राजनीति
बदलते समीकरण, राजनीति में घुसा जातिवाद
लिंगायत-वोक्कलिगा के बाद दलितों की जोर आजमाइश
क्षेत्रीयकरण की ओर बढ़ रही हैं भाजपा-कांग्रेस पार्टियां
राष्ट्रपति-विधानसभा चुनाव की आहट से माहौल तल्ख
मुख्यमंत्री संग उप मुख्यमंत्री पद पर जातिवाद की आहट
कर्नाटक में दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कलिगा का हमेशा आमना-सामना होता रहा है। दोनों एक-दूसरे पर राजनीतिक रूप से भारी पड़ने की कवायद में जुटे रहे हैं। अब यहां दलितों की जोर आजमाइश भी सामने आने लगी है। सीएम की ताजपोशी को लेकर मचे बवंडर के बाद यहां का राजनीतिक समीकरण बदलता दिख रहा है। आखिर क्या होगा इसका असर? पढ़िए एक रिपोर्ट...
एक तरफ पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियों को पीछे धकेल कर क्षेत्रीय पार्टियां अपना रुतबा बढ़ा रही हैं, तो दूसरी तरफ कर्नाटक में एक अलग ही राजनीतिक परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है। देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का यहां क्षेत्रीयकरण हो रहा है। दोनों पार्टियां स्थानीय जातीय समीकरणों के जाल में अजीब तरह से उलझ चुकी हैं। इन पार्टियों के संगठनों में बहुसंख्यक समुदायों की पकड़ मजबूत बनाने की जंग तेज है। इस जंग में यह पार्टियां खेमों में बंट चुकी हैं। दरअसल इसे कर्नाटक की राजनीति का पुराना ट्रेंड ही माना जा सकता है। दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कलिगा के बाद अब यहां दलितों की जोर आजमाइश भी शुरू हो चुकी है। तय है कि ऐसे में राजनीतिक वजन बढ़ाने की जंग काफी तीखी हो चुकी है। राष्ट्रपति चुनाव और राज्य विधानसभा का चुनाव समय से पहले होने की कयासबाजियों तथा नए सीएम की ताजपोशी ने पूरे माहौल में एक तड़का सा डाल दिया है।
दो प्रमुख जातियों पर टिका दारोमदार
गौरतलब है कि राज्य में एक वर्ष से कम ही समय में विधानसभा चुनाव होना है। दशकों से कर्नाटक की राजनीति का रास्ता तय करने वाली दो प्रमुख जातियों ने फिर से अपना लोहा मनवाने के लिए दोनों पार्टियों के प्रमुख पदों पर कब्जा जमाने की होड़ में है। राज्य की साढेÞ छह करोड़ की आबादी में से 17 प्रतिशत लिंगायत और 16 प्रतिशत वोक्कलिगा हैं। इन दोनों समुदायों के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के अंदर जबर्दस्त खेमेबाजी शुरू कर दी है। जब भाजपा ने वर्ष 2008 में कर्नाटक के रूप में दक्षिण भारत के किसी राज्य की सत्ता पर पहली बार अपनी ताकत पर पकड़ बनाई तो उसे कथित तौर पर ‘लिंगायतों को वोक्कलिगा समुदाय के धोखे’ की भावना का पूरा फायदा मिला था। वोक्कलिगा समुदाय जनता दल (एस) का समर्थक माना जाता है। लिंगायत समुदाय ने जद (एस) के प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी द्वारा अपने वादे से हटते हुए लिंगायत बीएस येदुरप्पा को सत्ता न सौंपने को वोक्कलिगा समुदाय की धोखेबाजी मानी थी।
भारी पड़ते रहे हैं लिंगायत
मई 2008 में हुए चुनाव में येदुरप्पा के प्रति लिंगायतों की सहानुभूति की लहर का भरपूर फायदा मिला। उस चुनावी जीत के बाद भ्रष्टाचार के कई आरोपों में उलझे येदुरप्पा को अपनी कुर्सी खाली करनी पड़ी। उनके स्थान पर डीवी सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। ये वोक्कलिगा समुदाय के हैं। अब लिंगायतों ने उन पर छह महीने के अंदर अपना पद छोड़कर येदुरप्पा की वापसी का रास्ता साफ करने के वादे से मुकरने का आरोप लगाया जा रहा है। भाजपा में येदुरप्पा समर्थक विधायकों का एक बड़ा खेमा बन चुका है। ये पार्टी के अंदर ही आर-पार की जंग लड़ने को तैयार दिख रहे हैं। सदानंद गौड़ा ने हाल में बेंगलूर में आयोजित वोक्कलिगा समुदाय के एक सम्मेलन में यह कहकर लिंगायतों की भावनाओं को आहत कर दिया कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी वोक्कलिगा समुदाय के समर्थन के कारण मिली। उसी समय से पार्टी के लिंगायत विधायकों और मंत्रियों ने सदानंद गौड़ा को कुर्सी से हटाने के लिए ‘करो या मरो’ की जंग छेड़ रखी है।
लिंगायत नेता शेट्टर की ताजपोशी
जातिगत राजनीति को ही इसके मूल में माना जा रहा है कि लंबी जद्दोजहद के बाद येदुरप्पा के आगे झुकते हुए भाजपा नेतृत्व ने वहां के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को हटाकर उनकी जगह लिंगायत नेता जगदीश शेट्टर की ताजपोशी करने का फैसला कर लिया है। इस आशय की घोषणा सप्ताह भर के भीतर होने की उम्मीद है। इस ताजपोशी से यह माना जा रहा है कि भाजपा ने लंबी जद्दोजहद के बाद अब इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है कि कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री वीएस येदुरप्पा की ही चलेगी। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भी इस बात को मानने के लिए विवश हो गए हैं कि शेट्टर को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाने के अलावा अब और कोई विकल्प नहीं है। इस फैसले पर भाजपा संसदीय बोर्ड की मुहर लगनी आवश्यक है। यह पार्टी की निर्णय लेने वाली शीर्ष संस्था है और अधिकांश सदस्यों के बीच इसको लेकर सहमति है कि राज्य में भाजपा के असंतुष्ट खेमे की ओर से चार साल से दी जा रही धमकियों से पार्टी की छवि देशभर में खराब हो रही है।
ऐसे बनी ताजपोशी की बात
भाजपा के केंद्रीय नेताओं को इस बात की चिंता थी कि आगामी विधानसभा चुनाव घोषित होने तक पार्टी में दुबारा बगावत न हो और अगले चुनाव के बाद पार्टी की सत्ता में वापसी हो सके। हालांकि मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को बदलने का विरोध लालकृष्ण आडवाणी कर चुके थे। इसके बाद भी भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का मानना है कि शेट्टर को मुख्यमंत्री होना चाहिए। वहीं शेट्टर ने मीडिया के सामने कहा है कि आलाकमान का फैसला हफ्ते भर के भीतर आने की उम्मीद है। हमने सब कुछ पार्टी नेतृत्व पर छोड़ दिया है। वहीं सूत्रों का यह भी कहना है कि भाजपा संसदीय दल के नेता लालकृष्ण आडवाणी हालांकि मौजूदा विधानसभा में तीसरा मुख्यमंत्री चुनने के पक्ष में नहीं हैं। वे येदुरप्पा के भी खिलाफ हैं, क्योंकि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण आडवाणी की काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर की गई यात्रा पर प्रतिकूल असर पड़ा था। आडवाणी नहीं चाहते थे कि येदुरप्पा के किसी मनोनीत व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और पार्टी महासचिव अनंत कुमार भी येदुरप्पा के करीबी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे।
कुरूबा-वोक्कलिगा को लुभाने की कोशिश
जातिगत राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि यहां सत्तासीन भाजपा कुरूबा-वोक्कलिगा को लुभाने के लिए भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। लिंगायत नेता के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद ये दोनों समुदाय भाजपा से कट न सके इसके लिए भाजपा नेतृत्व उप मुख्यमंत्री पद पर भी विचार कर सकता है। शायद यही वजह है कि भाजपा की कर्नाटक इकाई के प्रमुख केएस ईश्वरप्पा उप मुख्यमंत्री पद के लिए खेमेबंदी कर रहे हैं। वे कुरूबा समुदाय के हैं। उनके अलावा आर अशोक भी इस दौड़ में हैं, जो सदानंद गौड़ा की तरह वोक्कलिगा समुदाय से हैं। ईश्वरप्पा ने इससे पहले सरकार में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई थी। वहीं पार्टी में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर आलाकमान के सामने दो उप मुख्यमंत्री नियुक्त करने के सुझाव हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव 2013 के उत्तरार्ध में होने हैं। अगर यहां दो उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति हो जाती है तो इस चुनाव में भाजपा को जातिगत समीकरणों का लाभ मिल सकता है।
कांग्रेस भी डाल रही डोरे
कांग्रेस की हालत राज्य के जातीय समीकरण में काफी अजीब सी है। इसे कुछ हद तक बेईमानी भी कह सकते हैं। हाल में इस समीकरण में कांग्रेस की रणनीतिक पैठ बेहतर बनाने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने टुमकूर के सिद्धगंगा मठ जाकर लिंगायत समुदाय के धर्मगुरु शिवकुमार स्वामी से मिलकर अपनी दिशा का संकेत दे दिया था। वहीं इस पार्टी के सबसे असरदार और विधानसभा में विपक्ष के नेता सिद्दरामैया दलित कुरुबा समाज से आते हैं। हालांकि उनका पार्टी के अंदर फिलहाल कोई विरोध नहीं हो रहा है, लेकिन जंग यहां भी मची है। यह जंग पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए लड़ी जा रही है। इसका नेतृत्व कांग्रेस के 82 वर्षीय वरिष्ठ लिंगायत नेता और पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष शामनूर शिवशंकरप्पा कर रहे हैं। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को इस बात का भरोसा दिलाना चाहते हैं कि कर्नाटक में अगले चुनाव का विजेता वही होगा, जो लिंगायतों की सहानुभूति जीतने में सफल होगा।
कितने सशक्त हैं शिवशंकरप्पा
वरिष्ठ लिंगायत नेता शामनूर शिवशंकरप्पा का कहना है कि वोक्कलिगा समुदाय से कांग्रेस को समर्थन की उम्मीद बेमानी होगी। यह समुदाय हमेशा जद (एस) के पाले में रहा है। वहीं पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर अनुसूचित जाति के डॉ. जी परमेश्वर के होने से पार्टी किसी भी संख्या बहुल समुदाय से समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकेगी। उनका कहना है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को वापस सत्ता में लाना है, तो इसका एक ही रास्ता है कि किसी लिंगायत नेता को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंप दी जाए। वे वादा भी कर चुके हैं कि ऐसा करने से पार्टी को 225 सदस्यों वाली विधानसभा में 150 सीटें मिलेंगी। उल्लेखनीय है कि हाल में लिंगायत समुदाय के राजनीतिक नेताओं ने बेंगलूर में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर अपनी अगली रणनीति तय करने का प्रयास किया। इस सम्मेलन के बाद लिंगायतों ने भी प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष पद पर काबिज होने के लिए ‘करो या मरो’ की जंग छेड़ने की घोषणा कर दी। साफ है कि इस प्रकार की जाति आधारित राजनीतिक रणनीति बनाने वाले इस विश्वास के आधार पर काम कर रहे हैं कि इन दिनों भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेतृत्व में अंदरूनी मतभेद चरम पर है। कहीं ऐसा न हो कि दोनों पार्टियों को इस अंदरूनी ‘करो या मरो’ की जंग जारी रखते हुए कर्नाटक की जनता का समर्थन मांगने के लिए चुनाव मैदान में उतरना पडेÞ।
ऐसे खड़ा हुआ तूफान
कर्नाटक में 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा को दक्षिण में पहली बार सरकार बनाने का मौका मिला। हालांकि येदुरप्पा 2007 में भी कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री रहे, लेकिन 30 मई 2008 को राज्य के 25 वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उनका राज्य इकाई में सिक्का चलने लगा। भ्रष्टाचार तथा अवैध खनन के मुद्दे पर आलाकमान की ओर से इस्तीफा मांगने तथा आरोपमुक्त होने के बाद पुन: पद प्राप्ति के आश्वासन पर उन्होंने अपने विश्वसनीय सदानंद गौड़ा को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनवा दिया। बस यहीं से कर्नाटक में ऐसा राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ, जो आज तक थमने की राह देख रहा है। कर्नाटक में बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय के एकमात्र कद्दावर नेता येदुरप्पा को राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा कई बार दरिकनार किए जाने से येदुरप्पा समेत उनके समर्थक भी नाराज हैं। पिछले दिनों येदुरप्पा समर्थक नौ मंत्रियों की ओर से मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को अपने इस्तीफे सौंप राज्य में नए सियासी नाटक की नींव रख दी थी। हालांकि संवैधानिक रूप से ये इस्तीफे उन्हें राज्यपाल को सौंपने चाहिए थे, लेकिन मुख्यमंत्री को इस्तीफा सौंपने के पीछे उनकी दबाव की राजनीति थी। इसके आगे केंद्रीय नेतृत्व भी झुकता दिखा।
आज भी ‘दबंग’ हैं येदुरप्पा
पांच जुलाई तक राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग पर अडेÞ 50 विधायकों की ओर से भी केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया जाना इसका परिचायक है कि येदुरप्पा आज भी कर्नाटक की राजनीति में निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ हैं। उन्हें चुनौती देना राज्य भाजपा इकाई से लेकर केंद्रीय नेतृत्व के बस से बाहर की बात है। सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री पदभार संभालने के बाद जिस तरह से येदुरप्पा को हाशिये पर पहुंचाने का कार्य हुआ, उससे उन्होंने येदुरप्पा सहित उनके समर्थकों की नाराजगी मोल ले ली। येदुरप्पा समर्थक इससे पूर्व भी कई बार केंद्रीय नेतृत्व पर गौड़ा को पदच्युत करने का दबाव बना चुके थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ‘जो होगा, देखा जाएगा’ की तर्ज पर मूकदर्शक बनना आज राज्य में पार्टी की नींव को तो कमजोर कर ही गया है, राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी की छवि नकारात्मक बनती जा रही है। येदुरप्पा के ही कट्टर समर्थक जगदीश शेट्टार को राज्य की कमान सौंपने की जिद पर अडेÞ ये समर्थक पार्टी की कार्यकर्ता आधारित छवि को तोड़ उसे भी कांग्रेस की भांति एक सत्तात्मक व्यक्तिवादी पार्टी का चोला ओढ़ाना चाहते हैं। यह संघ को कतई मंजूर नहीं है, लेकिन येदुरप्पा की बढ़ी ताकत और उन्हें प्राप्त समर्थन से उसका अनुशासन का डंडा भी जोर नहीं मार रहा।
अब खड़े हैं यक्ष प्रश्न
अब जगदीश शेट्टार यदि मुख्यमंत्री नियुक्त हो भी गए तो क्या यह परंपरा भाजपा में कुरीतियों को जन्म नहीं दे रही? यह यक्ष प्रश्न है। सवाल यह भी भाजपा शासित अन्य राज्यों से भी यदि ऐसा ही असंतोष उभरा तब केंद्रीय नेतृत्व क्या करेगा? क्या सभी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदल देना ही इस संकट का समाधान होगा? इसमें संशय नहीं कि येदुरप्पा कर्नाटक में अभूतपूर्व जनसमर्थन रखते हैं, लेकिन इससे उन्हें मनमानी की छूट तो नहीं दी जा सकती! कांग्रेस के नक्श-ए-कदम पर चल रही भाजपा में यदि यही हाल रहा तो शासित राज्यों में हर वर्ष एक नए मुख्यमंत्री को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलानी पडेगी। ऐसे में सुशासन व सुराज के पार्टी के दावे का क्या होगा? क्या भाजपा में नेतृत्व का संकट इतना गहरा गया है कि मामूली सा कार्यकर्ता सत्ता में आते ही खुद को सर्वेसर्वा मानने लगता है। अंदर ही अंदर पार्टी कमजोर होती है? जहां तक बात येदुरप्पा की है तो वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे है। क्या वर्तमान में संघ के प्रचारक येदुरप्पा की भांति पद पिपासु हैं? आखिर येदुरप्पा किसके सामने और क्या आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं?




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