केंद्र सरकार एक अगस्त से एक योजना। इसके तहत दुष्कर्म पीडि़तों को दो लाख रुपये मुआवजा मिलेगा। पीडि़ता के नाबालिग होने अथवा मानसिक या शारीरिक विकलांगता का शिकार होने जैसे कुछ मामलों में मुआवजा की यह राशि तीन लाख रुपये तक हो सकती है। इस योजना की स्वीकृति दे दी गई है और बजट भी मुहैया करा दिया गया है। महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य दुष्कर्म की शिकार महिलाओं को आर्थिक मदद के साथ न्याय मुहैया कराना है। ऐसे में क्या मुआवजे से किसी पीडि़ता का जख्म मिट पाएगा। इसका उत्तर तलाशना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
अनीश कुमार उपाध्याय / न्यू दिल्ली
ये है यूपी की हकीकतअब सवाल यह है कि क्या ये मुआवजा दुष्कर्म पीडि़ता के जख्म को भर पाएगा। यदि नहीं तो आखिर किससे ये जख्म भरा जा सकता है। निःसंदेह इस घटना को अंजाम देने वाले अपराधी को ऐसा सबक सिखाया जाए कि आगे से कोई भी नारी के साथ ऐसी हिमाकत करना तो दूर इसकी सोंच भी न सके। पिछले दिनों कक्षा छह की मासूम छात्रा को गैंग रेप के बाद कत्ल कर दिया गया। बच्ची की हत्या भी इस दरिंदगी से की गई कि लाश देखने वालो के रोंगटे खडे़ हो गये। हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए क्रूर हत्यारों ने पहचान छुपाने के लिये चेहरे पर तेजाब डालकर मासूम छात्रा की आंखें तक फोड़ डाली। ये आज उत्तर प्रदेश की हकीकत है। मासूम बच्चियों के साथ हो रही बलात्कार की वारदातों से केवल एक सप्ताह के भीतर ही उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म की लगभग आधा दर्जन घटनाओं ने प्रदेश की कानून व्यवस्था की कलई खोल कर रख दी है।
खादी-खाकी का भी मचा है आतंक
पिछले एक महीने में प्रदेश में नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के रिकार्ड मामले दर्ज हुए और इन में से अधिकतर मामलो में बसपा सरकार के कई विधायकों के नाम सामने आये। आज प्रदेश में खादी वाले और खाकी वालो ने आतंक मचा रखा है। आज प्रदेश महिलाओं के खिलाफ अपराध में देश में तीसरे नम्बर पर है। महज कुछ घंटों के अन्दर-अन्दर कन्नौज में 14 साल की लड़की के साथ कथित बलात्कार कर के उसकी आंख फोड़ देना, बस्ती में 18 साल की लडकी से कथित बलात्कार, कानपुर में महिला से बलात्कार, गोंडा में 16 साल की दलित लड़की से कथित बलात्कार, फिरोजाबाद में 15 साल की नाबालिग बच्ची से बलात्कार और एटा में महिला से बलात्कार के बाद उसे जिन्दा जला देना। इन ताबड़तोड़ घटनाओं से पूरा प्रदेश हिल गया। प्रदेश में कानून व्यवस्था बेकाबू हो गई।
आबरू पर हावी धनबल
वहीं यह भी हकीकत है कि धनबल और पैरवी के बूते गरीब नारियों की आबरू बाजार में हमेशा ही नीलाम होती रही है। पिछले दिनों बांदा में जिस गरीब लडकी के साथ बलात्कार हुआ उल्टे उसे ही खादी वालों को खुश करने के लिये चोर बताकर हवालात में बंद कर दिया गया। ये ही नही बलात्कारी विधायक को बचाने के लिये नीचे से ऊपर तक के पुलिस अधिकारी एकजुट हो गए। यू तो उत्तर प्रदेश के साथ ही पूरे देश में ही महिलाओं और लडकियों के खिलाफ अपराधो में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है।
सत्ताधारियों की भी खास रही भूमिका
पिछले दिनों ऐसे ही कुछ बसपा सरकार के विधायकों ने सरकार की खूब किरकिरी कराई। इनमें योगेंद्र सांगर पर 24 दिनों तक एक लड़की के साथ गैंग रेप का आरोप लगा। बांदा से एमएलए पुरूषोत्तम द्विवेदी पर नाबालिग लड़की के साथ गैंग रेप का आरोप लगा। राम मोहन गर्ग फिश डेवलपमेंट काॅरपोरेशन के पूर्व चेयरमैन पर लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा। पूर्व मंत्री और मिल्कीपुर से बसपा के एमएलए आनंद सेन यादव पर दलित छात्रा के यौन शोषण का आरोप लगा। डिबाई विधान सभा क्षेत्र से बसपा विधायक श्री भगवान शर्मा पर एक लड़की को अगवा कर बलात्कार करने का आरोप लगा। ये सब घटनाएं तो महज एक बानगी भर हैं।
कानून नहीं व्यवस्था बनानी होगी
मुख्यमंत्री मायावती ने पिछले दिनों ये ऐलान किया था कि प्रदेश में महिलाओं और लड़कियों पर जुल्म और ज्यादती करने वालो को बख्शा नही जायेगा। प्रदेश में बलात्कार की घटनाओं से संबंधित मुकदमों को छह माह में निपटाने तथा आरोपी को आसानी से जमानत न मिलने के लिये सीआरपीसी की धारा 437 व 439 में संशोधन किये जायेगे। पर क्या इस से अपराध रूक जायेगे। क्या कानून में संशोधन करने से बलात्कार के अपराधो पर नियंत्रण हो जायेगा। नहीं बिल्कुल नहीं, कानून नहीं कानूनी व्यवस्था बनानी होगी मुख्यमंत्री को।
हमेशा ठगी जाती रही है नारी
वैसे भी महिला हमेशा से ठगी जाती रही है। जन्म से पहले, जन्म के बाद, बचपन, जवानी, बुढ़ापे तक में नारी का शोषण होता है। यह शोषण आज से नहीं अपितु हजारों वर्षों से चला आ रहा है। जन्म से पूर्व ही उसे माँ की कोख में ही दफनाने की साजिशे रचीं जाती हैं। साजिशें नाकाम होने पर अनचाही कन्या के जन्म लेने पर उसे नमक चटाकर, चारपाई के पावें के नीचे दबा कर मारने तक का अमानवीय कृत्य किया जाता है। पुत्री जन्म की खबर सुनते ही घर में खुशी के स्थान पर मातम का माहौल बन जाता है। बचपन से ही उसे पराया धन कहा जाने लगता है। जब एक कन्या को पराया कहकर ही संबोधित किया जाता हो, तो भला उसके लिए अपनापन कैसे आएगा।
उपेक्षा ही रही जिसकी नियति
बेचारी कन्या को उसके भाई से कम खाने को देना, घटिया वस्त्र पहनने को देना, शिक्षित न करना आम बात है। जैसे-तैसे बड़ी होती बेटी की शादी कर गंगा स्नान की सुखद अनुभूति प्राप्त कर अपने आप को दायित्व मुक्त समझते हैं पितृ सकरात्मक प्रवृति के इंसान। इस दौरान बचपन से जवानी तक एक नारी को अपनी अस्मिता की रक्षा स्वयं करनी पड़ती है। मर्दों की कामाग्नि पूर्ण आँखों से अपने बदन को जलने से बचाती रहती है। बाहरी मर्दों की वासना से बचती बचाती नारी को कई बार घरेलू यौन हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है।
धर्मगुरुओं ने भी नहीं बख्शा
तमाम कुकृयों को सांसारिक पतन मान कर भगवान की शरण में गई महिलाओं को तथाकथित धर्मगुरुओं ने भी नहीं बख्शा। धर्म के ठेकेदारों द्वारा बनाए पौराणिक ग्रंथ भी नारी शोषण को बढ़ावा देने व उसके शोषण की गरिमामयी कथाओं से भरे पड़े हैं। नारी के शोषण की कहानियाँ तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ व उनके काल के दौरान भी हुई। स्वयं माता सीता को भगवान राम ने शंकित निगाहों से देखा और माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी और फिर अयोध्या में एक धोबी के कहने भर से सीता को वनवास भेज दिया। सीता तो रावण के द्वारा जबरदस्ती उठा ली गई थी और एकान्त स्थान पर राक्षसणियों की देखरेख में अशोक वाटिका में कैद रही। जिसे स्वयं हनुमान जी ने देखा, लेकिन श्रीराम तो वनों में आजाद थे। उन पर तो सीता माता ने संदेह नहीं किया। अयोध्या में तो धोबी के कहने पर तथा संभवतयः राजनीति के दबाव में जनता के भड़कने के भय से सीता का त्याग कर दिया होगा, लेकिन रावण वध के पश्चात लंका से सीता को छुड़ाने पर सीता को किस के कहने या किस दबाव में अग्नि परीक्षा देने को कहा। क्या स्वयं श्री राम शंकित थे? स्वयं मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम ने अपनी पवित्रता का क्या सबूत दिया।
राम के काल की एक अन्य कथा
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के काल की एक अन्य कथा के अनुसार अहिल्या को देवराज इंद्र व चंद्रमा ने छला। जब ऋषि गौतम, इंद्र और चंद्रमा का तो कुछ न बिगाड़ सके, तो बेचारी नारी पर ही अपना ऋषि ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग कर डाला और क्रोध में अहिल्या को पाषाण मूर्ति बना दिया। आखिर स्वयं भगवान राम ने पाषाण मूर्ति बनी अहिल्या को अपने चरणों का स्पर्श दिया, तब वह पुनः पवित्र हो नारी रूप में परिवर्तित हुई। माता सीता तो कई वर्षों तक श्रीराम के साथ रही, तो सीता कैसे अपवित्र रह सकती थी।
राजाओं-ऋषियों ने भी खूब किया दुरुपयोग
इस प्रथा का राजाओं सहित ऋषियों ने भी जमकर दुरुपयोग कर नारी शोषण किया। अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु पुत्र कामना की आड़ में पत्नी अन्य राजा को सौंपते रहे। इस प्रथा को नियोग के नाम से जाना जाता था। नारी का सदैव शोषण होता रहा है। पुरुष कोई भी अनैतिक कार्य करे, वह कभी अपवित्र नहीं होता। जबकि स्त्री को अपवित्र मानते देर नहीं लगाता समाज।
शुद्धिकरण को लंबे-चैड़े कर्मकांड
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्राकृतिक नियम मासिक धर्म के पश्चात नारी अपवित्र हो जाती है। उसके मंदिर प्रवेश पर रोक लगा दी जाती है तथा घर की रसोई में भी प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है। मुस्लिम मान्यता अनुसार कुरान में उसक् शुद्धिकरण का खूब लंबे-चैड़े कर्मकांड का उल्लेख है। भला भगवान द्वारा बनाए प्राकृतिक चक्र में बेचारी नारी का क्या दोष? वह अपवित्र कैसे हो गई।
तब नारी को जला देते थे जिंदा
कुछ वर्ष पूर्व तक भारतीय समाज में सती प्रथा का बोलबाला था। पति की मृत्यु के पश्चात नारी को बोझ समझने वाला समाज जबरदस्ती उसे, उसके पति के साथ जिंदा जला देता और उसे सती का दर्जा दे दिया जाता। जैसे-तैसे राजाराम मोहनराय सरीखे समाज सुधारकों ने इस प्रथा को बंद करवाया। पति की दीर्घायु की कामना के लिए पत्नियां करवा चैथ का व्रत करती हैं। भले ही उनका पति उनके बीमार पड़ने पर उसे दवा के लिए पैसे तक न दे। पौराणिक कथाओं के अनुसार पांडव जुए में अपनी पत्नी द्रोपदी को दाव पर लगा देते हैं। इसी प्रकार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य वचन पूरे करने क् लिए सबसे पहले अपनी पत्नी को नीलाम किया, फिर अपने पुत्र को, फिर स्वयं को नीलाम किया।
नमन योग्य है नारी की सहनशीलता
बेचारी नारी को सदैव खिलौना मानने वाले समाज ने इसे पुरुषों से तुच्छ दर्जा ही प्रदान किया है। आडम्बरी मर्यादा की जंजीरों में जकड़ी सहनशील प्रकृति की नारी सब जानते हुए भी सब कुछ सहती रही। आखिर कब तक सहेगी.... और क्यो सहेगी.......? किसी भी शुभ कार्य जैसे विवाह शादी इत्यादि में यदि कोई विधवा सामने आ जाए तो उसे मनहूस समझ कर भला-बुरा कहा जाता है जबकि कोई विधुर (जिसकी पत्नी मर चुकी हो) सामने आ जाए तो अशुभ नहीं मानते। जीवन साथी तो दोनों स्थितियों में मरे हैं फिर ये भेदभाव व अन्याय नारी जाति के साथ ही क्यो?
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धर्मग्रंथों के आइने में नारी
नारी को दोयम दर्जे की नागरिकता प्रदान करने की स्थाई व लिखित व्यवस्था धर्म ग्रंथों से ही शुरू होती है। बाइवल के अनुसार-और स्त्री को पूरी अधीनता से सीखना चाहिए और मैं कहता हूँ कि स्त्री न उपदेश करे और न ही पुरुष पर आज्ञा चलाए, परंतु चुपचाप रहे, क्योंकि आदम पहले और उसके बाद हौवा बनायी गई। आदम को बहकाया न गया, पर स्त्री बहकावे में आकर अपराधिनी हुई। तो भी बच्चे जनने के द्वारा उद्धार पाएगी। यदि वे सयंम सहित विश्र्वास, प्रेम और पवित्रता से स्थिर रहे। (नया नियम, तीमुस्थियुस के नाम पौलुस प्रेषित की पहली पत्री, पृष्ठ 30)। विचारणीय विषय यह है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने बहकाने या न बहकाने का प्रश्न ही क्यों खड़ा हुआ। फिर बहकावे में आने वाला व्यक्ति अपराधी होता है या बहकाने वाला। और बच्चा जनने तथा अपराध से उद्धार पाने का क्या संबंध।
कु रान मजीदके पैरा-2, सूरत-2, आयत 223 के अनुसार-तुम्हारी बीवियां तुम्हारे लिए खेतियां है। बस जाओ जिस तरह चाहो अपने खेत में। आश्चर्य है आज के वैज्ञानिक युग का मानव भी सांतवी सदी की अतार्किक परिणति को हृदय से स्वीकार कर रहा है।
यहूदी लोग प्रातः काल की प्रार्थना में कहते हैं-ईश्वर का भला हो कि उसने हमें औरत नहीं बनाया। निःसंदेह ऐसी स्थिति में उनकी औरतों को कहना चाहिए ईश्वर का बुरा हो कि उसने हमें औरत बनाया। मगर वे अपनी प्रार्थना में कहती हैं-ईश्वर का भला हो कि उसने हमें पुरुषों की इच्छाओं के अनुरूप बनाया। इस तरह की प्रार्थनाओं के पीछे, पुरुषों की भोगवृति साफ झलकती है।
मनुस्मृति में कई स्थानों पर नारी को अपमानित किया है। इसमें ऐसी पत्नी जिससे केवल पुत्रियां ही प्राप्त हो उसे उसके पति द्वारा त्यागने का अधिकार है। पति भले ही कितना ही दुराचारी हो, पत्नी को उसे देवता समान मानकर उसकी सेवा करनी चाहिए।
बाइबल ओल्ड टेस्टमंद में लिखा है-नारी को संतान न होना महापाप है। वहीं धर्मगुरु संत अगर्स्टन ने कहा है कि नारी चाहे माता के रूप में हो या बहन के रूप में। उससे सदैव सचेत रहना चाहिए,क्योंकि प्रत्येक नारी में हौवा का वास होता है।
महाभारत आदिपर्व अध्याय 122 में पांडू, अपनी पत्नी कुंती को विवाह प्रथा कैसे शुरू हुई की कथा बताते है। एक बार ऋषि उदद्वालक की पत्नी को स्वयं उसके व उसक् पुत्र श्वेत्केतू के सम्मुख एक अन्य ब्राह्मण, मिलन हेतु बलपूर्वक खींचकर ले जाता है। पुत्र श्वेत्केतू से यह बर्दाश्त नहीं होता, वो इसका विरोध करता है। ऋषि उदद्वालक अपने पुत्र को विरोध करने से रोकते हैं और कहते है- हे पुत्र! यह धर्म संगत है। ब्राह्मण का यह कृत्य धर्मानुसार है। श्वेत्केतू ने धर्म व पिता की आज्ञा की अवमानना करते हुए नारी संरक्षण हेतू विवाह प्रथा शुरू की, लेकिन तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक उन्मादता का पूर्ण त्याग न करते हुए व्यवस्था ने नारी को फिर से छला। उसने विवाह व्यवस्था में पति इच्छा से पुत्र कामना पूर्ति हेतू अन्य मर्द से संसर्ग की छूट प्रदान कर दी।
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क्या कहते हैं समाजशास्त्री
पीजी काॅलेज गाजीपुर के समाजशास्त्र विभाग के रीडर डाॅ एसपी सिंह कहते हैं कि समाज में बदलाव आना एक सतत प्रक्रिया है। वहीं मानव की प्रवृत्ति में ही कामुकता रही है। नारियों के कामुक वस्त्र, उनके पहनावे, रहन-सहन, चाल-चलन आदि भी पुरूष को आकर्षित करते हैं। शारीरिक बनावट के आधार पर भी नारी पुरूषों से कमजोर होती है। ऐसे में सहज ही वे अमानवीय कृत्य का शिकार हो जाती है। अब तो सामाजिक बदलाव के दौर में पुरानी बात नहीं है। नारी सशक्त हुई है और समाज में अपनी जिम्मेवारी भी बखूबी निभा रही है। जहां तक मुआवजा देकर दुष्कर्म पीडि़ता को सरकार की ओर से राहत पहुंचाने की कवायद का सवाल है, इससे उसकी पीड़ा तो कम नहीं होगी, हां, उसके पुनर्वास में ये काफी कारगर साबित होगा। ये सरकार का बेहतर प्रयास है और इसकी सराहना की जानी चाहिए। हां, ऐसे मामलों में न्याय में देरी न करते हुए तत्काल दोषियों को कड़ा दंड देने का भी प्राविधान हो, ताकि आगे से कोई इसकी हिमाकत न कर सके।





