श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Saturday, April 30, 2011

लांग ड्राइव पर जाना, पर जान बचाना...

ड्राइविंग इतनी खतरनाक हो चुकी है कि सड़क पर वाहन ले जाते वक्त अब डर लगने लगा है। हर साल हजारों लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा बैठते हैं। हालांकि भारत सरकार ने यातायात नियम तोड़ने के मामलों में जुर्माना बढ़ाने का प्रस्ताव करते हुए एक विधेयक संसद में पेश किया था। इसका मकसद दिनोंदिन खतरनाक होती जा रही यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ करना है।
भारत में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो वाहन चलाते वक्त यातायात नियमों का पालन करना तो दूर सामान्य अनुशासन और समझदारी भी नहीं दिखाते। इसी का नतीजा है कि यहां हर साल देश के करीब 90 हजार से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। आंकड़ों की बात करें तो दुनिया भर में जितने लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं उनमें से आठ प्रतिशत मौतें अकेले भारत में होती हैं। इस तरह भारत ऐसे देशों की सूची में टाप पर है, जहां सड़क दुर्घटनाएं काफी अधिक होती हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में वाहन चलाने वालों यानी चालकों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि फिलवक्त  प्रति हजार पर 11 है, जो वर्ष 2011 के अत तक बढ़कर प्रति हजार पर 14 हो जाएगी। वर्तमान में यह बढ़ोत्तरी वर्ष 2000 के मुकाबले दो गुना से भी अधिक है। तब भारत में सिर्फ 0.5 प्रतिशत लोगों के पास कार हुआ करती थी। आज हर घर में कार नहीं सही, लेकिन मध्यम वर्गीय परिवारों में बाइक का होना तो आम बात हो चुकी है। शादी-विवाह में दहेज के रूप में बाइक देने के प्रचलन ने बाइक की डिमांड में काफी बढ़ोत्तरी कर दी है। इतना ही नहीं, आज बेरोजगारी के इस दौर में कई जॉब भी ऐसे हैं, जिनमें बिना बाइक के ड्यूटी नहीं हो सकती। लिहाजा शौकिया नहीं तो मजबूरी ही सही, बाइक की डिमांड अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। शायद यही वजह है कि बाइक, कार आदि की एजेंसियों पर एडवांस बुकिंग का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। या यूं समझ लीजिए कि बिना एडवांस बुकिंग कराए मनपसंद बाइक या कार मिलना अब आसान नहीं रहा।
उधर, सरकार ने जो नया विधेयक पिछले दिनों संसद में पेश किया था उसमें प्रस्ताव किया गया था कि निर्धारित सीमा से ज्यादा गति से वाहन चलाने पर जुर्माना 10 डालर यानी करीब चार सौ रुपए से बढ़ाकर 25 डालर यानी एक हजार रुपए किया जाएगा। अगर कोई व्यक्ति शराब के नशे में वाहन चलाता हुआ पाया जाता है तो उसे छह माह की जेल भी हो सकती है और पचास डालर यानी दो हजार रुपए जुर्माना हो सकता है।
ये तो बानगी भर है। इसी तरह के कुछ सख्त नियम कुछ वक्त पहले राजधानी दिल्ली में लागू किए गए थे, जिनका सड़कों पर असर भी नजर आने लगा था और यातायात में ज्यादा अनुशासन दिखता था। हालांकि यह भी एक शाश्वत सत्य है कि सख्त नियमों ने भ्रष्टाचार को पनाह देना शुरू कर दिया है। कारण कि पुलिस अमूमन यातायाता नियम तोड़ने वालों से रिश्वत लेकर उन्हें वहीं छोड़ देती है। लापरवाह ड्राइविंग हालांकि यहां के लिए कोई नई बात नहीं है। भारत में सभी तरह की सड़कों पर हर तरह के वाहन चलते हैं। पैदल से लेकर साइकिल, ट्रैक्टर, तेज रफ्तार कारें वगैरह-वगैरह...। और हां, अब जुगाड़ वाहन भी। ऐसा नजर आता है कि विभिन्न आकार और रफ्तार वाले वाहनों के बीच स्थान के लिए जद्दोजहद हो रही है। बसें, कारें, तिपहिया, हाथ से खींचकर चलने वाली गाड़ियों सभी अपनी-अपनी जगह बनाकर अपनी रफ्तार से चलते हैं। ऐसे में सड़कों पर चलने वाले पशुओं को भला कोई कैसे रोक सकता है। इतना ही नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था में हो रही प्रगति का मतलब है कि निकट भविष्य में वाहनों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होती रहेगी। मजे की बात तो ये कि वाहन चलाने वाले बहुतेरे चालक सड़क दुर्घटनाओं को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते। अक्सर देखा यह गया है कि सड़क दुर्घटनाएं लापरवाही से वाहन चलाने की वजह से ही हुई हैं। बहुत से मामलों में ऐसा भी होता है कि वाहन चलाने का न तो चालक के पास कोई तजुर्बा होता है और न ही उसने इसके लिए पर्याप्त अभ्यास ही किया होता है। जब ऐसे चालक किसी व्यस्त सड़क पर वाहन चलाने लगते हैं तो अक्सर इसका रिजल्ट दुर्घटना के रूप में ही सामने आता है।
वैसे तो युवा पीढ़ी में फर्राटेदार बाइक चलाना यूं कहें तो फैशन बन चुका है। बड़े रईस घरानों के दुलरुए बाइक को सड़कों पर चलाने के बजाय हाई स्पीड़ से हवा में उड़ाना शान समझते हैं। इससे सड़क पार करती महिला, बुजुर्ग और यहां तक कि बच्चे भी दुघर्टनाग्रस्त होकर असमय काल कवलित हो जाते हैं। वैसे ये दुलरुए मौका पाकर फरार हो जाने में भी काफी कुशल होते हैं। इतना ही नहीं, अगर ये लोगों के हाथ से बचकर पुलिस के हत्थे चढ़ भी गए तो धन और पैरवी इनके पास होती है। सोर्स इज फोर्स एंड मनी इज पावर का बखूबी इस्तेमाल करना रईस घरों के परिजनों को बखूबी आता है। इसके बाद पुलिसिया चंगुल से बेखौफ होकर छूटे ये दुलरुए अब भी सड़क के बजाय हवा में उड़ते रहना ही ज्यादा पसंद करते हैं। खैर, कुल मिलाकर ये विधेयक कितना कारगर साबित होगा, ये तो अभी वक्त बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि सड़क दुघर्टनाओं में कमी आने को लेकर अभी कोई प्रकाश की किरण नहीं दिख रही है। उसमें भी खास तौर पर भारत में जहां के युवा तो दूर अधेड़ भी यातायात नियमों को तोड़ना अपनी शान समझते हैं।

Saturday, April 23, 2011

भारत में हर साल बढ़ता एक ब्राजील

देश की 15 वीं जनगणना के प्रारंभिक आंकड़े पिछले गुरुवार को जारी कर दिए गए। इसके मुताबिक कुल आबादी पिछले आंकड़ों की तुलना में 17.64 फीसदी बढ़कर 1.21 अरब हो गई है। पिछले एक दशक में भारत की आबादी 18 करोड़ बढ़ गई है। मतलब साफ है। पिछले एक दशक में भारत की आबादी में उतनी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है जितनी की मौजूदा वक्त में ब्राजील की कुल आबादी है। यानी भारत में हर साल एक ब्राजील तैयार हो रहा है। इन सारी बुराइयों में एक पक्ष सराहनीय यह है कि भले ही जनसंख्या में रिकार्ड इजाफा हुआ हो, लेकिन महिला और महिला साक्षरता दर में बढ़ोत्तरी हुई है। इसे देश की आधी आबादी के प्रति लोगों के मन की खटास में आती कमी स्पष्ट परिलक्षित हो रही है।
देश भर में कुछ 58 करोड़ के आसपास महिलाओं की आबादी है। पिछले 10 वर्षों में नौ करोड़ महिलाओं की आबादी में इजाफा हुआ है। वहीं पुरुषों की कुल आबादी 62 करोड़ है। जनगणना आयुक्त सी. चंद्रमौली की ओर से गुरुवार को जारी किए गए इन आंकड़ों ने इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या के प्रति सरकार के सख्त कदम का असर अब दिखाई देने लगा है। भले ही आबादी बढ़ी है, लेकिन कन्या भ्रूण हत्या सरीखी सामाजिक बुराई में कमी आई है। अब बिटिया की अगवानी में भी दंपति रुचि लेने लगे हैं। बिटिया को बोझ नहीं समझा जा रहा है। खैर, अभी आंकड़ों पर ही नजर डालें तो भारत देश की जनसंख्या एक अरब 21 करोड़ तक पहुंच गई है। इनमें पुरुषों की सख्या 62 करोड़ और महिलाओं की संख्या 58 करोड़ तक पहुंच गई है। आंकड़ों के मुताबिक देश में पुरुषों की संख्या में 17.19 फीसदी और महिलाओं की संख्या में 18.12 फीसदी का इजाफा हुआ है। यानी पुरुषों की तुलना में इन एक दशक में पुरुषों की अपेक्षा नारी ने अधिक जन्म लिया है। जनसंख्या के आंकड़ों का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इसमें छह साल तक के बच्चों की संख्या में घटी है। उधर, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की साक्षरता दर में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। आंकड़ों के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या में सबसे अधिक 16 फीसदी हिस्सा उत्तर प्रदेश की है। नौ प्रतिशत के साथ महाराष्टÑ दूसरे, आठ प्रतिशत के साथ पश्चिमी बंगाल तीसरे और सात प्रतिशत के साथ आंध्र प्रदेश चौथे स्थान पर है। इन आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सबसे आबादी वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 21 करोड़ है। वहीं जनसंख्या के हिसाब से महाराष्टÑ दूसरे स्थान पर है। देश का एकमात्र राज्य नागालैंड है, जिसकी जनसंख्या में कमी आई है। ठाणे सबसे अधिक आबादी वाला जिला उभर सामने आया है। देश की जनसंख्या 121 करोड़ है जो कि अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान बांग्लादेश और जापान की कुल जनसंख्या 121.43 करोड़ के आसपास है। उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश और महाराष्टÑ की सम्मिलित आबादी अमेरिका से अधिक है। यह जानकारी 2011 की जनगणना के तदर्थ आंकड़ों में दी गई है। इन्हें केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई और भारत के महापंजीयक चंद्रमौली ने गुरुवार को जारी किया। इन आंकड़ों के मुताबिक इस आबादी में 62 करोड़ 37 लाख पुरुष और 58 करोड़ 65 लाख महिलाएं शामिल हैं।
कुल मिलाकर इस जनगणना ने इतना संकेत तो दे दिया है कि महिलाओं के प्रति भारतीयों के दिलों में बैठी तमाम बुराइयां अपना दम तोड़ने लगी हैं। आधी आबादी के प्रति भारतीयों के मन में नरमी का रुख पैदा होने लगा है। वहीं इनके शिक्षा-दीक्षा पर भी अब ध्यान दिया जाने लगा है। इन सबके बीच यह भी हकीकत है कि अब बालिकाओं के पोषण के प्रति भी दंपति गंभीर होने लगे हैं। आखिर हो भी क्यों न। भारत देश की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज महामहिम राष्टÑपति, सोनिया गांधी, यूपी की सीएम मायावती सरीखी महिलाओं ने समाज को एक नई सोंच दी है। आज लोग पैदा होने वाली बालिकाओं में इनका ही चेहरा देखने लगे हैं। उनकी सोंच बदली है। सेना से लेकर तमाम जिम्मेदार ओहदों को नारी शक्ति ने अपनी कार्यशैली का कायल कर दिया है।

भ्रष्टाचार, राजीव से मनमोहन सरकार तक

योग गुरु बाबा रामदेव और केंद्र सरकार के भ्रष्टाचारी होने की बात को लेकर मौजूदा दौर में चल रही राजनीतिक जंग की मुहिम में कितनी राजनीति और हकीकत है ये किसी से छुपा नहीं है। राजनीति के दौर में भ्रष्टाचार वह मुद्दा रहा है, जिसने सरकार के तख्त-ओ-ताज बदलने में अहम भूमिका का निर्वाह किया है। इन दिनों जब योग गुरु ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उछाला है तो वे भी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बरी कर रहे हैं। वहीं नजर डालें तो बाबा जिस केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा बता रहे हैं, उसे लेकर मुहिम छेड़ने का दावा कर रहे हैं, मनमोहन उसी केंद्र सरकार के अगुवा है। लाजिमी है कि यहां व्यक्तित्व की महानता के आगे भ्रष्टाचार की बातें उनके सामने गौण हो गई हैं। इसे मनमोहन ने काफी मशक्कत से हासिल की है।
अगर भ्रष्टाचार पर गौर फरमाएं तो यह एक मानव हालत और प्राचीन घटना है। सभ्यता की शुरूआत से सार्वजनिक कुलीन लोग व्यक्तिगत लाभ के लिए उनके कार्यालय का दुरुपयोग करते रहे हैं। जबकि उन नागरिकों की पकड़ सत्ता के भ्रष्ट लोगों तक रही है और उन्होंने इसका लाभ भी लिया है। भ्रष्टाचार की पौध तभी पुष्पित व पल्लवित हुई है, जब देश में राजनैतिक, राजकोषीय अनिश्चितता, प्रतिस्पर्धा, परमाणु प्रसार, आतंकवाद और अत्याचार ने सिर उठा रखा है। वैश्विक खतरों के बीच यह भी सही है कि सकारात्मक नेतृत्व, पारदर्शिता, मुश्किल और दंड के साथ ही तमाम प्रतिबंधों के जरिए ही इस पर अंकुश लगाया जा सकता है। भ्रष्टाचार वैश्विक सुरक्षा और विश्व व्यवस्था को पंगु बनाने की क्षमता रखता है। विकास, दमन, अत्याचार, रख-रखाव, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में इसके तमाम खतरे मौजूद हैं। मानव और नशीली दवाओं के अवैध व्यापार के मुद्दों के बीच भ्रष्टाचार ने आतंकवाद को भी पर्याप्त पोषण दिया है। तीसरी दुनिया में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा रहा है।
पतन की राह पर निकला व्यक्ति अक्सर भ्रष्टाचार के कंधे का सहारा लेता है। उसे न तो संस्कार दिखाई पड़ता है और न ही कोई अन्य आवश्यक बातें। उसकी पहली प्राथमिकता उसकी अपनी जरूरत होती है। लोकाचार की बातें उसके लिए मजाक से ज्यादा कुछ नहीं होती। परोपकार की भावना गौण हो जाती है। भ्रष्टाचारी अक्सर शांत, उदासीन और चिंतित रहते हैं। ऐसे व्यक्ति अक्सर धोखेबाज और पाखंडी भी होते हैं। हां, बातों की कला में वे माहिर जरूर होते हैं। भारत में भ्रष्टाचार की नींव की बात करें तो जब भी किसी राजनीतिक ने विकास के पायदान पर कदम रखा है, उसकी राह में इसी कांटे को बिछाया जाता रहा है।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। तब उन पर बोफोर्स के गोले खूब दागे गए। इन गोलों ने तब भी कांग्रेस को खूब कमजोर भी किया। कांग्रेस इतनी कमजोर हुई कि इसके बाद अभी तक अपने अकेले दम पर केंद्र में सरकार बनाने की हैसियत उसकी नहीं हुई। खास यह कि बोफोर्स में भी कुछ साबित नहीं हुआ। बोफोर्स के जमाने में वीपी सिंह ने ये प्रभाव देने की कोशिश की थी कि वे सत्ता में आने के बाद सब कुछ उजागर कर देंगे। यह दीगर है कि वे कुछ भी उजागर नहीं कर सके। इसके बाद देवगौड़ा, गुजराल और न ही वाजपेई की सरकार ही कुछ करामात इस मामले में दिखा सकी। राजीव गांधी पर कभी भी ये आरोप साबित नहीं हो सके। यह अलग बात है कि जब यह मामला उछला तो राजीव गांधी इस राजनीतिक लड़ाई को हार गए थे। इसके बाद फिर भी एक बहुत बड़े जनसमुदाय ने यह नहीं माना कि राजीव गांधी बोफोर्स में धन खा गए। आज की तरह तब भी राजनीतिक अगुवा यानी राजीव गांधी के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचारियों का जमावड़ा जरूर था। उन लोगों ने युवा राजीव गांधी की मासूमियत का फायदा उठाकर खूब मनमानी भी की।
आज भी कमोबेस वही हालात हैं। मनमोहन सिंह सरकार घोटालों की चपेट में है। रोज नित नए घोटाले सामने आ रहे हैं। इस बीच तब की तरह आज भी कोई मनमोहन सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप को लगाने की जुर्रत नहीं कर पा रहा है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट तक खींच ले जाने वाले सुब्रमण्यमम स्वामी, फायर ब्रांड नेता सुषमा स्वराज या अरुण जेटली। सभी एक मुंह से कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर कोई शक नहीं। बाबा रामदेव भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। आज ये सभी इसे बेबाकी से स्वीकार कर रहे हैं कि मनमोहन खुद घोटालेबाज तो नहीं हैं, लेकिन घोटालेबाजों के सरदार जरूर हैं। शायद उनमें और राजीव गांधी के बीच यही थोड़ा फर्क है। खास यह भी कि तब राजीव गांधी को किसी ने भी कमजोर प्रधानमंत्री नहीं कहा। राजनीतिक अपरिपक्वता के बावजूद कांग्रेस में होता वही था जो राजीव गांधी चाहते थे। वो ही पार्टी और सरकार दोनों के मुखिया थे। सरकार और संगठन दोनों के बीच उनकी सहमति के बगैर फैसले नहीं होते थे। कांग्रेस का बड़ा से बड़ा नेता उनके सामने नतमस्तक था। फिर चाहें वो महाराष्टÑ के शेर शरद पवार रहे हों या फिर कर्नाटक के वीरेंद्र पाटिल। या फिर आंध्र प्रदेश के एम चेन्ना रेड्डी। तब यूपी में नारायण दत्त तिवारी और वीर बहादुर सिंह की तूती बोला करती थी। मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह जलवा था। अर्जुन सिंह जैसे लोग जब दुबारा अपने बल पर जीतकर मुख्यमंत्री बने तो शपथ के अगले दिन ही राजीव गांधी ने उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर भेज दिया। तब अर्जुन सिंह सरीखा राजनीतिक दिग्गज भी चूं तक नहीं कर सका। वहीं आज ये बात देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए नहीं कही जा सकती।
इन सबके बीच एक हकीकत यह भी है कि मनमोहन सिंह ने देश की अर्थव्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदल दिया है। उनका ही योगदान है कि आज भारत दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश कहा जा रहा है। माना जा रहा है कि 2050 तक अमेरिका और चीन को पछाड़ते हुए भारत दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरेगा। वहीं राजनैतिक विरोधियों के लिए मनमोहन को कमजोर बताने का ये भाव तो उनके पदग्रहण के साथ ही अंकुरित हो गया था, जब वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया। तब यह माना गया था कि सोनिया को मनमोहन इसलिए रास आ रहे हैं कि वे उनके लिए सीईओ की तरह काम करेंगे। वे किसी मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह राजनीति में उलटफेर की संभावना को पनपने नहीं देंगे। वैसे भाजपा के लौहपुरुष समझे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी इस मुगालते में आ गए कि वे मनमोहन को कमजोर साबित कर पीएम की कुर्सी तक पहुंच जाएंगे। वहीं समूची दुनियां ने जाना कि तब उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी।
ऐसे में आज जब योग गुरु ने केंद्र सरकार के खिलाफ एक बार फिर भ्रष्टाचार का मुद्दा उछाला है तो भले ही वक्त बदल गया है, लेकिन परिस्थितियां इतिहास की उसी घटना को एक बार फिर दुहरा रही है। वहीं इसका कोई खास नतीजा दूर-दूर तक निकलता दिख भी नहीं रहा है।

70 के दशक में बलिया से जेपी ने युवाओं को जगाया था

भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल विधेयक लाने के लिए जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे अन्ना हजारे को बारंबार सलाम। कारण कि 75 साल के नौजवान का नाम अगर अन्ना हजारे कहकर पुकारा जाए तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी। समूचे देश में उनके इस संकल्प को लेकर अंदर ही अंदर जो चिनगारी धधकने लगी है, ऐसी स्थिति को पैदा करने वाला इंसान साधारण मानव हो ही नहीं सकता। मौजूदा माहौल को देखकर 70 के दशक की सहसा ही याद आ गई है।
वह मौका जब गुजरात में चिमन भाई पटेल की सरकार के खिलाफ वहां के नौजवानों ने आंदोलन का शंखनाद किया था। वह ऐसा दौर था जिस वक्त देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आयरन लेडी इंदिरा गांधी विराजमान थीं। उस वक्त भी  देश भ्रष्टाचार की गर्त में डूब चुका था।   भ्रष्टाचार के खिलाफ तब गुजरात का नौजवान जागा और गुजरात की आग की चिनगारी शोला बनकर बिहार तक जा पहुंची। तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी देश की तरुणाई को आवाज लगाई थी। तब जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में न सिफ छात्र, नौजवान बल्कि विपक्षी भी साथ हो लिए थे।  भ्रष्टाचार की मुहिम में तब समूचा देश एक सूत्र में पिरो गया था। इस दौरान आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री का सिंहासन भी डोल उठा था। खैर, 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। खैर, इस जंग ने रंग दिखाया और 19 महीने बाद इंदिरा गांधी की तानाशाही का खात्मा हुआ।अब 30 बरसों के बाद एक बार फिर केंद्र की सत्ता पर कांग्रेस ही काबिज है। वहीं अब अगुवा जरूर बदल गए हैं, लेकिन तस्वीर वही पुरानी दिख रही है। एक बार फिर इतिहास अपने को दुहराने पर आमादा दिख रहा है। अब 75 साल के नौजवान अन्ना हजारे की अगुवाई में भ्रष्टाचार का गला घोंटने के लिए युवाओं के अंदर की छटपटाहट भी बाहर आती दिखने लगी है।तब उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर और बिहार की सीमा पर स्थित बलिया जिले के गांव सिताबदियारा से निकली लोकनायक जयप्रकाश नारायण सरीखी हस्ती ने देश को लोहा मनवाया था, तो अब अन्ना हजारे के रूप में वही युवा बुजुर्ग देश से भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेकर निकल पड़ा है। बूढ़ी हड्डियों का जोश देखते ही बन रहा है। उम्र के इस पड़ाव में जब अमूमन लोग रिटायर होने की बात सोंचते हैं अथवा दुनिया छोड़ने के लिए दिन गिनते हैं, तब उस दौर में यह बुजुर्ग देश से भ्रष्टाचार मिटाने की चिन्गारी लिए युवाओं को पुकार रहा है। युवा भी इसमें पीछे नहीं है। संचार क्रांति के इस युग में युवा न सिर्फ मोबाइल, इंटरनेट का भरपूर प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि हजारे का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए वे सारे प्रयास किए जा रहे हैं, जो किए जा सकते हैं। वैसे भी भारत की संस्कृति रही है कि वे बुजुर्गों को ही अपना अगुवा मानते रहे हैं। हर सोच-विचार में बुजुर्गों की सहमति जरूर ली जाती है। अबकी जब कोई बुजुर्ग ही भ्रष्टाचार की अलख जगाने निकला हो तो फिर बात ही क्या है। कुल मिलाकर अन्ना हजारे का यह प्रयास न सिफ सराहनीय है, बल्कि ये बदलाव की बयार नि:संदेह मुकाम पाएगी। ऐसी उम्मीद है। वैसे भी बुजुर्गों की जंग ने हमेशा अपना रंग दिखाया है। चाहे वह बाबू कुंवर सिंह ने 1857 में अपनी तलवार से चमकाई हो, या फिर रास्ट्रपिता महात्मा गांधी ने। आज जब  भ्रष्टाचार चरम पर है। हर ओहदेदार भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा है तो जागी तरुणाई नि:संदेह देश को नई दिशा और दशा देगी।

...नहीं चेते तो नहीं मिलेगी मां की कोख

लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महल के जारी फतवा कन्या भ्रूण हत्या कत्ल के बराबर नि:संदेह देश व समाज के लिए जरूरी फतवों में एक होगा। आधी आबादी कही जाने वाली नारी के प्रति अगर बदलाव नहीं आया तो वह दिन दूर नहीं, जब इंसान को पैदा होने के लिए मां की कोख नहीं मिलेगी। जिस मां शब्द का भावार्थ आज तक कोई नहीं निकाल सका, उस मां की पैदाइश भी एक कन्या के रूप में ही होती है। इसके लिए अगर किसी एक समाज को दोषी करार दिया जाए तो ये सर्वथा अनुचित ही होगा। दरअसल, लिंग-भेद पर आधारित समाज में औरतों पर अत्याचार और यातना की कहानी पैदाइश के बाद, किशोरावाथा, या युवावस्था में नहीं, बल्कि गर्भ से ही शुरू हो जाती है। यूनिसेफ की एक रपट के मुताबिक, एशिया में गर्भावस्था में बच्चियों और कन्या भ्रूणों की ज़िन्दगी की गुंजाइश बाकी दुनिया के मानदंडों के मुकाबले बहुत  ही कम है।आए दिन न्यूजÞ चैनल कई शहरों में स्टिंग आप्रेशन चलाकर इसका रहस्योद्घाटन करते रहते हैं कि फलां सरकारी अस्पतालों और प्राइवेट क्लीनिकों में पैसे लेकर धड़ल्ले से  गैर कानूनी तौर पर हो रहे अल्ट्रासाउंड और कन्या भ्रूणों के गर्भपात कराए जा रहे हैं। ये खबर भी अब तो सुर्खियां नहीं बन रहीं। देश में वैसे भी प्रति हजार लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है।  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ख़ास हालातों को छोड़  दें तो कानूनी तौर पर भ्रूण की लिंग जांच को अवैध ठहराए जाने के बावजूद यदि ऐसे हादसे लगातार हो रहे हैं तो यह बेशक ये गंभीर मसला है। देश, समाज और सरकार सभी के लिए। करीब दशक-भर पहले परिवार कल्याण निदेशालय ने प्रसव पूर्व लिंग जांच निरोधक अधिनियम लागू किया, लेकिन यह सच्चाई है की आज भी बड़े पैमाने पर देश भर के महानगरों, छोटे-बड़े शहरों, यहाँ तक की कÞस्बों के सरकारी और निजी अस्पतालों और  क्लीनिकों में धड़ल्ले से भ्रूण परीक्षण हो रहे हैं । गर्भवती औरतों, उनके रिश्तेदारों और डॉक्टरों की मिलीभगत से कन्या भ्रूणों की बड़े पैमाने पर हत्या की जा रही है। कन्या भ्रूण और नवजात बच्चियों की सरेआम के जा रही हत्या की वजह से देश में औरत-मर्द अनुपात में असुंतलन आ गया है। पंजाब और हरियाणा सहित कुछ अन्य राज्यों में तो यह अनुपात काफी चिंताजनक हालत तक पहुँच गया है। जहां तक भ्रूण हत्या का सवाल है एक बार लिंग जांच के बाद उसकी हत्या के कई तरीके अब तो छोटे-मोटे मेडिकल स्टोर संचालक भी महिलाओं को बता देते हैं। कुछ रुपयों की लालच में खास तौर पर देहात क्षेत्र की महिलाएं इसका खूब सहारा भी लेती हैं। कुछ बरस पहले तक अमीर घरानों में बिटिया के जन्म को लेकर रोक की खबरें आती थीं, अब तो झुग्गी-झोपड़ियों की तथाकथित जागरुक महिलाओं ने कन्या के जन्म पर पाबंदी लगाना शुरू कर दिया है। हां, बेहतर वे बिरादरी हैं, जहां के लोग घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत करते हैं। घुमक्कड़ समाज ही बिटिया के हाथ पीले करते हैं और चैन की दो रोटी खाकर मजे से जिंदगी गुजार देते हैं। इनके लिए बेटे और बिटिया के जन्म में कोई खास अंतर नहीं होता। यह दीगर है कि ये समाज के पास न तो अपनी जमीन होती है और न ही कोई ऐसी संपत्ति जिसके लिए बिटिया उनके लिए बोझ लगती हो। बेटे की परिवरिश भी फटेहाली में होती है और बिटिया की भी। वे आधुनिक सभ्य समाज की अपेक्षा बच्चे भी कुछ ज्यादा पैदा करते हैं। कहा गया है कि अगर बुरे से बुरे व्यक्ति के पास भी अच्छे गुण हो तो उसे आत्मसात कर लेना चाहिए। वहीं हकीकत यह है कि आज के समाज ने उस कुलीन समाज की तमाम अच्छाईयों के साथ भ्रूण हत्या सरीखी बुराई भी सीख ली है। यहां उल्लेखनीय है कि  प्रसव पूर्व लिंग जांच अधिनियम 1994 के तहत भ्रूण की लिंग जांच के लिए अल्टासोनोग्राफी एमिनोसेटेसिस सरीखीं तकनीक का इस्तेमाल लिंग संबंधी कोई भी जानकारी देने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस बीच इस बीच रास्ट्रीय महिला आयोग ने भ्रूण जांच के तौर-तरीके  बताने वाली अमेरिकी वेबसाइट पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। जाहिर है, पुरुष सत्तात्मक मुल्कों में औरत-मर्द अनुपात को संतुलित करने के लिए यह जरूरी है। इसमें सरकार और कानून की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। साथ ही, जन जागरूकता के लिए मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं  को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
-अनीश कुमार उपाध्याय

...तू भूल गया उस लहू की कीमत

चाह मिली थी, राह मिली थी।
चैन भी था, आराम भी था।।
                    खून सने केसरिया में वीरों का अभिमान भी था।
                    हरे-भरे देश की हरियाली पर हम सभी को शान भी था।।
पर हाय आजादी में वीरों की चिताओं का राख भी था।
आजाद हिंद की वर्दियों में वीर लहू का दाग भी था।।
                    आजादी के इस तेवर में नई दुल्हनों की मांग भी थी।
                    सिंदूर का जिसमें दाग नहीं था, बस जीवन की हाय ही थी।।
सुभाष, भगत की कुर्बानियों का, रंग भरा पैगाम भी था।
देश के गौरव तिरंगे पर, कुर्बानियों का नाम भी था।।
                    पर हाय दुर्दशा इस तिरंगे की, क्या तेरा अंजाम यही था।
                    तेरी याद में मर मिटने की, क्या तेरे वंशजों का काम यही था।।
अर्द्धशताब्दी अभी बीती ही थी, आजादी के नारों से।
रह-रहकर गूंज जो उठती थी, वीर सेनानियों की चीत्कारों से।।
                   तू भूल गया उस लहू की कीमत, जो कितनी मशक्कत बाद मिली।
                   तू याद न उसको रख पाया, कैसे पाई हमने दिल्ली।।
लाल किले पर फहराने हित, हमने कितने यत्न किए।
हम जिए न जिए, तू तो उसके तले जिए।।
                   इसी आस में वीरों ने भारत की गाथा को सौंप दिया।
                   तूने भी वचन रक्षा का देकर, आजादी को हाथ लिया।।
महान गुरु का ध्यान अपनाकर, जन-गण-मन को गाया था।
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, यही नारा तुझे भाया था।।
                   भ्रष्टाचार ने चादर तानी, तू उसके नीचे छुप जो गया।
                   तेरे दिलोदिमाग से, देशभक्ति का ख्याल उतर गया।।
अब तो तू दूर रहे इस पवित्र तिरंगे से, जिसमें भारत का स्वाभिमान भरा।
सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, तिरंगे के साथ धरा।।
                  गद्दारों की लंबी कतार में, तूने अपने को स्थिर किया।
                  देश प्रेम को नगण्य जानकर तूने तिरंगे को कलंकित किया।।
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, वक्त रहते तू जो संभल गया।
कुरीतिया, भ्रष्टचार वगैरह, कैसे जिंदा रह पाएगा क्या।।