श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Sunday, October 30, 2011

मनरेगा पर ‘महाभारत’

चले थे हज बख्शवाने, रोजे पड़ गए गले
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने लगाया मनरेगा में धांधली का आरोप
जयराम ने जिस एनजीओ को बनाया आधार, उसी ने झाड़ा पल्ला
मनरेगा में भ्रष्टाचार को लेकर दर्ज किए गए थे 10 एफआईआर
मीडिया को चिट्ठी लीक होने की खबर से नाराज हुए सीएम माया
मनरेगा को लेकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस व प्रदेश की मुखिया मायावती के बीच चल रही महाभारत में कोई पीछे हटने का तैयार नहीं है। वहीं केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश जिस एनजीओ को आधार बनाकर मायावती को लपेट रहे थे, उसी एनजीओ ने ऐसी किसी  भी जानकारी से इनकार कर केंद्रीय मंत्री को कटघरे में ला खड़ा किया है।
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
केंद्र और यूपी सरकार के बीच चल रही सियासी जंग के बीच अब मनरेगा एक नया मुद्दा बन गया है। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने योजना की धनराशि के दुरुपयोग पर सीबीआई जांच की जरूरत से इंकार करते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश पर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए पीएम मनमोहन सिंह को पत्र लिखा। वहीं रमेश ने भी पलटवार करते हुए कहा कि वे यूपी सरकार के आरोपों पर कोई जवाब नहीं देंगे। खैर, मनरेगा को लेकर केंद्र व यूपी सरकार में छिड़ी महाभारत का मामला पीएम दरबार में है। जबकि केंद्रीय मंत्री जिस एनजीओ के सहारे सीएम को कटघरे में खड़ा कर रहे थे, उसी एनजीओ ने उनके दावे का खंडन भी कर दिया है। लिहाजा केंद्र सरकार एक बार फिर बगले झांकते दिख रही है।
क्या था मामला
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को मनरेगा योजना में राज्य में एक बड़े घोटाले का हवाला देते हुए एक पत्र लिखा। वनांगना एनजीओ को आधार बनाकर लिखे गए खत में उन्होंने मनरेगा के धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया। खास तौर पर प्रदेश के सात जिलों यथा बलरामपुर, गोंडा, महोबा, सोनभद्र, संत कबीर नगर, कुशीनगर और मिर्जापुर में मनरेगा के धन के दुरुपयोग का आरोप सूबे की बसपा सरकार पर लगाया। बलरामपुर में जहां 2007-08 में  विभिन्न पंचायतों में 1.5 लाख से अधिक कैलेंडर प्रत्येक 31 रुपये की लागत से मनरेगा के धन से खरीदा गया। इसके अलावा 80 लाख रुपये के प्राथमिक चिकित्सा बक्से, सात लाख रुपये के टेंट भी खरीदे गए। वहीं गोंडा में इसी सत्र में पंचायतों में 37 लाख रुपये के खिलौने खरीदे गए। वहीं 1.09 करोड़ के टेंट की खरीद हुई। अधिकांश खरीद उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड से बिना निविदा के खरीदे गए थे। इसी क्रम में कुशीनगर में भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था। मिर्जापुर में चार करोड़ रुपये गबन का आरोप लगाया गया। उधर, सोनभद्र में भी 250 करोड़ रुपये के दुरुपयोग व गबन का आरोप लगाया गया था।
...फिर शुरू हुई घेरने की कवायद
पत्र में दिए गए अनाप-शनाप खर्च के आंकड़े बयां कर रहे हैं कि यूपी में मनरेगा के धन में जमकर धांधली की गई है। कांग्रेस ने इसे ही आधार बनाकर यूपी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने रमेश की तरफदारी करते हुए कहा है कि ग्रामीण विकास मंत्री का खत तथ्यों पर आधारित है और तथ्य कभी झूठ नहीं बोलते। खास यह कि अभी चार दिन पहले ही केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने मुख्यमंत्री मायावती को यूपी में मनरेगा की बदहाली और धांधली पर लंबा-चौड़ा पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने यूपी के सात जिलों में मनरेगा में फंड के दुरुपयोग की बात कहते हुए मामले की सीबीआई जांच का सुझाव तो दिया ही, साथ ही आगे के लिए फंड रोकने की भी चेतावनी दे डाली।
एनजीओ ने भी झाड़ लिया पल्ला
अभी ये मामला चल ही रहा था कि अचानक नाटकीय ढंग से मामले की हवा निकल गई। हुआ ये कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश जिस एनजीओ को आधार बनाकर यूपी की माया सरकार पर आग्नेयास्त्र छोड़ रहे थे, उसकी हवा उसी एनजीओ ने निकाल दी। रमेश ने यूपी की सीएम मायावती को मनरेगा में हुई गड़बड़ियो  के मद्देनजर लिखी चिट्ठी में वनांगना एनजीओ का जिक्र किया था। इस एनजीओ से मिले फीडबैक का हवाला देते हुए जयराम ने माया सरकार से यूपी में मनरेगा को लेकर हो रही धांधली की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी। वहीं वनांगना एनजीओ ने दावा किया है कि उसने जयराम रमेश को इस तरह का कोई फीडबैक दिया ही नहीं है। एनजीओ संस्थापक सदस्य माधवी कुकरेजा ने बताया है कि इसी साल सितंबर में दिल्ली में मनरेगा पर सम्मेलन में उन्होंने इस स्कीम में दलित महिलाओं की भागीदारी के मुद्दे पर अपनी बात रखी थी। रमेश इस कार्यक्रम में बतौर चीफ गेस्ट मौजूद थे। मगर उन्होंने न तो मनरेगा में गड़बड़ी या धांधली जैसी कोई बात उठाई थी और न ही सीबीआई जांच की मांग रखी थी। माधवी के मुताबिक रमेश ने अपनी चिट्ठी में यूपी के सोनभद्र व महोबा जैसे जिन जिलों में हो रही कथित गड़बड़ियो का जिक्र किया है, वहां तो उनका संगठन काम भी नहीं करता है। उन्होंने राजनीतिक शक्ल ले चुके इस मसले में अपने संगठन को लपेटे जाने पर सख्त ऐतराज भी जताया है।
चिट्ठी लीक होने से खफा सीएम
मायावती का कहना है कि केंद्रीय मंत्री जयराम   रमेश की चिट्ठी उन्हें मिलने से पहले मीडिया को दे दी गई। हालांकि रमेश का पत्र मिलने के बाद सीएम ने चार जिलों क्रमश: बलरामपुर, गोंडा, मिर्जापुर और महोबा में गड़बड़ियों की जांच आर्थिक अपराध शाखा यानी ईओडब्लू से कराने के निर्देश दे दिए हैं। सीएम ने कहा है कि राज्य की एजेंसियां भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने में सक्षम हैं। कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने भी बताया है कि सीएम मायावती ने पीएम को इसके लिए पत्र भेज भी दिया है। इसमें बताया गया है कि किस तरह प्रदेश सरकार ने किस तरह  योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया है। मायावती ने बताया है कि राज्य सरकार ने पहले से ही उपलब्ध धनराशि का 60 फीसदी धन खर्च कर लिया है। वहीं दूसरी किस्त के लिए जरूरी अभिलेखों के साथ मांग भेजी गई है। सीएम ने पीएम से अनुरोध किया कि वे इस मामले में दखल कर धनराशि समय से रिलीज कराने की पहल करें ताकि योजना पर अमल समय में हो सके। नसीहत दी है कि जरूरतमंद परिवारों को रोजी-रोटी उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य दोनों को एक साथ खड़ा होना होगा।
10 एफआईआर दर्ज
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने जिन सात जिलों में गड़बड़ियों की शिकायत की है, मुख्यमंत्री ने वहां जांच शुरू करा दी है। अब तक 18 प्रथम श्रेणी, 13 द्वितीय श्रेणी और 43 तृतीय श्रेणी के अधिकारियों के साथ ही 236 फील्ड लेबल कर्मचारियों के विरूद्ध निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। वित्तीय अनियमितताओं के 71 एफआईआर दर्ज कराए गए हैं। इसके अलावा 53.97 लाख रुपये की धनराशि की वसूली की गई है। वहीं 131 लाख रुपये की वसूली की कार्रवाई की जा रही है। ये मामले इसकी गवाही दे रहे हैं कि कहीं न कहीं शासन की इस महत्वाकांक्षी योजना को पलीता लगाया गया है। मामला भले ही सूबे की मायावती सरकार और केंद्र सरकार के बीच बहस का मुद्दा हो, लेकिन जिस मकसद से ये योजना अस्तित्व में आई, उसकी कलई कम से कम इस बहस के जरिये यूपी में तो खुल ही चुकी है।
इनसेट...
जयराम के लगाए गए आरोप
-मनरेगा योजना के फंड का यूपी सरकार ने किया है दुरुपयोग।
-कई जिलों में खिलौने, कैलेंडर, टेंट की खरीद में किए गए करोड़ों खर्च।
-बिना टेंडर व मानकों के विपरीत प्रदेश सरकार ने की है खरीद।
-पूरे मामले की सीबीआई जांच क्यों नहीं की जा सकती।
मायावती की ओर से दिए गए जवाब
-ग्रामीण विकास मंत्रालय की वेबसाइट बीते चार साल में यूपी में मनरेगा के कामों को बेहतर बता रही है।
-केंद्रीय मंत्री जयराम की ओर से मनरेगा संबंधी भेजा गया खत राजनीति से प्रेरित है।
-जो पत्र उन्हें पहले मिलना चाहिए था, उससे पहले वह मीडिया में पहुंच गया।
-भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए राज्य की एजेंसियां सक्षम है। इस मामले में सीबीआई जांच नहीं होगी।
-मामले की जांच ईओडब्ल्यू को सौंपी गई। जांच एक एसपी के नेतृत्व में गठित टीम करेगी। प्रदेश सरकार ने मामले में संलिप्त कई निचले अधिकारियों को किया निलंबित।
-बलरामपुर, गोंडा, मिर्जापुर, महोबा में ईओडब्ल्यू की जांच के निर्देश
-कई अधिकारियों पर गिराई गई गाज
-जयराम के आरोप को कांग्रेस ने ठहराया जायज। कहा, कभी झूठ नहीं बोलते जयराम।
इनसेट...
किसने क्या कहा...
जयराम रमेश के पत्र में लगाए गए आरोप और उठाए गए बिंदु राजनीति से प्रेरित हैं। रमेश का पत्र राज्य सरकार को प्राप्त होने से पहले मीडिया में पहुंचाना उनकी मंशा का जाहिर करता है।
शशांक शेखर सिंह, मंत्रिमंडलीय सचिव, उत्तर प्रदेश
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की ओर से भेजे गए खत पर मायावती ने शोर ज्यादा मचाया है, जबकि उसके जवाब में तथ्य नहीं दिए हैं।
मनु सिंघवी, कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता
मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार की जांच पर कांग्रेस व बसपा नूरा कुश्ती कर रही हैं। हाईकोर्ट की देखरेख में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच होनी चाहिए। चुनावी माहौल में मनरेगा को लेकर केंद्र और राज्य के बीच तलवारें खिंचना उनकी मिलीभगत है। ऐसा नहीं होता तो आखिर कल तक बसपा पर मेहरबान रही कांग्रेस को अचानक यूपी में भ्रष्टाचार की चिंता कैसे सताने लगी? 
मुख्तार अब्बास नकवी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा
अपना दामन पाक-साफ बताने वाली प्रदेश की मायावती सरकार को जांच से आखिर किस बात का डर है? विधानसभा चुनाव से पहले दूध का दूध और पानी का पानी अगर उन्हें करना है तो आज ही पत्र लिखकर सीबीआई जांच की सिफारिश कर देनी चाहिए।
श्रीप्रकाश जायसवाल,
केंद्रीय कोयला मंत्री

ज्यादा दागी कौन?

‘हम नहीं कोई और है’
प्रदेश मंत्री ने किया दावा, भाजपा  आज भी बेदाग
सपा-बसपा की राजनीति से ऊब चुकी है जनता
महंगाई,  भ्रष्टाचार से कांग्रेस से टूट चुका है मोह
अन्ना आंदोलन से खुल गई है विपक्षियों की कलई 
‘‘लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के महामंत्री और अध्यक्ष से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले भाजपा के प्रदेश मंत्री दयाशंकर सिंह प्रदेश की राजनीति में भाजपा को पाक-साफ होने का दावा करते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि आज तमाम राजनीतिक दल दागदार हैं, लेकिन भाजपा आज  भी बेदाग है और आगे भी रहेगी। सपा-बसपा पर आय से अधिक काला धन अर्जित करने का आरोप है तो कांग्रेस महंगाई और भ्रष्टाचार  को लेकर कटघरे में है। भाजपा ही केवल वह दल है जिसमें यूपी में कोई दाग नहीं है।’’
अनीश कुमार उपाध्याय / दिल्ली
भाजपा की प्रदेश स्तरीय राजनीति में दयाशंकर सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं। लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरूआत करने वाले दयाशंकर वर्तमान में भाजपा के प्रदेश मंत्री हैं। काफी बरसों तक ये भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे। यूपी के पूर्वी छोर पर बसे बलिया से इन्होंने सदर विधानसभा  से भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ा। ये दीगर है कि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा और सपा-बसपा की सीधी टक्कर के बीच ये दरकिनार कर दिए गए। हालांकि इसके बाद भी वे बलिया की जनता के दिलों में रहते हैं। न सिर्फ राजनीति के चलते बल्कि अपनी सामाजिक कार्यों की वजह से। गरीबों की सेवा और मानवता की रक्षा के लिए खुद को संकल्पित बताने वाले दयाशंकर सिंह मौजूदा राजनीति में भ्रष्टाचार की घुसपैठ से आहत हैं। पिछले दिनों हमवतन के मीडिया इंचार्ज अनीश कुमार उपाध्याय से दूरभाष पर बातचीत हुई। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश...।
हमवतन: दयाशंकर जी, आप भाजपा के पुराने सदस्य रहे हैं, वर्तमान में भाजपा की स्थिति काफी दयनीय हो चली है। इसके लिए आप किसे कुसूरवार मानते हैं?
दयाशंकर: मैं छात्र राजनीति से भाजपा की राजनीति में आया हूं। काफी उतार-चढ़ाव भी देखे हैं। जहां तक भाजपा की गिरती साख का सवाल है, अब ऐसा नहीं है। संगठन तेजी से एक बार फिर मजबूत हुआ है। भाजपा हमेशा जनता के हितों के लिए संघर्ष करती रही है और आगे भी करती रहेगी। जहां तक भाजपा की गिरती साख का सवाल है, भाजपा से जनता की काफी अपेक्षाएं थीं। जो होनी भी चाहिए। जहां तक इसके लिए किसी के कुसूरवार होने का सवाल है, इसके लिए कोई एक दोषी नहीं होता। कहीं न कहीं हमारे में कमी रही होगी, उसे काफी हद तक दूर कर भी लिया गया है। पिछले दिनों आडवाणी जी ने जो रथयात्रा निकाली, उसमें लोगों के उमड़े हुजूम को देखकर ऐसा लगा कि मानों लोग भाजपा की ओर एक बार फिर टकटकी लगाए देख रहे हैं। जनता का उत्साह ये कह रहा था कि वे मौजूद केंद्र व प्रदेश की सरकार से दुखी हैं।
हमवतन: भ्रष्टाचार  के खात्मे को लेकर आडवाणी जी ने रथयात्रा निकाली। क्या आपको ऐसा लगता है कि आडवाणी जी वास्तव में क्या एक बार फिर जनता के दिलों में इस यात्रा से जगह बना पाएंगे?
दयाशंकर: मैं ये स्पष्ट कर दूं कि आडवाणी जी ने अपनी रथयात्रा न केवल भ्रष्टाचार  को लेकर निकाली है, बल्कि इसके पीछे मौजूद लूटतंत्र का खुलासा करना भी है। यूपी में जिधर से भी आडवाणी जी की रथयात्रा गुजरी लोगों का हुजूम उनकी बाट जोहता दिखा। उमड़े हुजूम और लोगों के अपार समर्थन इसकी गवाही दे रहा था कि भाजपा एक बार फिर सत्ता में आएगी। रथयात्रा के समर्थन में न सिर्फ काफी तादाद में महिला, पुरुषों ने समर्थन दिया, बल्कि काफी तादाद में युवा भी थे। किसी भी देश की ताकत युवा शक्ति से पहचानी जाती है। ऐसे में अगर भाजपा के साथ ये युवा हैं, तो नि:संदेह भाजपा न सिर्फ प्रदेश की सत्ता पर काबिज होगी, बल्कि केंद्र में एक बार फिर कमल खिलेगा।
हमवतन: हम एक बार फिर भ्रष्टाचार के मूल मुद्दे से भटक रहे हैं। आडवाणी जी ने रथयात्रा निकालते वक्त भ्रष्टाचार  का खात्मे को भी एक मुद्दा माना था। क्या आपको लगता है कि भ्रष्टाचार के मामले में आपका संगठन यानी भाजपा पाक-साफ है।
दयाशंकर: नि:संदेह। भाजपा आज भी अन्य दलों से बेहतर संगठन है। इसके कर्मठ कार्यकर्ता ही इसकी पहचान हैं। अन्य दलों में काफी दागदार हैं। आए दिन किसी न किसी राजनीतिक दल के दागदार चेहरे जनता के सामने आ रहे हैं। हर दल में दागी हैं। हां, भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा दागी नहीं है, अन्य दल के लोग हैं। भाजपा वैसे भी भारतीय संस्कृति की पहचान है। हमारे कार्यकर्ता देशभक्ति की भावना से लबरेज होते हैं। वहीं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का घुन लोकतंत्र की जड़ों का खोखला कर रहा है। आडवाणी जी की रथयात्रा के पीछे इन घुनों को मिटाना है। इसके लिए सशक्त लोकपाल का होना जरूरी है।
हमवतन: भ्रष्टाचार का जहां तक सवाल है गुजरात में पिछले सात साल से भाजपा की सरकार है। भाजपा वहां अपना लोकायुक्त नियुक्त नहीं कर पाई है। ऐसे में देश के लिए सशक्त लोकपाल की मांग करना कितना जायज है?
दयाशंकर: गुजरात में भाजपा शासनकाल में चहुंओर सुख-शांति है। अन्य दलों के शासनकाल और मौजूदा शासनकाल की तुलना कर आप स्थिति का आकलन सहज ही कर सकते हैं। वहां लोकायुक्त की   नियुक्ति की दिशा में प्रयास जारी है। आशा है कि जल्द ही इस पर अमल भी हो जाएगा। वैसे भी भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए अगर देश स्तर पर लोकायुक्त होगा तो राज्य स्तर में भी इसकी पहल हो जाएगी। दोनों अलग-अलग बातें हैं। गुजरात में जल्द लोकायुक्त नियुक्त होगा। कर्नाटक में लोकायुक्त की नियुक्ति होने जा रही है।
हमवतन: आपने ये कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर कोई दाग नहीं है। अभी पिछले दिनों ही भाजपा के कई नेता ऐसे ही मामले में गिरफ्तार किए गए हैं। जैसे कर्नाटक के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी वगैरह-वगैरह...।
दयाशंकर: देखिए, मैं ये स्पष्ट कर दूं कि किसी भी संगठन में हर किस्म के लोग जुड़ते हैं। अभी तक इन पर केवल आरोप लगे हैं, पुष्टि नहीं हुई है। किसी पर आरोप लगने मात्र से उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। वहीं अन्य दलों के कई राजनेताओं पर आरोप साबित भी हो चुके हैं। सबसे खास बात तो ये कि यूपी की राजनीति में किसी भी भाजपा नेता पर ऐसा आरोप नहीं है कि उन्होंने कहीं भ्रष्टाचार किया है। उत्तर प्रदेश की जनता भी इस स्थिति से भलीभांति  वाकिफ हो चुकी है कि अन्य दलों में भ्रष्टाचारियों की लंबी-चौड़ी फौज है, जबकि प्रदेश भाजपा का दामन आज भी पाक-साफ है। खैर, फिर भी अगर हमारा कोई भी नेता भ्रष्टाचार का दोषी मिलेगा तो नि:संदेह उस पर कार्रवाई की जाएगी।
हमवतन: यूपी की मौजूदा राजनीति में सपा-बसपा को लेकर ही ध्रुवीकरण माना जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में भी दोनों दलों में सीधी टक्कर को लेकर उम्मीद जताई जा रही है। ऐसे में आप भाजपा को कहां पाते हैं?
दयाशंकर: देखिए, मौजूदा राजनीति में इन दोनों दलों की कलई जनता की अदालत में खुल चुकी है। दोनों दलों के असली चेहरे जनता के सामने आ चुके हैं। आए दिन इन दोनों दलों के नेता भ्रष्टाचार के मामले में घिरते जा रहे हैं। अन्ना के आंदोलन के बाद सपा-बसपा की रही-सही कसर भी पूरी हो चुकी है। जनता ये जान चुकी है कि ये दोनों दलों के नेता जनता को लूटते हैं। ऐसे में भाजपा की दावेदारी यूपी में दमदार हो जाती है।
हमवतन: सपा-बसपा के अलावा कांग्रेस भी यूपी की राजनीति में अपना दखल दे सकती है। आपने उसके विषय में कुछ नहीं कहा!
दयाशंकर: यूपी की राजनीति में कांग्रेस बिल्कुल निचले पायदान पर पहुंच गई है। महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों की राजनीति से जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो गया है। आज गरीबों को खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं मिल रहा। सरकार की तमाम योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही है। समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद तो यूपी की जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो चुका है। ऐसे में कांग्रेस का यूपी में कोई अस्तित्व दूर-दूर तक नहीं दिख रहा।
हमवतन: आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने क्या तैयारी की है? अबकी चुनाव मेंभाजपा का मूल मुद्दा क्या होगा?
दयाशंकर: हम अपने पुराने मुद्दे पर आज भी कायम हैं। भ्रष्टाचार के खात्मे का संकल्प लेकर हम चुनाव मैदान में उतरेंगे। प्रदेश का चतुर्मुखी विकास, सबको अपना हक-हकूक दिलाना, हर जाति, धर्म के लोगों को विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए भाजपा संकल्पित है। अबकी चुनाव में भाजपा का प्रयास होगा कि वे प्रदेश की हर सीटों पर दमदार प्रत्याशी दे। प्रत्याशी ऐसा हो जो जनता से जुड़ा हो। जमीनी हो। गरीबों, दबे-कुचलों के हक-हकूक के लिए संघर्ष करने वाला हो।
हमवतन: परिसीमन के चलते क्या भाजपा को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है?
दयाशंकर: देखिए, किसी भी विधानसभा में पार्टी का उद्देश्य, प्रत्याशी का चरित्र ही जीत में अहम किरदार निभाता है। अगर प्रत्याशी बेहतर होगा तो जनता उसे जरूर अपना मत देगी। जहां तक परिसीमन का सवाल है इससे अब कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। हां, इससे थोड़ा असंतुलन की स्थिति जरूर पैदा हुई है, लेकिन इसका असर भाजपा पर नहीं पड़ेगा। कारण कि प्रदेश की जनता सपा, बसपा की राजनीति से ऊब चुकी है। इनके क्रियाकलापों से नाराज जनता भाजपा को लेकर आशान्वित है। उम्मीद है कि इस परिसीमन का पूरा लाभ भाजपा को मिलेगा। भाजपा एक बार फिर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होगी। भाजपा के पास कर्मठ और जुझारू  कार्यकर्ताओं की लंबी-चौड़ी फौज है। खास ये कि आज भी युवा शक्ति भाजपा के साथ है। वैसे भी  राजनीति में युवा शक्ति का रोल अहम होता है। प्रदेश के अन्य दलों की अपेक्षा भाजपा की साख काफी उम्दा है। लिहाजा अबकी भाजपा को सत्ता में आने से कोई ताकत रोक नहीं सकती।

Thursday, October 27, 2011

गऊ मारकर जूते दान

 ...अब कांग्रेस से भयभीत ‘अन्ना टीम’
किरण बेदी के आयोजकों से वसूले अधिक धन का मामला
ऐसे तो ए.राजा और कोनिमोझी को भी मिलनी चाहिए माफी
मामले के पर्दाफाश के बाद बदल गए किरण बेदी के स्वर
जनलोकपाल के मुद्दे से भटक चुका है अन्ना का आंदोलन
अन्ना टीम की सक्रिय सदस्य एवं पूर्व आईपीएस किरण बेदी ये मान चुकी हैं कि उन्होंने आयोजकों से हवाई टिकटों के पैसे बचाए थे। तर्क देती हैं कि ये धन उन्होंने ट्रस्ट के लिए बचाए थे। क्या उनका ये माफीनामा उनको अपराध मुक्त कर देगा? क्या झूठ या हेराफेरी से ट्रस्ट के लिए ही सही धन बटोरना कानूनी या नैतिक रूप से उचित है? ये यात्राएं उन्होंने अन्ना के लिए कीं? क्या केवल अन्ना टीम में सक्रियता के चलते ही उन्हें माफी चाहिए? कुल मिलाकर हालात बदल गए हैं। कल तक जो कांग्रेस अन्ना टीम से भीत थी आज अन्ना टीम वैसे ही कांग्रेस से भयभीत है।
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
काफी पुरानी कहावत है गऊ मारकर जूते दान। किरण बेदी कुछ ऐसा ही कर रही हैं। वे कहती हैं कि खुद को कष्ट दे उन्होंने जो धन हवाई टिकटों से बचाए थे, अब वे वापिस कर देंगी। यानी मामले के पर्दाफाश के बाद स्वर बदल गए हैं। उनके समर्थक भी दुहाई दे रहे हैं कि वे भी इंसान है और इंसान से चूक तो होती ही है। अब जब वे धन वापसी को तैयार हैं तो इस मामले का पटाक्षेप होना चाहिए। समर्थकों का ये भी आरोप है कि अन्ना आंदोलन से खार खाए लोगों की अन्ना टीम को बदनाम करने की ये साजिश है। अगर किरण को इंसान मान लिया और उनकी गलती चूक है तो ए.राजा और कनिमोझी भी तो इंसान है। फिर तो काले कारनामे करने वालों की फेहरिश्त में वे सभी होंगे, जो गलती मानकर पाक-साफ हो जाएंगे। वे भी अगर अपनी काली कमाई सरकार को सौंप दें तो सभी को माफ भी कर देना चाहिए! क्यों, अगर किरण को माफी दी जा सकती है तो औरों को क्यों नहीं?
कांग्रेस ने तो नहीं दी थी सलाह
अगर अन्ना टीम के खिलाफ ये मुहिम कांग्रेस की साजिश भी मान लें तो भी कहीं से कांग्रेस कटघरे में खड़ी नहीं दिखती। किरण बेदी का मामला हो या प्रशांत भूषण का। कांग्रेस ने किरण को हवाई टिकट के पैसे बचाने की सलाह नहीं दी थी। प्रशांत भूषण पर हमला करने वाला भी दूर-दूर तक कांग्रेसी नहीं। अगर इसमें कांग्रेस की भूमिका रही होती तो नि:संदेह अब तक देश की राजनीति में भूचाल आ गया होता। सच पूछिए तो कल तक कांग्रेस के खिलाफ बारुद भरने वाली अन्ना टीम आज खुद बारूद के ढेर पर जा बैठी है। वैसे अगर मूल मुद्दे की बात करें तो भ्रष्टाचार यूं ही खत्म नहीं हो सकता। इसके लिए हर व्यक्ति में बदलाव लाना होगा। जिस देश के लोग खुद की हिफाजत के लिए हेलमेट न पहनने के लिए भी बहाने ढूंढ लेते हैं, वहां सख्त कानून तो चाहिए, लेकिन लोगों के हृदय परिवर्तन के साथ।
मिल रहा अशुभ संकेत
अब बात यदि समाजसेवी अन्ना हजारे की करें तो जनलोकपाल के लिए अपनी मुहिम का आगाज कर रातोंरात देश के नायक के रूप में वे उभरे। वहीं अब अन्ना टीम व केंद्र सरकार के बीच चल रहे वाक युद्ध और टकरावपूर्ण माहौल ने अशुभ संकेत भी देना शुरू कर दिया है। अप्रैल माह में अन्ना ने जंतर-मंतर पर  अपना आंदोलन का आगाज किया। तब से लेकर अब तक अन्ना समेत उनके सभी प्रमुख सहयोगी आरोपों के कटघरे में आ चुके है। प्रशांत से मारपीट करने वाले युवकों ने खुद को श्रीराम सेना का सदस्य बताया। वे काश्मीर में जनमत संग्रह संबंधी प्रशांत के बयान से खफा थे। वहीं केजरीवाल पर लखनऊ में चप्पल फेंकने वाले जितेंद्र पाठक ने स्वीकार किया कि वे अन्ना द्वारा कांग्रेस के विरूद्ध चलाए जा रहे अभियान से नाराज हैं। जितेंद्र को कांग्रेस अपना सदस्य तक नहीं मानती।
...तो दामन बेदाग होने वाला नहीं
देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी का ये मामला काफी गंभीर है। वे दुनियाभर में नैतिकता पर प्रवचन देती हैं। वहीं खुद इकोनॉमी क्लास में हवाई सफर कर आयोजकों से बिजनेस क्लास का किराया वसूलती हैं। कुल मिलाकर उनका ये तर्क हास्यास्पद है कि रकम का अंतर वह अपने एनजीओ को देकर सामाजिक कार्यों में लगा रहीं थीं।  जिस राष्ट्रपिता बापू की दुहाई अन्ना टीम बार-बार देती है, उन्होंने ही कहा था कि सिर्फ साध्य की पवित्रता पर्याप्त नहीं है, साधन भी पवित्र होना चाहिए। इस मामले में किरण बेदी का साध्य भले ही पवित्र हो, लेकिन साधन तो असत्य पर ही आधारित है। अब अगर वे झूठ या हेराफेरी में पकड़े जाने पर रकम वापस भी कर देती हैं तो उनका दामन बेदाग होने वाला नहीं।

Monday, October 24, 2011

आरोपों की ‘जुगाली’


एजेंडे पर नहीं बात, ‘केंद्र’ पर आघात
सबको चाहिए विशेष राज्य का दर्जा
विकास के लिए हर कोई चाहता पैकेज
महंगाई, अपराध से निबटने से बेफिक्र
विपक्षियों का केंद्र पर पक्षपात का आरोप
12 वीं पंचवर्षीय योजना के एप्रोच पेपर को लेकर अबकी हुई राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक को कुल मिलाकर सियासत का अखाड़ा कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। हर मुख्यमंत्री और उनके प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी। नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जयललिता, मायावती, प्रेम कुमार धूमल, बीसी खंडूरी समेत तमाम गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने विकास को लेकर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया। राजनीतिक मामलों में केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया और जमकर खरी-खोटी सुनाई।
अनीश कुमार उपाध्याय / दिल्ली
राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक में केंद्र व राज्य सरकारों के बीच अजीब कशमकश का नजारा रहा। पीएम मनमोहन सिंह देश की विकास दर को लेकर चिंतित दिखे, लेकिन प्रदेशों  से आए मुख्यमंत्री और उनके प्रतिनिधियों में एक बात जो खास थी, वह थी सबको विकास की चाहत। इसके लिए सभी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया और जमकर केंद्र सरकार पर आघात किया। वहीं किसी भी सीएम ने ये नहीं बताया कि उनके पास अपने राज्य के विकास के लिए क्या एजेंडा है। अपने राज्य में वे विकास को कैसे गति देंगे? हां, केंद्र पर आरोपों की जुगाली करने में हर कोई एक-दूजे को पछाड़ने की होड़ में लगा रहा।
पीएम ने धैर्य रखने की दी नसीहत
देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यों के विकास की बात शुरू भी की तो उसके बाद मौजूद मुख्यमंत्रियों और उनके प्रतिनिधियों ने अपने राज्य के विकास को कोई एजेंडा पेश नहीं किया। ये नहीं बताया कि वे अपने राज्य के विकास के लिए किस थीम पर कार्य कर रहे हैं। सभी ने विशेष राज्य के दर्जा की मांग की तो इसके लिए पैकेज की मांग करने से भी कोई नहीं चूका। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की मंथर अर्थव्यवस्था पर चिंता जताई। इससे देश में बन रहे निराशा के माहौल से सतर्क और धैर्य बनाए रखने की नसीहत दी। विकास में बाधा के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुसूरवार ठहराया।
मांगों का लंबा पुलिंदा
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी खुद के राज्य के विकास को लेकर तैयार एजेंडे पर कोई चर्चा न कर सके। उन्होंने बैठक में ये नहीं बताया कि वे अपने राज्य के विकास के लिए कौन-कौन सी नई योजनाएं या प्रयास करने वाले हैं। हां, उन्होंने भी अपने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात एक बार फिर दुहराई। स्पष्ट किया कि दर्जा मिलने तक पेयजल और वन विकास के कार्यों के लिए राजस्थान को विशेष आर्थिक मदद दी जाए। उन्होंने बाड़मेर में तेल रिफाइनरी की मांग एक बार फिर उठाई। ग्रामीण बीपीएल आवास योजना, नि:शुल्क दवा वितरण योजना समेत अन्य कल्याणकारी योजनाओं के संबंध में भी तमाम मांगें पटल पर रखीं।
जयललिता भी केवल बरसीं
एनडीसी की बैठक में खुद जयललिता की जगह उनके प्रतिनिधि ने उनके लिखे भाषण को पढ़ा। उन्होंने केंद्र सरकार पर संघीय ढांचे का अतिक्रमण करने के भी गंभीर आरोप जड़े। गरीबी की विवादित परिभाषा, महंगाई के मुद्दे पर आड़े हाथों लिया। एनडीसी के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े करते हुए केंद्र सरकार को संवैधानिक दायरे में रहने की नसीहत तक दे डाली। उनका सीधा आरोप था कि केंद्र उन्हें ही धन दे रहा है जहां या तो कांग्रेस सरकार है या फिर उसके सहयोगी दल की सरकार है। केंद्र सरकार गैर कांग्रेस शासित राज्यों को दंडित कर रही है। खैर, तमिलनाडु की सीएम जयललिता के बयान को खारिज करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सीधे कहा किया कि ये बिल्कुल झूठ है।
माया’ भी नहीं रही पीछे
केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेने में यूपी की मुखिया मायावती भी पीछे नहीं रही। उनकी ओर से यूपी के वित्त मंत्री लालजी वर्मा ने एनडीसी की बैठक में सहभागिता की। खैर, मायावती ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राज्यों को दिए जाने वाले बजट में अवांछनीय कटौती कर रही है। तर्क दिया कि विकास को गति देने के लिए संसाधनों के आवंटन में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है। विकास के रूप में उन्होंने विशेष रूप से दलितों, पिछड़े, उपेक्षितों, निसहाय, दलित क्षेत्रों के उत्थान पर जोर दिया।
झारखंड को भी चाहिए विशेष दर्जा
झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने प्रदेश के पिछड़ेपन व माओवादी हिंसा को देखते हुए राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की वकालत की। उनका तर्क था कि देश के विकास में झारखंड अपना बेशकीमती संसाधन मुहैया करा रहा है। विकास के मानकों के लिहाज से वह ऐसे कई राज्यों से पीछे है, जिन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। उग्रवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विशेष राज्य का होना जरूरी है। उन्होंने कहा खनिजों से मिलने वाले राजस्व के केंद्र व राज्य के बीच बंटवारे की मौजूदा प्रणाली में बदलाव लाए। वनीकरण पर जोर दिया तो झारखंड में यूरेनियम की उपलब्धता को देखते हुए राज्य में एक अदद परमाणु बिजलीघर बनाने की मांग की। उन्होंने केंद्र को खनिजों के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की नसीहत दी, ताकि खनिजों का दोहन राष्ट्रीय आवश्यकताओं के मुताबिक हो सके।
काश्मीर समस्या समाधान पर जोर
जम्मू-काश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तान से सक्रिय बातचीत की पैरवी करते हुए कहा कि बिना इसके इस समस्या का हल नहीं निकल सकता। केवल सीमा पार कारोबार और दोनों देशों के बीच बस चलाने मात्र से काश्मीर मसले का हल निकलने वाला नहीं है। बिना बाहरी बातचीत प्रकिया को जारी रखकर इस मसले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने भी कहा कि यहां के अवाम की आकांक्षाएं और शिकायतों का सियासी समाधान के लिए आर्थिक विकास जरूरी है। राज्य को सुरक्षा के घेरे से निकालकर इसको एक राजनीतिक स्वरूप देना होगा। वार्ताकारों की नियुक्ति की सराहना करते हुए इनके सिफारिशों को भी तत्काल प्रभाव से लागू करने की वकालत की।
क्षति का मांगा मुआवजा
उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बाढ़ से हुई क्षति के रूप में 3265 करोड़ रुपये की मांग की। इसके लिए उन्होंने एक हजार करोड़ तुरंत अवमुक्त करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने खनन कंपनियों पर अतिरिक्त कर दुगुना करने की वकालत की। सुझाव दिया कि अयस्क के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। उन्होंने भी उड़ीसा को विशेष श्रेणी का राज्य घोषित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कृषि उत्पादन और उत्पादक को बढ़ावा देने की नसीहत दी। कालाहांडी, बोलागीर सरीखे ऐतिहासिक क्षेत्रों के मुद्दे पर भी उन्होंने विशेष पैकेज दिए जाने की जरूरत बताई।
ममता ने तोड़ा तिलिस्म
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ लोगों को तीस्ता नदी जल बंटवारे के मुद्दे पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। उम्मीद जताई कि भारत और बांग्लादेश के बीच मधुर संबंध अनवरत बने रहेंगे। जहां तक तीन बीघा का सवाल है हमारी सरकार के साथ कोई मुद्दा नहीं है। हां, तमाम मुख्यमंत्रियों की फेहरिश्त से खुद को अलग करते हुए उन्होंने केंद्र से केवल धन की मांग नहीं की। ये भी बताया कि माओवादी खतरे से निबटने के लिए उनके पास क्या एजेंडा है। उन्होंने माओवादी खतरे को नजरंदाज करते हुए यहां तक कहा कि वे हमारे भाई-बहन हैं और आगे आकर उन्हें राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए। वे चर्चा के लिए तैयार हैं और उन्हें पूरा पैकेज भी देंगी।

Friday, October 14, 2011

खाद्य संकट


अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
विश्व भूख सूचकांक की रिपोर्ट ने भारत की हकीकत को दुनिया के सामने ला दिया है।भले ही केंद्र सरकार गरीबों के पैमाने को लेकर विपक्षियों से उलझकर रह गई हो, लेकिन अमेरिका स्थित संस्था इंटरनेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च के सहयोग से काम करने वाली इस संस्था ने इस हकीकत को पुख्ता कर दिया है कि गरीबों की सूची में भारत की स्थिति काफी दयनीय है। ऐसा नहीं है कि ये रिपोर्ट राजनीति से प्रेरित होकर बनाई गई हो। कारण कि विश्व भूख सूचकांक की रिपोर्ट को समूचा विश्व गंभीरता से लेता है। यह सूचकांक तीन कसौटियों यथा जनसंख्या में कुपोषित लोगों का प्रतिशत, अंडरवेट बच्चों का प्रतिशत और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर के आधार पर तैयार होता है।
पिछले दशक में कम सुधार
खाद्य सुरक्षा के लिहाज से जिन देशों का हाल पिछले एक दशक में सबसे कम सुधरा है, उनमें भारत भी एक है। वहीं इसी अवधि में चीन, ईरान और ब्राजील ने इस सूचकांक पर अपनी स्थिति में लगभग 50 प्रतिशत का सुधार किया है। ताजा रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि जैव इंधन के लिए फसलों के बढ़ते उपयोग, जलवायु परिवर्तन एवं वायदा कारोबार के बढ़ते चलन के कारण विश्व खाद्य बाजार में उतार-चढ़ाव तेज है। वहीं गरीबी पर उसकी भारी मार पड़ रही है। जाहिर है, इस हाल में कमजोर तबके को खाद्य सुरक्षा देने के लिए खास इंतजाम की दरकार है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून बेशक इस दिशा में एक प्रभावी पहल होगी। ताजा भूख सूचकांक सरकार को यह एहसास कराने के लिए काफी है कि इस प्रयास में और देर बिल्कुल उचित नहीं। अगर यह कानून पिछले दो साल से लाभार्थी समूहों की पहचान और नकद सब्सिडी बनाम सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अनाज की आपूर्ति में विवाद में न फंसा होता तो शायद इस साल भारत की तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर होती।
सिस्टम का है सारा दोष
ऐसा नहीं है कि हमारे कृषि प्रधान देश के अन्नदाता किसान बेहतर फसल नहीं उगाना चाहते। सारा दोष सिस्टम का है। बेहतर उत्पादन के बावजूद फसलों की बेहतर देखभाल न होने से हर साल देश के अन्न भंडार का एक बहुत बड़ा हिस्सा सड़कर नष्ट हो जाता है। बीते दिनों बिहार प्रांत के छपरा और मोतिहारी रेलवे स्टेशनों पर हजारों बोरों में रखा गेहूं सड़ गया। एफसीआई भी सब कुछ जानते हुए इसका वितरण नहीं कर सकी। कुछ सड़े बोरों का हाल अब ये हो गया है कि उसमें मवेशी भी मुंह नहीं मार रहे। ये खास इसलिए भी है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि गेहूं की बर्बादी होने के बदले उसका वितरण गरीबों के बीच कर दिया जाए। ये हालात ये बताने के लिए काफी हैं कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लेकर संबंधित सरकारें कितनी सजग हैं। अगर केवल बिहार की ही बात करें तो पिछले पांच वर्षों में गया, मुजफ्फरपुर, पटना, नवादा, नालंदा और पटना में ही भूखमरी के करीब 150 मामले सामने आ चुके हैं। इसके बाद भी अगर सरकार नहीं चेत रही है तो इसे क्या कहेंगे। कुछ ऐसा ही हाल यूपी का भी है। यहां भी पर्याप्त उत्पादन के बावजूद अन्न भण्डारण की उचित व्यवस्था न होने से हर साल काफी मात्रा में अन्न सड़कर नष्ट हो जाता है।
सुधार की कोशिश
उधर, पिछले दिनों उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रो.केवी थामस ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि भारत सरकार ने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीडीपीएस) की कार्यक्षमता और प्रभावशीलता को सुधारने के लिए चरणबद्ध तरीके  से उसका कंप्यूटरीकरण करने का कार्य शुरू कर दिया है। पहले चरण में आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के तीन जिलों में इस पायलट आधार को लागू करने के लिए मंजूरी मिल चुकी है। आवश्यक वस्तुओं की स्मार्ट कार्ड आधारित वितरण वाली पायलट योजना को चंडीगढ़ (केंद्र शासित प्रदेश) और हरियाणा में शुरू कर दिया गया है। वहीं 11 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान खाद्यान्न के रिसाव को रोकने के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग प्रणाली (जीपीएस), रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान तंत्र आदि जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करने का सुझाव भी दिया गया था। वर्ष 2010-11 के दौरान सरकार ने टीडीपीएस, अन्य कल्याणकारी योजनाओं आदि के तहत 355.97 लाख टन चावल और 276.49 लाख टन गेहूं का आवंटन किया है। 
70 फीसदी आबादी अब भी भूखी
वैसे यूं कहें तो भारत और दुनिया की प्रमुख समस्याओं में गरीबी प्रमुख है। भारत की 70 फीसदी आबादी अभी भी भरपेट खाना नहीं खाती। भारत  में आर्थिक विकास जितना बढ़ रहा है, उतनी की रफ्तार से गरीबी भी बढ़ रही है। वास्तव में गरीबी और विषमता घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। बढ़ती महंगाई गरीबी का सबसे बड़ा कारण है। पेट्रोल-डीजल, अनाज सब कुछ महंगा है। वहीं दूसरी तरफ मजदूर तबके का शोषण बदस्तूर जारी है। यह भी हकीकत है कि गरीबी को बढ़ाने में भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण है। गरीबों के बच्चों को शिक्षा और पोषाहार देने के लिए सरकार आंगनबाड़ी कार्यक्रम चला रही है। हालांकि इसमें कितना भ्रष्टाचार है अब किसी से छुपा नहीं है। वहीं गरीबी के साथ ही बढ़ती जनसंख्या भी मुख्य वजहों में एक है। अनाज की पैदावार कम है और उसे खाने वालों की तादाद ज्यादा।
10 में नौ महिलाएं कुपोषित
उधर,  विभिन्न संगठनों यथा विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) और स्वास्थ्य मंत्रालय भारत  सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो उत्पादन के बावजूद हालात काफी भयावह हैं। दुनिया में भूखमरी  से पीड़ित लगभग 50 प्रतिशत लोग अकेले भारत में रहते हैं। भारत के लगभग 350 मिलियन (35 करोड़) लोग न्यूनतम ऊर्जा आवश्यकताओं के हिसाब से 80 प्रतिशत से काफी कम भोजन का उपयोग करते हैं। वहीं 15 से 49 वर्ष आयुवर्ग में 10 में से नौ महिलाएं कुपोषण और रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद गर्भवती महिलाओं में रक्ताल्पता के कारण ही शिशु मृत्युदर 20 प्रतिशत है। पांच वर्ष से कम आयु वर्ग में आधे से ज्यादा बच्चे मध्यम या गंभीर कुपोषण के शिकार हैं या फिर बौनेपन से ग्रस्त हैं। भारत में बाल मृत्यु के लगभग 50 प्रतिशत मामलों का कारण कुपोषण है। हर तीसरा व्यस्क (15 से 49 आयुवर्ग) सामान्य से अधिक पतला है। 
...और सरकार का है ये रवैया
खैर, कुल मिलाकर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा है, फिर भी भारत में लोग भूख से मर रहे हैं। साधारण जनता महंगाई से दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पा रही है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली के विधायक 73,000 रुपये प्रतिमाह और मंत्री 1,15,000 रुपये प्रतिमाह वेतन-भत्ता उठा रहे हैं। गरीबों को सड़ा अनाज भी मयस्सर नहीं। सिर ढकने के लिए छत नहीं। पहनने के लिए वस्त्र नहीं। पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं। जीर्ण-शीर्ण सरकारी विद्यालय। शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती फेहरिश्त। कालाबाजारी और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा। ये हालात काफी हैं कि हमारे जनप्रतिनिधि जनता के कितने हितैषी हैं। खाद्य सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त के प्रति इनकी लापरवाही अब जगजाहिर है।  हां, गत दिनों सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी एक रिपोर्ट में योजना आयोग ने इतना जरूर कह दिया कि शहर में 32 और गांव में 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीबी रेखा की परिधि में नहीं आता। मजे की बात तो ये कि देश की शीर्ष अदालत में दाखिल रिपोर्ट पर बकायदा प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर भी थे। स्वाभाविक ही था कि इस पर सरकार की थू-थू होती। वही हुआ भी। 
भारत में भूखमरी आखिर क्यों?
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम मात्र अधिकारों से आगे कुछ नहीं देखता। वर्तमान में सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को रियायती दरों पर 35 किग्रा खाद्यान्न उपलब्ध कराती है। इसमें गेहूं और चावल शामिल है। गेहूं 4.15 रुपये और चावल 5.65 रुपये प्रति किग्रा की दर से बेचा जा रहा है। अंत्योदय योजना के तहत 2.42 करोड़ परिवारों के लिए कीमतें घटाकर क्रमश: दो रुपये और तीन रुपये कर दी गई। वहीं इससे हुआ क्या? सारा अनाज कालाबाजारी करने वालों के गोदामों में भरा जाने लगा। सरकारी कागजी आंकड़ों पर एपीएल परिवार परिवारों में 11.52 करोड़, बीपीएल परिवार में 6.52 करोड़ खाद्यान्न सस्ते दरों पर दिया जा रहा है। अगर यह मानें कि एक परिवार में औसत पांच सदस्य हैं तो कागजों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में 90 करोड़ लोग आ गए। अगर यह सच है तो ये समझ से परे है कि पूरी दुनिया में भूखमरी के शिकार सबसे अधिक लोग भारत में ही क्यों हैं?