श्री गणेशाय नमः

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Monday, June 27, 2011

जेल की दीवारों में ‘सरस्वती साधना’

2009 में तिहाड़ जेल से निकला एक आईएएस
तमाम कैदी कैद में ही पा रहें हैं डिग्री/डिप्लोमा
पांच और कैदी कर रहे आईएएस की तैयारी


अनीश कुमार उपाध्याय
तिहाड़ । इसका नाम आते ही सहज ही दिमाग में एक खाका बनता है। लंबी-चैड़ी दीवारें। दीवारों के पीछे कई कोठरियां। इसमें सजा काट रहे तमाम खूंखार और नामी गिरामी डकैत, बदमाश, हत्यारे वगैरह-वगैरह। अगर आपसे ये कहा जाए कि इन्हीं दीवारों के पीछे इन दिनों ये कैदी सरस्वती की साधना कर रहे हैं तो एकबारगी आपको विश्वास न हो। जी हां, यकीन करिए, यही हकीकत है।
कैदी भविष्य बना रहे उज्ज्वल
यहां सजा काट रहे कई कैदी डिग्री और डिप्लोमा कोर्स कर अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने की मुहिम में जुटे हैं। इतना ही नहीं, वर्ष 2009 में इसी तिहाड़ जेल में रहकर एक कैदी ने देश की सबसे बड़ी परीक्षा आईएएस में सफलता हासिल की है। इतना ही नहीं, जेल की दीवारों में अभी पांच और कैदी कुछ ऐसा ही सपना संजोए दिन-रात एक कर सफलता पाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। तिहाड़ जेल में सरकारी संगठन और एनजीओ की मदद से शिक्षण कार्य संचालित किया जा रहा है।
जेल की दीवारों में भी हौसले बुलंद
कौन कहना है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। इसे हकीकत में बदलने की मुहिम में तिहाड़ जेल में कैद पांच कैदी पूरे मनोयोग से जुटे हैं। कत्ल के आरोप में कैद मणिपुर के गजियाओ के जार्ज प्रशासनिक सेवा में आने के बाद देश के उपेक्षित अपने राज्य की क्षमता को आगे बढ़ाने की मंशा रखते हैं। वे प्रदेश के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देना चाहते हैं। वहीं धोखाधड़ी के आरोप में सजा काट रहे बिलासपुर छत्तीसगढ़ के सिद्धार्थ सिंह सीदर खडगपुर आईआईटी से पास आउट हैं और उनका दावा है कि जेल में जितना वक्त उन्हें पढ़ने के लिए मिल जाता है, घर पर शायद ही मिल पाता। अपहरण के आरोप में कैद में रहकर आईएएस की तैयारी कर रहे बिहार के अमित झा के हौसले भी बुलंद हैं। कानपुर के राठौर और संदीप कहते हैं कि जेल की दीवारों में वे जरूर कैद हैं, लेकिन उनके सपने आजाद हैं।
इग्नू-एनआईओएस ने संभाली कमान
इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी इग्नू नई दिल्ली और नेशनल इंस्टीटयूट आॅफ ओपेन स्कूलिंग एनआईओएस दिल्ली ने क्रमशः 2640 और 1900 छात्रों को शिक्षा दी है। यहां कैदियों के लिए कंप्यूटर टेनिंग सेंटर भी संचालित किया जा रहा है। यहां से बीए, बीकाम, क्रिएटिव राइटिंग इन इंग्लिश में डिप्लोमा, मानवाधिकार में सार्टिफिकेट कोर्स, मास्टर इन टूरिज्म, मैनेजमेंट, कंप्यूटर, पीजी डिप्लोमा इन डिस्टेंस एजुकेशन आदि की शिक्षा ये कैदी हासिल कर रहे हैं।
वोकेशनल क्लास भी हो रही संचालित
इतना ही नहीं वोकेशनल क्लास के रूप में हिंदी, इंग्लिश टाइपिंग, कामर्शियल आर्ट आदि की शिक्षा भी यहां के कैदियों को दी जा रही है। इसका प्रमाण पत्र डायरेक्टेट आफ टेनिंग एंड टेक्निकल एजुकेशन की ओर से जारी किया जा रहा है।
कैदी सीख रहे योग के गुर
वहीं वर्ष 1994 में तिहाड़ जेल नंबर चार में 10 दिवसीय योग और मेंडेटेशन से जुड़े दो कोर्स भी संचालित किए जा रहे हैं। छह माह का कंप्यूटर कोर्स एनजीओ स्टरलाइन फाउंडेशन की मदद से तैयार हैं। ये कोर्स पात्रता रखने वाले कैदियों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके अलावा गांधीवादी दर्शन के प्रसार के लिए तिहाड़ जेल में एक गांधी सेंटर गांधी स्मृति और दर्शन समिति द्वारा इग्नू वार्ड में सरकार की ओर से स्थापित किया गया है। खास यह भी कि गांधीवादी दर्शन पर पांच सौ से अधिक पुस्तकें पुस्तकालय में उपलब्ध हैं।
30 प्रतिशत कैदी अभी भी निरक्षर
अब यदि तिहाड़ में कैदियों की स्थिति पर नजर डालें तो खाका आसानी से समझा जा सकता है। तिहाड़ के सभी जेलों में मौजूदा दौर में करीब 12 हजार कैदी हैं। इनमें से लगभग 30 प्रतिशत ऐसे कैदी भी हैं, जिनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है। जेल नंबर सात में तो करीब एक हजार कैदियों में से 200 अनपढ़ हैं।
जेल प्रशासन ने संभाली शिक्षा की कमान
कैदियों को शिक्षा उपलब्ध कराने की व्यवस्था जेल प्रशासन ने संभाल रखी है। इनकी शिक्षा व्यवस्था का खर्च जेल प्रशासन ही वहन करता है। इतना ही नहीं यूनिफार्म और जूते भी जेल प्रशासन ही उपलब्ध कराता है। कैदियों को पढ़ने के लिए चेयर और डेस्क की भी मुकम्मल व्यवस्था है। इन कैदियों को पढ़ाने के लिए शिक्षक एचआरडी मिनिस्टी से आते हैं।
रोजाना दो बैच में लगती क्लास
जेल में कैदियों की रोजाना दो बैच में क्लास लगती है। शिक्षक इन अनपढ़ कैदियों को हस्ताक्षर करने,अखबार, बुक्स वगैरह पढ़ने तथा लिखने की बेसिक जानकारी उपलब्ध कराते हैं। जेल नंबर सात में 18 से 21 साल के कैदी स्काई ब्लू शर्ट और डार्क ब्लू पैंट पहनकर बकायदा शिक्षा लेते हैं।

इनसेट---

शिक्षा की है मुकम्मल व्यवस्था

डीजी जेल नीरज कुमार ने बताया कि जेल में कैदियों की शिक्षा के मुकम्मल बंदोबस्त की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती। सरकार ही नहीं, जेल के अधिकारी और कर्मचारी भी कैदियों की शिक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं। जो भी सुविधाएं इन कैदियों को चाहिए, वो सब यहां उपलब्ध कराई जाती है। सरकार का भी कैदियों की शिक्षा पर पूरा ध्यान है। लिहाजा यही वजह है कि यहां आईएएस जैसी परीक्षा की तैयारी भी कैदी करते हैं और एक कैदी इसमें सफलता भी पा चुका है। उस कैदी का नाम बताने से इनकार करते हुए उन्होंने इतना जरूर बताया कि बलात्कार के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे उस कैदी ने जब आईएएस की परीक्षा में सफलता पाई तो दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में उसकी सजा माफ कर दी । उन्होंने आश्वस्त किया कि आगे भी अगर इससे बेहतर सुविधाएं कैदियों को दी जाएंगी।

इनसेट---

तिहाड़ जेल में कैदियों की आयुवार स्थिति

उम्र                                 पुरूष                         महिला
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18 से 21 साल                1199                           25
21 से 30 साल                  5893                         110
30 से 50 साल                   3593                        273
50 से 65 साल                   516                          59
65 वर्ष से उपर                 58                            12
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कुल कैदी                        11259                        479
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सर्वयोग      11738
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इनसेट---
आईएएस की तैयारी में जुटे हैं ये कैदी
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नाम                  पता                                      आरोप
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जार्ज              गजिआओ, मणिपुर                     कत्ल
सिद्धार्थ सिंह सीदर बिलासपुर, छत्तीसगढ़         धोखाधड़ी
अमित झा            बिहार                                  अपहरण
राठौर                कानपुर, उत्तर प्रदेश                      ---
संदीप                कानपुर, उत्तर प्रदेश                     हत्या
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नोटः ये सभी कैदी तिहाड़ जेल के बैरक नंबर तीन में रहकर अपनी तैयारी कर रहे हैं।

Monday, June 20, 2011

गंगातीरियों को मार रहा आर्सेनिक

अब नहीं इतराते गंगा किनारे के छोरे
सब कुछ जानते हुए भी पी रहे जहर
लाख कवायद के बाद भी शुद्ध पेयजल मयस्सर नहीं

अनीश कुमार उपाध्याय
कभी खुद को गंगा किनारे का छोरा बताकर इतराने वाले गंगा तटवर्ती इलाकों के वाशिंदों के लिए न सिर्फ गंगाजल बल्कि भूमिगत जल भी जहर बन चुका है। तिल-तिलकर मौत के आगोश में समाते यहां के वासियों के लिए पीने के पानी का कोई अन्य विकल्प न होने के चलते वे सब कुछ जानते हुए भी इस जहर को पीने के लिए मजबूर हैं। खास यह कि तमाम जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों की कवायद के बाद भी यहां के वाशिंदों को शुद्ध पेयजल मयस्सर नहीं हो सका है।
जहां तक आर्सेनिक की मौजूदगी का सवाल है यूपी के कुल 20 जिलों के 322 विकास खंड ऐसे हैं, जहां भूमिगत जल में मानक से कई गुना अधिक आर्सेनिक की मौजूदगी पाई गई है। आर्सेनिक की जद में आकर अकेले बलिया के 60 फीसदी  लोग उदर विकार से ग्रसित हैं। खासतौर पर बलिया जिले के बेलहरी ब्लाॅक, गंगापुर का तिवारी टोला, रिकनी छपरा, चैबे छपरा, राजपुर, एकौना आदि गांवों में तो प्रत्यक्ष रूप से इसका असर देखा जा सकता है।  अब यदि आर्सेनिक की मौजूदगी पर गौर फरमाएं तो यूनीसेफ के मानक के मुताबिक 10 पीपीबी -पार्ट पर बिलियन- से अधिक आर्सेनिक की मात्रा शरीर के लिए घातक होती है। बलिया में 50 से 450 पीपीबी तक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है। वहीं यूपी के ही बहराइच जिले में तो इसकी मात्रा 1000 पीपीबी तक पाई गई है। यूनीसेफ के ताजी रिपोर्ट के मुताबिक अकेले पूर्वांचल के करीब 25 हजार लोग आर्सेनिकोसिस नामक बीमारी से ग्रसित हैं।
अब तो हालात ये हैं कि बलिया जिले के बांगर इलाके के लोग अपनी बिटिया के हाथ भी गंगा तटवर्ती और आर्सेनिक प्रभावित इलाके द्वाबा के लोगों के साथ पीला करना नहीं चाहते हैं। उक्त गांवों में तमाम लोग आर्सेनिक की जद में आकर मौत के आगोश में समा चुके हैं। गंगापुर गांव के रामनारायण यादव, सावित्री, बेलहरी ब्लाक के गांव सोनवानी के रामकिशोर धोबी आदि कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अपने हैंडपंप का पानी लंबे समय तक पीने के बाद दुनिया छोड दिया। लिहाजा आज भी इनके परिजनों से बातचीत के बाद आर्सेनिक का खौफ इनके चेहरे पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। परिजनों की बातों पर गौर करें तो जब इनके परिजनों को आर्सेनिकोसिस रोग का असर हुआ तो वे उन्हें लेकर जहां-तहां चिकित्सकों के यहां इलाज के लिए भटकते रहे। इसकी दवाएं भी काफी महंगी हैं। तमाम दवाओं के बाद भी उसका कहीं कोई असर नहीं हुआ। कई जांच और काफी धन खर्च के बाद जब रोग ठीक नहीं हुआ तो इनकी आर्थिक ताकत जवाब दे गई। लिहाजा तिल-तिल मौत के आगोश में वे अपने परिजन को समाते देखने के लिए विवश हो गए। मोबाइल पर बातचीत में उनके परिजनों से ये पूछे जाने कि क्या वे अब उस जल को नहीं पीते तो उन्हीं के शब्दों में-का करिं जा बाबूजी। अब गंगा माई के पानी ना पीहीं जा त कहवां के पीहीं जा। कल -हैंडपंप- के पानी में भी उहे जहर घुलल बा। आशय यह कि क्या करें। अब गंगा मैया के जल का सेवन न करें तो कहां का पानी पिया जाए। हैंडपंप का पानी भी तो शुद्ध नहीं है, जिसका पानी पीकर प्यास बुझाई जा सके।
उधर, इस इलाके के हल्दी में अपना निजी क्लिनिक चलाने वाले प्रमुख चिकित्सक डा भगवान ओझा से मोबाइल पर वार्ता की गई तो उनका कहना था कि गंगा तटवर्ती इलाके के तमाम मरीज रोजाना आते हैं। जहां तक मेरा मानना है कि पीलिया, हेपेटाइटिस बी, लीवर, किडनी, क्षय, कैंसर, डायरिया, कालाजार आदि रोगियों की इस प्रभावित इलाके में भरमार है। आम तौर पर इस रोग में चलने वाली दवाएं इन पर बेअसर होती हैं। कारण कि आर्सेनिकोसिस नामक रोग से लडने के लिए अभी तक कोई खास दवा बाजार में नहीं आ सकी है। लिहाजा कई बार यहां के रोगियों को अन्यत्र रेफर करना पड़ता है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
बलिया जिले के द्वाबा के बसपा विधायक सुभाष यादव का कहना है कि आर्सेनिक प्रभावित द्वाबा इलाके में शुद्ध पेयजल उपलब्धता के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। बेलहरी ब्लाॅक के नीरूपुर तथा मुरलीछपरा में ओवर हेड पानी टंकी का निर्माण कराया गया है। इसके अलावा भी तमाम वे प्रयास किए जा रहे हैं, जो वे कर सकते हैं। चुनावी जीतने के बाद आर्सेनिक का मुददा उनके लिए अहम रहा। वे इसके समूल नाश के लिए संकल्पबद्ध हैं।
बलिया जिले के द्वाबा के पूर्व विधायक एवं पूर्व खाद्य एवं रसद राज्यमंत्री भरत सिंह का कहना है कि जब वे पहली दफा द्वाबा से विजयी हुए तब ये आर्सेनिक का मामला प्रकाश में आया। इसके लिए उन्होंने विधानसभा स्तर पर भी कई बार सवाल उठाए और आर्सेनिक प्रभावित रामगढ, गंगापुर, बेलहरी ब्लाॅक क्षेत्र के लोगों की समस्या को सरकार से अवगत कराया। उनका ही प्रयास रहा कि यूनीसेफ की टीम ने इस क्षेत्र में आकर पानी का सैंपल लिया औ आर्सेनिक की मौजूदगी का खुलासा किया। अब जब वे सत्ता में नहीं है फिर भी इसके लिए उनसे जो बन पडता है, वे करते हैं।

अधिकारी उवाच
जल निगम बलिया के अधिशासी अभियंता एके श्रीवास्तव ने बताया कि जिले की 310 बस्तियां आर्सेनिक से ज्यादा प्रभावित हैं। इसमें बेलहरी, बैरिया, मुरलीछपरा, रेवती आदि ब्लाॅक क्षेत्र के गांव व उनकी बस्तियां शामिल हैं। इसके तहत विभाग की ओर से 103 बस्तियों में 498 डीप बोरिंग वाले हैंडपंप लगाए गए हैं।
आर्सेनिक का इतिहास
आर्सेनिक सल्फाइड का पता काफी पहले लग चुका था। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में इसका वर्णन किया है। उसमें इस अयस्क का नाम हरिताल है। प्राचीन काल में इसका उपयोग हस्तलिखित पुस्तकों के अशुद्ध लेख को मिटाने के लिए किया जाता था। यूनानियों ने आर्सेनिक सल्फाइड का अध्ययन ईस्वी से चैथी शताब्दी पूर्व किया था। इसी क्रम में 13 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध कार्यकर्ता ऐलबर्टस मैग्नस ने सल्फाइड अयस्क को साबुन के साथ गर्म करके एक धातु से मिलता-जुलता पदार्थ बनाया। सन 1733 ई स्वीडन देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिक वर्जीलियस ने इसका परमाणु भार निकाला।
रसायन विज्ञान के आइने से
आर्सेनिक रसायन की आवर्त सारणी का पंचम मुख्य समूह का एक तत्व है। इसकी स्थिति फाॅसफोरस के नीचे तथा एंटीमनी के उपर है। आर्सेनिक में अधातु के गुण अधिक और धातु के कम गुण विद्यमान हैं। इस धातु की उपधातु -मेटालाॅयड- की श्रेणी में रखा जाता है। आर्सेनिक से नीचे एंटीमनी में धातु के गुण अधिक हैं तथा उससे नीचे बिस्मथ पूर्ण रूपेण धातु है।
आर्सेनिक का संकेत -एएस
परमाणु क्रमांक  -33
परमाणु भार  -74 ़96
आयन का अर्द्धव्यास -0 ़69 गुणे 10 ई - 8 सेमी
गलनांक   -820 डिग्री सेंटीग्रेड --36 वायुमंडल दाब पर--
विद्युत प्रतिरोधकता -3 ़5 गुणे 10 ई-5 --ओहम सेमी--20 डिग्री सेंटीग्रेड पर
मौजूदगी
यौगिक अवस्था में आर्सेनिक धरती पर अनेक जगहों पर पाया जाता है। ज्वालामुखी के वाष्पों में, समुद्र तथा अनेक खनिजीय जलों में यह मिश्रित रहता है। आर्सेनिक का मुख्य अयस्क आक्साइड और सल्फाइड है। कहीं-कहीं यह तत्व अन्य धातुओं के साथ यौगिक के रूप में मिलता है। मुख्यतः सिल्वर, एंटीमनी, ताम्र, लौह और कोबाल्ट के साथ आर्सेनिक यौगिक बनाता है।
आर्सेनिक के ये हैं गुणधर्म
साधारण ताप पर आर्सेनिक के दो भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। एक धूसर रंग का और दूसरा पीला आर्सेनिक। धूसर रंग का आर्सेनिक अपारदर्शी है। इसके मणिभ षटकोणीय, कठोर, भंगुर और धातु की चमक लिए होते हैं। इसका आपेक्षिक घनत्व 5.7 है। यह आर्सेनिक तत्व का स्थाई रूप है। वहीं पीला आर्सेनिक पारदर्शी होता है। इसके मणिभ घनाकार तथा नम्र होते हैं। इसका आपेक्षिक घनत्व 2.0 है। यह अस्थाई अपर रूप है। कार्बन टविसल्फाइड में आर्सेनिक विलयन से पीला आर्सेनिक मणिभिकृृत किया जाता है। पीले अपर रूप को गर्म करने या प्रकाश में रखने से वह धूसर रूप में परिवर्तित हो जाता है।
जिंदगी भी देता आर्सेनिक
आम तौर पर आर्सेनिक के यौगिक विषैले होते हैं। वे शरीर की कोशिकाओं में पक्षाघात --पैरालिसिस-- पैदा करते हैं। अंतडियों और उत्तकों को हानि पहुंचाते हैं। आर्सेनिक खाने पर सिरदर्द, चक्कर, वमन आदि लक्षण पैदा होते हैं। हालांकि इसके अनेक कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिक रक्ताल्पता, तंत्रिका व्याधि, गठिया, मलेरिया, प्रमेह तथा अन्य रोगों के इलाज में होता है।
अन्य कार्यों में आर्सेनिक का उपयोग
आर्सेनिक आक्साइड आर्सेनिक का सबसे उपयोगी यौगिक है। यह तांबे, सीसे तथा अन्य धातुओं के अयस्क से सहजता से निकाला जाता है। आर्सेनिक आक्साइड अन्य आर्सेनिक यौगिकों के निर्माण में काम आता है। इसका उपयोग कांच बनाने तथा चमडे की वस्तुओं को सुरक्षित करने में होता है। सीसे में एक प्रतिशत आर्सेनिक डालने से उसकी पुष्टता बढ जाती है।
ये जिले हैं आर्सेनिक की जद में
यूपी के कुल 20 जिले आर्सेनिक की जद में हैं। आर्सेनिक से सर्वाधिक प्रभावित जिलों में बलिया और लखीमपुर हैं। इसके अलावा चंदौली, गोरखपुर, गाजीपुर, सिदार्थनगर, बस्ती, बहराइच, उन्नाव, बलरामपुर, मुरादाबाद, संत कबीरनगर, बरेली में भी आर्सेनिक की मात्रा मानक से अधिक पाई गई है। वहीं संत रविदासनगर के कुछ इलाके, मिर्जापुर, गोंडा, रायबरेली, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ आंशिक रूप से आर्सेनिक से प्रभावित हैं।