श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Friday, September 30, 2011

मुआवजा भर पाएगा जख्म

केंद्र सरकार एक अगस्त से एक योजना। इसके तहत दुष्कर्म पीडि़तों को दो लाख रुपये मुआवजा मिलेगा। पीडि़ता के नाबालिग होने अथवा मानसिक या शारीरिक विकलांगता का शिकार होने जैसे कुछ मामलों में मुआवजा की यह राशि तीन लाख रुपये तक हो सकती है। इस योजना की स्वीकृति दे दी गई है और बजट भी मुहैया करा दिया गया है। महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य दुष्कर्म की शिकार महिलाओं को आर्थिक मदद के साथ न्याय मुहैया कराना है। ऐसे में क्या मुआवजे से किसी पीडि़ता का जख्म मिट पाएगा। इसका उत्तर तलाशना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
अनीश  कुमार  उपाध्याय / न्यू  दिल्ली 
ये है यूपी की हकीकत
अब सवाल यह है कि क्या ये मुआवजा दुष्कर्म पीडि़ता के जख्म को भर पाएगा। यदि नहीं तो आखिर किससे ये जख्म भरा जा सकता है। निःसंदेह इस घटना को अंजाम देने वाले अपराधी को ऐसा सबक सिखाया जाए कि आगे से कोई भी नारी के साथ ऐसी हिमाकत करना तो दूर इसकी सोंच भी न सके। पिछले दिनों कक्षा छह की मासूम छात्रा को गैंग रेप के बाद कत्ल कर दिया गया। बच्ची की हत्या भी इस दरिंदगी से की गई कि लाश देखने वालो के रोंगटे खडे़ हो गये। हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए क्रूर हत्यारों ने पहचान छुपाने के लिये चेहरे पर तेजाब डालकर मासूम छात्रा की आंखें तक फोड़ डाली। ये आज उत्तर प्रदेश की हकीकत है। मासूम बच्चियों के साथ हो रही बलात्कार की वारदातों से केवल एक सप्ताह के भीतर ही उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म की लगभग आधा दर्जन घटनाओं ने प्रदेश की कानून व्यवस्था की कलई खोल कर रख दी है।
खादी-खाकी का भी मचा है आतंक
पिछले एक महीने में प्रदेश में नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के रिकार्ड मामले दर्ज हुए और इन में से अधिकतर मामलो में बसपा सरकार के कई विधायकों के नाम सामने आये। आज प्रदेश में खादी वाले और खाकी वालो ने आतंक मचा रखा है। आज प्रदेश महिलाओं के खिलाफ अपराध में देश में तीसरे नम्बर पर है। महज कुछ घंटों के अन्दर-अन्दर कन्नौज में 14 साल की लड़की के साथ कथित बलात्कार कर के उसकी आंख फोड़ देना, बस्ती में 18 साल की लडकी से कथित बलात्कार, कानपुर में महिला से बलात्कार, गोंडा में 16 साल की दलित लड़की से कथित बलात्कार, फिरोजाबाद में 15 साल की नाबालिग बच्ची से बलात्कार और एटा में महिला से बलात्कार के बाद उसे जिन्दा जला देना। इन ताबड़तोड़ घटनाओं से पूरा प्रदेश हिल गया। प्रदेश में कानून व्यवस्था बेकाबू हो गई।

आबरू पर हावी धनबल
वहीं यह भी हकीकत है कि धनबल और पैरवी के बूते गरीब नारियों की आबरू बाजार में हमेशा ही नीलाम होती रही है। पिछले दिनों बांदा में जिस गरीब लडकी के साथ बलात्कार हुआ उल्टे उसे ही खादी वालों को खुश करने के लिये चोर बताकर हवालात में बंद कर दिया गया। ये ही नही बलात्कारी विधायक को बचाने के लिये नीचे से ऊपर तक के पुलिस अधिकारी एकजुट हो गए। यू तो उत्तर प्रदेश के साथ ही पूरे देश में ही महिलाओं और लडकियों के खिलाफ अपराधो में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है।
सत्ताधारियों की भी खास रही भूमिका
पिछले दिनों ऐसे ही कुछ बसपा सरकार के विधायकों ने सरकार की खूब किरकिरी कराई। इनमें योगेंद्र सांगर पर 24 दिनों तक एक लड़की के साथ गैंग रेप का आरोप लगा। बांदा से एमएलए पुरूषोत्तम द्विवेदी पर नाबालिग लड़की के साथ गैंग रेप का आरोप लगा। राम मोहन गर्ग फिश डेवलपमेंट काॅरपोरेशन के पूर्व चेयरमैन पर लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा। पूर्व मंत्री और मिल्कीपुर से बसपा के एमएलए आनंद सेन यादव पर दलित छात्रा के यौन शोषण का आरोप लगा। डिबाई विधान सभा क्षेत्र से बसपा विधायक श्री भगवान शर्मा पर एक लड़की को अगवा कर बलात्कार करने का आरोप लगा। ये सब घटनाएं तो महज एक बानगी भर हैं।
कानून नहीं व्यवस्था बनानी होगी
 मुख्यमंत्री मायावती ने पिछले दिनों ये ऐलान किया था कि प्रदेश में महिलाओं और लड़कियों पर जुल्म और ज्यादती करने वालो को बख्शा नही जायेगा। प्रदेश में बलात्कार की घटनाओं से संबंधित मुकदमों को छह माह में निपटाने तथा आरोपी को आसानी से जमानत न मिलने के लिये सीआरपीसी की धारा 437 व 439 में संशोधन किये जायेगे। पर क्या इस से अपराध रूक जायेगे। क्या कानून में संशोधन करने से बलात्कार के अपराधो पर नियंत्रण हो जायेगा। नहीं बिल्कुल नहीं, कानून नहीं कानूनी व्यवस्था बनानी होगी मुख्यमंत्री को।
हमेशा ठगी जाती रही है नारी
वैसे भी महिला हमेशा से ठगी जाती रही है। जन्म से पहले, जन्म के बाद, बचपन, जवानी, बुढ़ापे तक में नारी का शोषण होता है। यह शोषण आज से नहीं अपितु हजारों वर्षों से चला आ रहा है। जन्म से पूर्व ही उसे माँ की कोख में ही दफनाने की साजिशे रचीं जाती हैं। साजिशें नाकाम होने पर अनचाही कन्या के जन्म लेने पर उसे नमक चटाकर, चारपाई के पावें के नीचे दबा कर मारने तक का अमानवीय कृत्य किया जाता है। पुत्री जन्म की खबर सुनते ही घर में खुशी के स्थान पर मातम का माहौल बन जाता है। बचपन से ही उसे पराया धन कहा जाने लगता है। जब एक कन्या को पराया कहकर ही संबोधित किया जाता हो, तो भला उसके लिए अपनापन कैसे आएगा।
उपेक्षा ही रही जिसकी नियति
बेचारी कन्या को उसके भाई से कम खाने को देना, घटिया वस्त्र पहनने को देना, शिक्षित न करना आम बात है। जैसे-तैसे बड़ी होती बेटी की शादी कर गंगा स्नान की सुखद अनुभूति प्राप्त कर अपने आप को दायित्व मुक्त समझते हैं पितृ सकरात्मक प्रवृति के इंसान। इस दौरान बचपन से जवानी तक एक नारी को अपनी अस्मिता की रक्षा स्वयं करनी पड़ती है। मर्दों की कामाग्नि पूर्ण आँखों से अपने बदन को जलने से बचाती रहती है। बाहरी मर्दों की वासना से बचती बचाती नारी को कई बार घरेलू यौन हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है।
धर्मगुरुओं ने भी नहीं बख्शा
तमाम कुकृयों को सांसारिक पतन मान कर भगवान की शरण में गई महिलाओं को तथाकथित धर्मगुरुओं ने भी नहीं बख्शा। धर्म के ठेकेदारों द्वारा बनाए पौराणिक ग्रंथ भी नारी शोषण को बढ़ावा देने व उसके शोषण की गरिमामयी कथाओं से भरे पड़े हैं। नारी के शोषण की कहानियाँ तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ व उनके काल के दौरान भी हुई। स्वयं माता सीता को भगवान राम ने शंकित निगाहों से देखा और माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी और फिर अयोध्या में एक धोबी के कहने भर से सीता को वनवास भेज दिया। सीता तो रावण के द्वारा जबरदस्ती उठा ली गई थी और एकान्त स्थान पर राक्षसणियों की देखरेख में अशोक वाटिका में कैद रही। जिसे स्वयं हनुमान जी ने देखा, लेकिन श्रीराम तो वनों में आजाद थे। उन पर तो सीता माता ने संदेह नहीं किया। अयोध्या में तो धोबी के कहने पर तथा संभवतयः राजनीति के दबाव में जनता के भड़कने के भय से सीता का त्याग कर दिया होगा, लेकिन रावण वध के पश्चात लंका से सीता को छुड़ाने पर सीता को किस के कहने या किस दबाव में अग्नि परीक्षा देने को कहा। क्या स्वयं श्री राम शंकित थे? स्वयं मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम ने अपनी पवित्रता का क्या सबूत दिया।
राम के काल की एक अन्य कथा
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के काल की एक अन्य कथा के अनुसार अहिल्या को देवराज इंद्र व चंद्रमा ने छला। जब ऋषि गौतम, इंद्र और चंद्रमा का तो कुछ न बिगाड़ सके, तो बेचारी नारी पर ही अपना ऋषि ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग कर डाला और क्रोध में अहिल्या को पाषाण मूर्ति बना दिया। आखिर स्वयं भगवान राम ने पाषाण मूर्ति बनी अहिल्या को अपने चरणों का स्पर्श दिया, तब वह पुनः पवित्र हो नारी रूप में परिवर्तित हुई। माता सीता तो कई वर्षों तक श्रीराम के साथ रही, तो सीता कैसे अपवित्र रह सकती थी।
राजाओं-ऋषियों ने भी खूब किया दुरुपयोग
इस प्रथा का राजाओं सहित ऋषियों ने भी जमकर दुरुपयोग कर नारी शोषण किया। अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु पुत्र कामना की आड़ में पत्नी अन्य राजा को सौंपते रहे। इस प्रथा को नियोग के नाम से जाना जाता था। नारी का सदैव शोषण होता रहा है। पुरुष कोई भी अनैतिक कार्य करे, वह कभी अपवित्र नहीं होता। जबकि स्त्री को अपवित्र मानते देर नहीं लगाता समाज।
शुद्धिकरण को लंबे-चैड़े कर्मकांड
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्राकृतिक नियम मासिक धर्म के पश्चात नारी अपवित्र हो जाती है। उसके मंदिर प्रवेश पर रोक लगा दी जाती है तथा घर की रसोई में भी प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है। मुस्लिम मान्यता अनुसार कुरान में उसक् शुद्धिकरण का खूब लंबे-चैड़े कर्मकांड का उल्लेख है। भला भगवान द्वारा बनाए प्राकृतिक चक्र में बेचारी नारी का क्या दोष? वह अपवित्र कैसे हो गई।
तब नारी को जला देते थे जिंदा
कुछ वर्ष पूर्व तक भारतीय समाज में सती प्रथा का बोलबाला था। पति की मृत्यु के पश्चात नारी को बोझ समझने वाला समाज जबरदस्ती उसे, उसके पति के साथ जिंदा जला देता और उसे सती का दर्जा दे दिया जाता। जैसे-तैसे राजाराम मोहनराय सरीखे समाज सुधारकों ने इस प्रथा को बंद करवाया। पति की दीर्घायु की कामना के लिए पत्नियां करवा चैथ का व्रत करती हैं। भले ही उनका पति उनके बीमार पड़ने पर उसे दवा के लिए पैसे तक न दे। पौराणिक कथाओं के अनुसार पांडव जुए में अपनी पत्नी द्रोपदी को दाव पर लगा देते हैं। इसी प्रकार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य वचन पूरे करने क् लिए सबसे पहले अपनी पत्नी को नीलाम किया, फिर अपने पुत्र को, फिर स्वयं को नीलाम किया।
नमन योग्य है नारी की सहनशीलता
बेचारी नारी को सदैव खिलौना मानने वाले समाज ने इसे पुरुषों से तुच्छ दर्जा ही प्रदान किया है। आडम्बरी मर्यादा की जंजीरों में जकड़ी सहनशील प्रकृति की नारी सब जानते हुए भी सब कुछ सहती रही। आखिर कब तक सहेगी.... और क्यो सहेगी.......? किसी भी शुभ कार्य जैसे विवाह शादी इत्यादि में यदि कोई विधवा सामने आ जाए तो उसे मनहूस समझ कर भला-बुरा कहा जाता है जबकि कोई विधुर (जिसकी पत्नी मर चुकी हो) सामने आ जाए तो अशुभ नहीं मानते। जीवन साथी तो दोनों स्थितियों में मरे हैं फिर ये भेदभाव व अन्याय नारी जाति के साथ ही क्यो?
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धर्मग्रंथों के आइने में नारी
नारी को दोयम दर्जे की नागरिकता प्रदान करने की स्थाई व लिखित व्यवस्था धर्म ग्रंथों से ही शुरू होती है। बाइवल के अनुसार-और स्त्री को पूरी अधीनता से सीखना चाहिए और मैं कहता हूँ कि स्त्री न उपदेश करे और न ही पुरुष पर आज्ञा चलाए, परंतु चुपचाप रहे, क्योंकि आदम पहले और उसके बाद हौवा बनायी गई। आदम को बहकाया न गया, पर स्त्री बहकावे में आकर अपराधिनी हुई। तो भी बच्चे जनने के द्वारा उद्धार पाएगी। यदि वे सयंम सहित विश्र्वास, प्रेम और पवित्रता से स्थिर रहे। (नया नियम, तीमुस्थियुस के नाम पौलुस प्रेषित की पहली पत्री, पृष्ठ 30)। विचारणीय विषय यह है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने बहकाने या न बहकाने का प्रश्न ही क्यों खड़ा हुआ। फिर बहकावे में आने वाला व्यक्ति अपराधी होता है या बहकाने वाला। और बच्चा जनने तथा अपराध से उद्धार पाने का क्या संबंध।
कु रान मजीदके पैरा-2, सूरत-2, आयत 223 के अनुसार-तुम्हारी बीवियां तुम्हारे लिए खेतियां है। बस जाओ जिस तरह चाहो अपने खेत में। आश्चर्य है आज के वैज्ञानिक युग का मानव भी सांतवी सदी की अतार्किक परिणति को हृदय से स्वीकार कर रहा है।
यहूदी लोग प्रातः काल की प्रार्थना में कहते हैं-ईश्वर का भला हो कि उसने हमें औरत नहीं बनाया। निःसंदेह ऐसी स्थिति में उनकी औरतों को कहना चाहिए ईश्वर का बुरा हो कि उसने हमें औरत बनाया। मगर वे अपनी प्रार्थना में कहती हैं-ईश्वर का भला हो कि उसने हमें पुरुषों की इच्छाओं के अनुरूप बनाया। इस तरह की प्रार्थनाओं के पीछे, पुरुषों की भोगवृति साफ झलकती है।
मनुस्मृति में कई स्थानों पर नारी को अपमानित किया है। इसमें ऐसी पत्नी जिससे केवल पुत्रियां ही प्राप्त हो उसे उसके पति द्वारा त्यागने का अधिकार है। पति भले ही कितना ही दुराचारी हो, पत्नी को उसे देवता समान मानकर उसकी सेवा करनी चाहिए।
बाइबल ओल्ड टेस्टमंद में लिखा है-नारी को संतान न होना महापाप है। वहीं धर्मगुरु संत अगर्स्टन ने कहा है कि नारी चाहे माता के रूप में हो या बहन के रूप में। उससे सदैव सचेत रहना चाहिए,क्योंकि प्रत्येक नारी में हौवा का वास होता है।
महाभारत आदिपर्व अध्याय 122 में पांडू, अपनी पत्नी कुंती को विवाह प्रथा कैसे शुरू हुई की कथा बताते है। एक बार ऋषि उदद्वालक की पत्नी को स्वयं उसके व उसक् पुत्र श्वेत्केतू के सम्मुख एक अन्य ब्राह्मण, मिलन हेतु बलपूर्वक खींचकर ले जाता है। पुत्र श्वेत्केतू से यह बर्दाश्त नहीं होता, वो इसका विरोध करता है। ऋषि उदद्वालक अपने पुत्र को विरोध करने से रोकते हैं और कहते है- हे पुत्र! यह धर्म संगत है। ब्राह्मण का यह कृत्य धर्मानुसार है। श्वेत्केतू ने धर्म व पिता की आज्ञा की अवमानना करते हुए नारी संरक्षण हेतू विवाह प्रथा शुरू की, लेकिन तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक उन्मादता का पूर्ण त्याग न करते हुए व्यवस्था ने नारी को फिर से छला। उसने विवाह व्यवस्था में पति इच्छा से पुत्र कामना पूर्ति हेतू अन्य मर्द से संसर्ग की छूट प्रदान कर दी।
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क्या कहते हैं समाजशास्त्री
पीजी काॅलेज गाजीपुर के समाजशास्त्र विभाग के रीडर डाॅ एसपी सिंह कहते हैं कि समाज में बदलाव आना एक सतत प्रक्रिया है। वहीं मानव की प्रवृत्ति में ही कामुकता रही है। नारियों के कामुक वस्त्र, उनके पहनावे, रहन-सहन, चाल-चलन आदि भी पुरूष को आकर्षित करते हैं। शारीरिक बनावट के आधार पर भी नारी पुरूषों से कमजोर होती है। ऐसे में सहज ही वे अमानवीय कृत्य का शिकार हो जाती है। अब तो सामाजिक बदलाव के दौर में पुरानी बात नहीं है। नारी सशक्त हुई है और समाज में अपनी जिम्मेवारी भी बखूबी निभा रही है। जहां तक मुआवजा देकर दुष्कर्म पीडि़ता को सरकार की ओर से राहत पहुंचाने की कवायद का सवाल है, इससे उसकी पीड़ा तो कम नहीं होगी, हां, उसके पुनर्वास में ये काफी कारगर साबित होगा। ये सरकार का बेहतर प्रयास है और इसकी सराहना की जानी चाहिए। हां, ऐसे मामलों में न्याय में देरी न करते हुए तत्काल दोषियों को कड़ा दंड देने का भी प्राविधान हो, ताकि आगे से कोई इसकी हिमाकत न कर सके।

Sunday, September 25, 2011

आडवाणी की रथयात्रा

क्या हो पाएगा ‘सत्ता परिवर्तन’
लोकनायक जयप्रकाशनगर से आगाज रहा है शुभदायक
आडवाणी भी हो सकते हैं इस अंधविश्वास के शिकार
रथयात्रा के दौरान जनता पूछ सकती है उनसे कई सवाल
रथ के घोड़ों की लगाम संग सवालों का जवाब भी रखना होगा
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
सियासत में कब क्या हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ ऐसी ही स्थितियों से देश की जनता इन दिनों दो-चार हो रही है।भाजपा भी इस पर पूरा इत्तेफाक रखती है। लोकनायक जयप्रकाशनारायण के जन्मदिन 11 अक्टूबर को उनकी जन्मस्थली यूपी-बिहार सीमा पर स्थित सिताबदियारा से भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की निकलने वाली रथयात्रा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। रथयात्रा से अगर आडवाणी इस मुगालते में हैं कि वे सत्ता परिवर्तन में कामयाब हो जाएंगे, तो उन्हें उन तमाम सवालों का जवाब भी तैयार रखना हो, जो जनता उनसे पूछ सकती है। 
यूपी में चुनावी फिजा बनाने के लिए भाजपा की रथयात्रा की तैयारियां इन दिनों जोर-शोर से हो रही हैं। तैयारियां ही क्यों, भाजपा के नेताओं को ऐसा लग रहा है कि वे इस रथयात्रा के जरिए देश की जनता को एक बार फिर ‘बरगलाने’ में कामयाब हो जाएंगे। रथ सजाएं जा रहे हैं, उन रथों पर कौन सवार होगा, रथ कहां से चलेगा, कहां-कहां रुकेगा, कहां कैसे आगवानी की जाएगी वगैरह-वगैरह की रणनीतियां बनाई जा रही है। बनाई क्या जा रही है, अब तो ये तय भी हो गया है कि बिहार-यूपी सीमा पर स्थित जयप्रकाशनगर से ये रथ निकलेगा। यहां ये बता दें कि जयप्रकाशनगर वह इलाका है जहां एक बहुत बड़ा क्षेत्र ऐसा है जहां के वाशिंदे न तो खुद को बिहार का वासी बता पाते हैं और न ही यूपी का। बिहार में सारण तथा यूपी के बलिया में जयप्रकाशनगर (पूर्व में इसका नाम सिताबदियारा था) का क्षेत्र पड़ता है। इस सीमा विवाद को हल कर पाने में त्रिवेदी आयोग भी असफल रहा है। आज भी यूपी और बिहार के किसान सीमा विवाद को लेकर जान गंवाते हैं। यूपी की जमीन में बोई गई फसल बिहार के दबंग किसान काट ले जाते हैं। कुछ ऐसा ही यूपी के किसान भी करते हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस  की कहावत पर यहां के किसान अपनी जिंदगी गुजारते हैं। सिताबदियारा से लेकर हासनगर दियारा तक के किसानों का यही हाल है। यूपी-बिहार सरकार भी इस दिशा में आजादी के बाद से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। इस मामले में हासनगर के विजयशंकर राय की हत्या तक हो चुकी है। आए दिन यहां असलहे गरजते हैं। कहने का आशय है कि ऐसी भूमि से रथयात्रा निकाल भाजपा  जनता को क्या संदेश देना चाहती है, वह भगवान ही जानें। हां, इतना जरूर है कि लोकनायक जयप्रकाशनारायण की जन्मस्थली, कर्मस्थली जयप्रकाशनगर से संघर्ष का आगाज सदैव  शुभदायक रहा है। हो सकता है कि भाजपा  के लिए ये स्थल के चुनाव के पीछे की मंशा भी यही रही हो। यही जयप्रकाशनगर है, जहां से पूर्व प्रधानमंत्री स्व.चंद्रशेखर ने अपनी भारत यात्रा शुरू की थी। इसी भारत  यात्रा ने चंद्रशेखर को अचानक देश-दुनिया के सामने ला दिया और वे देश के प्रधानमंत्री बने। यह दीगर है कि उनका कुल जमा कार्यकाल चार माह का ही रहा। वहीं अब आडवाणी को भी ये अंधविश्वास हो सकता है कि वे भी अगर जयप्रकाशनगर से अपनी ‘यात्रा’ निकालते हैं तो उन्हें भी मनमांगी मुराद मिल जाएगी। हालांकि उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री की दौड़ से दूर रखने का वादा किया है। खैर, भाजपा  के लिए जनता की वैतरणी पार करने के लिए निकाली गई ये रथयात्रा आडवाणी जी के लिए तीर्थाटन है, पर्यटन है या कुछ और वे ही जानें। हां, आडवाणी जी ने अब तक ये नहीं बताया कि रथयात्रा निकालने के लिए उन्होंने क्या पार्टी हाईकमान से परमिशन ली भी है या यूं ही चल दिए हैं रथ हांकने। जहां तक मेरे ख्याल से ये निर्णय आडवाणी जी का अपना है। सवाल इसका नहीं है कि रथयात्रा कहां से निकलेगी। सवाल ये है कि आडवाणी जी अपनी रथयात्रा किस मकसद को लेकर निकाल रहे हैं। वैसे भाजपा ने अराजकता, भ्रष्टाचार आदि को ही मुद्दा माना है। अगर ये अराजकता के खिलाफ है तो आडवाणी को खुद को जनता से होने वाले तमाम सवालों से भी दो-चार होने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। जब आडवाणी जी देश के उप प्रधानमंत्री थे तो कंधार में विमान आईसी 814 के अपहरणकर्ताओं को छोड़ने का फैसला लिया गया था। इनके गृहमंत्री रहते हुए पुरुलिया हथियार कांड के मुख्य अभियुक्त पीटर ब्लीच को छोड़ दिया गया। वैसे ये कहा जा रहा है कि अन्ना के समर्थन और भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए ये रथ निकाला जा रहा है तो आडवाणी को इस सवाल से भी दो-चार होना पड़ सकता है। गुजरात में पिछले सात साल से भाजपा की सरकार है। भाजपा वहां अपना लोकायुक्त नियुक्त नहीं कर सकी। ऐसे में देश के लिए लोकपाल की मांग पर समर्थन कितना जायज है। खास इसलिए भी कि आडवाणी खुद सांसद थे। दूसरा मध्य प्रदेश। यहां भ्रष्टाचार किस्से-कहानी नहीं, बल्कि किंवदंती बन चुके हैं। भूमाफियाओं और मंत्रियों के सांठ-गांठ के किस्से अब किसी से छुपे नहीं हैं। इसकी गूंज दिल्ली दरबार तक पहुंच चुकी है। अगर ये रथयात्रा आतंक के खात्मे के लिए है तो छत्तीसगढ़ में उनके ही कार्यकाल में नक्सलियों के साम्राज्य का कितना विस्तार हुआ, इसे गृह मंत्रालय की फाइलों को   टटोलकर तलाशा जा सकता है। वही हाल झारखंड का भी है। जब वहां दुबारा भाजपा की सरकार बनाई जा रही थी तो आडवाणी जी काफी विचलित हुए थे। उन्हें लगा था कि भ्रष्टाचार में डूबे सोरेन के साथ सरकार कैसे बनाई जा सकती है। इसके बाद भी आखिर सरकार क्यों बनी। यूपी में भाजपा की सरकार नहीं है, लेकिन 1992 में आडवाणी जी अपनी ली गई कसम भूल  चुके हैं। पंजाब में भाजपा के कई मंत्री सीबीआई के शिकंजे में आ चुके हैं। मजे की बात तो ये कि भाजपा के ही सदस्य खुलेआम बाकी मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं। कर्नाटक में भ्रष्टाचार से घिरे मुख्यमंत्री को भाजपा को हटाना पड़ा। वहीं भ्रष्टाचार से घिरे रेड्डी बंधुओं को सरकार में बनाए रखने के लिए पिछले दो साल में भाजपा व स्वयं लालकृष्ण आडवाणी ने कितनी मेहनत की इससे पूरा देश वाकिफ है। 
वैसे भी अयोध्या आंदोलन के अगुवा रहे लालकृष्ण आडवाणी इन दिनों खुद अजीब राजनीतिक कशमकश के दौर से गुजर रहे हैं। कभी उन्हें हिंदू हृदय सम्राट की पदवी से नवाजने वाला आरएसएस भी उनसे मुंह मोड़ चुका है। यहां तक कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रस्तावित अपनी रथयात्रा के समर्थन के लिए उन्हें नागपुर जाकर मत्था तक टेकना पड़ा है। कल तक जो उन्हें वेटिंग इन पीएम कहते थे अब उन्हें राजनीति की मुख्यधारा से हटने की नसीहत तक देने लगे हैं। यही वजह रही कि नागपुर में सरसंघ चालक से मुलाकात के बाद उन्हें कहना पड़ा कि देश की जनता और पार्टी ने उन्हें जितना दिया, वह प्रधानमंत्री पद से कहीं अधिक है। इस दर्द से इतना आसानी से समझा जा सकता है कि क्या इस रथ यात्रा उनके राजनीतिक जीवन में कोई नया करिश्मा कर पाएगी? वर्ष 1990 के दौर में जो संघ उन्हीं की याद में सोता-जागता था, आज खारिज कर रहा है। यह दीगर है कि 1984 में दो सीटों पर सिमटने वाली भाजपा को आडवाणी की रथयात्रा ने नई चमक दी थी, जिससे केंद्र में भाजपा को सरकार बनाने में काफी सहूलियत हुई। अभी वे राजनीति में इसका लाभ उठा पाते कि वर्ष 2004 में लालकृष्ण आडवाणी ने एक और राजनीतिक भूल कर डाली। तब उन्होंने पाकिस्तान में जिन्ना को सेकुलर बताने वाला बयान दे डाला। तभी से आरएसएस ने उनसे मुंह मोड़ लिया। वैसे भी राजनीति में कुछ भी अंतिम नहीं होता की सोच पर कायम लालकृष्ण आडवाणी का ये मानना हो सकता है कि राजनीति में न तो विचार, न व्यक्ति और न ही अवसर ही अंतिम होता है। इसी नजाकत को भापते हुए उन्होंने यूपीए दो के खिलाफ खुद को खड़ा करने के लिए उन्होंने भ्रष्टाचार को मुद्दा चुना। उन्हें पता है कि सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है। लोगों में इसको लेकर सरकार के खिलाफ गुस्सा है। लिहाजा नोट के बदले वोट मामले में अपने दो पूर्व सांसदों के जेल जाने में उन्होंने अवसर तलाश लिया। उन्होंने लोकसभा में हुंकार भरी  कि वे भी जेल जाने के लिए तैयार हैं। इसके बाद सरकार के खिलाफ अलख जगाने के लिए फिर रथयात्रा का ऐलान कर डाला। उनके इस कदम से संघ और पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेता खुद हतप्रभ रह गए हैं। क्या ये मान लिया जाए कि आडवाणी की ये रथयात्रा उनकी राजनीतिक प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने की अंतिम कोशिश है। हालांकि कुल मिलाकर भाजपा भी कांग्रेस की ही तरह है। उसका भी दामन दागदार है। ऐसे में आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का विश्वास जीत पाएंगे, इस पर संदेह है। सवाल यह भी है कि जो व्यक्ति पार्टी और संघ के बीच अपनी मजबूत उपस्थिति की लड़ाई लड़ रहा हो, वह जनता को क्या भरोसा दिला पाएगा कि सत्ता में आने के बाद उसकी पार्टी भ्रष्टाचार से देश को निजात दिला पाएगी। 
ऐसे तमाम आरोपों से रथ पर सवार महारथियों से जनता जवाब तलाशेगी तो उसका जवाब भी भाजपा के इन दिग्गजों को तैयार रखना होगा। कुल मिलाकर आडवाणी की रथयात्रा का मकसद यही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में अलख जगाई जाए। जनता अन्ना के आंदोलन को भुला न बैठे। ऐसे में भाजपा कोई कोर-कसर छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए लगभग छह हजार किलोमीटर की प्रस्तावित ये चुनावी यात्रा कितनी कारगर होगी, भाजपा लहर एक बार फिर बन पाएगी या नहीं ये तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि जनता भाजपा के हर रंग से वाकिफ हो चुकी है। अगर जनता से वोट मांगने पहुंचने पर इन सवालों का अगर पिटारा खोला तो रथयात्रा के सारे घोड़े एक साथ छूट सकते हैं।

Friday, September 9, 2011

...आखिर ऐसा क्यों?

सीरियल बम ब्लास्ट से दहलता इंडिया
अमेरिका पर दोबारा हमला क्यों नहीं?
अफजल गुरु का आखिर बचाव क्यों?
आतंकवाद से क्यों नहीं लड़ते राजनेता?
दिल्ली, आगरा के बाद अब अगला कौन?
25 मई को दिल्ली हाईकोर्ट की पार्किंग में जोरदार विस्फोट। इसके बाद 17 सितंबर को आगरा के जया अस्पताल में धमाका। आखिर ये बम ब्लास्ट कब तक होते रहेंगे। कब तक बम ब्लास्ट से दहलता रहेगा इंडिया। भारत की नीतियां गलत हैं या यहां आदमी की कोई कीमत नहीं रही। एक ओर जहां अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर बम ब्लास्ट के बाद दूसरी बड़ा ब्लास्ट नहीं हो सका। आखिर ऐसा क्यों? ऐसे तमाम सवालों का जवाब तलाशती रिपोर्ट..!

अनीश कुमार उपाध्याय/नई दिल्ली
एक दशक पहले न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर विध्वंस के बाद अमेरिका में आज तक कोई दूसरा आतंकी हमला नहीं हुआ। इसके विपरीत भारत  में आतंकी हमले सालाना-दर-सालाना हो रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों? लंबी और खर्चीली कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट से संसद तक आतंकी हमलों के आरोपियों का दोष सिद्ध हो रहा है। अदालत आतंकी मुहम्मद अफजल गुरु को फांसी की सजा देती तो है, पर सजा पर कार्रवाई नहीं होती। पहले मानव अधिकार के नाम पर  उसे बचाने की कोशिश की जाती है, तो फिर राजनेता उसकी फांसी टालने की वकालत करते हैं। बरसों बीत गए, मगर अफजल की फांसी नहीं हुई। अब तो स्थिति यह कि वोट के ‘सौदागर’ ‘जनता के लिए’ नहीं, बल्कि अफजल के लिए बोलने लगे हैं। इससे जुड़े अफसरों को धमकियां तक दी जा रही हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि अगर फांसी हुई तो सजा सुनाने वाले जज को मार दिया जाएगा। हालत यह कि राजनेता अफजल के बचाव में अब जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने के फिराक में हैं।
कटिबद्धता का अभाव
यह सब ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि आतंकियों को सजा देने के प्रति हम कटिबद्ध नहीं हैं। सियासत इस बात की हो रही है कि अपराधी यदि किसी विशेष समुदाय का हो, तो उसके साथ नरमी बरतने का चौतरफा उपाय होता है। अन्य संभावित  आतंकियों को बचाने के लिए भी विशेष कानून पोटा तक को रद्द कर दिया गया है। आतंकियों के घर जाकर बड़े नेता उन्हें निर्दोष होने का प्रमाण पत्र देते हैं, जबकि आतंकियों का मुकाबला करते हुए खुद को शहीद करने वाले पुलिसकर्मियों को ही लांछित करते हैं। कुख्यात आतंकवादी को ‘लादेन जी’ कहकर सम्मान देते हैं। इनका समुचित मजहबी तरीके से अंतिम संस्कार होना चाहिए था। यदि आतंकियों के प्रति नरमी दिखाने, बचाने और प्रश्रय तक देने के इतने इंतजाम इस देश में हों, तब नए-नए आतंकियों को शह आखिर मिले भी तो क्यों न? अमेरिका में यह सब नहीं हुआ। उसने अपने ऊपर हमला करने वालों को दंड देने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लोग भले  ही अमेरिकी विदेश नीतियों की आलोचना करें, मगर उन्हें उसे श्रेय देना ही पड़ेगा कि अपने देश की सुरक्षा और सम्मान पर उन्होंने समझौता नहीं किया। हमने ठीक उलटा किया है। निजी या दलीय स्वार्थ, अज्ञानता, भीरुता आदि कारणों से राजनेता आतंकवाद से लड़ने से कतराते हैं।
आखिर नेता क्यों नहीं दृढप्रतिज्ञ?
आखिर हमारे देश के नेता आतंकियों को तय समय में कठोर दंड देने की प्रतिज्ञा क्यों नहीं करते? इसके लिए विशेष कानून क्यों नहीं बनाए गए? आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पोटा और माकोका जैसे कानूनों को समाप्त कर दिया गया। मानवाधिकार हनन होने पर दोषी को दंडित करने की घोषणाएं दोहराई जाती हैं। हास्यास्पद यह कि इन सबके बीच आतंकियों को दंडित करने की न तो सरकारी स्तर पर कोई घोषणा होती है और न ही कोई दबाव ही बनाया जाता है। नतीजा दिल्ली हाईकोर्ट में हुए बम धमाके में 11 लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं, तो करीब पांच गुना लोग जख्मी होते हैं। आगरा के निजी अस्पताल में बम ब्लास्ट हो जाता है। जिंदगी की आस में अपने परिजनों को यहां लाने वाले खुद काल के गाल में समा जाते हैं। तब चाहें जितनी हाय-तौबा हो, किंतु दोषियों को दंडित करने की बात सोंचना भी अब बेमानी लगती है।
कार्रवाई में देरी से अपराधी को लाभ
पुरानी कहावत है कि किसी पकड़े गए अपराधी का सबसे बड़ा मददगार ‘समय’ होता है। किसी अपराध की जांच और दोषी करार करने के बीच होने वाली देर का लाभ  अपराधी को ही मिलता है। यह बात दीगर है कि दुनिया के दूसरे देशों में नागरिकों की जान और देश की अस्मिता की रक्षा के लिए विशेष कानून बनाया जाता है, लेकिन हमारे यहां लोगों की जान सस्ती है। नेताओं को इसकी परवाह नहीं है। अलबत्ता, आतंकियों, माओवादियों और अलगाववादियों की जान जाने पर शोर-शराबा शुरू हो जाता है। आतंकियों के हाथों मारे गए सैनिकों को लेकर हम संवेदनहीन बने हैं। आतंकवाद से लड़ने की इस आत्मघाती और ढीली पद्धति से ही देश आतंकियों के निशाने पर है।
आतंकवाद से पीड़ित देश भारत
भारत दुनिया के आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित देशों में से एक है, लेकिन हमारा देश दुनिया की नजरों में संकल्पहीन देश के रूप विख्यात है। यही कारण है कि अतिसुरक्षित दिल्ली आज सबसे अधिक असुरक्षित है। प्रशासनिक तौर पर चाक-चौबंद आगरा भी आतंकियों का शिकार हो गया।

स्थान बदला, आतंकी नहीं
दिल्ली में पिछला बम धमाका 25 मई को  न्यायालय के गेट नंबर सात के पास वकीलों के पार्किंग में हुआ था। दूसरी बार गेट नंबर पांच पर। पिछली बार कोई नुकसान नहीं, इस बार पूरा देश हिल गया। संसद और सुप्रीम कोर्ट के नजदीक वीवीआईपी इलाके में हुए विस्फोट ने देश की सुरक्षा और आतंकवाद से निपटने के लिए सरकारी कवायद पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं आगरा में ताजमहल से महज ढाई किलोमीटर की दूरी पर स्थित निजी अस्पताल में बम धमाके ने प्रशासनिक चौकसी को चुनौती दी है। यह आतंकियों की चेतावनी है। अगर जल्द ही आतंकियों को सजा नहीं गई, तो नागरिक सुरक्षा खतरे में है।
सहमने नहीं, चेतने का है वक्त
आगरा के सिकंदरा रोड स्थित जया हास्पिटल में हुए बम धमाके और थैले में मिले विस्फोटक पदार्थ आतंकियों के शक्तिशाली होने का सुबूत है। वे  कभी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। ऐसा वे कर भी  रहे हैं। संवेदनशील जगहों पर ब्लास्ट कर आराम से निकल जाना उनकी निडरता का परिचायक है। संसद सत्र के दौरन दिल्ली हाईकोर्ट के सामने धमाका आतंकवादी कार्रवाई का सबसे अहम हिस्सा है। उसी संसद की जिसकी आबरू पर 13 दिसंबर 2001 को हमला किया गया था। हाईकोर्ट का पहला धमाका चेतावनी थी।
आईटी में हीरो, सुरक्षा में जीरो
आईटी मामलों में दुनिया की महाशक्ति का दर्जा रखते हैं, मगर सुरक्षा के मामले में फेल हैं। खास यह भी कि हर घटनाओं के बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं तो आती है, लेकिन इसकी रोकथाम का उपाय कोई नहीं सुझाता। अन्ना के आंदोलन के बाद लोगों में नेताओं के प्रति अविश्वास बढ़ा है। देश में होने वाली बार-बार की आतंकी घटनाओं के बीच सोमनाथ को बिसराना नादानी होगी। मोहम्मद गजनी ने सोमनाथ पर विजय पाने के लिए कुल 27 बार हमले किए। अंतत: आखिरकार वह कामयाब रहा। कारण था कि तत्कालीन राजाओं के पास स्थाई रूप से संगठित और प्रशिक्षित सेनाएं नहीं थीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी सरकार गजनी काल में प्रवेश कर गई है?

इनसेट...
चुनौती देकर गायब होते आतंकी
आतंकी दिल्ली में एक छोटे से ब्रीफकेस, आगरा में टिफिन बॉक्स से धमाका करके गायब हो जाते हैं। प्रशासनिक चौकसी धरी रह जाती है। एक अनुमान के मुताबिक, पिछले डेढ़ दशक में दिल्ली में डेढ़ दर्जन से अधिक आतंकी वारदात हो चुकी हैं। ऐसे में आगरा जैसे ताज सिटी और अन्य छोटे-मोटे शहरों की बिसात ही क्या है। अ•ाी तक चूकने वाले 10 व्यक्तियों या एजेंसियों का खुलासा नहीं हो सका है। आतंकियों से निपटने की रणनीति लगातार बदल रही है, मगर उससे निपटने की हमारी मन:स्थिति और गति पुरानी ही है। मुंबई पर 26/11 को हुए हमले और उसके बाद की घटनाएं इसका प्रमाण है कि कहीं कुछ नहीं बदला है। नागरिकों को अभ्यस्त बनाया जा रहा है कि वे आम चुनाव की तरह ही अपनी सुरक्षा पर होने वाले हमलों की भी तैयारी करती रहे। हर घटना के बाद सत्ता के शिखर पुरुष सिर झुकाकर मुआवजों के साथ-साथ आश्वासनों का लॉलीपॉप थमाते रहेंगे। इसी वर्ष 25 मई तथा इस विस्फोट के ठीक तीन माह तेरह दिन बाद दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर भीषण बम विस्फोट में 15 लोगों की मौत के बाद आगरा में बम धमाके से हमारी सरकार कोई सबक लेगी इसकी उम्मीद नहीं दिख रही है।
इनसेट...
यूपी में आतंक का साया
-5 जुलाई 2005: अयोध्या में रामजन्म भूमि परिसर में पांच आतंकी फायरिंग करते हुए घुसे।
-28 जुलाई 2005: जौनपुर के निकट श्रमजीवी एक्सप्रेस में विस्फोट। 14 व्यक्तियों की मौत।
-7 मार्च 2006 : वाराणसी के संकटमोचन मंदिर, रेलवे स्टेशन पर विस्फोट, 12 लोग मारे गए।
-22 मई 2007 : गोरखपुर के घंटाघर के पास सीरियल विस्फोट में तीन मरे।
-23 नवंबर 2007 : लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद कचहरी में विस्फोट में 10 की मौत।
- 31 दिसंबर 2007/ 01 जनवरी 2008 को रामपुर के सीआरपीएफ कैंप पर हमले में क्रमश: सात और एक जवान की मौत।
-07 दिसंबर 2010 वाराणसी में आरती के दौरान विस्फोट। एक की मौत, 50 घायल।
-17 सितंबर 2011-आगरा में बम धमाके में 15 जख्मी।