उभरे दो महानायक, एक सफल, दूसरा विफल
सादगी, फकीरी और कमजोर नेटवर्क के बावजूद अन्ना सफल
करोड़ों अनुयायियों, जबर्दस्त नेटवर्क के बावजूद रामदेव विफल
अन्ना सीधे चल पाया मुकाम, बाबा ने शार्टकट से पाया भटकाव
दोनों ही अपने अनशन को लेकर बन गए जनमानस के हीरो
अन्ना के पास सब्र की ताकत, रणछोड़ हो चुके बाबा रामदेव
नीति और नीयत को लेकर दोनों में खड़ा हो गया अंतर

‘‘अन्ना अपनी सादगी, फकीरी और कमजोर नेटवर्क के बावजूद जनता के दिलों में जगह बना गए, जबकि बाबा रामदेव अपने योग, भव्यता, करोड़ों अनुयायियों, बेहिसाब संसाधनों और जबर्दस्त नेटवर्क के बावजूद विफल रहे। मामला करिश्माई व्यक्तित्व और दूरदर्शी नजरिए का है। ये राजनीति एक भूल भूलैया है। इसमें अन्ना सीधे चले और जनता के दिलों में जगह पा लिया। बाबा रामदेव ने शार्टकट अपनाया और आधे रास्ते में ही अटक गए।’’
अनीश कुमार उपाध्याय
सादगी, फकीरी और कमजोर नेटवर्क के बावजूद अन्ना सफल
करोड़ों अनुयायियों, जबर्दस्त नेटवर्क के बावजूद रामदेव विफल
अन्ना सीधे चल पाया मुकाम, बाबा ने शार्टकट से पाया भटकाव
दोनों ही अपने अनशन को लेकर बन गए जनमानस के हीरो
अन्ना के पास सब्र की ताकत, रणछोड़ हो चुके बाबा रामदेव
नीति और नीयत को लेकर दोनों में खड़ा हो गया अंतर

‘‘अन्ना अपनी सादगी, फकीरी और कमजोर नेटवर्क के बावजूद जनता के दिलों में जगह बना गए, जबकि बाबा रामदेव अपने योग, भव्यता, करोड़ों अनुयायियों, बेहिसाब संसाधनों और जबर्दस्त नेटवर्क के बावजूद विफल रहे। मामला करिश्माई व्यक्तित्व और दूरदर्शी नजरिए का है। ये राजनीति एक भूल भूलैया है। इसमें अन्ना सीधे चले और जनता के दिलों में जगह पा लिया। बाबा रामदेव ने शार्टकट अपनाया और आधे रास्ते में ही अटक गए।’’अनीश कुमार उपाध्याय
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में पिछले कुछ माह में दो चेहरे उभर कर सामने आए। योग गुरु बाबा रामदेव और दूसरे अन्ना हजारे। जनता भी अनशन और आंदोलनों की राजनीति से रुबरू हुई। दोनों ही अपने अनशन को लेकर जनमानस के हीरो बन बैठे। इन आंदोलनों में भीड़ भी खूब उमड़ी। जहां अन्ना हजारे का अनशन लोकपाल बिल को लेकर था, वहीं बाबा रामदेव का काला धन वापसी को लेकर। बुनियादी तौर पर दोनों के व्यक्तित्व ने जनता को आकर्षित किया। अन्ना का आंदोलन और अनशन सफल रहा, जबकि बाबा रामदेव का आंदोलन विवादास्पद साबित हुआ। आखिर इसकी वजह क्या रही...!
दोनों चाहते भ्रष्टाचार का खात्मा
अन्ना और बाबा रामदेव दोनों देश से भ्रष्टाचार का खात्मा चाहते हैं। अन्ना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके लिए उनके पास सब्र की ताकत है। वे बाबा रामदेव की तरह मैदान छोड़कर भागने वालों में नहीं है। अन्ना के खिलाफ भी सरकार ने जुल्म की इंतहा की, लेकिन निडर अन्ना के मकसद को वे ढहा न सकी। अन्ना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। लोकपाल विधेयक में वे तमाम बुराइयों का अंत होता देख रहे हैं। वहीं बाबा रामदेव का आंदोलन केवल विदेशी काला धन को ही वापस लाना है। अन्ना सुलझे, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्ति हैं, जबकि बाबा रामदेव को मीडिया में छाए रहने का चस्का लगा है। वहीं किसी भी काम या अभियान की सफलता में नीति और नीयत दोनों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे द्वारा चलाये जा रहे जन आंदोलन पर सरकार की प्रतिक्रिया को इन दोनों कसौटियों पर कसने का प्रयास होना चाहिए। नीति का अर्थ है नियम। नीयत से अभिप्राय काम करने वाले की मानसिकता से है। नीयत का महत्व नीति से कहीं अधिक है।
शासन की नीयत में खोट
शासन की नीयत भ्रष्टाचार मिटाने की नहीं है। कारण बिल्कुल साफ है कि इसकी चपेट में कांग्रेस के सब बड़े लोग आ रहे हैं। यदि नीयत ठीक हो, तो वर्तमान संविधान में से ही मार्ग निकल सकता है। पर नीयत ठीक न होने के कारण जनता का विश्वास इस सरकार से उठ गया है। लोगों की नजर में यह सरकार खलनायक बन चुकी है, जबकि कांग्रेसी इस आंदोलन को ही गलत कह रहे हैं। आंदोलन को विफल करने के लिए मनमोहन, राहुल, सिब्बल और चिदंबरम आदि साम, दाम, दंड और •ोद जैसा हर हथकंडा अपना रहे हैं। साम अर्थात समझाना-बुझाना, बात करना। दाम अर्थात लालच से विपक्ष को खरीदना। दंड अर्थात शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न तथा भेद अर्थात आंदोलनकारियों में फूट डालना।
साम, दाम, दंड, भेद की अपनाई नीति
साम, दाम, दंड, भेद की दृष्टि से देखें, तो बाबा रामदेव को पहले समझाने का प्रयत्न हुआ। उनसे वार्ता की गई। समझौते का प्रयास हुआ। जब इसमें सफलता नहीं मिली तो जनता और उनके समथर्कों में भ्रम पैदा करने के लिए एक चिट्ठी प्रस्तुत की गई। जब उससे भी काम नहीं बना तो आधी रात में लाठी और आंसू गैस के बल पर जबरन बाबा और उनके समथर्कों को रामलीला मैदान से खदेड़ दिया गया। अन्ना के साथ भी क्रमश: यही हो रहा है। उन्हें भी समझाया और बातचीत में उलझाया गया। दाम देकर भी उनके साथियों को खरीदने का प्रयास अवश्य हुआ होगा, यह आंदोलन की धूल बैठने के बाद ही पता लगेगा। शासन ने सरकारी लोकपाल के दायरे में जानबूझ कर निजी संस्थाओं (एनजीओ) को भी रखा है। जिससे अन्ना समर्थक डर जाएं। इन निजी संस्थाओं का एक बड़ा समूह अन्ना के साथ काम कर रहा है। लिहाजा उनके समर्थक इस प्रावधान का विरोध कर रहे हैं। इससे कितने लोग भयभीत हुए, यह भी समय बताएगा। अन्ना ने स्वयं माना है कि उन्हें मारने के लिए सुपारी दी गई। आंदोलन में फूट डालने और समथर्कों को दिग्भर्मित करने के लिए शासन ने चाल चली। अन्ना का आमरण अनशन अब अनिश्चितकालीन अनशन में बदल गया है।
पहले सत्कार, अब बता रहे भ्रष्टाचारी
हैरानी की बात तो ये कि जिन बाबा रामदेव और अन्ना के आगे शासन के बड़े-बड़े लोग झुककर कालीन बिछाते थे, वे बाबा और अन्ना अब उन्हें भ्रष्टाचारी लग रहे हैं। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को अब 50 तरह की जांच के दायरे में उलझा दिया गया है। इसी प्रकार अन्ना के न्यासों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जांच की तलवार लटका दी है। उनके सैनिक सेवा के रिकार्ड भी खंगाले जा रहे हैं। मकसद सिर्फ यही है कि कहीं कुछ कमजोर पहलू हाथ आ सके। मजे की बात तो ये कि इन्हीं अन्ना हजारे को भारत सरकार ने पद्म सम्मान दिए हैं। ऐसे में यहां प्रश्न उठता है कि यदि अन्ना भ्रष्ट हैं, तो इन्हें पद्म सम्मान क्यों दिया गया? इसका एक अर्थ यह भी है कि पद्म सम्मान देते समय व्यक्ति की पूरी जांच नहीं होती। सवाल यह भी कि यदि अन्ना भ्रष्ट हैं तो उनके नाम की अनुशंसा और उन्हें सम्मानित करने वालों को क्या कहेंगे?
सांसद भी लोकपाल से अनभिज्ञ
पिछले छह महीने से चल रहे प्रकरण से स्पष्ट हो गया है कि भ्रष्टाचार को मिटाने की नीयत न होने के कारण कांग्रेस आंदोलन को दबाने,भटकाने और कमजोर करने की नीति पर चल रही है। यह बात दूसरी है कि अब तक उसे इसमें पूरी सफलता नहीं मिली है। आगे क्या होगा, यह तो समय के गर्भ में है। जहां तक सरकारी और जन लोकपाल विधेयक की बात है, आम आदमी तो दूर, सांसदों तक को इसके बारे में ठीक से पता तक नहीं है। हां, जनता यह जरूर जान गई है कि शासन की नीयत खराब है, वह भ्रष्टाचार को रोकना नहीं चाहती। लिहाजा जनता बिना कुछ जाने अन्ना वाले जन लोकपाल को समर्थन दे रही है। मीडिया और कांग्रेसीजनों ने मनमोहन सिंह की छवि ऐसी बनाई है, मानो वे प्रमाणिकता के अवतार हों। पर अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार को होते देखना क्या अपराध नहीं है ? यदि वे चाहते तो इसे रोक सकते थे। वे देश के संविधान से अधिक मैडम इटली और राहल बाबा के प्रति निष्ठा के कारण चुप रहे। कांग्रेस को भय है कि यदि प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के अधीन रख दिया गया, तो उनकी ओर से अगले संभावित प्रधानमंत्री राहुल बाबा का क्या होगा?
आखिर क्यूं हो रहा अन्ना-अन्ना
जयप्रकाश नारायण और वीपी सिंह के आंदोलन के अनुभव बहुत पुराने नहीं हुए हैं। तब भी सत्ता तो बदली, पर व्यवस्था नहीं। जन आंदोलन से निरंकुश सत्ता को भय अवश्य लगता है।भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे इन आंदोलनों की सफलता वतर्मान समय की बड़ी आवश्यकता है। पुलिस को लगा कि अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर वह दुबारा बाबा रामदेव वाला दृश्य दोहरा देगी। पर ऐसा हुआ नहीं। मीडिया के शौकीन बाबा रामदेव तो राजनीति के चक्कर में पड़कर थोड़ा बहक गए, इसलिए कांग्रेस ने भी ना आव देखा ना ताव। रात के 12 बजे डण्डा चलाकर रामदेव को लेडीज सूट-सलवार पहनने पर मजबूर कर दिया। यहां रामदेव की नीयत में खोट नहीं थी। भावनाओं को समझा जाए तो सब ठीक था। बस भारतीय जनता जरा भावुक है और वह बाबा राम की कॉरपरेट छवि को ही उनकी असलियत मानती है। खैर, अब सवाल है कि हर तरफ जो अन्ना-अन्ना हो रहा है वह आखिर क्यूं हो रहा है?
इमोशनली अटैचमेंट का करिश्मा
आम जनता आज लोकपाल को छोड़कर अन्ना हजारे के नाम पर सड़कों पर जुट रही है। फेसबुक, ट्विटर पर युवा स्पोर्ट अन्ना के नारे लगा रहे है। पर क्या यही युवा लोकपाल बिल के बारें में पूरी सच्चाई जानते हैं। भारत में एक चीज बडी देखने लायक होती है। अगर हम किसी को इमोशनली अटैच कर लें तो उससे कोई भी गलत या सही काम करवा सकते हैं। अन्ना हजारे के साथ भी आज की युवा पीढ़ी भावनात्मक तौर से जुड़ गई है। यही वजह है कि जो अन्ना हजारे कह रहे हैं, वही आम जनता कर रही है। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि अन्ना गलत हैं या उनका आंदोलन गलत है। देश में भ्रष्टाचार है और आम आदमी इससे पीड़ित भी है। सारी उम्र भी बीन बजाई जाय तो भी भ्रष्टाचार नहीं मिटाया जा सकता। ये एक प्रकार से बेतहाशा धन-संपत्ति का खेल है। भला अपने पैरों पर कुल्हाड़ी कौन मारेगा।
भ्रष्टाचार से त्रस्त है जनता
अन्ना हजारे के आन्दोलन को लेकर एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर व्यापारी, चाय वाला, घर में काम करने वाली सहायिका सभी को ये ज्ञात है कि इस समय देश में कोई बहुत महान नेता देश की गड़बड़ियों को दूर करने के लिए उपवास कर रहा है। सरकार उसको पकड़कर जेल में बंद कर रही है, परन्तु वो अपनी धुन का पक्का है। दिहाड़ी मजदूर या घर में काम करने वाली सहायिका इसलिए क्योंकि उनको भीअपनी बित्ते भर की कमाई से एक हिस्सा रिश्वत के रूप में देना पड़ रहा है। जब उन्होंने अपना बीपीएल कार्ड, पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र बनवाया या फिर उनके बच्चों को भूले भटके कोई आर्थिक सहायता मिलती है, आवास योजना में घर मिलना हो या फिर..कृषकों या अन्य साधन विहीन वर्गों से सम्बद्ध लोग हों, सारी रिश्वत, भ्रष्टाचार की मार से पीड़ित हैं। कभी कभी तो लगता है कि ये जन कल्याणकारी योजनाएं लागू करने के पीछे मूल भावना जनकल्याण की नहीं, रिश्वत, भ्रष्टाचार के नए-नए माध्यम उपलब्ध कराने की रहती है।
भ्रष्टाचार का कोई निदान नहीं
इन तमाम परिस्थितियों को देखकर यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार का कोई निदान नहीं। यह एक विश्वव्यापी परिघटना बन चुकी है। पर जिन देशों के संविधान और प्रशासन की नकल हमने की है उनमें कहीं भ्रष्टाचार ऐसा नहीं है। मामूली टैक्स-चोरी के लिए भी अमेरिका, यूरोप में बड़े-बड़े लोगों को जेल भुगतनी पड़ती है। वहाँ पुलिस के सबसे निचले कांस्टेबल को भी सामान्यत: भ्रष्ट नहीं माना जाता। लिहाजा जो भारतीय दिल्ली में ट्रैफिक आदि नियमों का बेफिक्री से उल्लंघन करते हैं, वही लोग शिकागो या लंदन में ऐसा कदापि नहीं करते। क्योंकि वहाँ ऐसा कर बचा नहीं जा सकता। भारतीय नेताओं के चाल और चरित्र में भी काफी फर्क है। डॉ. लोहिया के लेखन से 1947 के बाद के नेताओं का चरित्र समझा जा सकता है। हमारे नेताओं में लोभ अज्ञान, भय, आलस्य और ढिलाई जैसे कई दुर्गुण थे। इस से नीति-निर्माण और प्रशासन की उत्तरोत्तर दुर्गति हुई।

