श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Friday, August 19, 2011

अन्ना और बाबा रामदेव

उभरे दो महानायक, एक सफल, दूसरा विफल
सादगी, फकीरी और कमजोर नेटवर्क के बावजूद अन्ना सफल
करोड़ों अनुयायियों, जबर्दस्त नेटवर्क के बावजूद रामदेव विफल
अन्ना सीधे चल पाया मुकाम, बाबा ने शार्टकट से पाया भटकाव
दोनों ही अपने अनशन को लेकर बन गए जनमानस के हीरो
अन्ना के पास सब्र की ताकत, रणछोड़ हो चुके बाबा रामदेव
नीति और नीयत को लेकर दोनों में खड़ा हो गया अंतर


‘‘अन्ना अपनी सादगी, फकीरी और कमजोर नेटवर्क के बावजूद जनता के दिलों में जगह बना गए, जबकि बाबा रामदेव अपने योग, भव्यता, करोड़ों अनुयायियों, बेहिसाब संसाधनों और जबर्दस्त नेटवर्क के बावजूद विफल रहे। मामला करिश्माई व्यक्तित्व और दूरदर्शी नजरिए का है। ये राजनीति एक भूल भूलैया है। इसमें अन्ना सीधे चले और जनता के दिलों में जगह पा लिया। बाबा रामदेव ने शार्टकट अपनाया और आधे रास्ते में ही अटक गए।’’
अनीश कुमार उपाध्याय
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में पिछले कुछ माह में दो चेहरे उभर कर सामने आए। योग गुरु बाबा रामदेव और दूसरे अन्ना हजारे। जनता भी अनशन और आंदोलनों की राजनीति से रुबरू हुई। दोनों ही अपने अनशन को लेकर जनमानस के हीरो बन बैठे। इन आंदोलनों में भीड़ भी खूब उमड़ी। जहां अन्ना हजारे का अनशन लोकपाल बिल को लेकर था, वहीं बाबा रामदेव का काला धन वापसी को लेकर। बुनियादी तौर पर दोनों के व्यक्तित्व ने जनता को आकर्षित किया। अन्ना का आंदोलन और अनशन सफल रहा, जबकि बाबा रामदेव का आंदोलन विवादास्पद साबित हुआ। आखिर इसकी वजह क्या रही...!
दोनों चाहते भ्रष्टाचार का खात्मा
अन्ना और बाबा रामदेव दोनों देश से भ्रष्टाचार का खात्मा चाहते हैं। अन्ना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके लिए उनके पास सब्र की ताकत है। वे बाबा रामदेव की तरह मैदान छोड़कर भागने वालों में नहीं है। अन्ना के खिलाफ भी सरकार ने जुल्म की इंतहा की, लेकिन निडर अन्ना के मकसद को वे ढहा न सकी। अन्ना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। लोकपाल विधेयक में वे तमाम बुराइयों का अंत होता देख रहे हैं। वहीं बाबा रामदेव का आंदोलन केवल विदेशी काला धन को ही वापस लाना है। अन्ना सुलझे, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्ति हैं, जबकि बाबा रामदेव को मीडिया में छाए रहने का चस्का लगा है। वहीं किसी भी काम या अभियान की सफलता में नीति और नीयत दोनों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे द्वारा चलाये जा रहे जन आंदोलन पर सरकार की प्रतिक्रिया को इन दोनों कसौटियों पर कसने का प्रयास होना चाहिए। नीति का अर्थ है नियम। नीयत से अभिप्राय काम करने वाले की मानसिकता से है। नीयत का महत्व नीति से कहीं अधिक है।
शासन की नीयत में खोट
शासन की नीयत भ्रष्टाचार मिटाने की नहीं है। कारण बिल्कुल साफ है कि इसकी चपेट में कांग्रेस के सब बड़े लोग आ रहे हैं। यदि नीयत ठीक हो, तो वर्तमान संविधान में से ही मार्ग निकल सकता है। पर नीयत ठीक न होने के कारण जनता का विश्वास इस सरकार से उठ गया है। लोगों की नजर में यह सरकार खलनायक बन चुकी है, जबकि कांग्रेसी इस आंदोलन को ही गलत कह रहे हैं। आंदोलन को विफल करने के लिए मनमोहन, राहुल, सिब्बल और चिदंबरम आदि साम, दाम, दंड और •ोद जैसा हर हथकंडा अपना रहे हैं। साम अर्थात समझाना-बुझाना, बात करना। दाम अर्थात लालच से विपक्ष को खरीदना। दंड अर्थात शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न तथा भेद अर्थात आंदोलनकारियों में फूट डालना।
साम, दाम, दंड, भेद की अपनाई नीति
साम, दाम, दंड, भेद की दृष्टि से देखें, तो बाबा रामदेव को पहले समझाने का प्रयत्न हुआ। उनसे वार्ता की गई। समझौते का प्रयास हुआ। जब इसमें सफलता नहीं मिली तो जनता और उनके समथर्कों में भ्रम पैदा करने के लिए एक चिट्ठी प्रस्तुत की गई। जब उससे भी काम नहीं बना तो आधी रात में लाठी और आंसू गैस के बल पर जबरन बाबा और उनके समथर्कों को रामलीला मैदान से खदेड़ दिया गया। अन्ना के साथ भी क्रमश: यही हो रहा है। उन्हें भी समझाया और बातचीत में उलझाया गया। दाम देकर भी उनके साथियों को खरीदने का प्रयास अवश्य हुआ होगा, यह आंदोलन की धूल बैठने के बाद ही पता लगेगा। शासन ने सरकारी लोकपाल के दायरे में जानबूझ कर निजी संस्थाओं (एनजीओ) को भी रखा है। जिससे अन्ना समर्थक डर जाएं। इन निजी संस्थाओं का एक बड़ा समूह अन्ना के साथ काम कर रहा है। लिहाजा उनके समर्थक इस प्रावधान का विरोध कर रहे हैं। इससे कितने लोग भयभीत हुए, यह भी समय बताएगा। अन्ना ने स्वयं माना है कि उन्हें मारने के लिए सुपारी दी गई। आंदोलन में फूट डालने और समथर्कों को दिग्भर्मित करने के लिए शासन ने चाल चली। अन्ना का आमरण अनशन अब अनिश्चितकालीन अनशन में बदल गया है।
पहले सत्कार, अब बता रहे भ्रष्टाचारी
हैरानी की बात तो ये कि जिन बाबा रामदेव और अन्ना के आगे शासन के बड़े-बड़े लोग झुककर कालीन बिछाते थे, वे बाबा और अन्ना अब उन्हें भ्रष्टाचारी लग रहे हैं। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को अब 50 तरह की जांच के दायरे में उलझा दिया गया है। इसी प्रकार अन्ना के न्यासों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जांच की तलवार लटका दी है। उनके सैनिक सेवा के रिकार्ड भी खंगाले जा रहे हैं। मकसद सिर्फ यही है कि कहीं कुछ कमजोर पहलू हाथ   आ सके। मजे की बात तो ये कि इन्हीं अन्ना हजारे को भारत सरकार ने पद्म सम्मान दिए हैं। ऐसे में यहां प्रश्न उठता है कि यदि अन्ना भ्रष्ट हैं, तो इन्हें पद्म सम्मान क्यों दिया गया? इसका एक अर्थ यह भी है कि पद्म सम्मान देते समय व्यक्ति की पूरी जांच नहीं होती। सवाल यह भी कि यदि अन्ना भ्रष्ट हैं तो उनके नाम की अनुशंसा और उन्हें सम्मानित करने वालों को क्या कहेंगे?
सांसद भी लोकपाल से अनभिज्ञ
पिछले छह महीने से चल रहे प्रकरण से स्पष्ट हो गया है कि भ्रष्टाचार को मिटाने की नीयत न होने के कारण कांग्रेस आंदोलन को दबाने,भटकाने और कमजोर करने की नीति पर चल रही है। यह बात दूसरी है कि अब तक उसे इसमें पूरी सफलता नहीं मिली है। आगे क्या होगा, यह तो समय के गर्भ में है। जहां तक सरकारी और जन लोकपाल विधेयक की बात है, आम आदमी तो दूर, सांसदों तक को इसके बारे में ठीक से पता तक नहीं है। हां, जनता यह जरूर जान गई है कि शासन की नीयत खराब है, वह भ्रष्टाचार को रोकना नहीं चाहती। लिहाजा जनता बिना कुछ जाने अन्ना वाले जन लोकपाल को समर्थन दे रही है। मीडिया और कांग्रेसीजनों ने मनमोहन सिंह की छवि ऐसी बनाई है, मानो वे प्रमाणिकता के अवतार हों। पर अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार को होते देखना क्या अपराध नहीं है ? यदि वे चाहते तो इसे रोक सकते थे। वे देश के संविधान से अधिक मैडम इटली और राहल बाबा के प्रति निष्ठा के कारण चुप रहे। कांग्रेस को भय है कि यदि प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के अधीन रख दिया गया, तो उनकी ओर से अगले संभावित प्रधानमंत्री राहुल बाबा का क्या होगा?
आखिर क्यूं हो रहा अन्ना-अन्ना
जयप्रकाश नारायण और वीपी सिंह के आंदोलन के अनुभव बहुत पुराने नहीं हुए हैं। तब भी सत्ता तो बदली, पर व्यवस्था नहीं। जन आंदोलन से निरंकुश सत्ता को भय अवश्य लगता है।भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे इन आंदोलनों की सफलता वतर्मान समय की बड़ी आवश्यकता है। पुलिस को लगा कि अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर वह दुबारा बाबा रामदेव वाला दृश्य दोहरा देगी। पर ऐसा हुआ नहीं। मीडिया के शौकीन बाबा रामदेव तो राजनीति के चक्कर में पड़कर थोड़ा बहक गए, इसलिए कांग्रेस ने भी ना आव देखा ना ताव। रात के 12 बजे डण्डा चलाकर रामदेव को लेडीज सूट-सलवार पहनने पर मजबूर कर दिया। यहां रामदेव की नीयत में खोट नहीं थी। भावनाओं को समझा जाए तो सब ठीक था। बस भारतीय जनता जरा भावुक है और वह बाबा राम की कॉरपरेट छवि को ही उनकी असलियत मानती है। खैर, अब सवाल है कि हर तरफ जो अन्ना-अन्ना हो रहा है वह आखिर क्यूं हो रहा है?
इमोशनली अटैचमेंट का करिश्मा
आम जनता आज लोकपाल को छोड़कर अन्ना हजारे के नाम पर सड़कों पर जुट रही है। फेसबुक, ट्विटर पर युवा स्पोर्ट अन्ना के नारे लगा रहे है। पर क्या यही युवा लोकपाल बिल के बारें में पूरी सच्चाई जानते हैं। भारत में एक चीज बडी देखने लायक होती है। अगर हम किसी को इमोशनली अटैच कर लें तो उससे कोई भी गलत या सही काम करवा सकते हैं। अन्ना हजारे के साथ भी आज की युवा पीढ़ी भावनात्मक तौर से जुड़ गई है। यही वजह है कि जो अन्ना हजारे कह रहे हैं, वही आम जनता कर रही है। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि अन्ना गलत हैं या उनका आंदोलन गलत है। देश में भ्रष्टाचार है और आम आदमी इससे पीड़ित भी है। सारी उम्र भी बीन बजाई जाय तो भी भ्रष्टाचार नहीं मिटाया जा सकता। ये एक प्रकार से बेतहाशा धन-संपत्ति का खेल है। भला अपने पैरों पर कुल्हाड़ी कौन मारेगा।
भ्रष्टाचार से त्रस्त है जनता
अन्ना हजारे के आन्दोलन को लेकर एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर व्यापारी, चाय वाला, घर में काम करने वाली सहायिका सभी को ये ज्ञात है कि इस समय देश में कोई बहुत महान नेता देश की गड़बड़ियों को दूर करने के लिए उपवास कर रहा है। सरकार उसको पकड़कर जेल में बंद कर रही है, परन्तु वो अपनी धुन का पक्का है। दिहाड़ी मजदूर या घर में काम करने वाली सहायिका इसलिए क्योंकि उनको भीअपनी बित्ते भर की कमाई से एक हिस्सा रिश्वत के रूप में देना पड़ रहा है। जब उन्होंने अपना बीपीएल कार्ड, पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र बनवाया या फिर उनके बच्चों को भूले भटके कोई आर्थिक सहायता मिलती है, आवास योजना में घर मिलना हो या फिर..कृषकों या अन्य साधन विहीन वर्गों से सम्बद्ध लोग हों, सारी रिश्वत, भ्रष्टाचार की मार से पीड़ित हैं। कभी कभी तो लगता है कि ये जन कल्याणकारी योजनाएं लागू करने के पीछे मूल भावना जनकल्याण की नहीं, रिश्वत, भ्रष्टाचार के नए-नए माध्यम उपलब्ध कराने की रहती है।
भ्रष्टाचार का कोई निदान नहीं
इन तमाम परिस्थितियों को देखकर यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार का कोई निदान नहीं। यह एक विश्वव्यापी परिघटना बन चुकी है। पर जिन देशों के संविधान और प्रशासन की नकल हमने की है उनमें कहीं भ्रष्टाचार ऐसा नहीं है। मामूली टैक्स-चोरी के लिए भी अमेरिका, यूरोप में बड़े-बड़े लोगों को जेल भुगतनी पड़ती है। वहाँ पुलिस के सबसे निचले कांस्टेबल को भी सामान्यत: भ्रष्ट नहीं माना जाता। लिहाजा जो भारतीय  दिल्ली में ट्रैफिक आदि नियमों का बेफिक्री से उल्लंघन करते हैं, वही लोग शिकागो या लंदन में ऐसा कदापि नहीं करते। क्योंकि वहाँ ऐसा कर बचा नहीं जा सकता। भारतीय नेताओं के चाल और चरित्र में भी काफी फर्क है। डॉ. लोहिया के लेखन से 1947 के बाद के नेताओं का चरित्र   समझा जा सकता है। हमारे नेताओं में लोभ अज्ञान, भय, आलस्य और ढिलाई जैसे कई दुर्गुण थे। इस से नीति-निर्माण और प्रशासन की उत्तरोत्तर दुर्गति हुई।

Thursday, August 18, 2011

गंगा ने मिटाए ‘गांव’

सड़क पर हजारों की आबादी
गंगौली व रिकनी छपरा का मिटा अस्तित्व
समूचे गांव को समेट ले गई गंगा
सड़क के किनारे एनएच 19 बना सहारा
सपनों के आशियाने पर फिरा गंगा का पानी
गरीबों के पुनर्वास के लिए कोई व्यवस्था नहीं
लाखों खर्च के बाद भी  नहीं रुक सकी तबाही
‘‘बाढ़ से उजड़ना, बसना और फिर बरबाद हो जाना। यूपी के बलिया जिले के नदियों के तटीय क्षेत्रवासियों के लिए मानो यही नियति है। इससे निजात को अब तक अरबों खर्च हुए, फिर भी समस्या जस की तस है। कटान व बाढ़ से दर्जनों गांवों का अस्तित्व मिट गया है। कई गांव अस्तित्व खोने के कगार पर हैं। इन गांवों को कटान से बचाने को विभाग के पास न तो कोई योजना है और न ही कोई खास प्रयास ही हो रहा है। महकमे का ध्यान सिर्फ बंधों की रक्षा तक ही सीमित है। अब तक कितनी धनराशि निरोधक कार्यों में खर्च हुई, इससे विभाग भी अनभिज्ञ  है। कहना गलत न होगा कि अगर निरोधक कार्यों में पारदर्शिता बरती गयी होती तो काशी की ही तरह यहां भी पक्के घाट होते।’’
अनीश कुमार उपाध्याय/देहली
गंगा की विनाशकारी लहरे बलिया जिले में कहर बनकर बरप रही है। हर साल की तरह इस साल भी गंगा ने जिले के दो गांवों गंगौली और रिकनीछपरा गांवों का अस्तित्व मिटा दिया है। समूचे गांव के गंगा के पेटे में समाने के बाद यहां के वाशिंदे एनएच 19 (गाजीपुर-हाजीपुर राष्ट्रीय राजमार्ग) पर शरण लेने के लिए विवश हैं। गंगौली की करीब आठ सौ और रिकनी छपरा की करीब छह सौ की आबादी बारिश और तल्ख धूप झेल रही है। बाढ़ ने इनके आलीशान आशियानों को भी जमींदोज कर इन्हें सड़कों पर ला दिया है। लिहाजा कल तक जिनकी गिनती गांव के सबसे रईश परिवारों में होती थी, वे भी आज बंजारों की तरह सड़क किनारे तंबू व बोरे का पांडाल बनाकर गुजर-बसर करने को विवश हैं।
गंगा का कहर
गंगा अब तक मझौंवा, पचरूखिया, नारायणपुर, गंगापुर, भवन टोला, भगवान टोला, बैजू टोला, लोहा टोला समेत सैकड़ों गांवों का अस्तित्व मिटाने के बाद इस साल गंगौली और रिकनीछपरा गांव का भी आस्तित्व मिटा दिया। हालांकि अभी भी पचरुखिया तक अफरा-तफरी का माहौल है। पीड़ित अपने सामानों को काफी मशक्कत के बावजूद सुरक्षित जगह पर पहुंचाने में असमर्थ हैं। कारण की गांव बाढ़ के पानी से चारो तरफ से घिर गया है। गंगा की लहरें रिकनीछपरा, गंगौली के रिहायशी आवासों को अपने पेटे में ले चुकी है। अति संवेदनशील कटान स्थल पचरुखिया-मझौंवा के स्पर संख्या 17 व 18 पर गंगा की धाराओं का बैक रोलिंग बढ़ती ही जा रही है। क्षेत्र के दजर्नों संपर्क मार्गों पर आवागमन बाधित है। बलिया जनपद के द्वाबा के दयाछपरा से नौरंगा तक नवनिर्मित प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क को नदी की धाराएं निगल चुकी है। ग्रामीणों को शौच के लिए भी नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। वहीं उदई छपरा, प्रसाद छपरा, बुधनचक, पांडेयपुर के आठ गांवों सहित दर्जन भर गांव पानी से पूरी तरह घिर चुके है। वहीं दूबे छपरा में गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा बनवाए गए बंधे में दो जगह से पानी का रिसाव हो रहा है। ग्रामीणों का कहना था कि अगर गीता प्रेस बंधा टूटा तो पांच हजार की आबादी के साथ-साथ इंटर कालेज एवं महाविद्यालय भी तबाह हो जाएगा।
आठ हजार की आबादी घरों में कैद
राष्ट्रीय राजमार्ग 19 पर टेंगरहीं से गायघाट तक बाढ़ का दबाव है। इससे तटवर्ती इलाकों में लोगों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। बाढ़ के पानी के चलते करीब आठ हजार की आबादी घरों में कैद हो चुकी है। गंगा में लगातार उफान के कारण बलिया शहर के नजदीक जमुआं से दुबहर तक बने रिंग बांध पर भी पानी का दबाव बढ़ रहा है। जमुआं के दियारे में हजारों एकड़ में किसानों द्वारा बोई गई सब्जी, मक्का एवं अन्य फसल पानी में पूरी तरह डूबकर नष्ट हो चुके हैं। रामपुरकोड़रहा ग्राम पंचायत मे बिजली के खम्बे पर बाढ़ के पानी का दबाव बढ़ने से सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पूरे गांव की विद्युत आपूर्ति पिछले कई दिनों से रोक दी गई है। वहीं करीब 200 साल पुराना पीपल का वृक्ष व सुदर्शन सिंह,  शंभु सिंह, उदय सिंह, फिरंगी, प्रदीप सिंह, डा. राजन मिश्र, बच्चा मिश्र का घर गंगा नदी में विलीन हो गया है।
मवेशी भी असुरक्षित
गंगा के जल स्तर में वृद्धि से बाढ़पीड़ित अपने समानों तथा मवेशियों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कवायद में जुटे हैं। पांच दर्जन से अधिक लोगों के घरों में बाढ़ का पानी घुस चुका है। बाबू का डेरा, खवासपुर, सिताब दियर, खखन का डेरा, गंगापुर, दोकटी दियारा की तमाम खड़ी फसलें डूब गई है। रामपुर कोड़रहा गांव के बाढ़पीड़ित श्रीचरण यादव, गुरूचरण यादव, बब्बन, सुग्रीव, फुलचंद्र, रमेश, दिनेश, रामराज, अवधेश, जगदेव, रामधनी, सूचित, अवध, छोटकन, विक्रम, अनंत, दुर्गा, सुदर्शन समेत पांच दर्जन से अधिक के आशियाने जलमग्न हो गए हैं। बाढ़ पीड़ित अपने परिवार के सदस्यों एवं मवेशियों आदि को लेकर बीएसटी बंधे पर शरण लेने को मजबूर हैं। बच्चों का स्कूल, व्यापारियों का कारोबार तक ठप है।
करोड़ बहे, फिर भी असुरक्षित
बात अगर बलिया जनपद के दो नदियों गंगा और घाघरा से घिरे द्वाबा की करें तो इस क्षेत्र में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। वहीं इससे कोई फायदा नहीं हुआ और बाढ़ व कटान की स्थिति ज्यों की त्यों बरकरार   है। हर साल बाढ़ से करोड़ों रुपए की हानि होती रही है। बलिया जनपद के मझौंवा को ही लें तो यहां गंगा की कटान को रोकने के लिए अब तक लगभग  50 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। निरोधक कार्यों का निरीक्षण करने के लिए मंत्री से लेकर उच्चाधिकारी तक आए और आवश्यक दिशा-निर्देश देकर चले गए। वहीं परिणाम ढाक के तीन पात वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है।
मुख्यमंत्रियों का आश्वासन भी बेकार
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह तथा वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती ने बाढ़ से विस्थापित हुए लोगों की आवासीय समस्या के समाधान के लिए प्लॉट की व्यवस्था करने का सब्जबाग दिखाया था। वहीं उनके ये आश्वासन भी कोरे ही साबित हुए। इसकी गवाही बाढ़ व कटान में अपना सब कुछ गंवा कर टीएस बंधे पर शरण वाले लोग भी कर रहे हैं, जिनकी जिंदगी खानाबदोशों सरीखी हो गयी है। बच्चे न तो स्कूल जा पाते हैं और न ही बीमार होने पर यहां के लोगों को अपेक्षित स्वास्थ्य सेवाएं ही मिल पाती हैं।
नीचे से बाढ़, ऊपर से बारिश
गंगा की प्रलयंकारी हुई लहरों को आसमान से गिर रहे बरसाती पानी का भी खूब शह मिल रहा है। लिहाजा नदी का जलस्तर तो बढ़ ही रहा है, कटान भी तेज हो चली है। गांवों के जलमग्न होने के साथ ही हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि पर गंगा की लहरें दिख रहीं हैं। घर-बार छोड़कर सड़क किनारे पहुंचे पीड़ित बारिश की वजह से खुले आसमान के तले भींगने को विवश हैं। जिला प्रशासन की ओर से इन गरीबों के लिए अभी तक कोई खास व्यवस्था न किए जाने से गरीब खासतौर पर बुजुर्ग, महिला, बच्चे और बीमार भी बारिश के पानी में रहने के लिए विवश हैं। यहां की दशा देखकर किसी भी कठोर कलेजे वाले का कलेजा मुंह को आ जा रहा है, लेकिन शासन व प्रशासन इनकी सुधि लेना उचित नहीं समझ रहा है।
वर्जन बाक्स...
निरोधक कार्यों में लाएंगे पारदर्शिता
बाढ़ निरोधक कार्यों में सौ फीसदी पारदर्शिता लाने की कोशिश हो रही है। इसमें किसी को भी कुछ कहने का कोई मौका नहीं दिया जाएगा। इस वर्ष बंधे के रखरखाव के लिए एक करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं। इसमें 40 लाख रुपए मिल चुके हैं। इसके अतिरिक्त तुर्तीपार परियोजना में 10.11 करोड़ रुपए स्वीकृत हैं। इसमें भी अब तक सात करोड़ रुपए मिल चुके हैं।
आरपी तिवारी
अधिशासी अभियंता
सिंचाई  विभाग (बाढ़ प्रखंड), बलिया

वर्जन बाक्स...
बाढ़ से निपटने को प्रशासन मुस्तैद
बाढ़ से निपटने के लिए प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। इसके लिए बचाव दल के साथ ही तमाम बाढ़ चौकियों को भी एलर्ट कर दिया गया है। कहीं भी बाढ़ के पानी के रिसाव की सूचना मिलते ही तत्काल उस पर कार्रवाई की जा रही है। मातहतों को भी बचाव व राहत कार्य के लिए सख्त निर्देश दिए गए हैं। बाढ़ पीड़ितों को भी राहत पहुंचाने की भरसक कोशिश की जाती है। वहीं कई मामले प्रदेश स्तर से जुड़े होने के कारण वे इस पर कुछ नहीं कह सकते।
मधुकर द्विवेदी
जिलाधिकारी, बलिया।

Monday, August 15, 2011

आजादी का पहला शहीद


-सेना से दूर मंगल पाण्डेय के वंशज
-भ्रष्टाचार के चलते हक तलाश रहे वंशज
-दमखम के बावजूद नहीं बन पा रहे सैनिक
-कई बार प्रयास के बावजूद मिली असफलता
-मंगल को लेकर उठे कई बार विवाद

‘‘जिन्होंने भारत को आजाद कराने के लिए ब्रितानी हुकूमत का डटकर मुकाबला किया। जिन्होंने अपने परिवार की चिंता किए बगैर अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम सहे। जिन्होंने भारत  की आजादी के लिए अपनी पहली शहादत दी। आज अगर वे जिंदा होते तो नि:संदेह आजाद भारत में उनका शीश शर्म से झुक जाता। आजादी की जंग के पहले शहीद मंगल पाण्डेय के वंशजों के लिए इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी कि जिस सैनिक ने भारत  की आजादी के लिए जंग का पहला शंखनाद किया, आज उनके वंशज उसी सेना से दूर हैं। मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र सेना में भर्ती होने का दमखम तो रखते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते उनकी इस हसरत पर पानी फिर चुका है। प्रस्तुत है मंगल पाण्डेय के परिवार की ऐसी ही दर्द-ए-दास्तां व मंगल पाण्डेय की अनछुए पहलुओं को पेश करती एक रिपोर्ट...’’
आजादी की जंग का वह पहला शहीद, जिसने ब्रितानी बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को आजाद कराने के लिए अपनी आहुति दे दी, उसके वंशज आज सेना से दूर हैं। ऐसा नहीं है कि अमर शहीद मंगल पाण्डेय के वंशज सेना में जाना नहीं चाहते। इस परिवार के युवाओं में सेना में जाने की छटपटाहट तो है, लेकिन भ्रष्टाचार के चरम ने उनकी इन हसरतों पर पानी फेर दिया है। इतना ही नहीं, मंगल पाण्डेय के नाम पर बना स्मारक भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ा है। घर की दशा दयनीय है। टूटे-फूटे आवास में जिंदगी गुजार रहे मंगल के वंशजों को आज भी किसी रहनुमा की तलाश है।
बलिया से लौटकर अनीश कुमार उपाध्याय
कौन हैं मंगल पांडेय के वंशज
मंगल पांडेय का पैत्रिक गाँव नगवा
 (बलिया) स्थित घर, जहाँ आज भी
उनके वंशज रहते हैं।
आम तौर पर ये तो सभी जानते हैं कि आजादी की जंग में सेना में रहकर विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बलिया जिले के नगवां गांव निवासी सुदिष्ट पाण्डेय के पुत्र अमर शहीद मंगल पाण्डेय अविवाहित थे। लेकिन उनके दो सगे भाई थे। बड़े भाई नरेंद्र पाण्डेय व छोटे भाई ललित पाण्डेय। ललित पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: महावीर पाण्डेय व महादेव पाण्डेय हुए। महावीर पाण्डेय के एकमात्र पुत्र थे बरमेश्वर पाण्डेय। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में मंगल पाण्डेय से प्रेरित बरमेश्वर भी आजीवन अविवाहित रहते हुए अपना जीवन देश के नाम उत्सर्ग कर दिया। वहीं महादेव पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: महेश पाण्डेय व सुरेश पाण्डेय। सुरेश पाण्डेय के चार पुत्र क्रमश: विजय कुमार पाण्डेय, अजय कुमार पाण्डेय, नरेंद्र कुमार पाण्डेय और अनिल कुमार पाण्डेय। इनमें नरेंद्र पाण्डेय सेना में रहे और 17 वर्ष 20 दिन की सेवा के उपरांत पहली मार्च 2001 को सेवानिवृत्त हो गए। वहीं महेश पाण्डेय के इकलौते पुत्र रघुनाथ पाण्डेय इन दिनों केंद्रीय विद्यालय नैनीताल के प्रधानाचार्य पद पर हैं। इसके साथ ही इनका पूरा कुनबा नैनीताल में ही बस गया है। बलिया जिले के नगवां गांव में अब रहते हैं मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र विजय कुमार पाण्डेय व अजय कुमार पाण्डेय। विजय 58 साल के बुजुर्ग हैं। इनके दो पुत्र क्रमश: अरविंद कुमार पाण्डेय (30) व विपिन कुमार पाण्डेय (24) हैं। अजय 50 साल के हैं और इनके दो पुत्र क्रमश अनूप (20) व अनुज (18) हैं। अनूप बीफार्मा तो अनुज पालिटेक्निक कर बेरोजगारी की दशा में उत्तरांचल के उधमसिंह नगर में खेती कर रहे हैं। वहीं नरेंद्र पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: शशांक (20) जो बलिया स्थित सतीश चंद्र कॉलेज से बीए फाइनल कर रहे हैं तो दूसरे सौरभ  पाण्डेय (13) महर्षि वाल्मिकी बाल विद्यालय काजीपुरा में पढ़ रहे हैं।
सेना के लिए किसने किया कितना प्रयास
मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र (वर्तमान में बुजुर्ग हो चुके)विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि उन्होंने भी सेना में जाने की काफी कोशिश की, लेकिन हर बार छांट दिए गए। इतना ही नहीं मेरे पुत्र अरविंद कुमार पाण्डेय का पुलिस में एसआई के लिए फिजिकली चयन होने के बाद भी लिखित परीक्षा में छांट दिया गया। अजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि वे उधम सिंह नगर में पुलिस भर्ती  के लिए गए थे, लेकिन उनका चयन नहीं हुआ। खास यह कि सभी ने खुद को मंगल पाण्डेय का वंशज बताते हुए छूट की भी वकालत की, लेकिन अधिकारियों ने कोई तवज्जो नहीं दिया। परिजनों ने आरोप लगाया कि सेना में जाने के लिए भी इस परिवार के कई युवा कतार में लगे, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते उन्हें सेना में भर्ती नहीं किया गया। अनिल कुमार पाण्डेय ने बताया कि वे भी सेना में भर्ती होने के लिए कई बार बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत हुए, लेकिन उन्हें सेना में नहीं लिया गया। उन्होंने बेबाक आरोप मढ़ा कि खुद सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उनसे धन की मांग की, जिस पर उन्होंने खुद को मंगल पाण्डेय का वंशज बताते हुए  इसे देने से इंकार किया तो उसका कहना था कि तमगा लेकर घूमते फिरो, सेना में नहीं जाओगे। हास्यास्पद बताया कि सेना ने उन्हें मेडिकली अनफिट करार दिया, जबकि वे पूर्ण रूप से स्वस्थ थे और आज भी हैं।
इतिहास के आइने में मंगल पाण्डेय
मंगल पाण्डेय का जन्म 19 जुलाई 1827 को तत्कालीन गाजीपुर जनपद के बलिया तहसील अंतर्गत नगवां गांव के टोला बंधुचक में सुदिष्ट  पाण्डेय व जानकी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। वे तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के 19 वीं नेटिव इंफेंटरी रेजीमेंट के सिपाही थे। 1857 में भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में विद्रोह शुरू करने का श्रेय बलिया के नगवा गांव निवासी  मंगल पाण्डेय को ही है। कारतूस में गाय व सूअर की चर्बी को लेकर 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डेय का क्रोध भड़क उठा। उसने परेड ग्राउंड में ही अपने साथियों को विद्रोह के लिए ललकार लगाई। अंग्रेज सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने जब मंगल को गिरफ्तार करने का हुक्म सैनिकों को दिया तो कोई भी सैनिक आगे नहीं बढ़ा। वहीं मंगल ने ह्यूसन को गोली मारकर वहीं पर ढेर कर दिया। इसके बाद सामने आए लेफ्टिनेंट बॉब को भी मंगल ने गोली से उड़ा दिया। इस दौरान जब मंगल अपनी बंदूक में कारतूस भर रहे थे तो इतने में एक अग्रेज अफसर ने उन पर गोली चलाई लेकिन निशान चूक जाने पर मंगल ने उसे भी तलवार से मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद अंग्रेज अफसर कर्नल वीलर ने मंगल को गिरफ्तार करने का आदेश दिया, लेकिन किसी सैनिक ने इस पर अमल नहीं किया। अंत में कर्नल हिअर्सी के दबाव में आकर मंगल ने स्वयं अपनी बंदूक से खुद को गोली मार ली। इसके बाद उन्हें अस्पताल भेजा गया, जहां मंगल कुछ दिनों के बाद स्वस्थ हो गए। इसके  बाद कोर्ट मार्शल और अंत में फांसी की सजा मुकर्रर की गई। अंत में आठ अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी गई। यहीं से भड़की आजादी की आग ने अंत में देश को आजाद करके ही दम लिया।
शिवभक्त थे मंगल पाण्डेय
शिव मंदिर जहाँ मंगल पांडेय पूजा करते थे।
कट्टर हिंदू ब्राह्मण होने के साथ ही मंगल पाण्डेय एक शिवभक्त भी थे। आज भी उनकी ओर से पूजित शिवलिंग सहसा ही इसका बोध कराता है। मौजूदा घर के ठीक सामने बने एक छोटे से शिवालय में उक्त शिवलिंग स्थापित है। इस शिवलिंग की पूजा मंगल पाण्डेय सेना में भर्ती होने से पहले तथा जब तक वे गांव आते रहे हमेशा करते थे। शिव में उनकी अटूट आस्था थी और इसके लिए वे घंटो शिव पूजा भी किया करते थे। आज ये मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में जरूर है, लेकिन आज भी इस मंदिर में गांव के लोग पूजापाठ करते हैं।
कुश्ती के शौकीन थे मंगल पाण्डेय
मंगल पाण्डेय के बारे में बुजुर्गों की यादों को जेहन में समेटे आज भी बुजुर्ग उस प्रसंग को कहते नहीं अघाते। मंगल के बारे में कुरेदते ही वे मंगल की वीरता का बखान नम आंखों से करने लगते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि अमर शहीद मंगल पाण्डेय कुश्ती के शौकीन थे और अखार में क्षेत्र में नामी-गिरामी अखाड़ा था। यहां मंगल पाण्डेय कुश्ती लड़ने आया करते थे। कहा जाता है कि यहीं पर कभी लोरिक-संवरू नामक वीर भी अखाड़े में कुश्ती लड़ते थे और इसी वजह से इस गांव का नाम अखार पड़ गया। आज भी उनकी यादों को सहेजते हुए युवा क्लब अखार की संयोजक रणजीत कुमार सिंह की देखरेख में अखाड़ा व व्यायामशाला चला रहा है। अखार निवासी 85 वर्षीय वृद्ध गिरनारी सिंह बताते हैं कि उनके दादा स्व.गोगा सिंह बताते थे कि मंगल पाण्डेय पड़ोसी गांव नगवां से अखार में कुश्ती लड़ने आया करते थे। 80 वर्षीय बृज बिहारी सिंह ने बताया कि मंगल पाण्डेय हमारे बाबा के परम मित्र थे। जब भी वे गांव आते उनसे मिले बगैर वापस नहीं जाते थे। 70 वर्षीय संत विलास सिंह ने बताया कि उनके बाबा बसावन सिंह से मंगल पाण्डेय ने कुश्ती के कई गुर भी सीखे थे।
मंगल को लेकर खड़े होते रहे विवाद
अमर शहीद मंगल पाण्डेय को बलिया व फैजाबाद जिले का निवासी होने को लेकर प्राय: विवाद उठता ही रहा है। हालांकि अब यदि मंगल पाण्डेय के प्रपौत्र की मानें तो उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खंडपीठ ने मंगल पाण्डेय को नगवा का निवासी होना मान लिया है। हालांकि पूर्व में नगवां स्थित मंगल पाण्डेय की मूर्ति का लोकार्पण करने पहुंच तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मंच से घोषणा की थी कि हर स्तर से प्रमाणित हो चुका है कि मंगल पाण्डेय मूल रूप से बलिया जिले के नगवा गांव के ही निवासी थे। ऐसे में इस विवाद में कोई दम नहीं है।
जीवन पर आधारित फिल्म भी रही विवादित
बहुविवादित फिल्म ‘मंगल पाण्डेय: द
राइजिंग’का विरोध करते
बलियावासी और भाजपा नेतागण
वर्ष 2006 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मंगल पाण्डेय के जीवन चरित्र पर आधारित बहुविवादित फिल्म ‘मंगल पाण्डेय: द राइजिंग’ में उनकी जन्मभूमि बलिया को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया गया था। साथ ही कई तथ्यों को गलत ढंग से परोसा गया। इसमें मंगल पाण्डेय को शराब पीते फिल्माया गया था। जबकि मंगल पाण्डेय शराब को छूते तक नहीं थे और खाटी ब्राह्मण थे। भले ही फिल्म निर्माता की इसके पीछे फिल्म को मसालेदार बनाने की थी, लेकिन महानायक पर लगे इस लांछन से समूचे देश में बखेड़ा खड़ा हो गया। बलिया भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां पर पुलिस को विरोध के चलते लाठी चार्ज भी करना पड़ा। भारी विरोध के बाद आखिरकार उस फिल्म से इस अंश को काटना ही पड़ा।
मंगल का स्मारक उपेक्षित
भारत के प्रथम शहीद मंगल पाण्डेय की स्मृति में बलिया जिले में दो जगहों पर स्मारक के रूप में उनकी भव्य  प्रतिमा स्थापित की गई है। इनमें एक उनके पैतृक गांव नगवां तो दूसरा नगर के कदम चौराहे पर स्थित है। शहीद मंगल पाण्डेय स्मारक सोसायटी नगवां का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के निर्देशन में   स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. तारकेश्वर पाण्डेय के सहयोग से किया गया। मंगल पाण्डेय के व्यक्तित्व व कृतित्व को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए शहीद मंगल पाण्डेय के नाम पर इंटरमीडिएट कालेज, शोध संस्थान, संग्रहालय, पुस्तकालय आदि की स्थापना की गई। विद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य होने का गौरव संस्था के अध्यक्ष व पूर्व नगर विकास मंत्री स्व.विक्रमादित्य पाण्डेय को प्राप्त हुआ। जब तक स्व.विक्रमादित्य पाण्डेय जीवित रहे, स्मारक की देखरेख में कहीं कोई कमी नहीं आने दी। वहीं वर्तमान में ये सभी स्मारक उपेक्षित हो गए हैं।
हर साल होता भव्य आयोजन
बलियावासियों के लिए यूं कहें तो बगावत और बगावती तेवर दोनों शान है। भृगु बाबा की तपोस्थली बलिया में स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी फेहरिश्त है। हर साल मंगल पाण्डेय के बलिदान दिवस आठ अप्रैल को उनके पैतृक गांव नगवां में भव्य  आयोजन किया जाता है। शहीद स्मारक में आयोजित इस कार्यक्रम में तमाम दिग्गज राजनीतिज्ञ यथा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव, पूर्व नगर विकास मंत्री विक्रमादित्य पाण्डेय, पूर्व नगर विकास राज्यमंत्री नारद राय, नगर विकास मंत्री नकुल दूबे सरीखे तमाम दिग्गज सहभागिता करते रहे हैं।
...जब उपेक्षित हुर्इं मंगल पाण्डेय की पौत्रवधू
प्रथम शहीद मंगल पाण्डेय की
पौत्रवधू 
तेतरी देवी
जरा सोंचिए तब क्या स्थिति हो, जब किसी परिवार के ही सदस्य के बलिदान दिवस पर भव्य आयोजन किया जा रहा हो और उनकी पौत्रवधू को सुरक्षाकर्मी उक्त स्थल पर जाने से ही रोक दिया जाए। वर्ष 2005 में ऐसा ही वक्त आया। आठ अप्रैल 2005 को जब नगवां स्थित स्मारक स्थल पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन था और तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव बतौर मुख्य अतिथि वहां पहुंचे थे तो घर की सबसे बुजुर्ग महिला यानी मंगल पाण्डेय की पौत्रवधू तेतरी देवी कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंची। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पहचाना नहीं और लाख अपना पता बताने पर भी आयोजन स्थल पर नहीं जाने दिया। इसको लेकर जब आयोजन स्थल पर हंगामा हुआ और मुलायम सिंह यादव को इसकी भनक  लगी तो वे खुद वहां पहुंचे और सुरक्षाकर्मियों को फटकारते हुए तेतरी देवी को मंच पर लेकर पहुंचे और उन्हें सम्मानित किया।
मंगल के अनुज के नाम पर मिलीं सुविधाएं
भले ही मंगल पाण्डेय के वंशजों को मंगल के नाम पर सुविधाएं न मिलीं हों, लेकिन उनके अनुज बरमेश्वर पाण्डेय के नाम पर थोड़ी-बहुत सुविधाएं जरूर मिलीं हैं। बरमेश्वर पाण्डेय ने भी आजादी की जंग में सक्रिय योगदान निभाया था। तब के बलिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इन्हें अपना कप्तान चुन लिया था और वे आजीवन कप्तान साहब कहे जाते रहे। वे 1930 से 1942 तक सक्रिय रूप से अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे। दर्जनों बार जेल गए और यातनाएं सही। इन्हीं के नाम पर इनके वंशजों को थोड़ी-बहुत सुविधाएं मिलतीं हैं। यूं कहें तो नैनीताल में जमीन वगैरह मिली है, लेकिन मंगल पाण्डेय के नाम पर कुछ भी मयस्सर नहीं हुआ।
वर्जन बाक्स...
हमें गर्व है
‘‘ जब मेरा ब्याह नगवां गांव में तय हुआ और ये बताया गया कि वे अमर शहीद मंगल पाण्डेय के पौत्र की अर्द्धांगिनी बनने जा रही है तो उन्होंने तत्काल विवाह के लिए हामी भर दी। विवाह के बाद जब वे ससुराल नगवा पहुंची तो मंगल गीतों में पूर्वजों में मंगल पाण्डेय का नाम लेकर भी गीत गाए जाते थे और आज भी गाए जाते हैं। सांझी-पराती (मंगलाचरण) में भी मंगल पाण्डेय का नाम लिया जाता है। मुझे गर्व है कि मैं उनकी पौत्र की वधू हूं। शिकायत है तो बस इतनी कि वर्तमान शासन में वह सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं, जिनके उनके वंशज हकदार हैं। इससे शर्मनाक क्या होगा कि मंगल पाण्डेय को जन्म स्थली को लेकर विवाद खड़ा कर दिया गया था। खैर, अब हकीकत में यह स्वीकार कर लिया गया है कि मंगल पाण्डेय बलिया के वासी थे।
तेतरी देवी
मंगल पाण्डेय की पौत्रवधू ’’

समूचे देश के लिए आदर्श हैं मंगल पाण्डेय
‘‘ अमर शहीद मंगल पाण्डेय वास्तव में न सिर्फ बलिया बल्कि समूचे देश के लिए एक आदर्श हैं। उन्होंने उस वक्त अंग्रेजों के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार किया, जब कोई उनके खिलाफ बोलने का साहस तक नहीं करता था। जहां तक मंगल पाण्डेय के वंशजों को सुविधा देने का सवाल है, शासन स्तर से जो सुविधाएं मिलती हैं उन्हें दिया जाता है। आगे भी अगर मंगल पाण्डेय के वंशजो को शिकायत होगी तो वे नि:संदेह उनसे कह सकते हैं।
मधुकर द्विवदी
जिलाधिकारी, बलिया’’
नहीं हो सका विकास
‘‘ आजादी की जंग में पहली शहादत देने वाले गांव में विकास की वह धारा प्रवाहित नहीं हो सकी है, जो काफी पहले हो जानी चाहिए थी। शासन तथा प्रशासन स्तर से विकास को लेकर कभी भी रुचि नहीं ली गई। यहां तक कि गांव का स्मारक भी सुरक्षित नहीं है। गांव स्तर से ही प्रतिमा व स्मारक की साफ-सफाई व रंग-रोगन कराया जाता है। मंगल पाण्डेय द्वार के लिए खंड विकास अधिकारी दुबहर से मिलकर वार्ता की गई है। उन्होंने मनरेगा के तहत इसे जल्द बनवाने का भरोसा दिया है।
विनोद कुमार गुप्ता
ग्राम प्रधान नगवां’’
नहीं मिली सुविधाएं
‘‘ वक्त के साथ मंगल पाण्डेय का गांव एक नक्सल प्रभावित गांव हो चुका है। इसके बाद भी इस गांव को शासन-प्रशासन स्तर से वो सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं, जिसका ये गांव हकदार है। गांव में पुलिस चौकी की स्थापना की मांग लंबे अरसे से की जाती   रही है, लेकिन इस पर आज तक अमल नहीं हो सका है। स्मारक तक जाने के लिए आज तक पक्की सड़क नहीं है। ये सड़क निजी जमीन को लेकर खड़े विवाद के चलते है। प्रशासन इसे खत्म करने की कोशिश तक नहीं कर रहा है।
भुनेस्वर पासवान
पूर्व प्रधान, नगवां ’’
हो रहा हरसंभव  प्रयास 
‘‘ अमर शहीद मंगल पाण्डेय बलिया के लिए आदर्श हैं। इनकी यादों को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए जितना हो सकता है, समिति संघर्षरत है। मंगल पाण्डेय के वंशजों को हरसंभव मदद देने में समिति कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती। हमेशा समिति विभिन्न आयोजनों के जरिए इनके परिवार को सम्मानित करती रही है और आगे भी करती रहेगी। ’’
शशिकांत चतुर्वेदी
अध्यक्ष,मंगल पाण्डेय स्मारक समिति
नगवां (बलिया)।

1942 में भी दिखी झलक
‘‘ अमर शहीद मंगल पाण्डेय ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही थे, न कि अंग्रेजी सेना के। जब मंगल पाण्डेय ने बगावत की थी, तब विक्टोरिया ने उसे अपने कब्जे में नहीं लिया था। मंगल पाण्डेय ने न सिर्फ देश की आजादी बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसी बगावत का तेवर 1942 की क्रांति में भी देखा गया। मंगल पाण्डेय को उनका स्थान दिलाने के लिए समिति संघर्षरत है और 1987 से शुरू संघर्ष आज भी अनवरत जारी है। हालांकि वर्ष 1980 में मंगल पाण्डेय का डाक टिकट भी जारी हो चुका है। दुखद ये कि मंगल पाण्डेय के स्मारक के नाम पर एक धूर भी जमीन नहीं मिली है। जो जमीन है वह या तो समिति की है या निजी।
राजकुमार पाण्डेय
मंत्री
शहीद मंगल पाण्डेय स्मारक समिति
कदम चौराहा (बलिया)’’

स्मारक के संरक्षण में कब-कितना खर्च
वर्ष धनराशि (लाख रुपए में)
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1986-87 4.44
1988-89 2.00
1990-91 2.66
1991-92 5.40
1992-93 0.78125
1994-96 4.00
2004-05 2.58
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कुल खर्च 21.86125
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