श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Wednesday, July 27, 2011

बस 19 साल की जिंदगी

संकट में मोक्षदायिनी का जीवन
प्रदूषित होती गंगा से भावनात्मक आस्था पर चोट
नदी के जल में घटती आक्सीजन की मात्रा चिंतनीय
हिमनद के 2030 तक समाप्त होने की उम्मीद
नहीं चेता गया तो बरसाती नदी होकर रह जाएगी गंगा
अनीश कुमार उपाध्याय
भारत की महत्वपूर्ण नदी गंगा । सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी खास। भारतवंशियों की आस्था का पर्याय तो विशाल भूभाग में हरियाली की जीवनदायिनी।नदी किनारे बसने वाले लोगों के पेयजल का स्रोत भी। अब भी यदि नहीं चेता गया तो ये जीवनदायिनी महज एक बरसाती नदी होकर रह जाएगी। कारण कि 2007 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा। वहीं इसमें दिनोंदिन घटती आक्सीजन की मात्रा भी चिंतनीय है।
हरिद्वार स्थित भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड के वैज्ञानिको के अनुसार आज गंगा का जल न पीने लायक और न नहाने के लायक भी नहीं बचा हैं। हरिद्वार में स्थित कंपनिया ,अस्पताल ,होटल आदि अपने यहाँ की सारा का सारा कचरा गंगा में बहा देते हैं। गंगा निकलती तो हैं साफ और स्वच्छ परन्तु सबसे पहले वह हरिद्वार आती हैं और हरिद्वार से ही वह पूरी तरह से दूषित हो जाती हैं। हरिद्वार की दवा कंपनिया खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाईड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देती हैं। इससे इस पवित्र नदी का जल दूषित हो गया हैं। वहीं टिहरी में गंगा को कैद करने तथा दिनोंदिन पर्यावरण में व्याप्त गर्मी से हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। लिहाजा एक अनुमान के मुताबिक गंगा केवल 19 साल की और मेहमान है।
2510 किमी की दूरी तय करती है नदी
भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है गंगा । ये भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2510 किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भूभाग को सींचती है। देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन-जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है । वर्ष 2071 किमी तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है।
मां के रूप में पूजनीय गंगा
सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मीटर) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है। इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं।
आर्थिक उन्नति में भी देती योगदान
इस नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं। साथ ही मीठे पानी वाले दुर्लभ  डालफिन भी पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है । वहीं अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित जरूरतों को पूरा करती हैं। लिहाजा ये नदी भारत के आर्थिक उन्नति में भी योगदान देती है।
फिर भी नहीं थम रहा प्रदूषण
गंगा की इस असीमित शुद्धिकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में भारत सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।
उद्गम स्थल से ही प्रदूषित होती गंगा
वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा का प्रदूषित होना उसके उदगम स्थान से ही शुरू हो जाती हैं। पर्यटक, तीर्थ यात्रा से होने वाली गंदगी से गंगा दूषित हो रही हैं। बड़े -बड़े कारखानों ,कंपनियो, अस्पतालों से निकलने वाली दूषित पदार्थो से पवित्र नदी दूषित हो रही हैं।  धरमशालाओं, अतिथि गृहो, होटलों आदि के मल-मूत्र सब गंगा में ही गिराए जा रहे हैं। इसके कारण इसका जल दूषित होता जा रहा हैं।
एक अरब डॉलर का ऋण मंजूर
विश्व बैंक ने गंगा नदी की सफाई और स्वच्छता के लिए एक अरब डालर का ऋण मंजूर किया है। विश्व बैंक ने एक बयान जारी कर कहा कि इस सहयोग राशि का एक बड़ा हिस्सा सतत ढंग से गंगा में प्रदूषण घटाने के उपायों में निवेश किया जाएगा। इसके तहत जल संग्रह एवं शोधन, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, कूड़ा प्रबंधन एवं मुहाने पर प्रबंधन शामिल है। बैंक ने कहा उसके राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना से गंगा को स्वच्छ करने एवं संरक्षण कार्यक्रम के प्रबंधन में नए परिचालन संस्थानों की क्षमता के निर्माण में मदद मिलेगी। 2009 में केंद्र ने गंगा नदी को स्वच्छ करने के लिए राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण गठन किया था।
गंगा सफाई में होंगी तमाम चुनौतियां
तेजी से बढ़ रही आबादी, नगरीकरण और औद्योगिक विकास गंगा के समक्ष मुख्य चुनौती हैं। राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी परियोजना (एनजीआरबीए) विश्व बैंक की सहायता से लागू की जा रही है। यह परियोजना केंद्र और राज्य के   स्तर पर एनजीआरबीए से संबंधित संस्थाओं के निर्माण और उसके सुदृढ़ीकरण पर ध्यान केंद्रित करेगा। विश्वस्तरीय गंगा ज्ञान केंद्र की स्थापना, नदी घाटी प्रबंधन को मजबूत बनाना और प्रदूषण घटाने के लिए चुनिंदा निवेशों को धन मुहैया कराना इसका उद्देश्य होगा। औद्योगिक प्रदूषण, ठोस कचरा प्रबंधन और नदीमुख प्रबंधन, आवश्यक सीवेज निस्तारण आदि समस्याओं का भी समाधान ढूंढा जाएगा।
जल शुद्ध करते बैक्टीरियोफेज विषाणु
 गंगा नदी विश्वभर में अपनी शुद्धिकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धिकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं। ये जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते। नदी के जल में प्राणवायु (आक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है।
अब टूट रहा तिलिस्म
माना जाता है कि नदी के जल के सेवन से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। इससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है। वहीं अब इसका तिलिस्म टूटने लगा है। कारण कि गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है।
लगातार घट रही आक्सीजन की मात्रा
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार गंगा नदी में आक्सीजन की मात्रा लगातार घटती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1986 में घुलित आॅक्सीजन की मात्रा 8 .4 मिलीग्राम प्रति लीटर थी ,जो 2010 में घटकर 6 .13 मिलीग्राम प्रति लीटर पर पहुँच गई हैं। नदी से डॉल्फिन की संख्या भी घटती जा रही हैं। डाल्फिन यह बताती हैं कि नदी कितना स्वच्छ हैं अर्थात यह नदी के स्वच्छता का प्रतीक हैं। डॉल्फिन का शरीर कई ऐसे खतरनाक रसायनों का जानकारी सहज उपलब्ध करता हैं जो पानी के नमूने में नहीं मिलता। बोर्ड के अनुसार नदी में कौलिफोर्म बैक्टीरिया की संख्या लगातार खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं।
प्लास्टिक ने भी काफी किया नुकसान
औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल आक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ ०0 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य।
गंगा का पराभव मतलब सभ्यता का अंत
गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अन्त। गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है। शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए कानून बने हैं। इसी क्रम में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित कर दिया गया है और गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना लागू की गई हैं। हांलांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं। जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा।
गंगा बचाने की पहल
गंगा नदी को बचाने की अपील लेकर बीजेपी नेता उमा भारती, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलीं। उमा को सोनिया गांधी ने आश्वासन दिया है कि गंगा नदी के बारे में वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से बात करेंगी। सरकार ने गंगा की देख -रेख के लिए एक समिति का गठन किया हैं जो एक स्वागत योग्य कदम हैं। सरकार ने जून 1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत तो बड़े जोर- शोर से की लेकिन यह प्लान अपनी गंतव्य तक नहीं पहुँच सका। महंत निगमानंद ने तो काफी प्रयास किये और एकबारगी लगा कि उनका यह प्रयास जरुर रंग लायेगा । हालांकि इस पर उनकी मौत ने बहुत से सवाल खड़े कर दिया हैं। सरकार की नींद उनकी मौत के बाद खुली तो हैं, लेकिन अब देखना यह हैं की सरकार आस्था का प्रतीक गंगा माँ को बचाने के लिए क्या कदम उठाती हैं?

Sunday, July 17, 2011

दूसरा भगवान, ले रहा जान

-ड्रग ट्रायल के नाम पर जिंदगियों से खिलवाड़ 
-डिग्री होल्डर डॉक्टर्स छीन रहे जिंदगियां
-एमपी में खूब फल-फूल रहा गोरखधंधा
-इंदौर बना ड्रग ट्रॉयल का हब
-दवा कंपनियों ने बड़ी चतुराई से बिछाया जाल
-राज्य के कई चिकित्सक निभा रहे सहभागिता
-रतलाम के विधायक ने विस सत्र में उठाया मुद्दा
-नियमों के विपरीत 1833 बच्चों पर ड्रग ट्रॉयल
-चार बच्चे ड्रग ट्रॉयल का झेल रहे दुष्परिणाम
‘‘सेकेंड गॉड यानी जिंदगी देने वाले चिकित्सक। मौत के मुंह में जाने वाले को भगवान  के बाद अगर कोई बचाता है तो वह नि:संदेह चिकित्सक ही होते हैं। ऐसे में ये जिंदगी देने वाले हाथ ही अगर मौत के सौदागर बन जाए तो स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्य प्रदेश में ये दूसरा भगवान लोगों की जान ले रहा है। चौंकिए मत! ड्रग ट्रॉयल के नाम पर यहां ये चिकित्सक जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहे हैं। डिग्री होल्डर्स इन डॉक्टरों ने नीम-हकीम खतरे जान वाली कहावत को भी झुठला दिया है। नियमों के विपरीत 1833 बच्चों पर ड्रग ट्रॉयल किया गया, जिसमें से चार बच्चे आज भी इसका दुष्परिणाम झेल रहे हैं। रतलाम के विधायक ने विस सत्र में जब यह मुद्दा उठाया है तो ये आवाज दूर तलक जाएगी, ऐसी उम्मीद जगी है।’’
अनीश कुमार उपाध्याय / नई दिल्ली
नीम हकीम खतरे जान ये कहावत तो सभी  ने सुनी है,लेकिन क्या आपने कभी ऐसा देखा है कि बड़े-बड़े डिग्री होल्डर डॉक्टर्स जान-बूझकर लोगो की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ कर रहे हों? मध्य प्रदेश में  ड्रग ट्रायल के नाम पर ऐसा ही गोरखधंधा खूब फल-फूल रहा है। विदेशी दवा कंपनियों ने अपने बाजार को बढ़ाने बड़ी चतुराई से ये जाल बिछाया है। राज्य के कई चिकित्सक इस काम को अंजाम दे रहे हैं। खासतौर पर इंदौर ड्रग ट्रायल का हब बन गया है। विधान सभा  के इस सत्र में रतलाम के विधायक पारस सखलेचा ने जब ये मामला उठाया तो कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए।
धांधली की हो गई हद
सखलेचा के अनुसार इंदौर के चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के प्राध्यापक हेमन्त जैन ने 1833 बच्चों पर नियमों के विपरीत ड्रग ट्रायल किया। वह भी सरवाईकल कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी के लिए। इनमें से चार बच्चे ड्रग ट्रॉयल  के  गंभीर दुष्परिणामों से जूझ रहे हैं। सखलेचा ने बताया कई बच्चे तो ऐसे हैं जिनका जन्म ही 2010 मे हुआ है। वहीं उनका रजिस्ट्रेशन 2007 में ही कर लिया गया। इसे धांधली की हद न कहें तो और क्या कहें? इतना ही नहीं डॉ. हेमन्त जैन अब तक ड्रग ट्रॉयल के नाम पर सरकार का एक करोड़ 70 लाख रुपए डकार चुके हैं। साथ ही इस गोरखधंधे के नाम पर डॉ. जैन कई विदेश यात्राएं भी कर आए वो भी बिना विभागीय अनुमति के।
दोषियो के खिलाफ नहीं हुई कार्रवाई
डॉ. जैन के अलावा और भी कई चिकित्सक इस काम मे लिप्त है। ऐसा नहीं है कि इतना सब कुछ होता रहा ओर सरकार को इसकी भनक नहीं थी। इस मामले की ईओडब्लू और लोकायुक्त की ओर से जांच चल रही है। इसे विडंबना ही कहेंगे की तथाकथित राजनैतिक संरक्षण के चलते दोषियों के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गई। ड्रग ट्रॉयल को लेकर जो नियम है उसके तहत इस काम के लिए मिलने वाली रकम का 10 फीसदी हिस्सा संबंधित अस्पताल को जाता है। वहीं इन चिकित्सकों ने ये भी नहीं दिया। और तो और ड्रग ट्रॉयल से पहले मरीजों को इस बात की जानकारी भी नहीं दी गई और न ही ट्रॉयल के बाद उन्हे कोई मुआवजा दिया गया।
मुफ्त दवा की चाहत बनाती लाचार
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालो मे हजारों मरीजों पर एक चिकित्सक हैं। दूसरा सरकारी अस्पतालों मे मफ्त दवा मिलने की बात बेमानी सी है। लिहाजा ज्यादातर मरीजों को दवाएं बाहर से ही खरीदना पड़ती है। ऐसे मे कुछ मजलूम और लाचार मरीज मुफ्त दवा के लालच में उन चिकित्सको के चंगुल मे फंस जाते हैं, जो उन्हे अपनी परीक्षण और अध्ययन योजना का हिस्सा बना लेते है। ड्रग ट्रॉयल के लिए जिन दस्तावेजों पर मरीज और उसके परिजनों की अनुमति ली जाती है, वो सारे अंग्रेजी मे होते है। मरीज डॉक्टर को भगवान समझकर उन पर दस्तखत कर देता है। बस यहीं से वो चूहे, खरगोश और गिनी पिग की तरह दवा परीक्षण का विषय बन जाता है।
कब कसेगा दोषियों पर शिकंजा
पैसों के लालच मे इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ करने वाले चिकित्सकों पर सरकार क्या एक्शन लेगी। इस बारे में स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने बताया कि ड्रग ट्रायल संबंधी जो भी गड़बड़ियां सामने आई है उसकी जांच का जिम्मा भोपाल  स्थित गाँधी मेडिकल कॉलेज के डीन को सौंपा जाएगा। इस मुददे पर सरकार गंभीर  है। हम दोषियो के खिलाफ कार्यवाही करेंगे। सरकार कब कार्यवाही करेगी और कब दोषियो पर शिकंजा कसेगा आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन उन भुक्तभोगी मरीजों का क्या जो अपनी लाचारी और मजबूरी के चलते ड्रग ट्रायल के नाम पर चंद लालची चिकित्सको का शिकार बन चुके है।

इनसेट...
छीनते रहे धन और जन
सूत्रों के मुताबिक मध्य प्रदेश मे जिन चिकित्सको ने मरीजो पर ड्रग ट्रायल किए है उनमें डॉ. अनिल भरानी ने वर्ष 2006 से वर्ष 2010 तक 400 मरीजों पर ड्रग ट्रॉयल किया और एक करोड़ 53 लाख रूपये वसूले। ट्रॉयल के दौरान 30   मरीजों की मौत हो गई। डॉ. सलिल भार्गव  ने 2006 से 2010 तक 300 मरीजों पर ड्रग ट्रॉयल किया और एक करोड़ पांच लाख रूपये डकारे। ड्रग ट्रायल के दौरान 18 मरीज काल के गाल मे समा गए। डॉ.अपूर्व पौराणिक ने भी इन्ही वर्षो के दौरान 40 मरीजों पर ट्रॉयल किया। इनमें से आठ की मौत हो गई। इन्होंने भी तकरीबन 26 लाख रूपये का चूना लगाया। डॉ.पुष्पा वर्मा ने 32 मरीजों पर ड्रग ट्रॉयल किया और आठ लाख रूपये कमाए। ये सभी चिकित्सक इंदौर के  एम वाय अस्पताल के हैं। इन्होने इंसानां को गिनी पिग समझकर मनचाहे ढ़ंग से उन पर ड्रग ट्रायल किया और उनकी जिंदगी खतरे मे डाली।

संकट में ‘जीवनदायिनी’ का जीवन

प्रदूषित होती गंगा से भावनात्मक आस्था पर चोट
नदी के जल में घटती आक्सीजन की मात्रा चिंतनीय
अनीश कुमार उपाध्याय
भारत की महत्वपूर्ण नदी गंगा । सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी खास। भारतवंशियों की आस्था का पर्याय तो विशाल भूभाग में हरियाली की जीवनदायिनी।नदी किनारे बसने वाले लोगों के पेयजल का स्रोत भी । अब भी यदि नहीं चेता गया तो ये जीवनदायिनी महज एक बरसाती नदी होकर रह जाएगी। कारण कि 2007 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा। वहीं इसमें दिनोंदिन घटती आक्सीजन की मात्रा भी चिंतनीय है।
2510 किमी की दूरी तय करती है नदी
भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है गंगा । ये भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2510 किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है। देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन-जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है । वर्ष 2071 किमी तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है।
मां के रूप में पूजनीय गंगा
सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मीटर) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है। इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं।
आर्थिक उन्नति में भी देती योगदान
इस नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं। साथ ही मीठे पानी वाले दुर्लभ डालफिन भी पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है । वहीं अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित जरूरतों को पूरा करती हैं। लिहाजा ये नदी भारत के आर्थिक उन्नति में भी योगदान देती है।
फिर भी नहीं थम रहा प्रदूषण
गंगा की इस असीमित शुद्धिकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में भारत सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।
उद्गम स्थल से ही प्रदूषित होती गंगा
वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा का प्रदूषित होना उसके उदगम स्थान से ही शुरू हो जाती हैं। पर्यटक, तीर्थ यात्रा से होने वाली गंदगी से गंगा दूषित हो रही हैं। बड़े -बड़े कारखानों ,कंपनियो, अस्पतालों से निकलने वाली दूषित पदार्थो से पवित्र नदी दूषित हो रही हैं। धर्मशालाआंे, अतिथि गृहो, होटलों आदि के मल-मूत्र सब गंगा में ही गिराए जा रहे हैं। इसके कारण इसका जल दूषित होता जा रहा हैं।
वैज्ञानिकों ने भी पेयजल अयोग्य दिया करार
हरिद्वार स्थित भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड के वैज्ञानिको के अनुसार आज गंगा का जल न पीने लायक और न नहाने के लायक भी नहीं बचा हैं। हरिद्वार में स्थित कंपनिया ,अस्पताल ,होटल आदि अपने यहाँ की सारा का सारा कचरा गंगा में बहा देते हैं। गंगा निकलती तो हैं साफ और स्वच्छ परन्तु सबसे पहले वह हरिद्वार आती हैं और हरिद्वार से ही वह पूरी तरह से दूषित हो जाती हैं। हरिद्वार की दवा कंपनिया खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाईड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देती हैं। इससे इस पवित्र नदी का जल दूषित हो गया हैं।
एक अरब डालर का ऋण मंजूर
विश्व बैंक ने गंगा नदी की सफाई और स्वच्छता के लिए एक अरब डालर का ऋण मंजूर किया है। विश्व बैंक ने एक बयान जारी कर कहा कि इस सहयोग राशि का एक बड़ा हिस्सा सतत ढंग से गंगा में प्रदूषण घटाने के उपायों में निवेश किया जाएगा। इसके तहत जल संग्रह एवं शोधन, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, कूड़ा प्रबंधन एवं मुहाने पर प्रबंधन शामिल है। बैंक ने कहा उसके राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना से गंगा को स्वच्छ करने एवं संरक्षण कार्यक्रम के प्रबंधन में नए परिचालन संस्थानों की क्षमता के निर्माण में मदद मिलेगी। 2009 में केंद्र ने गंगा नदी को स्वच्छ करने के लिए राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण गठन किया था।
गंगा सफाई में होंगी तमाम चुनौतियां
तेजी से बढ़ रही आबादी, नगरीकरण और औद्योगिक विकास गंगा के समक्ष मुख्य चुनौती हैं। राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी परियोजना (एनजीआरबीए) विश्व बैंक की सहायता से लागू की जा रही है। यह परियोजना केंद्र और राज्य के स्तर पर एनजीआरबीए से संबंधित संस्थाओं के निर्माण और उसके सुदृढ़ीकरण पर ध्यान केंद्रित करेगा। विश्वस्तरीय गंगा ज्ञान केंद्र की स्थापना, नदी घाटी प्रबंधन को मजबूत बनाना और प्रदूषण घटाने के लिए चुनिंदा निवेशों को धन मुहैया कराना इसका उद्देश्य होगा। औद्योगिक प्रदूषण, ठोस कचरा प्रबंधन और नदीमुख प्रबंधन, आवश्यक सीवेज निस्तारण आदि समस्याओं का भी समाधान ढूंढा जाएगा।
जल शुद्ध करते बैक्टीरियोफेज विषाणु
गंगा नदी विश्वभर में अपनी शुद्धिकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धिकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं। ये जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते। नदी के जल में प्राणवायु (आॅक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है।
अब टूट रहा तिलिस्म
माना जाता है कि नदी के जल के सेवन से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। इससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है। वहीं अब इसका तिलिस्म टूटने लगा है। कारण कि गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है।
लगातार घट रही आॅक्सीजन की मात्रा
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार गंगा नदी में आॅक्सीजन की मात्रा लगातार घटती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1986 में घुलित आॅक्सीजन की मात्रा 8 .4 मिलीग्राम प्रति लीटर थी ,जो 2010 में घटकर 6 .13 मिलीग्राम प्रति लीटर पर पहुँच गई हैं। नदी से डाॅल्फिन की संख्या भी घटती जा रही हैं। डाल्फिन यह बताती हैं कि नदी कितना स्वच्छ हैं अर्थात यह नदी के स्वच्छता का प्रतीक हैं। डाॅल्फिन का शरीर कई ऐसे खतरनाक रसायनों का जानकारी सहज उपलब्ध करता हैं जो पानी के नमूने में नहीं मिलता। बोर्ड के अनुसार नदी में कौलिफोर्म बैक्टीरिया की संख्या लगातार खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं।
प्लास्टिक ने भी काफी किया नुकसान
औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल आॅक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ ०0 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य।
गंगा का पराभव मतलब सभ्यता का अंत
गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अन्त। गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घडि़यालों की मदद ली जा रही है। शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए कानून बने हैं। इसी क्रम में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित कर दिया गया है और गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना लागू की गई हैं। हांलांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं।
जागरूकता के बावजूद खतरा बरकरार
जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा।
गंगा बचाने की बीजेपी की पहल
गंगा नदी को बचाने की अपील लेकर बीजेपी नेता उमा भारती, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलीं। उमा को सोनिया गांधी ने आश्वासन दिया है कि गंगा नदी के बारे में वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से बात करेंगी।
अब जाग गई है सरकार
सरकार ने गंगा की देख -रेख के लिए एक समिति का गठन किया हैं जो एक स्वागत योग्य कदम हैं। सरकार ने जून 1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत तो बड़े जोर- शोर से की लेकिन यह प्लान अपनी गंतव्य तक नहीं पहुँच सका। महंत निगमानंद ने तो काफी प्रयास किये और एकबारगी लगा कि उनका यह प्रयास जरुर रंग लायेगा । हालांकि इस पर उनकी मौत ने बहुत से सवाल खड़े कर दिया हैं। सरकार की नींद उनकी मौत के बाद खुली तो हैं, लेकिन अब देखना यह हैं की सरकार आस्था का प्रतीक गंगा माँ को बचाने के लिए क्या कदम उठती हैं?