श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Tuesday, May 10, 2011

संकल्प के साथ करें प्रकृति की रक्षा

प्रकृति। जिसकी गोद में बसी हरियाली। ऊंचे पर्वत। झर-झर बहते झरने। कल-कल करती बहती नदियां। नदियों के किनारे साधना में लीन साधु-संत...। अद्भूत नजारा होगा है न...। पर जरा सोंचिए। जब इनकी जगह पर दूर-दूर तक केवल और केवल रेगिस्तान ही नजर आए। न कहीं हरियाली हो न नदियां, झील, तालाब, पोखरे वगैरह-वगैरह। तब जीवन नि:संदेह नीरस हो जाएगा। अगर ऐसा नजारा आने वाली आपकी पीढ़ियों को दिखेगा तो वे नि:संदेह आपको उस सम्मान की नजर से नहीं देख पाएंगे, जिसके आप हकदार है। यां यूं कहिए, जिसकी आपने आस लगा रखा है।
प्रकृति के अंधाधुंध दोहन, धरा से दिनोंदिन कम होती हरियाली, बांधों के जरिए नदियों के प्रबल, अथाह वेग को रोकने की कोशिश वगैरह-वगैरह ने प्रकृति के उस नजारों को रेगिस्तान के नजारों में बदलने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। अपने निजी स्वार्थ के लिए हम दिनोंदिन प्रकृति का इतना दोहन कर रहे हैं कि प्रकृति जितना उत्पादन कर रही है, उससे कई गुना हम अपने स्वार्थ के लिए उसे मिटाते जा रहे हैं। कहा जाता है कि किसी भी चीज को एक हाथ से दो तो दूसरे हाथ से लो। प्रकृति के साथ भी यह शत-प्रतिशत खरा उतरता है। पौध रोपेंगे तो वही विशालकाय वृक्ष बनेंगे। हरियाली देंगे, छाया देंगे और प्रकृति में जीवन के लिए वह हर चीजें उपलब्ध कराएंगे जिसकी धरती पर दिनोंदिन कमी आती जा रही है। पर्यावरण में आते बदलाव पर अंकुश लगेगा तो आकाश में बने ओजोन की परत में छेद की भी सहज ही भरपाई संभव हो सकेगी। प्रकृति की सुंदरता वैसे भी वह चीज है जिसने हर किसी का मन मोहा है। चाहें वह प्रकृति की गोद में बैठा कवि हो, कलाकार हो या फिर परिवार के साथ पिकनिक मनाने किसी पिकनिक स्पॉट पर निकला व्यक्ति। ऐसे में प्राकृतिक नजारे उसे सहज ही अपनी ओर खींचते हैं। कवियों की कल्पना को साकार रूप मिलता है तो किसी चित्रकार की कूची को सहज ही एक नया आयाम। प्रकृति की सुंदरता न सिर्फ बच्चों को भाती है बल्कि युवा, अधेड़, बुजुर्ग हर किसी की आंखों को वह शीतलता प्रदान करती है, जिसकी मनुष्य मानों लंबे अरसे से प्रतिक्षा करता हो। आखिर वह करे भी तो क्यों न करे। इस भागमभाग और महानगरीय जीवन ने उसे इतना व्यस्त कर दिया है कि उसे अब तो न प्रकृति की गोद में बैठने का अवसर है और न ही वह उसके लिए समय निकाल ही पाता है। आर्थिक प्रभुता वाले इस वक्त में प्रकृति को निहारने के लिए भले ही किसी के पास वक्त न हो, लेकिन उसके दिल से पूछिए वह हर वक्त इन नजारों को अपनी आंखों के झरोखों में कैद रखना चाहता है। ऐसे में जरूरत है तो बस और बस केवल प्रकृति की रक्षा का। इसके लिए हम सभी को संकल्प करना होगा कि प्रकृति की रक्षा हम उस मां की तरह करेंगे, जिसने हमे जन्म देने के साथ ही पालन-पोषण किया और उस काबिल बनाया कि हम खुद अपना भरण-पोषण कर सके। वक्त हमे पुकार रहा है कि प्रकृति की रक्षा की मुहिम में प्राण-प्रण से जुटो। इसे आंदोलन का रूप दो। नियम, कायदे, कानून सभी धरे रह जाते हैं। केवल और केवल व्यक्ति का आत्मविश्वास, उसकी अपनी सोंच और किसी कार्य के प्रति उसकी अपनी लगन ही उसे मुकाम देती है। प्रकृति की रक्षा की इस मुहिम में जुटने के लिए न किसी नारे की जरूरत है और न किसी आंदोलन की। अगर मौजूदा वक्त में जरूरत है तो केवल और केवल अपने आप में बदलाव लाने की। वक्त रहते सचेत होने की। अपने वंशजों को वैसी विरासत सौंपने की जिसमें हरियाली हो। झर-झर बहते झरने हो। अविरल प्रवाह के साथ बहती गंगा, गोमती, यमुना आदि नदियां हों। हिलोरे लेते समुद्र हों। इसे केवल एकमात्र संकल्प शक्ति से ही बरकरार रखा जा सकता है। अगर इसके बाद भी मानव नहीं चेते तो सभी प्राणियों में बुद्धिजीवी गिना जाने वाला मानव अपने इस अकाट्य सत्य से दूर हो जाएगा। तब इस धरा पर केवल बचेगा तो महाविनाश...!महाविनाश...!महाविनाश...! ...और इसके अलावा कुछ नहीं।

Thursday, May 5, 2011

सिसकती गंगा को उद्धारक की तलाश


लाख कवायद के बाद  भी अस्तित्व की जंग लड़ रही मोक्षदायिनी

आस्था के प्रवाह वाली नदी में बह रहा औद्योगिक कचरा
औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और प्रदूषण के जाल में जकड़ी गंगा अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रही है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने हाल ही में गंगा की सफाई के लिए सात हजार करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना को हरी झंडी दे दी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या पूर्व में करोड़ो रुपए खर्च के बाद पतित पावनी का जल वास्तव में अपने पुराने स्वरूप में लौट पाएगा। यह सही है कि गंगा को साफ करने की पिछली परियोजनाओं की अपेक्षा सात हजार करोड़ रुपए की ये सबसे बड़ी परियोजना है और इससे तमाम उम्मीदें भी लगाइं जा रही हैं।
इस कमेटी का तर्क है कि गंगा को साफ करने की पिछली तमाम परियोजनाओं की कामयाबी और नाकामयाबी को दृष्टिगत रखते हुए इस परियोजना को मूर्त रूप दिया गया है। इसमें उन सारी बातों को सम्मिलित किया गया है जो गंगा को निर्मल रखने के लिए आवश्यक है। यथा पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन करना, औद्योगिक प्रदूषण, कचरे और नदी के आसपास के इलाकों को बेहतर और कारगर प्रबंधन, नगर निगम के गंदे पानी के नालों का प्रांधन आदि शामिल हैं। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य गंगा संरक्षण के साथ ही नदी घाटी जुड़ाव द्वारा पर्यावरणीय प्रवाह को व्यापक बनाए रखना है। वैसे गंगा के प्रदूषण के मूल में जाएं तो गंगा को बांधों ने खूब नुकसान पहुंचाया है। ब्रिटिशकाल में यानी कि वर्ष 1916 में महामना मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में समझौता हुआ था कि गंगा के प्रवाह को कभी रोका नहीं जाएगा। संविधान की धारा 363 की भावना भी कमोबेस यही कहती है, लेकिन भारतीय सरकार की ही जानकारी में टिहरी में बांध बना और गंगा के प्रवाह को रोका भी गया। लिहाजा गंगा के अविरल प्रवाह में कमी आई और पतित पावनी सिसकने लगी।
उधर, उत्तराखंड की मौजूदा सरकार गंगा पर और भी बांध बनाना चाहती है। यहां के सीएम निशंक राज्य की नदियों से 10 हजार मेगावाट बिजली पैदा करना चाहते हैं। हास्यास्पद स्थिति तो यह कि तमाम लंबे-चौड़े दावे, तमाम सपनों का तिलिस्म खड़ा कर जिस टिहरी बांध का निर्माण हुआ, वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका है। हालात ये हैं कि टिहरी बांध आज भी अपने लक्ष्य से एक-चौथाई बिजली भी नहीं बना पा रहा है। उल्टे टिहरी बांध की वजह से गंगा का अविरल प्रवाह बाधित हुआ है। लिहाजा अट्ठाहास कर लंबे पाट लिए बहने वाली भारत की आस्था की प्रतिमूर्ति मोक्षदायिनी सिमट और सिकुड़ गई है। आलम यह है कि बांध के आसपास के सौ से भी अधिक गांव आज गंभीर जल संकट की स्थिति से जूझ रहे हैं। गंगा के जल का लेबल घटने से प्रदूषण का इजाफा हुआ और जलचरों की संख्या में भी अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई। इससे एक बहुत बड़े मछुआरा समुदाय के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। वहीं  बांध के आसपास के सौ से भी ज्यादा गांवों के लोग आज गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं। ये ग्रामीण इस परिस्थिति में अपना घर-बार छोड़कर अन्यत्र पलायन को मजबर हैं। ये वे ग्रामीण हैं जिनके कथित हितों के निमित्त इस बांध का निर्माण किया गया था।
उधर, गंगा के जल में औद्योगिक कचरे की स्थिति पर गौर फरमाएं तो तस्वीर काफी भयावह है। अकेले कानपुर में ही रोजाना करीब 400 चमड़ा शोधक फैक्टिरयों से तीन करोड़ लीटर गंदा जल रोजाना गंगा के जल में समाहित होता है। इसमें बड़े पैमाने में क्रोमियम, लेड, रासायनिक बाई प्रोडक्ट होते हैं। यही हाल वाराणसी, गाजीपुर, बलिया सरीखे छोटे-बड़े जिलों में भी होता है। हर दिन तकरीबन यहां से 19 करोड़ लीटर गंदा पानी खुली नालियों के जरिए गंगा की जलधारा में जा मिलता है। गंगा सफाई योजना को करीब ढाई दशक से भी ज्यादा वक्त हो गए। करोड़ों रुपए गंगा में बहाए गए। इसके बाद भी रिहायशी कॉलोनियों, कारखानों के गंदे पानी को इसमें मिलने से रोक पाना संभव नहीं हो सका। अकेले बलिया जिले में तो ज्ञापन से लेकर धरना-प्रदर्शन आदि तमाम आंदोलनों के बाद भी तस्वीर जस की तस है। उधर, इससे औद्योगिक इकाइयां जहां मुनाफे के चक्कर में कचरे का निस्तारण और परिशोधन के प्रति लापरवाह हैं, वहीं जिम्मेदार राज्य सरकारें और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड, कल-कारखानों की मनमानी को रोक पाने में  विफल हुई हैं। न्यायपालिका के कठोर रुख के बाद भी सरकार दोषियों पर कार्रवाई नहीं कर पाई है। वर्ष 1986 से शुरू हुई गंगा सफाई की मुहिम उसी वक्त मुकाम पा गई होती, यदि इसे गंभीरता से लिया गया होता। पांच सौ करोड़ रुपए की लागत से शुरू हुई इस परियोजना में बीते डेढ़ दशक के दौरान तकरीबन नौ सौ करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। वहीं मामला ढाक के तीन पात की कहावत को चरितार्थ कर रहा है।
संक्षेप में कहें तो भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता और धार्मिक कर्मकांड देश की सबसे बड़ी नदी को स्वच्छ बनने ही नहीं दे रहे हैं। गंगा में जहरीला पानी गिराने वाले कारखानों के प्रति बरती जा रही नरमी ही वजह है कि गंगा का पानी तो कहीं-कहीं जहरीला भी हो चला है। लिहाजा गंगा तटीय इलाको के भूजल में भी जहर घुल रहा है। गंगातीरी लोग तमाम असाध्य रोगों के शिकार हो रहे हैं। खास यह कि आम मान्यता रही है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होता या कीड़े नहीं पड़ते। माना जाता है कि इसमें निहित एक खास प्रकार का बैक्टिरिया इसे प्राकृतिक रूप से शुद्ध रखते हैं। वहीं आ गंगाजल के बैक्टिरिया खुद अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। वहीं गंगा जलस्तर में गिरावट का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि कभी वाराणसी में गंगा का जलस्तर 197 फुट हुआ करता था, जो अब घटकर कई जगहों पर महज 33 फुट के करीब रह गया है।
इसी क्रम में आर्थिक मामलो की कैबिनेट कमेटी ने जो सात हजार करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना को अमलीजामा पहनाया है, उसमें 5100 करोड़ रुपए जहां केंद्र सरकार वहन करेगी, वहीं गंगा प्रवाह वाले राज्यों की सरकारें 1900 करोड़ रुपए खर्च करेगी। इन राज्यों में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, ािहार, झारखंड और पश्चिमी बंगाल की सरकारें शामिल हैं। इसके अलावा इस मुहिम में 4600 करोड़ रुपए विश्व बैंक देगा। कुल मिलाकर आठ साल की समय सीमा में पूरी होने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना में कई ऐसे प्राविधान है कि यदि इन पर ईमानदारी और निष्ठा से अमलीजामा पहनाया जाए तो पतित पावनी का उद्धार होने से कोई नहीं रोक सकता।
-अनीश कुमार उपाध्याय

Tuesday, May 3, 2011

गंगा जल के साथ बहती ‘मौत’

गंगा तटीय इलाकों में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक
तमाम कवायद के बाद भी तिल-तिल कर मर रहे गंगा तीरी वाशिंदे

पतित पावनी गंगा। हिंदू आस्था का प्रतीक। साथ ही यूपी के तमाम जिलों समेत पूर्वांचल, बिहार आदि के वासियों के पेयजल का मुख्य स्रोत भी। तड़के श्रद्धालुओं के गंगा में डुबकी लगाने की होड़। आचमन के बाद तन-मन की शुद्धि। जीवनदायिनी मानी जाने वाली गंगा के जल में इस वक्त मौत बह रही है। इससे न सिर्फ गंगा जल बल्कि इन इलाकों के भूमिगत जल को भी जहरीला बना दिया है। यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा तटीय यूपी के 14 जिलों के भूमिगत जल में मानक से कई गुना अधिक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है। सर्वाधिक मात्रा यूपी के पूर्वी छोर पर बसे और बिहार से सटा जिला बलिया में तो मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक पाए जाने की पुष्टि भी हो चुकी है।
 इतना ही नहीं, गंगातीरी इन इलाकों में एक ओर जहां आर्सेनिक का कहर बरप रहा है, वहीं यहां के भूमिगत जल में एक दूसरा जहर आयरन भी यहां के वाशिंदों के लिए जी का जंजाल बन चुका है। यूनीसेफ के मानक के मुताबिक 10 पीपीबी (पार्ट  पर बिलियन) से अधिक आर्सेनिक की मात्रा मानव शरीर के लिए घातक है। वहीं अकेले बलिया जिले में तो समूचे भारतवर्ष से अधिक 50 से 450 पीपीबी तक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है।  हालांकि यूनीसेफ ने इसे गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को वस्तुस्थिति से न सिर्फ अवगत कराया है, बल्कि बलिया जिले के कुल 246 ऐसे सरकारी हैंडपंप (इंडिया मार्का दो) पर लाल निशान लगाते हुए इसे पेयजल के अयोग्य करार दे दिया है। साथ ही यूनीसेफ के कार्यकर्ताओं ने यहां पहुंचकर यहां के वाशिंदों को सख्त हिदायत दे रखी है कि किसी भी परिस्थिति में इस जल का न तो खुद सेवन करें और न ही अपने मवेशियों को ही इसका सेवन कराएं। यूनीसेफ का कहना है कि अगर इसका सेवन किया जाए तो न सिर्फ लीवर, गुर्दा खराब होने बल्कि तमाम चर्म रोग और कैंसर जैसी जटिल बीमारी मानव शरीर को अपने चपेट में ले सकती है। आर्सेनिक की अधिक मात्रा से मानव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है और व्यक्ति असमय काल कवलित हो सकता है। यूनीसेफ की रिपोर्ट के बाद खुद जल निगम ने भी इसकी जांच के बाद पुष्टि की है। जल निगम के अधिकारी बराबर इन क्षेत्रों पर नजर गड़ाए बैठे हैं। इसके लिए यहां डीप बोरिंग का प्रोजेक्ट भी प्रस्तावित है। हालांकि करोड़ों धन बर्बादी के बाद भी यह भी हकीकत है कि यहां के वाशिंदे इन तमाम हिदायतों के बाद भी इस जल का सेवन कर रहे हैं। वैसे यूनीसेफ के अधिकारियों ने भूमिगत जल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा के बारे में स्पष्ट तौर पर कहा है कि इसके मूल में कारखानों की गंदगी, रासायनिक तत्व व कचरा आदि है। गंगा जल के साथ भूमिगत जल में ये तत्व घुलकर उसे जहरीला बना चुके हैं।
 आर्सेनिक ही क्यों मानक से अधिक आयरन भी गंगा तटीय वाशिंदों के लिए किसी जहर से कम नहीं। गंगा तटीय यूपी-बिहार के इन इलाकों में मान से पांच गुना अधिक आर्सेनिक की मात्रा यहां के वाशिंदों के लीवर, गुर्दे को फेल करने में अहम भूमिका का निर्वाह कर रहा है। हालांकि यह दीगर है कि तमाम गरीब इन रासायनिक तत्वों के कहर से अनजान बनकर नीम-हकीमों के यहां जिंदगी के कुछ दिन गुजार लेते हैं। वहीं संपन्न लोग भारत के तमाम नामी-गिरामी अस्पतालों में लाखों रुपए धन केवल इलाज मद में ही खर्च कर रहे हैं। खास यह कि इन इलाकों के चिकित्सक भी इसे बेबाकी से मानते हैं कि यहां के लोगों के लिए लीवर का संक्रमण एक आम बात है। हालांकि चिकित्सकों का यह भी कहना है कि आयरन रक्त निर्माण में अहम भूमिका का निर्वाह करता है, लेकिन प्रति लीटर जल में इसकी मात्रा अगर 11 से 13 प्रतिशत के बीच हो तब। अगर इससे अधिक आयरन है तो ये फायदे की जगह मानव शरीर के लिए घातक है। वहीं गंगा तटीय इलाकों में तो इसका मानक पांच गुना से भी अधिक पाया गया है। इससे साफ है कि जीवनदायिनी कही जाने वाली गंगा के जल में इस वक्त मौत बह रही है। लेकिन आखिर यहां के वाशिंदे करें भी तो क्या। अगर आयरन के लिए पानी को उबाल कर इसकी मात्रा में कमी कर भी दें तो आर्सेनिक रूपी स्लो प्वाइजन से इनकी जान कैसे बच पाएगी। केंद्र सरकार की तमाम योजनाएं भी अब इनके लिए छलावा बन चुकी है। शायद यही वजह है कि अब सरकार से इनका विश्वास भी उठता जा रहा है। यहां के तमाम मंत्री, राजनीतिज्ञ भी इस मुद्दे को केवल वोट बैंक के लिए ही उछालते रहे हैं। अभी तक इस जहर पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। वहीं वक्त की जरूरत है कि गंगा में बह रहे अपशिष्ट पर नियंत्रण करते हुए एक बार फिर गंगा के जीवनदायिनी स्वरूप को लौटाने की। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई खास प्रयास होता नहीं दिख रहा है।
-अनीश कुमार उपाध्याय

Monday, May 2, 2011

जेहाद के नाम पर आतंकवाद को दी थी पनाह

सांप्रदायिकता के बूते विश्व में जमा रहा था पैठ
जेहाद शब्द को दे दिया था नया आयाम
मुस्लिम कट्टर पंथियों का बन गया था मसीहा

कहा जाता है आतंक का अंत बुरा होता है। ठीक वैसे ही जैसा विश्व के सबसे बड़े कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का हुआ। जेहाद के नाम पर आतंकवाद को पुष्पित और पल्लवित करने वाला यह शख्स सांप्रदायिकता के बूते विश्व में पैठ जमाने की मंशा पाले बैठा था। इस्लामिक देशों में एकजुटता लाकर वह गैर मुस्लिम देशों के प्रति नफरत के बीज रोपना चाहता था। इसके लिए उसने जेहाद शब्द को नया आयाम दिया और काफी हद तक मुस्लिम देशों का हीरो बन बैठा। जेहाद के नाम पर उसने न सिर्फ कुर्बानियां मांगी, बल्कि अमेरिका के खिलाफ चल रही अपनी जंग को मुस्लिम देशों की जंग बताकर खुद को सशक्त बनाने की उसने कोर कसर भी नहीं छोड़ी।
इसी जेहाद के नाम पर वह मुस्लिम देशों में खुद को हीरो साबित करने में वह काफी हद तक सफल भी रहा। शायद यही वजह रही कि मौत के अंतिम दिनों में पनाह लेने के लिए उसे पाक की सरजमी से ज्यादा महफूज जगह और कहीं दिखाई नहीं दी। यहां वह खुद को महफूज मान भी चुका था। आंतरिक सूत्रों के हवाले से जैसी खबरें आ रहीं है उसके मुताबिक पाक सरकार के नुमाइंदे ने भी उसकी खातिरदारी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे थे। ये तो अमेरिकी सूचना तंत्र की मजबूती ही थी, जिसने उसे पाक के बिल से बाहर निकाल लिया और उसे मौत की नींद सुला दिया। हालांकि केवल ओसामा बिन लादेन की मौत से आतंकवाद के खात्मे की पुष्टि नहीं होती। ऐसा नहीं होगा कि ओसामा की मौत के बाद विश्व से आतंकवाद का समूल नाश हो जाएगा। अभी आतंक के कई ऐसे पोषक हैं, जिसका खात्मा किए बगैर आतंकवाद के समूल नाश की बात करना भी बेमानी होगी। वैसे यूं कहें तो अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की मौत से इतना जरूर हुआ है कि अलकायदा का एक चेहरा मिटा दिया गया है। वहीं अभी तमाम चेहरे विश्व में आतंक और खौफ पैदा करने के लिए काफी हैं। सबसे बड़ी बात ये कि जिस आतंकवाद के खात्मे का बीड़ा लेकर चला अमेरिका भी इसे बेबाकी से मान रहा है कि आतंकवाद का केवल एक चेहरा मिटाया गया है, न कि समूचे आतंकवाद का नाश कर दिया गया है। अभी जंग बाकी है। खास तौर पर गौर फरमाएं तो भारत जिस पाकिस्तान को आतंकवाद का पोषक बता रहा था, वहीं ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद उसकी सत्यता भी एक बार फिर साबित हो गई है। वैसे पाकिस्तान की सरजमीं पर न जानें कितने लादेन खुद को मसीहा बनाने की मुहिम में रणक्षेत्र की बिसात सजा रहे हैं। जरूरत है आतंकवाद के समूल नाश के लिए सबसे पहले पाक की सरजमीं से आतंक रूप पौध को मिटाने की। इस्लामिक आतंकवाद को संरक्षण देने वाले पाक को लादेन की कहानी के अंत के साथ इतना तो सबक लेना ही चाहिए कि अब भी वक्त है और वह भी आतंकवाद के खिलाफ चल रहे वैश्विक युद्ध में सहभागिता कर हाथ बढ़ाए। अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब लादेन की तरह पाक की सरजमीं पर केवल लाशों का जखीरा होगा। जिंदगी भीख मांगती फिरेगी और पाक की हवा में बारुद की गंध ही मिलेगी। वैसे भी पाक को अब यह भलि-भांति समझ लेना चाहिए कि जेहाद का असली मायने आतंकवाद में निहित न होकर मानवता के कल्याण में निहित है। जेहाद मानवता को मिटाने के लिए नहीं, बल्कि मानवता के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए होना चाहिए। इस्लामिक ही नहीं, किसी भी धर्म या उसके पवित्र ग्रंथ में यह कहीं नहीं लिखा है कि निर्दोषों की हत्या कर धर्म की स्थापना करो। चाहें वह कोई भी धर्म हो। हिंदू, मुस्लिम आदि तमाम धर्मों का एक ही सूत्र वाक्य है कि मानवता की भलाई के लिए प्राणों की आहुति दे दो। ऐसा नहीं जैसा कि लादेन ने जेहाद शब्द को नया आयाम देकर मुसलमानों को भड़काने के लिए इस धर्म का सहारा लिया। हालांकि इसी जेहाद के चलते वह मुस्लिम कट्टर पंथियों का मसीहा जरूर बन गया, लेकिन हकीकत यह भी है कि उसके खात्मे के साथ इन कट्टरपंथियों को इतना तो सबक जरूर मिल गया होगा कि बुरा का अंत भी बुरा ही होता है। मानवता के हित में जीवन समर्पित करने वालों की आयु लंबी होती है। वह बेमौत नहीं मारा जाता। जिंदगी के लम्हों को जीता है और खूब जीता है।
अब अगर यह मान भी लें कि अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की मौत में पाक ने सहयोग दिया भी तो नि:संदेह इसके पीछे पाक की कुत्सित मानसिकता भी रही होगी। कल तक ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाले पाकिस्तान में ऐसा क्या विचार आया जो उसने लादेन के खात्मे के लिए अमेरिका का सहयोग दिया। नि:संदेह इसके बदले में पाक, अमेरिका से कुछ चाहता है। यही वजह रही कि उसने लादेन एनकाउंटर में अमेरिका का साथ दिया। पाक स्थित इस्लामाबाद के पास अबोटाबाद में कुल 40 मिनट तक चले सीआइए और पाक सेना के संयुक्त आॅपरेशन में यदि लादेन मारा गया है तो इसे भुनाने में पाक कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा। वैसे पाक की यह सोंच सफल होती भी नहीं दिख रही है। कारण कि पाक की सरजमीं पर आतंकी सरगना की मौत ने इतना तो साफ कर दिया है कि पाक ने ही अलकायदा मुखिया को पनाह दे रखी थी। मिलिट्री बेस से महज कुछ किमी की दूरी पर ही आतंकी सरगना छिपकर आतंकी गतिििवधयों को अंजाम देता था। अमेरिका इस सोच का बदला पाक से जरूर लेगा। ऐसे में ओसामा की मौत ने भले ही अमेरिका को राहत दे दी हो, लेकिन पाक की परेशानी दूर होती नहीं दिख रही है।

दो आतंक और खात्मा एक तिथि को

अडोल्फ हिटलर और ओसामा बिन लादेन दोनों आतंक के पर्याय
आतंक के साए तले जिंदगी जी और आतंक के लिए ही पा गए मौत
दोनों आतंक और खौफ के पर्याय रहे। एक ने तानाशाह की जिंदगी बसर की, तो दूसरे ने विश्व शक्ति के रूप में उभर रहे अमेरिका के माथे पर पसीना चुहचुहा दिया। जी हां, ये दोनों हस्तियां वे हैं जिन्होंने आतंक को पोषण दिया। आतंक के साए तले जिए और आतंक के लिए ही मारे गए। इसमें भी संयोग भी एक। दोनों का खात्मा भी एक ही तिथि को हुआ।
जीं हां यहां बात हो रही है जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर की। जिसने दूसरे विश्वयुद्ध में यूरोप को बुरी तरह बर्बाद कर दिया था। उसकी मौत 1 मई 1945 को हुई थी। गौरतलब है कि दूसरे विश्वयुद्ध  में जर्मनी की हार के बाद तानाशाह हिटलर ने खुदकुशी कर ली थी। हिटलर के मारे जाने की खबर एक मई 1945 को आई थी। कहा जाता है कि हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को खुदकुशी कर ली थी। लेकिन उनकी मौत की तारीख को एक मई ही माना जाता है। वहीं अब विश्व के सबसे बड़े आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत भी एक मई को हुई है। गौरतलब है कि अमेरिका के राष्टÑपति बराक ओबामा ने घोषणा की थी कि रविवार रात अमेरिकी सेना के हमले मे ओसामा बिन लादेन मारा जा चुका है। ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 90 किलोमीटर दूर अमेरिका सेना ने मार गिराया। जानकारी के मुताबिक लादेन इस घर में पिछले साल अगस्त से छुपा हुआ था। 40 मिनट तक चले इस आॅपरेशन में लादेन के परिवार वालों और मुख्य सहयोगी अल जवाहिरी के मारे जाने की भी खबर है। हालांकि जवाहिरी की मौत की पुष्टि नहीं हुई है। इस आॅपरेशन में अमेरिकी सेना को जान का नुकसान नहीं पहुंचा है। एक तरफ ओसामा की मौत की खबर पूरी दुनिया की मीडिया की सुर्खियों में हैं वहीं अभी तक पाकिस्तान के किसी भी सरकारी अधिकारी की तरफ से ओसामा की मौत के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। ना पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री, ना राष्टÑपति और ना ही अन्य किसी सरकारी अधिकारी ने ओसामा की मौत के बाद कोई बयान दिया है। बात साफ है  ओसामा की मौत से पाकिस्तान वाकई सदमे में होगा और अब उसे अमेरिका के सामने जवाब देना भारी पड़ेगा।
खैर, अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन की मौत की पुष्टि डीएनए टेस्ट से करके अपने नंबर वन दुश्मन और दुनिया के सबसे बड़े कुख्यात आतंकवादी का शव समंदर में दफना दिया है। जानकारी के मुताबिक अमेरिका नहीं चाहता था ओसामा को दफनाने की जगह आतंकियों की शरणगाह बन जाए इसलिए उसने ओसामा को बीच समंदर मे दफना दिया। उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब में जन्मा और दुनिया का सबसे कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन अल कायदा का चीफ था। लादेन के इशारे पर ही अल कायदा ने अमेरिका पर 9/11 का हमला किया था। ओसामा को अमेरिकी सेना ने रविवार की रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक एबटाबाद में 40 मिनट तक चले एक आॅपरेशन में मार गिराया।
वहीं अमेरिकी सेना ने रविवार की रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 150 किमी दूर एबटाबाद में अपने दुश्मन नंबर वन कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के लिए 40 मिनट तक चले इस आॅपरेशन में अमेरिकी सेना का साथ अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने दिया। ये भी जानकारी मिल रही है कि अमेरिका ने इस आॅपरेशन की भनक तक पाकिस्तान को नहीं लगने दी। अब सवाल यह उठता है आखिर वह किस तरह का घर था, जहां दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ने अपना ठिकाना बनाया और मारा गया। अमेरिका को पिछले दस साल से ओसामा की तलाश थी। तब से जब साल 2011 की 9 सितंबर को ओसामा ने बहुत ही सफाई से अमेरिका वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर विमानों से हमला करवाया था। इस हमले में अमेरिका के 3,000 नागरिक मारे गए थे। इस मकान की खासियत यह थी कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 150 किमी दूर एबटाबाद इलाके में बना ये आलीशान घर पाकिस्तानी मिलिटरी बेस से केवल एक किमी दूर था।  2005 में बनाए गए तीन मंजिला इस मकान की दीवारें 12-18 फुट ऊंची थीं और घर में सिर्फ दो दरवाजे थे और सड़क की तरफ कोई खिड़की नहीं थी।  महलनुमा ये मकान इलाके के बाकी मकानों से दस गुना बड़ा था और यहां ऐशो आराम की हर सुविधा मौजूद थी।  दुनिया की नजरों से बचने के लिए ओसामा के घर में न फोन था और ना ही इंटरनेट। अपने संदेश पहुंचाने के लिए वो कुरियर का इस्तेमाल करता था। जिन्हें उसे संदेशवाहक लाया ले जाया करते थे।  इन्हीं संदेशवाहकों के कारण ओसामा अमेरिका के जाल में फंसा। साल 2007 में सबसे पहले ओसामा के संदेशवाहक को गिरफ्तार किया गया।  फिर साल 2009 में संदेशवाहक के भाई का पता चला और उससे 2010 में ओसामा की लोकेशन का पता चल पाया। बाहरी दुनिया और अपने संगठन के लोगों से संपर्क करने के लिए ओसामा जिन कुरियर्स का इस्तेमाल करत था उन्हीं के संदेशवाहको के जरिए ओसामा के ठिकाने का पता चला।