श्री गणेशाय नमः

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श्री गणेशाय नमः

Sunday, December 25, 2011

परिसीमन से शिकन


यूपी समेत पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बज गया है। यूपी में नये परिसीमन के आधार पर चुनाव होने हैं। इस परिसीमन ने न सिर्फ विभिन्न राजनीतिक दलों बल्कि कई प्रत्याशियों के माथे पर शिकन डाल दी है। क्या होगा इस नये परिसीमन का असर? क्यों है प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें। राजनैतिक दल बार-बार क्यों बदल रहे प्रत्याशी? सत्तासीन विधायकों का आखिर क्यों कट गया टिकट? एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
चुनाव आयोग ने यूपी में सात चरणों में चार से 28 फरवरी के बीच विस चुनाव कराने का ऐलान कर दिया है। पंजाब, उत्तराखंड में 30 जनवरी को चुनाव होंगे। मणिपुर में 28 जनवरी और गोवा में तीन मार्च को वोट डाले जाएंगे। विस चुनाव समय से पहले होने से सत्ताधारी बसपा को काफी मायूसी है। उसे मलाल रहेगा कि राज्यसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीट पर कब्जा जमाने के लिए उसके पास उपलब्ध मौजूदा सख्या बल का उपयोग नहीं हो पाएगा। लिहाजा अब इस सदन में उसकी परफार्मेंस अगले विस चुनाव के नतीजों पर तय होगी। यही नहीं, फरवरी में चुनाव होने से जनता को लुभाने के लिए बसपा सरकार के हाथ औपचारिक रूप से बंध गए हैं। वहीं नए परिसीमन ने विभिन्न दलों का दिन का चैन और रातों की नींद छीन ली है।
माया के मंसूबों पर फिरा पानी
खुद सीएम मायावती के विभिन्न जिलों के औचक निरीक्षण करने के मंसूबे पर भी पानी फिर गया है। अब इसकी गुंजाइश नहीं रही कि वह बतौर सीएम ऐसा कर सकेंगी। आचार संहिता लागू होने से उन्हें अब पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से ही जनता को लुभाना होगा। वैसे भी बसपा को छोड़ बाकी प्रमुख दलों ने निर्वाचन आयोग से मांग की थी कि फरवरी माह में ही चुनाव होने चाहिए। बसपा जबकि अप्रैल माह में चुनाव चाहती थी। उसकी दलील थी कि मौसम और माध्यमिक शिक्षा परिषद की परीक्षाओं के कारण चुनाव फरवरी माह में कराना अनुचित होगा। इतना ही नहीं, बसपा सरकार ने दबाव बनाने के लिए बोर्ड परीक्षा की तिथि की घोषणा पहली मार्च से कर भी दी। खैर, इसके बाद भी बात नहीं बनीं और चुनाव की घोषणा कर दी गई है। हालांकि बसपा मुखिया को इस कोशिश से यह उम्मीद थी कि इस दौरान वह विरोधियों के हमले व अपने विधायकों पर लगे दाग को धो डालेंगी। कारण कि इससे उसे अप्रैल तक का वक्त मिल जाएगा। उधर, परिसीमन ने भी यूपी का चुनावी गणित गड़बड़ा दिया है।
परिसीमन का असर
यूपी में परिसीमन के बाद हो रहे 16 वीं विस चुनाव कई मायने में अहम होंगे। इसमें 403 में से 90 सीटें समाप्त हो गईं हैं। वहीं 126 सीटें पुर्नगठित हुई हैं या उन्हें नया नाम मिला है। इनका न केवल भूगोल बदला है, बल्कि जातीय समीकरण भी उलट-पुलट गए हैं। परिसीमन के बाद बिछ रही चुनावी बिसात में अब सभी दल बदले हुए जातीय समीकरण के हिसाब से अपनी गोटियां सेट करने की जुगत में लग गए हैं। पिछले लोस चुनाव में भी सियासी दलों को नए परिसीमन के हिसाब से अपनी रणनीति तय करनी पड़ी थी। वहीं अब पहली बार विस चुनाव में यह चुनौती एक बार फिर खड़ी हो गई है। बदले हुए जातीय समीकरणों के आधार पर लोस चुनाव का अनुभव तो दलों को है, लेकिन अब विस सीटों में बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा समेत सभी दलों को जमीनी हकीकत का पूरा अनुभव नहीं है।
सियासी दलों की चिंता का कारण
सियासी दलों को चिंता इस बात को लेकर है कि वह बदले हालात में किस तरह प्रत्याशी तय करें, ताकि सीट के जातीय गणित के हिसाब से भी दांव सटीक बैठे। लिहाजा वह इसे लेकर दुविधा में है कि क्षेत्र का भूगोल बदलने से उनका वोटों पर कितना प्रभाव होगा? किस बिरादरी के कितने वोट, किस सीट पर निर्णायक हैं? व्यक्तिगत तौर पर सीटिंग विधायकों व अन्य दावेदारों के सामने भी यही मुश्किलें हैं। हकीकत में परिसीमन से कई दावेदारों की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उनके लिए भी परिसीमन से प्रभावित सीटों पर अपने जौहर को दिखाने के लिए अधिक प्रयत्न करना पड़ेगा। यही नहीं, अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों का भूगोल बदलने से समीकरण भी बदल सकते हैं।
नया परिसीमन, नई रणनीति
पहली बार आरक्षित सीटों पर शानदार सफलता पाने वाली बसपा के लिए नए परिसीमन के बाद बनी सीटों पर नए सिरे से रणनीति बनाना अब जरूरी दिख रहा है। यही चुनौती अब बाकी दलों के लिए भी है। यही वजह है कि पार्टियों को भी प्रत्याशी का नाम तय करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जिन सीटिंग विधायकों की सीट खत्म हो गई है, उनके अपनी दावेदारी दूसरी सीट पर पक्की करने के लिए भी ‘अपनों’ से जूझना पड़ रहा है। टिकट वितरण को लेकर दावेदारों में इसी वजह से ऊहापोह की स्थिति है।  बतौर बानगी यदि भाजपा को ही लें तो पार्टी के सामने आज सबसे बड़ी समस्या उम्मीदवारों के नाम तय करने को लेकर है।
नहीं निकल पा रहा नतीजा
चुनाव आयोग ने फरवरी में मतदान की तारीखों का ऐलान कर दिया है, लेकिन भाजपा अभी तक आधी सीटों के लिए भी उम्मीदवारों का नाम तय नहीं कर सकी है। प्रदेश के नेता राज्य की सभी सीटों के लिए कई दौर में बैठक कर बहस-मुबाहिसा कर चुके हैं, लेकिन नतीजा नहीं निकला है। अब सभी को अगले सप्ताह होने वाली पार्टी के केंद्रीय चुनाव   समिति की बैठक का इंतजार है, जिसमें शेष बचीं सीटों के लिए नामों का निर्धारण होगा। वहीं न सिर्फ बसपा, बल्कि फरवरी में चुनाव की घोषणा ने भाजपा के सामने भी असंमजस की स्थिति पैदा कर दी है। इससे भाजपा की चुनावी रणनीति भी गड़बड़ा गई है। वैसे संगठन, प्रबंधन और प्रचार अभियान में तो काफी आगे है, लेकिन उम्मीदवार तय करने में उसका पिछड़ना राजनीति की दृष्टि से उचित नहीं माना जा रहा है।
लक्ष्य से पिछड़ रही भाजपा 
केंद्रीय कोर ग्रुप की बैठक में हुई समीक्षा और प्रदेश के नेताओं की लगातार हो रही औपचारिक बैठकों में भाजपा अब खुद महसूस कर रही है कि वह शुरूआत में तय अपने ही लक्ष्य से पिछड़ रही है। नेतृत्व की सोच फिलहाल तीसरे पायदान पर खड़ी पार्टी को दूसरे नंबर पर लाने की थी, लेकिन अब उसे इसको लेकर संशय दिख रहा है। रणनीति के जानकारों की मानें तो पार्टी अपनी ताकत अधिकतम दोगुना कर सकती है। दरअसल बीते साल बिहार में मिली बड़ी सफलता से उत्साहित भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए भी उसी रणनीति पर काम शुरू किया था। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी भी जमीनी मजबूती पर जोर दे रहे हैं और संगठन को बूथ स्तर से लेकर राज्य स्तर तक मजबूती के लिए तमाम तैयारियां करा रहे हैं, लेकिन यह हकीकत है कि वह अभी तक यूपी में कोई एक उम्दा नेता पेश नहीं कर सके हैं। वहीं उम्मीदवारों के चयन में देरी भी उन्हें जोरदार झटका दे सकती है।
क्या है परिसीमन
संविधान के अनुच्छेद 82 के अधीन, हरेक जनगणना के बाद कानून द्वारा संसद एक परिसीमन अधिनियम को अधिनियमित करती है। उसके बाद केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग का गठन करती है। आयोग परिसीमन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को सीमांकित करती है। देश में चार बार परिसीमन हुआ। पहली बार 1952, दूसरी बार 1963, तीसरी बार 1973, फिर 2002 में परिसीमन हुआ। तदुपरांत प्रदेश में 2009 में लोकसभा चुनाव भी नये परिसीमन के आधार पर कराये गये थे।
परिसीमन का सर्वाधिक असर
इसका सबसे ज्यादा असर हरदोई जिले में रहा है। यहां की नौ में से छह सीटों का अस्तित्व मिट गया है। बदलाव के नजरिये से गोरखपुर और जौनपुर दूसरे नंबर पर प्रभावित जिले हैं। यहां पांच-पांच सीटों का वजूद मिट गया है। मुरादाबाद, बाराबंकी, बलिया मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में चार-चार विस सीटों का नाम या तो बदल गया है, या खत्म हो गया है। वहीं मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जिले में चार-चार नई सीटों का का गठन हुआ है, जबकि बाराबंकी और बलिया में नई सीटों की संख्या तीन-तीन हैं। वाराणसी ऐसा जिला रहा जहां परिसीमन में समाप्त तीन सीटों के स्थान पर पांच नई सीटें बनीं। बलरामपुर, बांदा, कौशांबी, ललितपुर, महोबा, पीलीभीत और संत रविदासनगर में न कोई पुरानी सीट खत्म हुई और न ही कोई नई सीट गठित हुई।
आरक्षित सीटों पर असर
नहटौर (बिजनौर), धनौरा (ज्योतिबा फूले नगर), मिलक(रामपुर), कास्ता (खीरी), गोपामऊ, सांडी, बालामऊ (हरदोई), मोहना (उन्नाव), बाबागंज (प्रतापगढ़), आलापुर (अंबेडकरनगर), जैदपुर (बाराबंकी), बलहा (बहराइच), महादेवा (बस्ती), कपिलवस्तु (सिद्धार्थनगर), घनघटा (संत कबीरनगर), खजनी (गोरखपुर), बेल्थरारोड (बलिया), अजगरा (वाराणसी), कोरांव (इलाहाबाद), रसूलाबाद (रमाबाईनगर), आगरा ग्रामीण (आगरा) और बलदेव (मथुरा) की नई सीटें आरक्षित घोषित की गर्इं। वहीं नजीबाबाद (बिजनौर), रसड़ा (बलिया), मेजा (इलाहाबाद), गोवर्द्धन (मथुरा), चरथावल (मुजफ्फरनगर) आदि सीटें जो पहले आरक्षित थीं, इस बार अनारक्षित हो गई हैं। वहीं तीन सीटें जो पहले अनारक्षित थीं, अबकी आरक्षित हो गई हैं।
इनसेट...
                                            जिले और नए विस: एक नजर में
बलिया : बेल्थरारोड, फेफना, बैरिया
गाजीपुर : जंगीपुर
वाराणसी : पिंडरा, अजगरा, शिवपुर
जौनपुर :बदलापुर, मल्हनी, मुंगरा बादशाहपुर, जफराबाद
सोनभद्र : घोरावल, ओबरा
मिर्जापुर : मड़िहान
इलाहाबाद : फाफामऊ, फूलपुर, कोरांव
फतेहपुर : अयाहशाह, हुसैनगंज
गोरखपुर : कैपियरगंज, गोरखपुर शहर, गोरखपुर ग्रामीण, खजनी, चौरीचौरा
कुशीनगर : खड्डा, तमकुहीराज, कुशीनगर
देवरिया : पत्थरदेवा, रामपुर कारखाना
मऊ : मधुबन
आजमगढ़ : फूलपुर, पवई, दीदारगंज
चंदौली : सकलडीहा, सैयदराजा
जेपीनगर : धनौरा, नौगांव, सादात
मुरादाबाद : मुरादाबाद ग्रामीण, मुरादाबाद नगर, बिलारी, असमौली
विजनौर : बढ़ापुर, नहटौर, नूरपुर
रामपुर : स्वार, चमरव्वा, मिलक
बदायूं : शेखुपुर
बरेली : मीरगंज, बिथरी चैनपुर, बरेली
शाहजहांपुर : कटरा
खीरी : पलिया, गोला कोकरन्नाथ, कस्ता
सीतापुर : महोली, सेवता
हरदोई : सवाइजपुर, गोपामऊ, सांडी, बिलग्राम मल्लावा, बालामऊ
उन्नाव : मोहान
लखनऊ : बख्शी का तालाब, लखनऊ उत्तर
रायबरेली : हरचंदपुर, ऊंचाहार
प्रतापगढ़ : बाबागंज, विश्वनाथगंज, रानीगंज
सुल्तानपुर : सदर, लंभुआ
अंबेडकरनगर : आलीपुर
फैजाबाद : गोसार्इंगंज
बाराबंकी : कुर्सी, बाराबंकी, जैदपुर
बहराइच : बलहा, मटेरा, प्यागपुर
श्रावस्ती : श्रावस्ती
गोंडा : मेहनौन, तरबगंज, गौरा
बस्ती : रुदौली, बस्ती सदर, महादेवा
संत कबीरनगर: घनघटा
सिद्धार्थनगर : कपिलवस्तु
झांसाी : झांसी नगर
कानपुर नगर :   बिठूर, किदवईनगर, महाराजपुर
कानपुर देहात : रसूलाबाद, अकबरपुर रनियां, सिकंदरा
औरैया : दिबियापुर
कन्नौज : तिर्वा
फर्रूखाबाद : अमृतपुर, भोजपुर
चित्रकूट : चित्रकूट
एटा : अमांपुर, मारहरा
आगरा : आगरा दक्षिण, आगरा उत्तर, आगरा ग्रामीण
फिरोजाबाद : सिरसागंज
मथुरा : बलदेव
महामायानगर : सादाबाद
अलीगढ़ : छर्रा
गौतम बुद्ध नगर: नोएडा
गाजियाबाद : लोनी, साहिबाबाद, धौलाना
मेरठ : मेरठ दक्षिण
बागपत : बड़ौत
मुजफ्फरनगर : शामली, बुढ़ाना, पुरकाजी, मीरापुर
सहारनपुर : बेहट, सहारनपुर नगर, रामपुर मनिहारन, गंगोह
महाराजगंज : नौतनवां

इनसेट
खत्म हुए तथा नाम बदले गए विस क्षेत्र: एक नजर में
बिजनौर : सेवहारा, अफजलगढ़
ज्योतिबाफुले नगर : गंगेश्वरी
मुरादाबाद : बहजोई, मुरादाबाद पश्चिम, मुरादाबाद, मुरादाबाद देहात
रामपुर : स्वाटरांडा, शाहाबाद
बदायूं : उसहैत, बिनावर
बरेली : सान्हा, बरेली सिटी, कांवर
शाहजहांपुर : निगोही
खीरी :हैदराबाद, पेला
हरदोई : बेनीगंज, अहरौरी, बावन, पिहानी, बिलग्राम, मल्लावां
उन्नाव : हड़हा, हसनगंज
लखनऊ : महोना
रायबरेली : सतांव, डलमऊ
प्रतापगढ़ : गड़वारा, वीरापुर, बिहार
सुल्तानपुर : जयसिंहपुर, चांदा
अंबेडकरनगर : जहांगीरगंज
फैजाबाद : सोहावल
बाराबंकी : सिद्धौर, मसौली, नवाबगंज, फतेहपुर
बहराइच : फखरपुर, चर्दा
श्रावस्ती : इकौना
गोंडा : सादुल्लानगर, मुजेहना, डिविसर
बस्ती : नगर पूर्व, बस्ती, रामनगर
संतकबीरनगर : खेसहरा, हैसर बाजार
गोरखपुर : धुरियापार, कोडीराम, मुंडेरा बाजार, गोरखपुर, मानीराम
सिद्धार्थनगर : नौगढ़
महाराजगंज : लक्ष्मीपुर, श्याम देउरवा
जौनपुर : बरसठी, बयालसी, रारी, खुटहन, गड़वारा
कुशीनगर : नौरंगिया, सेवरही
देवरिया : कसया, गौरीबाजार
औरैया : अजीतमल
गाजीपुर : दिलदारनगर, सादात
आजमगढ़ : फूलपुर, सरायमीर
बलिया : सीयर, चिलकहर, दोआबा, कोपाचीट
चंदौली : धानापुर, चंदौली
वाराणसी : चिरईगांव, कोलअसला, गंगापुर
मिर्जापुर : राजगढ़
इलाहाबाद : झूंसी, नवाबगंज
फतेहपुर : किशुनपुर, हसवा
कानपुर नगर : जनरलगंज, सरसौल, चौबेपुर
कानपुर देहात : राजपुर, सरवन खेड़ा, डेरापुर
इटावा : लखना
कन्नौज : उमर्दा
फर्रुखाबाद : कमालगंज, मोहमदाबाद
चित्रकूट : कर्वी
मऊ :नत्थूपुर
हमीरपुर : मौदहा
झांसी : झांसी
जालौन : कौंच
मैनपुरी : घिरौर
एटा :सकीट, सोरो, निधौलीकला
आगरा : दयालबाग, आगरा पूर्व, आगरा पश्चिम
मथुरा : गोकुल
हाथरस : सादाबाद, सासनी
अलीगढ़ : गंगीरी
बुलंदशहर : अगौता
मेरठ : खरखौदा
बागपत : खेकड़ा, बरनावा
मुजफ्फरनगर : कांधला, जानसठ, मोरना, बघना
सहारनपुर : सरसावां, नागल, हरोड़ा, मुजफ्फराबाद

Tuesday, December 20, 2011

सस्ता अनाज नहीं, बदलो अंदाज

गरीबी अभिशाप है। यह सनातन सत्य है। गरीबों के भूखे पेट को केवल भरकर गरीबी दूर नहीं की जा सकती। उसके लिए सस्ता अनाज ही केवल विकल्प नहीं हो सकता। एक सर्वे के मुताबिक हर साल गरीबों की तादाद में बढ़ोत्तरी हो रही है। लिहाजा आखिर यह सब्सिडी वाला गेहूं, चावल देकर उन्हें कब तक जीवित रखा जा सकता है। जरूरत है व्यवस्था में परिवर्तन लाने की। यदि व्यवस्था बदलेगी तो गरीबी खुद-ब-खुद दूर हो जाएगी। विदेशों में इतना काला धन जमा है कि अगर इसे यहां लाकर कल-कारखाने लगाए जाएं , विद्यालय, महाविद्यालय बनाये जाएं, रिसर्च सेंटर खोले जाएं, गरीबों की शिक्षा की राह आसान की जाए। वह चाहें व्यवसायिक शिक्षा हो या तकनीकी शिक्षा। इससे न सिर्फ देश की गरीबी मिटेगी, बल्कि हमारे पास कुबेर के खजाने की भांति मेधा निधि भी होगी। कहा जाता है कि एक शिक्षित समूचे इलाके का भविष्य बदल सकता है। अमेरिका, चीन आदि देशों ने शिक्षा की बुनियाद मजबूत की और आर्थिक रूप से शक्तिशाली बन गये। हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिरने के बाद भी तबाह हुआ जापान तकनीकी शिक्षा के बूते एक बार फिर विकास की दौड़ में न सिर्फ शामिल हुआ, बल्कि उसने बुलंदी भी हासिल की।
विदेशों में जमा काला धन अरबो-खरबों रुपये का है। लोकपाल विधेयक के जरिये अन्ना व बाबा रामदेव सभी उसे अपने देश में लाना चाहते हैं। इसके पीछे का सत्य यह है कि जो धन विदेश की तरक्की का राह खोल रहा है, क्या उससे भारत की तरक्की नहीं हो सकती। यदि वह काला धन है तो उसे तो हर हाल में भारत में आना ही चाहिए।  अब अगर मूल मुद्दे पर आएं तो कैबिनेट ने खाद्य सुरक्षा बिल को हरी झंडी दे दी है। संसद में विधेयक भी पारित हो गया है। इसके मुताबिक प्राथमिक श्रेणी (बीपीएल) को प्रतिमाह, प्रति व्यक्ति सात किलो और सामान्य श्रेणी (एपीएल) को प्रति व्यक्ति तीन किलो अनाज दिया जाएगा। खाद्य सुरक्षा बिल से पहले तीन साल में बतौर सब्सिडी सरकार लगभग छह लाख करोड़ की भारी-भरकम रकम की जरूरत होगी। यह भी खास है कि यह रकम कहां से आएगी, सरकार ने इसका खुलासा नहीं किया है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद खाद्य सुरक्षा बिल संसद में पेश हो गया।  इसमें 63.5 प्रतिशत आबादी को सब्सिडी पर अनाज पाने का कानूनी अधिकार दिया गया है। छह लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ हर तीन साल में सरकार पर पड़ेगा। इसमें 75 प्रतिशत ग्रामीणों को इस कानून के दायरे में लाने की बात है। इसमें कम से कम 46 फीसदी लोग प्रायोरिटी हाउस होल्ड के तहत आएंगे। वहीं 50 प्रतिशत शहरी लोग इस कानून के दायरे में आएंगे। इसमें 28 फीसदी लोग प्रायोरिटी कैटेगरी के तहत आने वाले लोग होंगे। इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे हर व्यक्ति को हर माह सात किग्रा चावल, गेहूं और मोटा अनाज दिया जाएगा। उन्हें चावल तीन रुपये प्रति किग्रा, गेहूं दो रुपये प्रति किग्रा और मोटा अनाज एक रुपये प्रति किग्रा की दर से वितरित होगा। वहीं गरीबी रेखा के ऊपर के लोगों को तीन किग्रा चावल, गेहूं व मोटे अनाज दिए जाएंगे। कुल मिलाकर एक व्यक्ति का पेट हम इस राशन से एक माह तक नहीं भर सकता। राशन खत्म होने के बाद उसे फिर से वही साहूकारों के यहां चक्कर काटना होगा या कर्ज लेकर पेट भरना होगा। ऐसे में इतनी बड़ी रकम खर्च करके भी हम वहीं खड़े होंगे, जहां से चले थे। ऐसे में इसका कोई खास औचित्य या लाभ मुझे तो नहीं दिखता।
अब एक बानगी देखिये। अमूमन एक दिन में एक व्यक्ति 750 ग्राम खाद्यान्न खाता है। यह एक अनुमान है। इसमें कमीबेस भी संभव है। इस लिहाज से देखें तो यह खाद्यान्न बमुश्किल से उसका 10 दिनों तक ही पेट भर सकता है। इसके बाद वह 20 दिन के लिये या तो महंगा अनाज खरीदेगा या फिर भूखे रहेगा। वहीं अगर छह लाख करोड़ रुपये से रोजी-रोजगार के अवसर सृजित किए जाएं तो पहला लाभ तो यह होगा कि इससे कई बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। इससे कुटीर उद्योग, लघु उद्योग आदि स्थापित कर देश को विकास के पथ पर अग्रसर किया जा सकता है। इसमें जितने भी गरीब हैं, उन्हें विशेष सहूलियत देते हुए काम-धंधा कराया जाए। इससे एक तो मानव शक्ति में इजाफा होगा, वहीं पर्याप्त आमदनी की भी राह खुलेगी। वैसे आम योजनाओं की तरह इस योजना में भ्रष्टाचार नहीं होगा, इसे नहीं भूला जा सकता। आमतौर पर अगर गांवों में बंटने वाले राशन को ही लें तो कोटेदार अमूमन सरकारी राशन का एक बड़ा हिस्सा कालाबाजार पहुंचा देता है। आपूर्ति विभाग के बाबू से लेकर अधिकारी तक की इसमें सांठ-गांठ होती है। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाए कि गरीबों के लिए यह कोशिश हकीकत में रंग लाएगी ही। इस अनाज से गरीबों का पेट भरे या न भरे, कोटेदारों का पेट थोड़ा और जरूर फूल जाएगा। लिहाजा भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे समाज में इतने बड़ी जनता की धनराशि का अपव्यय कहां तक उचित कहा जा सकता है। हां, अगर सरकार इतने ही धन से रोजगार सृजित करने का प्रयास करे तो अगर व्याप्त भ्रष्टाचार के बावजूद एक लाख परिवारों को भी बेहतर जीवन जीने का साधन मिल गया तो देश से कम से कम इतने गरीब तो गरीबी रेखा से ऊपर आ जाएंगे।
  

Friday, November 25, 2011

नहीं बदलेगी तकदीर

पूर्वांचल के गठन से मुसलमानों को कोई फायदा नहीं
उद्योग के हिसाब से मिल सकती थोड़ी-बहुत राहत
कई  विभिन्न दलों में बंटना मुसलिमों के लिये घातक
एकजुटता का प्रदर्शन बखूबी नहीं कर पाते मुस्लिम
नये प्रदेश में 10 साल तक कोई परिवर्तन संभव नहीं
उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े होने के बाद भी पूर्वांचल के मुसलमानों की तकदीर संवरती नहीं दिख रही। हां, अगर पूर्वांचल राज्य गठन के बाद यहां की सरकार अगर इनको कारोबार करने में तवज्जों दे तो उन्हें थोड़ा सुधरने का अवसर जरूर मिलेगा। पूर्वांचल में जहां-तहां छितराये ये मुसलमान अगर लामबंद भी होते हैं तो ये अपना बहुत करिश्मा नहीं दिखा पायेंगे। मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि आगामी एक दशक तक इनके भाग्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं है।
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की कवायद इन दिनों जोरों पर है। खास तौर पर वाराणसी, बलिया, गाजीपुर आदि क्षेत्रों में इसकी चर्चा है कि पूर्वांचल राज्य गठन के बाद मुसलमानों का भविष्य क्या होगा। राजनीतिज्ञों की मानें तो यूपी के बंटवारे के बाद बनने वाला अलग पूर्वांचल राज्य में मुसलमानों को फिलहाल कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है। कारण कि जो स्थिति उत्तर प्रदेश के दौरान थी, वही अब भी बरकरार रहेगी। हालांकि उद्योग के हिसाब से उन्हें थोड़ा सुधरने का अवसर जरूर मिलेगा। 
आखिर ऐसा क्यों?
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब पांच करोड़ के आसपास है। प्रदेश के चार हिस्सों में बंट जाने से पूर्वांचल के हिस्से में 15.35 फीसदी मुसलमान आएंगे। हालांकि मुसलमान धार्मिक ऐतबार से हमेशा एकजुटता का प्रदर्शन करता आया है, लेकिन अंत में यही तबका बिखर जाता है। नतीजा वह न तो अपना रहनुमा चुन पाता है और न ही अपनी जमीन ही बना पाता है। वाराणसी के राजनीतिक विचारक जहांगीर आलम एडवोकेट बताते हैं कि कहीं-कहीं मुसलमान एकजुटता भी दिखाते हैं। चुनाव में भी यही एकजुटता होती है, लेकिन अलग-अलग तरीके से।
मुसलमानों की बढ़ जायेगी जिम्मेदारी
मुसलिम रिजर्वेशन मूवमेंट के प्रदेश संयोजक जफरयाब जिलानी का कहना है कि नये प्रदेश में करीब 10 साल तक कोई भी परिवर्तन के संकेत नहीं दिखेंगे। पूर्वांचल बनने से नये उद्योग-धंधों के विकास के अवसर इनके ऊपर उठने की वजह बन सकते हैं। कारण कि नये प्रदेश में वाराणसी, मऊ, आजमगढ़, बलिया, गोरखपुर समेत 26 जिले शामिल होंगे। वहीं कौमी एकता दल के प्रदेश अध्यक्ष अतहर जमाल लारी का दावा है कि राजनैतिक दृष्टि से मुसलमानों का नये प्रदेश में अहम रोल रहेगा। नये प्रदेश में तो उनकी संख्या 25 प्रतिशत रहेगी, तो वह इस मुद्दे पर अहम फैसला ले सकेंगे। उन्होंने कहा कि पूर्वांचल राज्य बन जाने से मुसलमानों की भी प्रदेश के विकास में जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। अधिकतर तबका बुनकर का होगा, जो अपने हुनर से प्रदेश की आर्थिक स्थिति में भी सहयोग देने से पीछे नहीं हटेगा।
ऐसी होगी तस्वीर
यूपी में फिलहाल मुस्लिमों की कुल आबादी18.50 फीसदी है। वहीं अगर पूर्वांचल की बात करें तो यहां मुस्लिमों की कुल आबादी15.35 फीसदी है। इसी क्रम में प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में मुस्लिम पुरुषों की कुल आबादी 15.24 फीसदी है, जबकि मुस्लिम महिलाओं की आबादी 15.47 फीसदी। कुल मिलाकर अगर ये मुस्लिम एकजुटता दिखायें तो काफी कुछ बदलाव कर सकते हैं, लेकिन अब इसके आसार दूर-दूर तक नहीं दिख रहे। खास तौर पर पूर्वांचल राज्य में विभिन्न छोटे-छोटे कौमी दलों के गठन ने इन्हें और छितरा दिया है। अब वे किसी भी एक दल पर आश्रित न होकर कई छोटे-छोटे दलों में बंट चुके हैं। 
दलों के दलदल में धंस गये मुसलमान
अगर पूर्वांचल की बात वर्तमान दौर को ही लेकर करें तो मुस्लिम खेमा कई पार्टियों में विभक्त हो चुका है। विभिन्न राजनैतिक दल भी इनका मत हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। एक ओर बसपा जहां मुस्लिम मतों को रिझाने में जुटी है, वहीं सपा भी इन्हें अपना बता रही है। भाजपा और कांग्रेस भी मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की कवायद करने में जुटे हैं। उधर, मुस्लिमों के बीच कभी गहरी पैठ रखने वाले अंसारी बंधुओं ने कौमी एकता दल के नाम से राजनीतिक पार्टी का गठन कर रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। लिहाजा ये छितराये मुसलमान किसी एक दल के नहीं रह गये हैं।
लग सकता है जोर का झटका
पूर्वांचल राज्य गठन के बाद अगर मुसलमानों ने एकजुटता का परिचय नहीं दिया तो उन्हें जोर का झटका भी लग सकता है। कारण कि अगर इस बिरादरी ने किसी भी एक दल की सवारी नहीं की और बिखर गये तो फिर इसका खामियाजा उन्हें काफी बरसों तक भुगतना पड़ सकता है। आज जो राजनैतिक पार्टियां उन्हें सिर-आंखों पर बिठाने के लिये बेचैन हैं, वे इन डोरे डालने के बजाय किसी सशक्त कौम को अपना बनाने की मुहिम में जुट सकते हैं। खास तौर पर गाजीपुर, बलिया, वाराणसी आदि क्षेत्रों के दौरे के बाद जो तस्वीर उभरकर सामने आई उसमें ये स्पष्ट हो गया कि ये वक्त मुसलमानों के लिए काफी अलर्ट रहने वाला होगा।
पूर्वांचल के गठन से बिखरना तय
गाजीपुर, बलिया की सरजमीं पर कई राजनीतिक दलों के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर   बताया कि पूर्वांचल राज्य गठन के बाद अगर मुसलमान बिरादरी दो से अधिक दलों में बंटती है तो उनका वह दबदबा खत्म हो जायेगा, जो इनके वजूद का गवाह रहा है। वैसे भी विभिन्न राजनैतिक दिग्गजों के वर्चस्व एवं राजनैतिक दलों की बढ़ी सक्रियता की वजह से इनका मात खाना तय माना जा रहा है। अगर पूर्वांचल में इनकी औकात घटी तो फिर मुस्लिम बिरादरी को निचले पायदान पर जाने से कोई ताकत रोक नहीं सकती। ऐसे में यदि वक्त रहते इस बिरादरी ने किसी एक दल को नहीं चुना तो उन्हें इसका दीर्घकालीन दुष्परिणाम भुगतना तय है। 


 प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में मुसलमानों की स्थिति

             जिला आबादी प्रतिशत पुरुष महिला
प्रतापगढ़         13.70 13.57       13.83
इलाहाबाद        12.72 12.56       12.90
बहराइच           34.83 34.40       35.33
गोंडा                19.26 18.85       19.71
फैजाबाद           14.57 14.33       14.83
अंबेडकर नगर   16.39 16.42       16.36
सिद्धार्थनगर      29.43 28.56       30.34
महाराजगंज      16.46 16.20       16.74
बस्ती               14.70 14.17       15.27
गोरखपुर             9.15 9.16         9.15
कुशीनगर           16.86 16.66       17.06
कौशांबी              13.51 13.29       13.76
देवरिया              11.38 11.21       11.55
मऊ                   19.14 19.15       18.93
आजमगढ़           15.07 15.15       15.00
बलिया                 6.57 6.54        6.61
जौनपुर               10.20 10.30       10.11
संत रविदास नगर  11.96 12.12       11.80
संत कबीर नगर      24.02 23.54       24.52
वाराणसी               15.85 15.95       15.74
गाजीपुर                  9.89 9.89        9.88
मिर्जापुर                 7.48 7.44        7.52
सोनभद्र                  5.40 5.40        5.41
श्रावस्ती                 25.60 25.02       26.26
बलरामपुर             36.72 35.59       37.97
चंदौली                  10.24 10.24       10.24
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टूटा तिलिस्म


पूर्वांचल की माफिया सियासत ने ली करवट
खुद अपने लिए किनारा तलाश रहे अंसारी बंधु
विधायकी सीट भी बचाना फिलहाल मुश्किल
सेकेंड रनर के कंधों पर अंसारी बंधुओं को ऐतबार
बलिया में कई पूर्व मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर
कई राजनीतिक दिग्गजों की मूंछ कटना तय
अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो जल्द ही पूर्वांचल की माफिया सियासत में ज्यादा तो नहीं, लेकिन काफी हद तक गिरावट आने के आसार हैं। जिस राजनीति के दमखम पर पूर्वांचल के अंसारी बंधु अरसे से अपनी धाक जमाए बैठे थे, वह तिलिस्म टूट चुका है। इस विधानसभा चुनाव में वे अब खुद के लिए किनारा तलाश रहे हैं। आखिर कैसे बदल गया इतना सब कुछ? जिन अंसारी बंधुओं के रहमोकरम पर पूर्वांचल में दिग्गज नेतागिरी करते थे, आखिर वह खुद अपनी जमीन के लिए कैसे मोहताज हो गए, जानिए इस रिपोर्ट से...!
गाजीपुर-बलिया से लौटकर अनीश कुमार उपाध्याय
पूर्वांचल की राजनीति में जल्द ही एक नया बदलाव होने जा रहा है। न सिर्फ यहां राज्य बंटवारे के बाद राजनीतिक घमासान तेज होगा, बल्कि जल्द ही यहां की सरजमीं से माफियाराज का भी सफाया हो जाएगा। मौजूदा हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि पूर्वांचल की जनता अब माफिया राजनीति से परेशान हो गई है। पिछले लोस चुनाव में जोरदार झटका देने के बाद यहां के लोग, फिजा में सिर्फ शांति चाहते हैं। पूर्व में जहां इस विस चुनाव के रक्तरंजित होने का आसार राजनीतिज्ञ लगा रहे थे, वहीं अब वे खुद स्वीकार कर रहे हैं कि जनता ने यहां पिछले लोस चुनाव से ही बदलाव की बयार बहा दी है। लिहाजा वह दिन दूर नहीं, जब पूर्वांचल की माटी से माफियागीरी का नामोंनिशां मिट जाएगा।
अफजाल खुद तलाश रहे किनारा
गाजीपुर जिले के पूर्व सांसद बाहुबली अफजाल अंसारी के लोस सीट गंवाने के बाद से ये आसार लगाए जा रहे थे कि यहां की छह विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाने के लिए अंसारी बंधु कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। वहीं अब हालात काफी बदल गए हैं। लोस सीट से सपा के राधेमोहन की जीत के बाद से यहां पूर्व सांसद रहे अफजाल अंसारी खुद अपने लिए किनारा तलाशते दिख रहे हैं। पहले साइकिल की सवारी करने के बाद अफजाल ने हाथी का साथ लिया। शुरुआती दौर में लाल झंडे को ‘लाल सलाम’ कर निकले मऊ के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को यह उम्मीद थी कि भारी-भरकम हाथी का साथ उनकी राजनीति को मुकाम दिलाने में अहम भूमिका निभाएगा। आपको याद दिला दें कि पिछले लोस चुनाव के वक्त गाजीपुर जिले के नगर स्थित लंका मैदान में पहुंचीं मुख्यमंत्री मायावती ने खुले मंच से अंसारी बंधुओं को अपराधी नहीं होने का ‘प्रमाण पत्र’ दिया था। यह दीगर है कि इस बयान पर काफी छीछालेदर होने के बाद मायावती ने झटके से बसपा के तब प्रत्याशी रहे अफजाल अंसारी से न सिर्फ दूरी बना ली, बल्कि पार्टी से निष्कासित भी कर दिया। 
अस्तित्व में आया कौमी एकता दल
इसी चुनाव में वाराणसी लोस सीट से उम्मीदवार रहे बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी (वर्ष 2007 में वे मऊ विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए थे) भी चुनाव हार गए। ऐसे में दोनों भाइयों की हार से एकबारगी पूर्वांचल की माफिया राजनीति ठिठक सी गई है। ऐसे में अपनी राजनीतिक जमीन खोते देख पूर्व सांसद अफजाल अंसारी ने मुख्तार अंसारी से राय-मशविरा के बाद कौमी एकता दल के नाम से एक राजनैतिक संगठन खड़ा किया है। वे इस विधानसभा चुनाव में गाजीपुर जिले समेत समूचे पूर्वांचल में अपने प्रत्याशी खड़ा कर रहे हैं। बकौल अफजाल अंसारी ये विस चुनाव में कौमी एकता दल नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। यह भी हकीकत है कि इन्हें अकेले दम पर सत्ता दूर दिख रही है। लिहाजा वे पीस पार्टी और भासपा जैसे जमीनी दलों से गठबंधन कर लखनऊ पहुंचने की तैयारी में हैं। खास ये कि कौमी एकता दल में उन प्रत्याशियों को तवज्जो दी जा रही है, जो पिछले विधानसभा चुनाव में सेकेंड रनर रहे हैं। इनको अपने साथ लाने के लिए वे हरसंभव कोशिश में जुटे हैं। यही वजह है कि अभी उन्होंने अपने प्रत्याशियों की लिस्ट को आउट तक नहीं किया है। गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़ में कौमी एकता दल के लंबे-चौड़े बैनर पोस्टर तो दिख रहे हैं, लेकिन कहीं भी इस पर प्रत्याशी की घोषणा नहीं की गई है। लिहाजा हो सकता है कि वे अन्य दलों के पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति को भांप रहे हों और इसके बाद ही अपना मोहरा वहां फिट करने की जुगाड़ में हों। 
ताकि खत्म न हो माफियाराज
सूत्रों की मानें तो अंसारी बंधुओं को इस विधानसभा चुनाव में उम्मीद है कि वे पूर्वांचल के दो-तिहाई मुसलमानों समेत अन्य छोटे जातिगत दलों का साथ लेकर लखनऊ  विस में अपनी जगह बना लेंगे। उनकी कुल मिलाकर यही रणनीति है कि वे उत्तर प्रदेश की उतनी सीटों पर काबिज हो जाएं, जिससे वे अपना समर्थन देकर यूपी की सरकार बनवा सकें। ताकि इनका माफियाराज खत्म न हो, लेकिन मौजूदा राजनीति एवं जनता की बढ़ी समझ से ऐसा होता दिख नहीं रहा है। हां, यहां मुहम्मदाबाद के विधायक शिबगतुल्लाह अंसारी एक बार फिर कौमी एकता दल के बैनर तले ताल ठोक रहे हैं। इनका दावा है कि इनके साथ मुस्लिम वर्ग के साथ ही गरीब व मजलूमों का एक बहुत बड़ा मतदाता समूह है। लिहाजा इनकी जीत पक्की है। इनके विरोध में बसपा प्रत्याशी पशुपति नाथ मैदान में हैं। माना जा रहा है कि इनकी सीधी टक्कर इन्हीं के साथ होगी।
मुस्लिम वोटों पर ताज की आस
पूर्वांचल की राजनीति में धाक जमाने निकले अंसारी बंधु हर हाल में कौमी एकता दल के प्रत्याशियों को विजय दिलाने की कोशिश में हैं। इसके लिए उन्होंने मुसलमानों को लुभाने के लिए हरसंभव कोशिश शुरू कर दी है। जैसा कि आंकड़ों के जानकार बताते हैं कि अंसारी बंधुओं को उम्मीद है कि अगर मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही वे कुछ राजभर आदि छोटी जातियों को अपने साथ जोड़ लेते हैं तो उनकी जीत पक्की है। लिहाजा वे इन छोटे दलों को अपने साथ जुटाने के लिए लखनऊ और दिल्ली तक सिफारिश लगा रहे हैं। गाजीपुर के सूत्रों ने बताया कि इसके लिए कौमी एकता दल के कार्यकर्ता छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर समूचे पूर्वांचल में कौमी एकता का संदेश दे रहे हैं। वैसे अबकी इस चुनाव में वे किसी भी प्रकार का लफड़ा मोल लेने के मूड में नहीं हैं। पार्टी के एक खास सूत्र ने बताया कि उन्होंने अपने कारिंदों को सख्त हिदायत दे रखी है कि किसी भी कीमत पर जोर-जबर्दस्ती का भाव न लाया जाए। जितना संभव हो मतदाताओं का विश्वास जीता जाए। इसके लिए उन्होंने कार्यकर्ताओं को गरीबों, मजलूमों की नि:स्वार्थ सेवा करने का भी निर्देश दे रखा है ताकि उनकी माफिया की छवि न बनने पाए। वैसे हकीकत क्या है, ये चुनाव के वक्त ही पता लगेगा।
बलिया में चल रही वर्चस्व की लड़ाई
इस विधानसभा चुनाव में बलिया में तस्वीर कुछ अलग ही दिख रही है। यहां पूर्व मंत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, जो इस चुनाव में अपने वर्चस्व की रक्षा की मुहिम में अभी से ही जुटे हैं। पूर्व मंत्रियों में कांग्रेस के बच्चा पाठक, सपा के शारदानंद अंचल, अंबिका चौधरी, रामगोविंद चौधरी, नारद राय, भाजपा के भरत सिंह वगैरह शामिल हैं। मंत्रियों की ये फौज एक बार फिर विस चुनावी दंगल में उतरने के लिए तैयार है। लिहाजा इनमें से कई मंत्रियों की विधायकी भी खतरे में दिख रही है। हालांकि भाजपा के भरत सिंह, नारद राय आदि पिछले चुनाव में हार का मुंह देख भी चुके हैं, लिहाजा इस बार वे किसी भी प्रकार का रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। मंत्री कार्यकाल में इनका सिर जो सातवें आसमान पर पहुंच चुका था, हार का मुंह देखने के बाद वे अब सीधे जनता से जुड़ रहे हैं। इसके लिए न सिर्फ ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं को तरजीह दी जा रही है, बल्कि ग्राम स्तर के कार्यकर्ताओं की एक कॉल को भी वे अब गंभीरता से ले रहे हैं।
द्वाबा की राजनीति में हलचल
बलिया जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों में द्वाबा को सर्वाधिक संवेदनशील इलाका माना जाता है। यहां की संवेदनशील जनता कब किधर बह जाए, कुछ कह पाना मतदान के दिन तक संभव नहीं रहता। यहां से करीब दो मर्तबा विधायक रहे एवं एक बार भाजपा के राजनाथ सिंह शासनकाल में खाद्य एवं रसद राज्यमंत्री का ओहदा संभालने वाले भरत सिंह हर हाल में अबकी जीत का ताज पहनने के लिए आतुर हैं। यहां के राजनीतिज्ञों की मानें तो भरत जमीनी नेता रहे हैं। यह दीगर है कि पूर्व में मंत्री पद पाने के बाद ये जनता से थोड़ा दूर हुए, तो जनता ने इन्हें आंखों से हटा लिया। लिहाजा बसपा से सुभाष यादव को टीका लग गया। अब वे एक बार फिर अपने पुराने रौ में लौट आए हैं। वैसे भी हकीकत है कि भरत की पहचान भाजपा पार्टी के नेता के रूप से ज्यादा जमीनी नेता के रूप में होती रही है। लिहाजा मौके की नजाकत को भांपते हुए यहां से सपा ने खुद को मजबूत करने के लिए सीयर विधायक व पूर्व मंत्री शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश अंचल को चुनावी मैदान में उतारने का मन बनाया है। माना जा रहा है कि यहां पूर्व के चुनावों में सपा के प्रत्याशी रहे पूर्व विधायक विक्रम सिंह क्षत्रिय मतों को बंटवारे के साथ अपने साथ जोड़ लेते थे, लेकिन यादव मत उनसे नहीं जुड़ पाते थे। जयप्रकाश अंचल यादव बिरादरी के हैं, लिहाजा सपा का मानना है कि इससे यादव मत उनसे जुड़ेंगे और द्वाबा में सपा की साइकिल चल निकलेगी। 
बांसडीह में दो दिग्गज आमने-सामने
यहां का बांसडीह विस का चुनाव भी अबकी कम रोचक नहीं होगा। खास तौर पर यहां दो ‘बूढ़े शेर’ चुनावी दंगल में उतरने के लिए तैयार हैं। एक तरफ कांग्रेस से पूर्व मंत्री रहे बच्चा पाठक चुनावी मैदान में हैं, तो दूसरी ओर पूर्व बाल विकास एवं पुष्टाहार मंत्री रामगोविंद चौधरी हैं। दोनों दिग्गजों का टकराव यादव बिरादरी पर निर्भर करता है। अमूमन ये माना जाता है कि बांसडीह विस यादव बाहुल्य इलाका है। यहां के यादव जिस ओर अपना रुख करते हैं, उसकी जीत पक्की हो जाती है। पूर्व में बच्चा पाठक ने अपनी तानाशाह राजनीति से यादवों से बैर मोल ले लिया था, जिसका खामियाजा उन्हें हार के रूप में चखना पड़ा। ये सभी यादव वोट रामगोविंद चौधरी के खाते में चले गए। इसके पीछे दूसरा कारण ये भी रहा कि सपा और खुद यादव बिरादरी से जुडे होने के नाते यादवों को इनकी साइकिल पर सवारी करने से कोई हर्ज नजर नहीं आया। लिहाजा रामगोविंद चौधरी बाजी मार ले गए। अबकी बच्चा पाठक ने इन यादवों को रिझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा अगर वोटों का बंटवारा हुआ तो पलड़ा किसका भारी होगा अभी कह पाना आसान नहीं है।
सदर विस में  घमासान
बलिया शहर से जुड़ा सदर विस हर मायने में अव्वल है। यहां के मतदाता हर बार बदलाव चाहते रहे हैं। लिहाजा यहां बसपा से मंजू सिंह और सपा से पूर्व नगर विकास राज्यमंत्री नारद के बीच कांटे की टक्कर होने का अनुमान है। हालांकि यहां अबकी कांग्रेस ने युवा चेहरे को तरजीह दी है। इन द्विकोणीय संघर्ष के बीच कांग्रेस ने नागेंद्र पांडेय के रूप में युवा चेहरा मैदान में उतारकर यहां की राजनीति में युवाओं का रुख अपनी ओर करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि महंगाई, भ्रष्टाचार आदि की आग में ये युवा चेहरा झुलसता दिख रहा है। नागेंद्र युवा कांग्रेसी हैं और छात्र राजनीति के बाद ये पहला अवसर है जब वे विधानसभा चुनाव में विस सदर से भाग्य आजमा रहे हैं। बलिया सदर विस में खास बात ये भी है कि नए परिसीमन ने कई नेताओं की सारी राजनीतिक गणित को ही गड़बड़ा दिया है। पूर्व में यहां तीन बड़ी आबादी वाले गांव मिड्ढा, अखार और बसंतपुर किसी भी प्रत्याशी के भाग्य  का फैसला करने का दंभ भरते थे। वहीं अब परिसीमन के बाद मिड्ढा फेफना विस में चला गया है। लिहाजा अखार और बसंतपुर अब इतने सक्षम नहीं रहे कि किसी भी प्रत्याशी को जीत का सेहरा बांध सकें। लिहाजा यहां अब प्रत्याशियों को नया गुणा-गणित लगाना पड़ेगा। इस गणित में कौन ज्यादा सफल होगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।
अन्य विस में भी जंग
वहीं सिकंदरपुर से राजधारी सिंह, रसड़ा से बब्बन राजभर कांग्रेस के बैनर तले चुनावी ताल ठाकेंगे। यहां भाजपा ने अभी पत्ता नहीं खोला है। बसपा ने केवल दो सीटों रसड़ा से उमाशंकर सिंह व सीयर से छठ्ठू राम के नाम की घोषणा की है। छठ्ठू राम बसपा शासनकाल में डेस्को उपाध्यक्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने जनता से सीधे जुड़ने का काफी प्रयास किया है। काफी दिनों तक बसपा जिलाध्यक्ष का ओहदा संभालने के बाद पूर्व सीएम मायावती ने उन्हें लाल बत्ती दी थी। लिहाजा सीयर में वे अपने पूर्व में किए विकास कार्यों को भूनाने की मुहिम में जुटे हैं। हालांकि वे इस मुहिम में कितना सफल हो पाते हैं, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। वहीं सपा ने छह सीटों में से पांच की घोषणा कर दी है। इनमें चारों पूर्व मंत्रियों में से किसी का टिकट नहीं कटेगा, ऐसी उम्मीद है। यहां फेफना से पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी, सदर से पूर्व नगर विकास राज्यमंत्री नारद राय, रसड़ा से सनातन पांडेय, बांसडीह विस से रामगोविंद चौधरी तथा द्वाबा विस से पूर्व मंत्री एवं सीयर विधायक शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश अंचल को टिकट मिला है। सीयर विस से अभी सपा ने प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। कुल मिलाकर यहां के हालात काफी रोचक होते दिख रहे हैं। 
जो जितना भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी
खास तौर पर बलिया को उत्तर प्रदेश की राजनीति का अखाड़ा माना जाता है। यहां जिस दल के प्रत्याशी ज्यादा जीतते हैं, इतिहास गवाह रहा है कि अमूमन प्रदेश में उन्हीं की सत्ता रही है। यही वजह रही कि पूर्व की सपा सरकार ने बलिया के चार विधायकों को मंत्री पद से नवाजा था। लिहाजा अबकी चुनाव में यहां के चारों पूर्व मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। खास तौर पर शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश अंचल पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यहीं से उनके कदम राजनीति की ओर बढ़े हैं। शारदानंद अंचल भी जी-जान से अपने बेटे को जीत दिलाने की कवायद में अभी से ही जुट गए हैं। इसके लिए पुराने सपा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियों का बंटवारा भी कर दिया गया है। वैसे शारदानंद अंचल की बनी बनाई जमीन पर जयप्रकाश अपनी राह कैसे निकालते हैं, ये अभी वक्त के गर्भ में है। हालांकि वहां के राजनीतिज्ञों की मानें तो शारदानंद अंचल के बेहतर व्यक्तित्व का लाभ, बसपा और कांग्रेस के विरोध में उठे स्वर का लाभ जयप्रकाश अंचल को अगर मिलता है तो उनकी सीट पक्की हो सकती है। हालांकि इस बारे में अभी कुछ कहना गलत होगा, लेकिन हां, यहां उनके विपक्ष में उतरने वाले प्रत्याशियों की राह कांटों भरी जरूर दिख रही है।

Sunday, October 30, 2011

मनरेगा पर ‘महाभारत’

चले थे हज बख्शवाने, रोजे पड़ गए गले
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने लगाया मनरेगा में धांधली का आरोप
जयराम ने जिस एनजीओ को बनाया आधार, उसी ने झाड़ा पल्ला
मनरेगा में भ्रष्टाचार को लेकर दर्ज किए गए थे 10 एफआईआर
मीडिया को चिट्ठी लीक होने की खबर से नाराज हुए सीएम माया
मनरेगा को लेकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस व प्रदेश की मुखिया मायावती के बीच चल रही महाभारत में कोई पीछे हटने का तैयार नहीं है। वहीं केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश जिस एनजीओ को आधार बनाकर मायावती को लपेट रहे थे, उसी एनजीओ ने ऐसी किसी  भी जानकारी से इनकार कर केंद्रीय मंत्री को कटघरे में ला खड़ा किया है।
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
केंद्र और यूपी सरकार के बीच चल रही सियासी जंग के बीच अब मनरेगा एक नया मुद्दा बन गया है। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने योजना की धनराशि के दुरुपयोग पर सीबीआई जांच की जरूरत से इंकार करते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश पर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए पीएम मनमोहन सिंह को पत्र लिखा। वहीं रमेश ने भी पलटवार करते हुए कहा कि वे यूपी सरकार के आरोपों पर कोई जवाब नहीं देंगे। खैर, मनरेगा को लेकर केंद्र व यूपी सरकार में छिड़ी महाभारत का मामला पीएम दरबार में है। जबकि केंद्रीय मंत्री जिस एनजीओ के सहारे सीएम को कटघरे में खड़ा कर रहे थे, उसी एनजीओ ने उनके दावे का खंडन भी कर दिया है। लिहाजा केंद्र सरकार एक बार फिर बगले झांकते दिख रही है।
क्या था मामला
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को मनरेगा योजना में राज्य में एक बड़े घोटाले का हवाला देते हुए एक पत्र लिखा। वनांगना एनजीओ को आधार बनाकर लिखे गए खत में उन्होंने मनरेगा के धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया। खास तौर पर प्रदेश के सात जिलों यथा बलरामपुर, गोंडा, महोबा, सोनभद्र, संत कबीर नगर, कुशीनगर और मिर्जापुर में मनरेगा के धन के दुरुपयोग का आरोप सूबे की बसपा सरकार पर लगाया। बलरामपुर में जहां 2007-08 में  विभिन्न पंचायतों में 1.5 लाख से अधिक कैलेंडर प्रत्येक 31 रुपये की लागत से मनरेगा के धन से खरीदा गया। इसके अलावा 80 लाख रुपये के प्राथमिक चिकित्सा बक्से, सात लाख रुपये के टेंट भी खरीदे गए। वहीं गोंडा में इसी सत्र में पंचायतों में 37 लाख रुपये के खिलौने खरीदे गए। वहीं 1.09 करोड़ के टेंट की खरीद हुई। अधिकांश खरीद उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड से बिना निविदा के खरीदे गए थे। इसी क्रम में कुशीनगर में भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था। मिर्जापुर में चार करोड़ रुपये गबन का आरोप लगाया गया। उधर, सोनभद्र में भी 250 करोड़ रुपये के दुरुपयोग व गबन का आरोप लगाया गया था।
...फिर शुरू हुई घेरने की कवायद
पत्र में दिए गए अनाप-शनाप खर्च के आंकड़े बयां कर रहे हैं कि यूपी में मनरेगा के धन में जमकर धांधली की गई है। कांग्रेस ने इसे ही आधार बनाकर यूपी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने रमेश की तरफदारी करते हुए कहा है कि ग्रामीण विकास मंत्री का खत तथ्यों पर आधारित है और तथ्य कभी झूठ नहीं बोलते। खास यह कि अभी चार दिन पहले ही केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने मुख्यमंत्री मायावती को यूपी में मनरेगा की बदहाली और धांधली पर लंबा-चौड़ा पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने यूपी के सात जिलों में मनरेगा में फंड के दुरुपयोग की बात कहते हुए मामले की सीबीआई जांच का सुझाव तो दिया ही, साथ ही आगे के लिए फंड रोकने की भी चेतावनी दे डाली।
एनजीओ ने भी झाड़ लिया पल्ला
अभी ये मामला चल ही रहा था कि अचानक नाटकीय ढंग से मामले की हवा निकल गई। हुआ ये कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश जिस एनजीओ को आधार बनाकर यूपी की माया सरकार पर आग्नेयास्त्र छोड़ रहे थे, उसकी हवा उसी एनजीओ ने निकाल दी। रमेश ने यूपी की सीएम मायावती को मनरेगा में हुई गड़बड़ियो  के मद्देनजर लिखी चिट्ठी में वनांगना एनजीओ का जिक्र किया था। इस एनजीओ से मिले फीडबैक का हवाला देते हुए जयराम ने माया सरकार से यूपी में मनरेगा को लेकर हो रही धांधली की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी। वहीं वनांगना एनजीओ ने दावा किया है कि उसने जयराम रमेश को इस तरह का कोई फीडबैक दिया ही नहीं है। एनजीओ संस्थापक सदस्य माधवी कुकरेजा ने बताया है कि इसी साल सितंबर में दिल्ली में मनरेगा पर सम्मेलन में उन्होंने इस स्कीम में दलित महिलाओं की भागीदारी के मुद्दे पर अपनी बात रखी थी। रमेश इस कार्यक्रम में बतौर चीफ गेस्ट मौजूद थे। मगर उन्होंने न तो मनरेगा में गड़बड़ी या धांधली जैसी कोई बात उठाई थी और न ही सीबीआई जांच की मांग रखी थी। माधवी के मुताबिक रमेश ने अपनी चिट्ठी में यूपी के सोनभद्र व महोबा जैसे जिन जिलों में हो रही कथित गड़बड़ियो का जिक्र किया है, वहां तो उनका संगठन काम भी नहीं करता है। उन्होंने राजनीतिक शक्ल ले चुके इस मसले में अपने संगठन को लपेटे जाने पर सख्त ऐतराज भी जताया है।
चिट्ठी लीक होने से खफा सीएम
मायावती का कहना है कि केंद्रीय मंत्री जयराम   रमेश की चिट्ठी उन्हें मिलने से पहले मीडिया को दे दी गई। हालांकि रमेश का पत्र मिलने के बाद सीएम ने चार जिलों क्रमश: बलरामपुर, गोंडा, मिर्जापुर और महोबा में गड़बड़ियों की जांच आर्थिक अपराध शाखा यानी ईओडब्लू से कराने के निर्देश दे दिए हैं। सीएम ने कहा है कि राज्य की एजेंसियां भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने में सक्षम हैं। कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने भी बताया है कि सीएम मायावती ने पीएम को इसके लिए पत्र भेज भी दिया है। इसमें बताया गया है कि किस तरह प्रदेश सरकार ने किस तरह  योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया है। मायावती ने बताया है कि राज्य सरकार ने पहले से ही उपलब्ध धनराशि का 60 फीसदी धन खर्च कर लिया है। वहीं दूसरी किस्त के लिए जरूरी अभिलेखों के साथ मांग भेजी गई है। सीएम ने पीएम से अनुरोध किया कि वे इस मामले में दखल कर धनराशि समय से रिलीज कराने की पहल करें ताकि योजना पर अमल समय में हो सके। नसीहत दी है कि जरूरतमंद परिवारों को रोजी-रोटी उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य दोनों को एक साथ खड़ा होना होगा।
10 एफआईआर दर्ज
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने जिन सात जिलों में गड़बड़ियों की शिकायत की है, मुख्यमंत्री ने वहां जांच शुरू करा दी है। अब तक 18 प्रथम श्रेणी, 13 द्वितीय श्रेणी और 43 तृतीय श्रेणी के अधिकारियों के साथ ही 236 फील्ड लेबल कर्मचारियों के विरूद्ध निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। वित्तीय अनियमितताओं के 71 एफआईआर दर्ज कराए गए हैं। इसके अलावा 53.97 लाख रुपये की धनराशि की वसूली की गई है। वहीं 131 लाख रुपये की वसूली की कार्रवाई की जा रही है। ये मामले इसकी गवाही दे रहे हैं कि कहीं न कहीं शासन की इस महत्वाकांक्षी योजना को पलीता लगाया गया है। मामला भले ही सूबे की मायावती सरकार और केंद्र सरकार के बीच बहस का मुद्दा हो, लेकिन जिस मकसद से ये योजना अस्तित्व में आई, उसकी कलई कम से कम इस बहस के जरिये यूपी में तो खुल ही चुकी है।
इनसेट...
जयराम के लगाए गए आरोप
-मनरेगा योजना के फंड का यूपी सरकार ने किया है दुरुपयोग।
-कई जिलों में खिलौने, कैलेंडर, टेंट की खरीद में किए गए करोड़ों खर्च।
-बिना टेंडर व मानकों के विपरीत प्रदेश सरकार ने की है खरीद।
-पूरे मामले की सीबीआई जांच क्यों नहीं की जा सकती।
मायावती की ओर से दिए गए जवाब
-ग्रामीण विकास मंत्रालय की वेबसाइट बीते चार साल में यूपी में मनरेगा के कामों को बेहतर बता रही है।
-केंद्रीय मंत्री जयराम की ओर से मनरेगा संबंधी भेजा गया खत राजनीति से प्रेरित है।
-जो पत्र उन्हें पहले मिलना चाहिए था, उससे पहले वह मीडिया में पहुंच गया।
-भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए राज्य की एजेंसियां सक्षम है। इस मामले में सीबीआई जांच नहीं होगी।
-मामले की जांच ईओडब्ल्यू को सौंपी गई। जांच एक एसपी के नेतृत्व में गठित टीम करेगी। प्रदेश सरकार ने मामले में संलिप्त कई निचले अधिकारियों को किया निलंबित।
-बलरामपुर, गोंडा, मिर्जापुर, महोबा में ईओडब्ल्यू की जांच के निर्देश
-कई अधिकारियों पर गिराई गई गाज
-जयराम के आरोप को कांग्रेस ने ठहराया जायज। कहा, कभी झूठ नहीं बोलते जयराम।
इनसेट...
किसने क्या कहा...
जयराम रमेश के पत्र में लगाए गए आरोप और उठाए गए बिंदु राजनीति से प्रेरित हैं। रमेश का पत्र राज्य सरकार को प्राप्त होने से पहले मीडिया में पहुंचाना उनकी मंशा का जाहिर करता है।
शशांक शेखर सिंह, मंत्रिमंडलीय सचिव, उत्तर प्रदेश
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की ओर से भेजे गए खत पर मायावती ने शोर ज्यादा मचाया है, जबकि उसके जवाब में तथ्य नहीं दिए हैं।
मनु सिंघवी, कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता
मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार की जांच पर कांग्रेस व बसपा नूरा कुश्ती कर रही हैं। हाईकोर्ट की देखरेख में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच होनी चाहिए। चुनावी माहौल में मनरेगा को लेकर केंद्र और राज्य के बीच तलवारें खिंचना उनकी मिलीभगत है। ऐसा नहीं होता तो आखिर कल तक बसपा पर मेहरबान रही कांग्रेस को अचानक यूपी में भ्रष्टाचार की चिंता कैसे सताने लगी? 
मुख्तार अब्बास नकवी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा
अपना दामन पाक-साफ बताने वाली प्रदेश की मायावती सरकार को जांच से आखिर किस बात का डर है? विधानसभा चुनाव से पहले दूध का दूध और पानी का पानी अगर उन्हें करना है तो आज ही पत्र लिखकर सीबीआई जांच की सिफारिश कर देनी चाहिए।
श्रीप्रकाश जायसवाल,
केंद्रीय कोयला मंत्री

ज्यादा दागी कौन?

‘हम नहीं कोई और है’
प्रदेश मंत्री ने किया दावा, भाजपा  आज भी बेदाग
सपा-बसपा की राजनीति से ऊब चुकी है जनता
महंगाई,  भ्रष्टाचार से कांग्रेस से टूट चुका है मोह
अन्ना आंदोलन से खुल गई है विपक्षियों की कलई 
‘‘लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के महामंत्री और अध्यक्ष से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले भाजपा के प्रदेश मंत्री दयाशंकर सिंह प्रदेश की राजनीति में भाजपा को पाक-साफ होने का दावा करते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि आज तमाम राजनीतिक दल दागदार हैं, लेकिन भाजपा आज  भी बेदाग है और आगे भी रहेगी। सपा-बसपा पर आय से अधिक काला धन अर्जित करने का आरोप है तो कांग्रेस महंगाई और भ्रष्टाचार  को लेकर कटघरे में है। भाजपा ही केवल वह दल है जिसमें यूपी में कोई दाग नहीं है।’’
अनीश कुमार उपाध्याय / दिल्ली
भाजपा की प्रदेश स्तरीय राजनीति में दयाशंकर सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं। लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरूआत करने वाले दयाशंकर वर्तमान में भाजपा के प्रदेश मंत्री हैं। काफी बरसों तक ये भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे। यूपी के पूर्वी छोर पर बसे बलिया से इन्होंने सदर विधानसभा  से भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ा। ये दीगर है कि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा और सपा-बसपा की सीधी टक्कर के बीच ये दरकिनार कर दिए गए। हालांकि इसके बाद भी वे बलिया की जनता के दिलों में रहते हैं। न सिर्फ राजनीति के चलते बल्कि अपनी सामाजिक कार्यों की वजह से। गरीबों की सेवा और मानवता की रक्षा के लिए खुद को संकल्पित बताने वाले दयाशंकर सिंह मौजूदा राजनीति में भ्रष्टाचार की घुसपैठ से आहत हैं। पिछले दिनों हमवतन के मीडिया इंचार्ज अनीश कुमार उपाध्याय से दूरभाष पर बातचीत हुई। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश...।
हमवतन: दयाशंकर जी, आप भाजपा के पुराने सदस्य रहे हैं, वर्तमान में भाजपा की स्थिति काफी दयनीय हो चली है। इसके लिए आप किसे कुसूरवार मानते हैं?
दयाशंकर: मैं छात्र राजनीति से भाजपा की राजनीति में आया हूं। काफी उतार-चढ़ाव भी देखे हैं। जहां तक भाजपा की गिरती साख का सवाल है, अब ऐसा नहीं है। संगठन तेजी से एक बार फिर मजबूत हुआ है। भाजपा हमेशा जनता के हितों के लिए संघर्ष करती रही है और आगे भी करती रहेगी। जहां तक भाजपा की गिरती साख का सवाल है, भाजपा से जनता की काफी अपेक्षाएं थीं। जो होनी भी चाहिए। जहां तक इसके लिए किसी के कुसूरवार होने का सवाल है, इसके लिए कोई एक दोषी नहीं होता। कहीं न कहीं हमारे में कमी रही होगी, उसे काफी हद तक दूर कर भी लिया गया है। पिछले दिनों आडवाणी जी ने जो रथयात्रा निकाली, उसमें लोगों के उमड़े हुजूम को देखकर ऐसा लगा कि मानों लोग भाजपा की ओर एक बार फिर टकटकी लगाए देख रहे हैं। जनता का उत्साह ये कह रहा था कि वे मौजूद केंद्र व प्रदेश की सरकार से दुखी हैं।
हमवतन: भ्रष्टाचार  के खात्मे को लेकर आडवाणी जी ने रथयात्रा निकाली। क्या आपको ऐसा लगता है कि आडवाणी जी वास्तव में क्या एक बार फिर जनता के दिलों में इस यात्रा से जगह बना पाएंगे?
दयाशंकर: मैं ये स्पष्ट कर दूं कि आडवाणी जी ने अपनी रथयात्रा न केवल भ्रष्टाचार  को लेकर निकाली है, बल्कि इसके पीछे मौजूद लूटतंत्र का खुलासा करना भी है। यूपी में जिधर से भी आडवाणी जी की रथयात्रा गुजरी लोगों का हुजूम उनकी बाट जोहता दिखा। उमड़े हुजूम और लोगों के अपार समर्थन इसकी गवाही दे रहा था कि भाजपा एक बार फिर सत्ता में आएगी। रथयात्रा के समर्थन में न सिर्फ काफी तादाद में महिला, पुरुषों ने समर्थन दिया, बल्कि काफी तादाद में युवा भी थे। किसी भी देश की ताकत युवा शक्ति से पहचानी जाती है। ऐसे में अगर भाजपा के साथ ये युवा हैं, तो नि:संदेह भाजपा न सिर्फ प्रदेश की सत्ता पर काबिज होगी, बल्कि केंद्र में एक बार फिर कमल खिलेगा।
हमवतन: हम एक बार फिर भ्रष्टाचार के मूल मुद्दे से भटक रहे हैं। आडवाणी जी ने रथयात्रा निकालते वक्त भ्रष्टाचार  का खात्मे को भी एक मुद्दा माना था। क्या आपको लगता है कि भ्रष्टाचार के मामले में आपका संगठन यानी भाजपा पाक-साफ है।
दयाशंकर: नि:संदेह। भाजपा आज भी अन्य दलों से बेहतर संगठन है। इसके कर्मठ कार्यकर्ता ही इसकी पहचान हैं। अन्य दलों में काफी दागदार हैं। आए दिन किसी न किसी राजनीतिक दल के दागदार चेहरे जनता के सामने आ रहे हैं। हर दल में दागी हैं। हां, भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा दागी नहीं है, अन्य दल के लोग हैं। भाजपा वैसे भी भारतीय संस्कृति की पहचान है। हमारे कार्यकर्ता देशभक्ति की भावना से लबरेज होते हैं। वहीं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का घुन लोकतंत्र की जड़ों का खोखला कर रहा है। आडवाणी जी की रथयात्रा के पीछे इन घुनों को मिटाना है। इसके लिए सशक्त लोकपाल का होना जरूरी है।
हमवतन: भ्रष्टाचार का जहां तक सवाल है गुजरात में पिछले सात साल से भाजपा की सरकार है। भाजपा वहां अपना लोकायुक्त नियुक्त नहीं कर पाई है। ऐसे में देश के लिए सशक्त लोकपाल की मांग करना कितना जायज है?
दयाशंकर: गुजरात में भाजपा शासनकाल में चहुंओर सुख-शांति है। अन्य दलों के शासनकाल और मौजूदा शासनकाल की तुलना कर आप स्थिति का आकलन सहज ही कर सकते हैं। वहां लोकायुक्त की   नियुक्ति की दिशा में प्रयास जारी है। आशा है कि जल्द ही इस पर अमल भी हो जाएगा। वैसे भी भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए अगर देश स्तर पर लोकायुक्त होगा तो राज्य स्तर में भी इसकी पहल हो जाएगी। दोनों अलग-अलग बातें हैं। गुजरात में जल्द लोकायुक्त नियुक्त होगा। कर्नाटक में लोकायुक्त की नियुक्ति होने जा रही है।
हमवतन: आपने ये कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर कोई दाग नहीं है। अभी पिछले दिनों ही भाजपा के कई नेता ऐसे ही मामले में गिरफ्तार किए गए हैं। जैसे कर्नाटक के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी वगैरह-वगैरह...।
दयाशंकर: देखिए, मैं ये स्पष्ट कर दूं कि किसी भी संगठन में हर किस्म के लोग जुड़ते हैं। अभी तक इन पर केवल आरोप लगे हैं, पुष्टि नहीं हुई है। किसी पर आरोप लगने मात्र से उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। वहीं अन्य दलों के कई राजनेताओं पर आरोप साबित भी हो चुके हैं। सबसे खास बात तो ये कि यूपी की राजनीति में किसी भी भाजपा नेता पर ऐसा आरोप नहीं है कि उन्होंने कहीं भ्रष्टाचार किया है। उत्तर प्रदेश की जनता भी इस स्थिति से भलीभांति  वाकिफ हो चुकी है कि अन्य दलों में भ्रष्टाचारियों की लंबी-चौड़ी फौज है, जबकि प्रदेश भाजपा का दामन आज भी पाक-साफ है। खैर, फिर भी अगर हमारा कोई भी नेता भ्रष्टाचार का दोषी मिलेगा तो नि:संदेह उस पर कार्रवाई की जाएगी।
हमवतन: यूपी की मौजूदा राजनीति में सपा-बसपा को लेकर ही ध्रुवीकरण माना जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में भी दोनों दलों में सीधी टक्कर को लेकर उम्मीद जताई जा रही है। ऐसे में आप भाजपा को कहां पाते हैं?
दयाशंकर: देखिए, मौजूदा राजनीति में इन दोनों दलों की कलई जनता की अदालत में खुल चुकी है। दोनों दलों के असली चेहरे जनता के सामने आ चुके हैं। आए दिन इन दोनों दलों के नेता भ्रष्टाचार के मामले में घिरते जा रहे हैं। अन्ना के आंदोलन के बाद सपा-बसपा की रही-सही कसर भी पूरी हो चुकी है। जनता ये जान चुकी है कि ये दोनों दलों के नेता जनता को लूटते हैं। ऐसे में भाजपा की दावेदारी यूपी में दमदार हो जाती है।
हमवतन: सपा-बसपा के अलावा कांग्रेस भी यूपी की राजनीति में अपना दखल दे सकती है। आपने उसके विषय में कुछ नहीं कहा!
दयाशंकर: यूपी की राजनीति में कांग्रेस बिल्कुल निचले पायदान पर पहुंच गई है। महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों की राजनीति से जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो गया है। आज गरीबों को खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं मिल रहा। सरकार की तमाम योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही है। समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद तो यूपी की जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो चुका है। ऐसे में कांग्रेस का यूपी में कोई अस्तित्व दूर-दूर तक नहीं दिख रहा।
हमवतन: आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने क्या तैयारी की है? अबकी चुनाव मेंभाजपा का मूल मुद्दा क्या होगा?
दयाशंकर: हम अपने पुराने मुद्दे पर आज भी कायम हैं। भ्रष्टाचार के खात्मे का संकल्प लेकर हम चुनाव मैदान में उतरेंगे। प्रदेश का चतुर्मुखी विकास, सबको अपना हक-हकूक दिलाना, हर जाति, धर्म के लोगों को विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए भाजपा संकल्पित है। अबकी चुनाव में भाजपा का प्रयास होगा कि वे प्रदेश की हर सीटों पर दमदार प्रत्याशी दे। प्रत्याशी ऐसा हो जो जनता से जुड़ा हो। जमीनी हो। गरीबों, दबे-कुचलों के हक-हकूक के लिए संघर्ष करने वाला हो।
हमवतन: परिसीमन के चलते क्या भाजपा को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है?
दयाशंकर: देखिए, किसी भी विधानसभा में पार्टी का उद्देश्य, प्रत्याशी का चरित्र ही जीत में अहम किरदार निभाता है। अगर प्रत्याशी बेहतर होगा तो जनता उसे जरूर अपना मत देगी। जहां तक परिसीमन का सवाल है इससे अब कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। हां, इससे थोड़ा असंतुलन की स्थिति जरूर पैदा हुई है, लेकिन इसका असर भाजपा पर नहीं पड़ेगा। कारण कि प्रदेश की जनता सपा, बसपा की राजनीति से ऊब चुकी है। इनके क्रियाकलापों से नाराज जनता भाजपा को लेकर आशान्वित है। उम्मीद है कि इस परिसीमन का पूरा लाभ भाजपा को मिलेगा। भाजपा एक बार फिर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होगी। भाजपा के पास कर्मठ और जुझारू  कार्यकर्ताओं की लंबी-चौड़ी फौज है। खास ये कि आज भी युवा शक्ति भाजपा के साथ है। वैसे भी  राजनीति में युवा शक्ति का रोल अहम होता है। प्रदेश के अन्य दलों की अपेक्षा भाजपा की साख काफी उम्दा है। लिहाजा अबकी भाजपा को सत्ता में आने से कोई ताकत रोक नहीं सकती।

Thursday, October 27, 2011

गऊ मारकर जूते दान

 ...अब कांग्रेस से भयभीत ‘अन्ना टीम’
किरण बेदी के आयोजकों से वसूले अधिक धन का मामला
ऐसे तो ए.राजा और कोनिमोझी को भी मिलनी चाहिए माफी
मामले के पर्दाफाश के बाद बदल गए किरण बेदी के स्वर
जनलोकपाल के मुद्दे से भटक चुका है अन्ना का आंदोलन
अन्ना टीम की सक्रिय सदस्य एवं पूर्व आईपीएस किरण बेदी ये मान चुकी हैं कि उन्होंने आयोजकों से हवाई टिकटों के पैसे बचाए थे। तर्क देती हैं कि ये धन उन्होंने ट्रस्ट के लिए बचाए थे। क्या उनका ये माफीनामा उनको अपराध मुक्त कर देगा? क्या झूठ या हेराफेरी से ट्रस्ट के लिए ही सही धन बटोरना कानूनी या नैतिक रूप से उचित है? ये यात्राएं उन्होंने अन्ना के लिए कीं? क्या केवल अन्ना टीम में सक्रियता के चलते ही उन्हें माफी चाहिए? कुल मिलाकर हालात बदल गए हैं। कल तक जो कांग्रेस अन्ना टीम से भीत थी आज अन्ना टीम वैसे ही कांग्रेस से भयभीत है।
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
काफी पुरानी कहावत है गऊ मारकर जूते दान। किरण बेदी कुछ ऐसा ही कर रही हैं। वे कहती हैं कि खुद को कष्ट दे उन्होंने जो धन हवाई टिकटों से बचाए थे, अब वे वापिस कर देंगी। यानी मामले के पर्दाफाश के बाद स्वर बदल गए हैं। उनके समर्थक भी दुहाई दे रहे हैं कि वे भी इंसान है और इंसान से चूक तो होती ही है। अब जब वे धन वापसी को तैयार हैं तो इस मामले का पटाक्षेप होना चाहिए। समर्थकों का ये भी आरोप है कि अन्ना आंदोलन से खार खाए लोगों की अन्ना टीम को बदनाम करने की ये साजिश है। अगर किरण को इंसान मान लिया और उनकी गलती चूक है तो ए.राजा और कनिमोझी भी तो इंसान है। फिर तो काले कारनामे करने वालों की फेहरिश्त में वे सभी होंगे, जो गलती मानकर पाक-साफ हो जाएंगे। वे भी अगर अपनी काली कमाई सरकार को सौंप दें तो सभी को माफ भी कर देना चाहिए! क्यों, अगर किरण को माफी दी जा सकती है तो औरों को क्यों नहीं?
कांग्रेस ने तो नहीं दी थी सलाह
अगर अन्ना टीम के खिलाफ ये मुहिम कांग्रेस की साजिश भी मान लें तो भी कहीं से कांग्रेस कटघरे में खड़ी नहीं दिखती। किरण बेदी का मामला हो या प्रशांत भूषण का। कांग्रेस ने किरण को हवाई टिकट के पैसे बचाने की सलाह नहीं दी थी। प्रशांत भूषण पर हमला करने वाला भी दूर-दूर तक कांग्रेसी नहीं। अगर इसमें कांग्रेस की भूमिका रही होती तो नि:संदेह अब तक देश की राजनीति में भूचाल आ गया होता। सच पूछिए तो कल तक कांग्रेस के खिलाफ बारुद भरने वाली अन्ना टीम आज खुद बारूद के ढेर पर जा बैठी है। वैसे अगर मूल मुद्दे की बात करें तो भ्रष्टाचार यूं ही खत्म नहीं हो सकता। इसके लिए हर व्यक्ति में बदलाव लाना होगा। जिस देश के लोग खुद की हिफाजत के लिए हेलमेट न पहनने के लिए भी बहाने ढूंढ लेते हैं, वहां सख्त कानून तो चाहिए, लेकिन लोगों के हृदय परिवर्तन के साथ।
मिल रहा अशुभ संकेत
अब बात यदि समाजसेवी अन्ना हजारे की करें तो जनलोकपाल के लिए अपनी मुहिम का आगाज कर रातोंरात देश के नायक के रूप में वे उभरे। वहीं अब अन्ना टीम व केंद्र सरकार के बीच चल रहे वाक युद्ध और टकरावपूर्ण माहौल ने अशुभ संकेत भी देना शुरू कर दिया है। अप्रैल माह में अन्ना ने जंतर-मंतर पर  अपना आंदोलन का आगाज किया। तब से लेकर अब तक अन्ना समेत उनके सभी प्रमुख सहयोगी आरोपों के कटघरे में आ चुके है। प्रशांत से मारपीट करने वाले युवकों ने खुद को श्रीराम सेना का सदस्य बताया। वे काश्मीर में जनमत संग्रह संबंधी प्रशांत के बयान से खफा थे। वहीं केजरीवाल पर लखनऊ में चप्पल फेंकने वाले जितेंद्र पाठक ने स्वीकार किया कि वे अन्ना द्वारा कांग्रेस के विरूद्ध चलाए जा रहे अभियान से नाराज हैं। जितेंद्र को कांग्रेस अपना सदस्य तक नहीं मानती।
...तो दामन बेदाग होने वाला नहीं
देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी का ये मामला काफी गंभीर है। वे दुनियाभर में नैतिकता पर प्रवचन देती हैं। वहीं खुद इकोनॉमी क्लास में हवाई सफर कर आयोजकों से बिजनेस क्लास का किराया वसूलती हैं। कुल मिलाकर उनका ये तर्क हास्यास्पद है कि रकम का अंतर वह अपने एनजीओ को देकर सामाजिक कार्यों में लगा रहीं थीं।  जिस राष्ट्रपिता बापू की दुहाई अन्ना टीम बार-बार देती है, उन्होंने ही कहा था कि सिर्फ साध्य की पवित्रता पर्याप्त नहीं है, साधन भी पवित्र होना चाहिए। इस मामले में किरण बेदी का साध्य भले ही पवित्र हो, लेकिन साधन तो असत्य पर ही आधारित है। अब अगर वे झूठ या हेराफेरी में पकड़े जाने पर रकम वापस भी कर देती हैं तो उनका दामन बेदाग होने वाला नहीं।

Monday, October 24, 2011

आरोपों की ‘जुगाली’


एजेंडे पर नहीं बात, ‘केंद्र’ पर आघात
सबको चाहिए विशेष राज्य का दर्जा
विकास के लिए हर कोई चाहता पैकेज
महंगाई, अपराध से निबटने से बेफिक्र
विपक्षियों का केंद्र पर पक्षपात का आरोप
12 वीं पंचवर्षीय योजना के एप्रोच पेपर को लेकर अबकी हुई राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक को कुल मिलाकर सियासत का अखाड़ा कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। हर मुख्यमंत्री और उनके प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी। नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जयललिता, मायावती, प्रेम कुमार धूमल, बीसी खंडूरी समेत तमाम गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने विकास को लेकर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया। राजनीतिक मामलों में केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया और जमकर खरी-खोटी सुनाई।
अनीश कुमार उपाध्याय / दिल्ली
राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक में केंद्र व राज्य सरकारों के बीच अजीब कशमकश का नजारा रहा। पीएम मनमोहन सिंह देश की विकास दर को लेकर चिंतित दिखे, लेकिन प्रदेशों  से आए मुख्यमंत्री और उनके प्रतिनिधियों में एक बात जो खास थी, वह थी सबको विकास की चाहत। इसके लिए सभी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया और जमकर केंद्र सरकार पर आघात किया। वहीं किसी भी सीएम ने ये नहीं बताया कि उनके पास अपने राज्य के विकास के लिए क्या एजेंडा है। अपने राज्य में वे विकास को कैसे गति देंगे? हां, केंद्र पर आरोपों की जुगाली करने में हर कोई एक-दूजे को पछाड़ने की होड़ में लगा रहा।
पीएम ने धैर्य रखने की दी नसीहत
देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यों के विकास की बात शुरू भी की तो उसके बाद मौजूद मुख्यमंत्रियों और उनके प्रतिनिधियों ने अपने राज्य के विकास को कोई एजेंडा पेश नहीं किया। ये नहीं बताया कि वे अपने राज्य के विकास के लिए किस थीम पर कार्य कर रहे हैं। सभी ने विशेष राज्य के दर्जा की मांग की तो इसके लिए पैकेज की मांग करने से भी कोई नहीं चूका। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की मंथर अर्थव्यवस्था पर चिंता जताई। इससे देश में बन रहे निराशा के माहौल से सतर्क और धैर्य बनाए रखने की नसीहत दी। विकास में बाधा के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुसूरवार ठहराया।
मांगों का लंबा पुलिंदा
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी खुद के राज्य के विकास को लेकर तैयार एजेंडे पर कोई चर्चा न कर सके। उन्होंने बैठक में ये नहीं बताया कि वे अपने राज्य के विकास के लिए कौन-कौन सी नई योजनाएं या प्रयास करने वाले हैं। हां, उन्होंने भी अपने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात एक बार फिर दुहराई। स्पष्ट किया कि दर्जा मिलने तक पेयजल और वन विकास के कार्यों के लिए राजस्थान को विशेष आर्थिक मदद दी जाए। उन्होंने बाड़मेर में तेल रिफाइनरी की मांग एक बार फिर उठाई। ग्रामीण बीपीएल आवास योजना, नि:शुल्क दवा वितरण योजना समेत अन्य कल्याणकारी योजनाओं के संबंध में भी तमाम मांगें पटल पर रखीं।
जयललिता भी केवल बरसीं
एनडीसी की बैठक में खुद जयललिता की जगह उनके प्रतिनिधि ने उनके लिखे भाषण को पढ़ा। उन्होंने केंद्र सरकार पर संघीय ढांचे का अतिक्रमण करने के भी गंभीर आरोप जड़े। गरीबी की विवादित परिभाषा, महंगाई के मुद्दे पर आड़े हाथों लिया। एनडीसी के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े करते हुए केंद्र सरकार को संवैधानिक दायरे में रहने की नसीहत तक दे डाली। उनका सीधा आरोप था कि केंद्र उन्हें ही धन दे रहा है जहां या तो कांग्रेस सरकार है या फिर उसके सहयोगी दल की सरकार है। केंद्र सरकार गैर कांग्रेस शासित राज्यों को दंडित कर रही है। खैर, तमिलनाडु की सीएम जयललिता के बयान को खारिज करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सीधे कहा किया कि ये बिल्कुल झूठ है।
माया’ भी नहीं रही पीछे
केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेने में यूपी की मुखिया मायावती भी पीछे नहीं रही। उनकी ओर से यूपी के वित्त मंत्री लालजी वर्मा ने एनडीसी की बैठक में सहभागिता की। खैर, मायावती ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राज्यों को दिए जाने वाले बजट में अवांछनीय कटौती कर रही है। तर्क दिया कि विकास को गति देने के लिए संसाधनों के आवंटन में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। विकास के रूप में उन्होंने विशेष रूप से दलितों, पिछड़े, उपेक्षितों, निसहाय, दलित क्षेत्रों के उत्थान पर जोर दिया।
झारखंड को भी चाहिए विशेष दर्जा
झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने प्रदेश के पिछड़ेपन व माओवादी हिंसा को देखते हुए राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की वकालत की। उनका तर्क था कि देश के विकास में झारखंड अपना बेशकीमती संसाधन मुहैया करा रहा है। विकास के मानकों के लिहाज से वह ऐसे कई राज्यों से पीछे है, जिन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। उग्रवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विशेष राज्य का होना जरूरी है। उन्होंने कहा खनिजों से मिलने वाले राजस्व के केंद्र व राज्य के बीच बंटवारे की मौजूदा प्रणाली में बदलाव लाए। वनीकरण पर जोर दिया तो झारखंड में यूरेनियम की उपलब्धता को देखते हुए राज्य में एक अदद परमाणु बिजलीघर बनाने की मांग की। उन्होंने केंद्र को खनिजों के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की नसीहत दी, ताकि खनिजों का दोहन राष्ट्रीय आवश्यकताओं के मुताबिक हो सके।
काश्मीर समस्या समाधान पर जोर
जम्मू-काश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तान से सक्रिय बातचीत की पैरवी करते हुए कहा कि बिना इसके इस समस्या का हल नहीं निकल सकता। केवल सीमा पार कारोबार और दोनों देशों के बीच बस चलाने मात्र से काश्मीर मसले का हल निकलने वाला नहीं है। बिना बाहरी बातचीत प्रकिया को जारी रखकर इस मसले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने भी कहा कि यहां के अवाम की आकांक्षाएं और शिकायतों का सियासी समाधान के लिए आर्थिक विकास जरूरी है। राज्य को सुरक्षा के घेरे से निकालकर इसको एक राजनीतिक स्वरूप देना होगा। वार्ताकारों की नियुक्ति की सराहना करते हुए इनके सिफारिशों को भी तत्काल प्रभाव से लागू करने की वकालत की।
क्षति का मांगा मुआवजा
उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बाढ़ से हुई क्षति के रूप में 3265 करोड़ रुपये की मांग की। इसके लिए उन्होंने एक हजार करोड़ तुरंत अवमुक्त करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने खनन कंपनियों पर अतिरिक्त कर दुगुना करने की वकालत की। सुझाव दिया कि अयस्क के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। उन्होंने भी उड़ीसा को विशेष श्रेणी का राज्य घोषित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कृषि उत्पादन और उत्पादक को बढ़ावा देने की नसीहत दी। कालाहांडी, बोलागीर सरीखे ऐतिहासिक क्षेत्रों के मुद्दे पर भी उन्होंने विशेष पैकेज दिए जाने की जरूरत बताई।
ममता ने तोड़ा तिलिस्म
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ लोगों को तीस्ता नदी जल बंटवारे के मुद्दे पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। उम्मीद जताई कि भारत और बांग्लादेश के बीच मधुर संबंध अनवरत बने रहेंगे। जहां तक तीन बीघा का सवाल है हमारी सरकार के साथ कोई मुद्दा नहीं है। हां, तमाम मुख्यमंत्रियों की फेहरिश्त से खुद को अलग करते हुए उन्होंने केंद्र से केवल धन की मांग नहीं की। ये भी बताया कि माओवादी खतरे से निबटने के लिए उनके पास क्या एजेंडा है। उन्होंने माओवादी खतरे को नजरंदाज करते हुए यहां तक कहा कि वे हमारे भाई-बहन हैं और आगे आकर उन्हें राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए। वे चर्चा के लिए तैयार हैं और उन्हें पूरा पैकेज भी देंगी।

Friday, October 14, 2011

खाद्य संकट


अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
विश्व भूख सूचकांक की रिपोर्ट ने भारत की हकीकत को दुनिया के सामने ला दिया है।भले ही केंद्र सरकार गरीबों के पैमाने को लेकर विपक्षियों से उलझकर रह गई हो, लेकिन अमेरिका स्थित संस्था इंटरनेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च के सहयोग से काम करने वाली इस संस्था ने इस हकीकत को पुख्ता कर दिया है कि गरीबों की सूची में भारत की स्थिति काफी दयनीय है। ऐसा नहीं है कि ये रिपोर्ट राजनीति से प्रेरित होकर बनाई गई हो। कारण कि विश्व भूख सूचकांक की रिपोर्ट को समूचा विश्व गंभीरता से लेता है। यह सूचकांक तीन कसौटियों यथा जनसंख्या में कुपोषित लोगों का प्रतिशत, अंडरवेट बच्चों का प्रतिशत और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर के आधार पर तैयार होता है।
पिछले दशक में कम सुधार
खाद्य सुरक्षा के लिहाज से जिन देशों का हाल पिछले एक दशक में सबसे कम सुधरा है, उनमें भारत भी एक है। वहीं इसी अवधि में चीन, ईरान और ब्राजील ने इस सूचकांक पर अपनी स्थिति में लगभग 50 प्रतिशत का सुधार किया है। ताजा रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि जैव इंधन के लिए फसलों के बढ़ते उपयोग, जलवायु परिवर्तन एवं वायदा कारोबार के बढ़ते चलन के कारण विश्व खाद्य बाजार में उतार-चढ़ाव तेज है। वहीं गरीबी पर उसकी भारी मार पड़ रही है। जाहिर है, इस हाल में कमजोर तबके को खाद्य सुरक्षा देने के लिए खास इंतजाम की दरकार है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून बेशक इस दिशा में एक प्रभावी पहल होगी। ताजा भूख सूचकांक सरकार को यह एहसास कराने के लिए काफी है कि इस प्रयास में और देर बिल्कुल उचित नहीं। अगर यह कानून पिछले दो साल से लाभार्थी समूहों की पहचान और नकद सब्सिडी बनाम सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अनाज की आपूर्ति में विवाद में न फंसा होता तो शायद इस साल भारत की तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर होती।
सिस्टम का है सारा दोष
ऐसा नहीं है कि हमारे कृषि प्रधान देश के अन्नदाता किसान बेहतर फसल नहीं उगाना चाहते। सारा दोष सिस्टम का है। बेहतर उत्पादन के बावजूद फसलों की बेहतर देखभाल न होने से हर साल देश के अन्न भंडार का एक बहुत बड़ा हिस्सा सड़कर नष्ट हो जाता है। बीते दिनों बिहार प्रांत के छपरा और मोतिहारी रेलवे स्टेशनों पर हजारों बोरों में रखा गेहूं सड़ गया। एफसीआई भी सब कुछ जानते हुए इसका वितरण नहीं कर सकी। कुछ सड़े बोरों का हाल अब ये हो गया है कि उसमें मवेशी भी मुंह नहीं मार रहे। ये खास इसलिए भी है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि गेहूं की बर्बादी होने के बदले उसका वितरण गरीबों के बीच कर दिया जाए। ये हालात ये बताने के लिए काफी हैं कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लेकर संबंधित सरकारें कितनी सजग हैं। अगर केवल बिहार की ही बात करें तो पिछले पांच वर्षों में गया, मुजफ्फरपुर, पटना, नवादा, नालंदा और पटना में ही भूखमरी के करीब 150 मामले सामने आ चुके हैं। इसके बाद भी अगर सरकार नहीं चेत रही है तो इसे क्या कहेंगे। कुछ ऐसा ही हाल यूपी का भी है। यहां भी पर्याप्त उत्पादन के बावजूद अन्न भण्डारण की उचित व्यवस्था न होने से हर साल काफी मात्रा में अन्न सड़कर नष्ट हो जाता है।
सुधार की कोशिश
उधर, पिछले दिनों उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रो.केवी थामस ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि भारत सरकार ने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीडीपीएस) की कार्यक्षमता और प्रभावशीलता को सुधारने के लिए चरणबद्ध तरीके  से उसका कंप्यूटरीकरण करने का कार्य शुरू कर दिया है। पहले चरण में आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के तीन जिलों में इस पायलट आधार को लागू करने के लिए मंजूरी मिल चुकी है। आवश्यक वस्तुओं की स्मार्ट कार्ड आधारित वितरण वाली पायलट योजना को चंडीगढ़ (केंद्र शासित प्रदेश) और हरियाणा में शुरू कर दिया गया है। वहीं 11 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान खाद्यान्न के रिसाव को रोकने के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग प्रणाली (जीपीएस), रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान तंत्र आदि जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करने का सुझाव भी दिया गया था। वर्ष 2010-11 के दौरान सरकार ने टीडीपीएस, अन्य कल्याणकारी योजनाओं आदि के तहत 355.97 लाख टन चावल और 276.49 लाख टन गेहूं का आवंटन किया है। 
70 फीसदी आबादी अब भी भूखी
वैसे यूं कहें तो भारत और दुनिया की प्रमुख समस्याओं में गरीबी प्रमुख है। भारत की 70 फीसदी आबादी अभी भी भरपेट खाना नहीं खाती। भारत  में आर्थिक विकास जितना बढ़ रहा है, उतनी की रफ्तार से गरीबी भी बढ़ रही है। वास्तव में गरीबी और विषमता घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। बढ़ती महंगाई गरीबी का सबसे बड़ा कारण है। पेट्रोल-डीजल, अनाज सब कुछ महंगा है। वहीं दूसरी तरफ मजदूर तबके का शोषण बदस्तूर जारी है। यह भी हकीकत है कि गरीबी को बढ़ाने में भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण है। गरीबों के बच्चों को शिक्षा और पोषाहार देने के लिए सरकार आंगनबाड़ी कार्यक्रम चला रही है। हालांकि इसमें कितना भ्रष्टाचार है अब किसी से छुपा नहीं है। वहीं गरीबी के साथ ही बढ़ती जनसंख्या भी मुख्य वजहों में एक है। अनाज की पैदावार कम है और उसे खाने वालों की तादाद ज्यादा।
10 में नौ महिलाएं कुपोषित
उधर,  विभिन्न संगठनों यथा विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) और स्वास्थ्य मंत्रालय भारत  सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो उत्पादन के बावजूद हालात काफी भयावह हैं। दुनिया में भूखमरी  से पीड़ित लगभग 50 प्रतिशत लोग अकेले भारत में रहते हैं। भारत के लगभग 350 मिलियन (35 करोड़) लोग न्यूनतम ऊर्जा आवश्यकताओं के हिसाब से 80 प्रतिशत से काफी कम भोजन का उपयोग करते हैं। वहीं 15 से 49 वर्ष आयुवर्ग में 10 में से नौ महिलाएं कुपोषण और रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद गर्भवती महिलाओं में रक्ताल्पता के कारण ही शिशु मृत्युदर 20 प्रतिशत है। पांच वर्ष से कम आयु वर्ग में आधे से ज्यादा बच्चे मध्यम या गंभीर कुपोषण के शिकार हैं या फिर बौनेपन से ग्रस्त हैं। भारत में बाल मृत्यु के लगभग 50 प्रतिशत मामलों का कारण कुपोषण है। हर तीसरा व्यस्क (15 से 49 आयुवर्ग) सामान्य से अधिक पतला है। 
...और सरकार का है ये रवैया
खैर, कुल मिलाकर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा है, फिर भी भारत में लोग भूख से मर रहे हैं। साधारण जनता महंगाई से दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पा रही है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली के विधायक 73,000 रुपये प्रतिमाह और मंत्री 1,15,000 रुपये प्रतिमाह वेतन-भत्ता उठा रहे हैं। गरीबों को सड़ा अनाज भी मयस्सर नहीं। सिर ढकने के लिए छत नहीं। पहनने के लिए वस्त्र नहीं। पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं। जीर्ण-शीर्ण सरकारी विद्यालय। शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती फेहरिश्त। कालाबाजारी और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा। ये हालात काफी हैं कि हमारे जनप्रतिनिधि जनता के कितने हितैषी हैं। खाद्य सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त के प्रति इनकी लापरवाही अब जगजाहिर है।  हां, गत दिनों सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी एक रिपोर्ट में योजना आयोग ने इतना जरूर कह दिया कि शहर में 32 और गांव में 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीबी रेखा की परिधि में नहीं आता। मजे की बात तो ये कि देश की शीर्ष अदालत में दाखिल रिपोर्ट पर बकायदा प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर भी थे। स्वाभाविक ही था कि इस पर सरकार की थू-थू होती। वही हुआ भी। 
भारत में भूखमरी आखिर क्यों?
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम मात्र अधिकारों से आगे कुछ नहीं देखता। वर्तमान में सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को रियायती दरों पर 35 किग्रा खाद्यान्न उपलब्ध कराती है। इसमें गेहूं और चावल शामिल है। गेहूं 4.15 रुपये और चावल 5.65 रुपये प्रति किग्रा की दर से बेचा जा रहा है। अंत्योदय योजना के तहत 2.42 करोड़ परिवारों के लिए कीमतें घटाकर क्रमश: दो रुपये और तीन रुपये कर दी गई। वहीं इससे हुआ क्या? सारा अनाज कालाबाजारी करने वालों के गोदामों में भरा जाने लगा। सरकारी कागजी आंकड़ों पर एपीएल परिवार परिवारों में 11.52 करोड़, बीपीएल परिवार में 6.52 करोड़ खाद्यान्न सस्ते दरों पर दिया जा रहा है। अगर यह मानें कि एक परिवार में औसत पांच सदस्य हैं तो कागजों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में 90 करोड़ लोग आ गए। अगर यह सच है तो ये समझ से परे है कि पूरी दुनिया में भूखमरी के शिकार सबसे अधिक लोग भारत में ही क्यों हैं?