी विधानसभावार अपने प्रत्याशी  भी तय कर दिए हैं। सूत्र बताते हैं कि बसपा का टिकट कटने के बाद यह विधायक इन छोटे दलों के झंडे के नीचे आने की जुगत में लग गए हैं। लिहाजा यह विधायक कौमी एकता दल सरीखे दलों की शरण में जा सकते हैं। वैसे हकीकत तो नामांकन के वक्त ही सामने आएगी कि कौन सा प्रत्याशी किसके झंडे के नीचे खड़ा होता है। लिहाजा छोटे दलों की बल्ले-बल्ले है। इन विधायकों को वह अपने लिए न सिर्फ जिताऊ मान रहे हैं, बल्कि संगठन मजबूती के लिहाज से भी काफी लाभदायक मान रहे हैं।

वर्जन...
लड़ना है मुझे चुनाव
हां, बसपा प्रमुख ने मेरा टिकट काट दिया है। लखनऊ पहुंचा है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। मैंने पूरे पांच साल संगठन मजबूती और द्वाबा के विकास के लिए दिए हैं। कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी विकास के लिए। संगठन के कुछ विरोधी लोगों के कहने मात्र से मेरा टिकट काट देना वाजिब नहीं कहा जा सकता। वैसे फिर भी पार्टी प्रमुख पर विश्वास है। लखनऊ में कार्यकर्ताओं की बैठक में जो तय होगा, उसे माना जाएगा। जहां तक अगली रणनीति का सवाल है, चुनाव तो मुझे लड़ना ही है। फिर भी नेतृत्व से अभी  आस है, जरूर मेरे हित में कोई न कोई फैसला होगा।
  सुभाष यादव,
बसपा विधायक,
     द्वाबा (वर्तमान में बैरिया)

दमखम से लडूंगा
कौन कहता है मैं बूढ़ा हो गया हूं। अभी जवान हूं। पूरे दमखम से विधानसभा चुनाव लड़ूंगा। आज कार्यकर्ताओं की फौज मेरे साथ है। कांग्रेस पहले से ज्यादा मजबूत हुई है। अबकी मेरी जीत भी पक्की है। जातिगत आंकड़ों से भी मैं वर्तमान में पहले से ज्यादा सशक्त हो चुका हूं। परिसीमन का बहुत असर मेरी सेहत पर पड़ने वाला नहीं है।
बच्चा पाठक,
कांग्रेस प्रत्याशी, बांसडीह विस


विधायक जिनके टिकट कटे
योगेश वर्मा : हस्तिनापुर
हाजी याकूब कुरैशी : मेरठ दक्षिण
विनोद हरि : सिवालखास
महिपाल                                     : नकुड़
डॉ. यशवंत                                  : जानसठ (मुजफ्फरनगर)
शाहनबाज राणा                          : बिजनौर
शीशराम                                      : नजीबाबाद
बलराम सैनी                                :मुरादाबाद पश्चिम
महेंद्र सिंह                                    : कोल (अलीगढ़)
मुस्लिम खां :उसेहत (बदायूं)
योगेंद्र सागर : बिल्सी
उर्मिलेश यादव                             : बिसौली
महिपाल माजरा                           : गंगोह
भगवान शर्मा                               :डिबाई (बुलंदशहर)
बासुदेव सिंह बाबा                        : शिकारपुर
शेखर तिवारी                               : औरैया
आनंद सेन                                   : मिल्कीपुर
फरीद महफूज किदवई                  :इसौली (बाराबंकी)
शेर बहादुर सिंह                            : जलालपुर (अंबेडकरनगर)
सतीश वर्मा                                   : मल्लावां
जितेंद्र सिंह बबलू                         : बीकापुर
दशरथ चौहान :हैसरबाजार (संतकबीरनगर)
श्यामसुंदर शर्मा                            : मथुरा
चंद्रभद्र सिंह                                 : इसौली
पुरुषोत्तम द्विवेदी                            : नरैनी
घूराराम                                       :बिल्थरारोड (बलिया)
सुभाष यादव                                : द्वाबा (बलिया)
केदारनाथ                                    : सीयर (बलिया)
श्यामनारायण यादव                     :गोपालपुर (आजमगढ़)

No comments: