श्री गणेशाय नमः

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Friday, November 25, 2011

नहीं बदलेगी तकदीर

पूर्वांचल के गठन से मुसलमानों को कोई फायदा नहीं
उद्योग के हिसाब से मिल सकती थोड़ी-बहुत राहत
कई  विभिन्न दलों में बंटना मुसलिमों के लिये घातक
एकजुटता का प्रदर्शन बखूबी नहीं कर पाते मुस्लिम
नये प्रदेश में 10 साल तक कोई परिवर्तन संभव नहीं
उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े होने के बाद भी पूर्वांचल के मुसलमानों की तकदीर संवरती नहीं दिख रही। हां, अगर पूर्वांचल राज्य गठन के बाद यहां की सरकार अगर इनको कारोबार करने में तवज्जों दे तो उन्हें थोड़ा सुधरने का अवसर जरूर मिलेगा। पूर्वांचल में जहां-तहां छितराये ये मुसलमान अगर लामबंद भी होते हैं तो ये अपना बहुत करिश्मा नहीं दिखा पायेंगे। मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि आगामी एक दशक तक इनके भाग्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं है।
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की कवायद इन दिनों जोरों पर है। खास तौर पर वाराणसी, बलिया, गाजीपुर आदि क्षेत्रों में इसकी चर्चा है कि पूर्वांचल राज्य गठन के बाद मुसलमानों का भविष्य क्या होगा। राजनीतिज्ञों की मानें तो यूपी के बंटवारे के बाद बनने वाला अलग पूर्वांचल राज्य में मुसलमानों को फिलहाल कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है। कारण कि जो स्थिति उत्तर प्रदेश के दौरान थी, वही अब भी बरकरार रहेगी। हालांकि उद्योग के हिसाब से उन्हें थोड़ा सुधरने का अवसर जरूर मिलेगा। 
आखिर ऐसा क्यों?
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब पांच करोड़ के आसपास है। प्रदेश के चार हिस्सों में बंट जाने से पूर्वांचल के हिस्से में 15.35 फीसदी मुसलमान आएंगे। हालांकि मुसलमान धार्मिक ऐतबार से हमेशा एकजुटता का प्रदर्शन करता आया है, लेकिन अंत में यही तबका बिखर जाता है। नतीजा वह न तो अपना रहनुमा चुन पाता है और न ही अपनी जमीन ही बना पाता है। वाराणसी के राजनीतिक विचारक जहांगीर आलम एडवोकेट बताते हैं कि कहीं-कहीं मुसलमान एकजुटता भी दिखाते हैं। चुनाव में भी यही एकजुटता होती है, लेकिन अलग-अलग तरीके से।
मुसलमानों की बढ़ जायेगी जिम्मेदारी
मुसलिम रिजर्वेशन मूवमेंट के प्रदेश संयोजक जफरयाब जिलानी का कहना है कि नये प्रदेश में करीब 10 साल तक कोई भी परिवर्तन के संकेत नहीं दिखेंगे। पूर्वांचल बनने से नये उद्योग-धंधों के विकास के अवसर इनके ऊपर उठने की वजह बन सकते हैं। कारण कि नये प्रदेश में वाराणसी, मऊ, आजमगढ़, बलिया, गोरखपुर समेत 26 जिले शामिल होंगे। वहीं कौमी एकता दल के प्रदेश अध्यक्ष अतहर जमाल लारी का दावा है कि राजनैतिक दृष्टि से मुसलमानों का नये प्रदेश में अहम रोल रहेगा। नये प्रदेश में तो उनकी संख्या 25 प्रतिशत रहेगी, तो वह इस मुद्दे पर अहम फैसला ले सकेंगे। उन्होंने कहा कि पूर्वांचल राज्य बन जाने से मुसलमानों की भी प्रदेश के विकास में जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। अधिकतर तबका बुनकर का होगा, जो अपने हुनर से प्रदेश की आर्थिक स्थिति में भी सहयोग देने से पीछे नहीं हटेगा।
ऐसी होगी तस्वीर
यूपी में फिलहाल मुस्लिमों की कुल आबादी18.50 फीसदी है। वहीं अगर पूर्वांचल की बात करें तो यहां मुस्लिमों की कुल आबादी15.35 फीसदी है। इसी क्रम में प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में मुस्लिम पुरुषों की कुल आबादी 15.24 फीसदी है, जबकि मुस्लिम महिलाओं की आबादी 15.47 फीसदी। कुल मिलाकर अगर ये मुस्लिम एकजुटता दिखायें तो काफी कुछ बदलाव कर सकते हैं, लेकिन अब इसके आसार दूर-दूर तक नहीं दिख रहे। खास तौर पर पूर्वांचल राज्य में विभिन्न छोटे-छोटे कौमी दलों के गठन ने इन्हें और छितरा दिया है। अब वे किसी भी एक दल पर आश्रित न होकर कई छोटे-छोटे दलों में बंट चुके हैं। 
दलों के दलदल में धंस गये मुसलमान
अगर पूर्वांचल की बात वर्तमान दौर को ही लेकर करें तो मुस्लिम खेमा कई पार्टियों में विभक्त हो चुका है। विभिन्न राजनैतिक दल भी इनका मत हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। एक ओर बसपा जहां मुस्लिम मतों को रिझाने में जुटी है, वहीं सपा भी इन्हें अपना बता रही है। भाजपा और कांग्रेस भी मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की कवायद करने में जुटे हैं। उधर, मुस्लिमों के बीच कभी गहरी पैठ रखने वाले अंसारी बंधुओं ने कौमी एकता दल के नाम से राजनीतिक पार्टी का गठन कर रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। लिहाजा ये छितराये मुसलमान किसी एक दल के नहीं रह गये हैं।
लग सकता है जोर का झटका
पूर्वांचल राज्य गठन के बाद अगर मुसलमानों ने एकजुटता का परिचय नहीं दिया तो उन्हें जोर का झटका भी लग सकता है। कारण कि अगर इस बिरादरी ने किसी भी एक दल की सवारी नहीं की और बिखर गये तो फिर इसका खामियाजा उन्हें काफी बरसों तक भुगतना पड़ सकता है। आज जो राजनैतिक पार्टियां उन्हें सिर-आंखों पर बिठाने के लिये बेचैन हैं, वे इन डोरे डालने के बजाय किसी सशक्त कौम को अपना बनाने की मुहिम में जुट सकते हैं। खास तौर पर गाजीपुर, बलिया, वाराणसी आदि क्षेत्रों के दौरे के बाद जो तस्वीर उभरकर सामने आई उसमें ये स्पष्ट हो गया कि ये वक्त मुसलमानों के लिए काफी अलर्ट रहने वाला होगा।
पूर्वांचल के गठन से बिखरना तय
गाजीपुर, बलिया की सरजमीं पर कई राजनीतिक दलों के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर   बताया कि पूर्वांचल राज्य गठन के बाद अगर मुसलमान बिरादरी दो से अधिक दलों में बंटती है तो उनका वह दबदबा खत्म हो जायेगा, जो इनके वजूद का गवाह रहा है। वैसे भी विभिन्न राजनैतिक दिग्गजों के वर्चस्व एवं राजनैतिक दलों की बढ़ी सक्रियता की वजह से इनका मात खाना तय माना जा रहा है। अगर पूर्वांचल में इनकी औकात घटी तो फिर मुस्लिम बिरादरी को निचले पायदान पर जाने से कोई ताकत रोक नहीं सकती। ऐसे में यदि वक्त रहते इस बिरादरी ने किसी एक दल को नहीं चुना तो उन्हें इसका दीर्घकालीन दुष्परिणाम भुगतना तय है। 


 प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में मुसलमानों की स्थिति

             जिला आबादी प्रतिशत पुरुष महिला
प्रतापगढ़         13.70 13.57       13.83
इलाहाबाद        12.72 12.56       12.90
बहराइच           34.83 34.40       35.33
गोंडा                19.26 18.85       19.71
फैजाबाद           14.57 14.33       14.83
अंबेडकर नगर   16.39 16.42       16.36
सिद्धार्थनगर      29.43 28.56       30.34
महाराजगंज      16.46 16.20       16.74
बस्ती               14.70 14.17       15.27
गोरखपुर             9.15 9.16         9.15
कुशीनगर           16.86 16.66       17.06
कौशांबी              13.51 13.29       13.76
देवरिया              11.38 11.21       11.55
मऊ                   19.14 19.15       18.93
आजमगढ़           15.07 15.15       15.00
बलिया                 6.57 6.54        6.61
जौनपुर               10.20 10.30       10.11
संत रविदास नगर  11.96 12.12       11.80
संत कबीर नगर      24.02 23.54       24.52
वाराणसी               15.85 15.95       15.74
गाजीपुर                  9.89 9.89        9.88
मिर्जापुर                 7.48 7.44        7.52
सोनभद्र                  5.40 5.40        5.41
श्रावस्ती                 25.60 25.02       26.26
बलरामपुर             36.72 35.59       37.97
चंदौली                  10.24 10.24       10.24
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टूटा तिलिस्म


पूर्वांचल की माफिया सियासत ने ली करवट
खुद अपने लिए किनारा तलाश रहे अंसारी बंधु
विधायकी सीट भी बचाना फिलहाल मुश्किल
सेकेंड रनर के कंधों पर अंसारी बंधुओं को ऐतबार
बलिया में कई पूर्व मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर
कई राजनीतिक दिग्गजों की मूंछ कटना तय
अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो जल्द ही पूर्वांचल की माफिया सियासत में ज्यादा तो नहीं, लेकिन काफी हद तक गिरावट आने के आसार हैं। जिस राजनीति के दमखम पर पूर्वांचल के अंसारी बंधु अरसे से अपनी धाक जमाए बैठे थे, वह तिलिस्म टूट चुका है। इस विधानसभा चुनाव में वे अब खुद के लिए किनारा तलाश रहे हैं। आखिर कैसे बदल गया इतना सब कुछ? जिन अंसारी बंधुओं के रहमोकरम पर पूर्वांचल में दिग्गज नेतागिरी करते थे, आखिर वह खुद अपनी जमीन के लिए कैसे मोहताज हो गए, जानिए इस रिपोर्ट से...!
गाजीपुर-बलिया से लौटकर अनीश कुमार उपाध्याय
पूर्वांचल की राजनीति में जल्द ही एक नया बदलाव होने जा रहा है। न सिर्फ यहां राज्य बंटवारे के बाद राजनीतिक घमासान तेज होगा, बल्कि जल्द ही यहां की सरजमीं से माफियाराज का भी सफाया हो जाएगा। मौजूदा हालात इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि पूर्वांचल की जनता अब माफिया राजनीति से परेशान हो गई है। पिछले लोस चुनाव में जोरदार झटका देने के बाद यहां के लोग, फिजा में सिर्फ शांति चाहते हैं। पूर्व में जहां इस विस चुनाव के रक्तरंजित होने का आसार राजनीतिज्ञ लगा रहे थे, वहीं अब वे खुद स्वीकार कर रहे हैं कि जनता ने यहां पिछले लोस चुनाव से ही बदलाव की बयार बहा दी है। लिहाजा वह दिन दूर नहीं, जब पूर्वांचल की माटी से माफियागीरी का नामोंनिशां मिट जाएगा।
अफजाल खुद तलाश रहे किनारा
गाजीपुर जिले के पूर्व सांसद बाहुबली अफजाल अंसारी के लोस सीट गंवाने के बाद से ये आसार लगाए जा रहे थे कि यहां की छह विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाने के लिए अंसारी बंधु कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। वहीं अब हालात काफी बदल गए हैं। लोस सीट से सपा के राधेमोहन की जीत के बाद से यहां पूर्व सांसद रहे अफजाल अंसारी खुद अपने लिए किनारा तलाशते दिख रहे हैं। पहले साइकिल की सवारी करने के बाद अफजाल ने हाथी का साथ लिया। शुरुआती दौर में लाल झंडे को ‘लाल सलाम’ कर निकले मऊ के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को यह उम्मीद थी कि भारी-भरकम हाथी का साथ उनकी राजनीति को मुकाम दिलाने में अहम भूमिका निभाएगा। आपको याद दिला दें कि पिछले लोस चुनाव के वक्त गाजीपुर जिले के नगर स्थित लंका मैदान में पहुंचीं मुख्यमंत्री मायावती ने खुले मंच से अंसारी बंधुओं को अपराधी नहीं होने का ‘प्रमाण पत्र’ दिया था। यह दीगर है कि इस बयान पर काफी छीछालेदर होने के बाद मायावती ने झटके से बसपा के तब प्रत्याशी रहे अफजाल अंसारी से न सिर्फ दूरी बना ली, बल्कि पार्टी से निष्कासित भी कर दिया। 
अस्तित्व में आया कौमी एकता दल
इसी चुनाव में वाराणसी लोस सीट से उम्मीदवार रहे बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी (वर्ष 2007 में वे मऊ विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए थे) भी चुनाव हार गए। ऐसे में दोनों भाइयों की हार से एकबारगी पूर्वांचल की माफिया राजनीति ठिठक सी गई है। ऐसे में अपनी राजनीतिक जमीन खोते देख पूर्व सांसद अफजाल अंसारी ने मुख्तार अंसारी से राय-मशविरा के बाद कौमी एकता दल के नाम से एक राजनैतिक संगठन खड़ा किया है। वे इस विधानसभा चुनाव में गाजीपुर जिले समेत समूचे पूर्वांचल में अपने प्रत्याशी खड़ा कर रहे हैं। बकौल अफजाल अंसारी ये विस चुनाव में कौमी एकता दल नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। यह भी हकीकत है कि इन्हें अकेले दम पर सत्ता दूर दिख रही है। लिहाजा वे पीस पार्टी और भासपा जैसे जमीनी दलों से गठबंधन कर लखनऊ पहुंचने की तैयारी में हैं। खास ये कि कौमी एकता दल में उन प्रत्याशियों को तवज्जो दी जा रही है, जो पिछले विधानसभा चुनाव में सेकेंड रनर रहे हैं। इनको अपने साथ लाने के लिए वे हरसंभव कोशिश में जुटे हैं। यही वजह है कि अभी उन्होंने अपने प्रत्याशियों की लिस्ट को आउट तक नहीं किया है। गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़ में कौमी एकता दल के लंबे-चौड़े बैनर पोस्टर तो दिख रहे हैं, लेकिन कहीं भी इस पर प्रत्याशी की घोषणा नहीं की गई है। लिहाजा हो सकता है कि वे अन्य दलों के पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति को भांप रहे हों और इसके बाद ही अपना मोहरा वहां फिट करने की जुगाड़ में हों। 
ताकि खत्म न हो माफियाराज
सूत्रों की मानें तो अंसारी बंधुओं को इस विधानसभा चुनाव में उम्मीद है कि वे पूर्वांचल के दो-तिहाई मुसलमानों समेत अन्य छोटे जातिगत दलों का साथ लेकर लखनऊ  विस में अपनी जगह बना लेंगे। उनकी कुल मिलाकर यही रणनीति है कि वे उत्तर प्रदेश की उतनी सीटों पर काबिज हो जाएं, जिससे वे अपना समर्थन देकर यूपी की सरकार बनवा सकें। ताकि इनका माफियाराज खत्म न हो, लेकिन मौजूदा राजनीति एवं जनता की बढ़ी समझ से ऐसा होता दिख नहीं रहा है। हां, यहां मुहम्मदाबाद के विधायक शिबगतुल्लाह अंसारी एक बार फिर कौमी एकता दल के बैनर तले ताल ठोक रहे हैं। इनका दावा है कि इनके साथ मुस्लिम वर्ग के साथ ही गरीब व मजलूमों का एक बहुत बड़ा मतदाता समूह है। लिहाजा इनकी जीत पक्की है। इनके विरोध में बसपा प्रत्याशी पशुपति नाथ मैदान में हैं। माना जा रहा है कि इनकी सीधी टक्कर इन्हीं के साथ होगी।
मुस्लिम वोटों पर ताज की आस
पूर्वांचल की राजनीति में धाक जमाने निकले अंसारी बंधु हर हाल में कौमी एकता दल के प्रत्याशियों को विजय दिलाने की कोशिश में हैं। इसके लिए उन्होंने मुसलमानों को लुभाने के लिए हरसंभव कोशिश शुरू कर दी है। जैसा कि आंकड़ों के जानकार बताते हैं कि अंसारी बंधुओं को उम्मीद है कि अगर मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही वे कुछ राजभर आदि छोटी जातियों को अपने साथ जोड़ लेते हैं तो उनकी जीत पक्की है। लिहाजा वे इन छोटे दलों को अपने साथ जुटाने के लिए लखनऊ और दिल्ली तक सिफारिश लगा रहे हैं। गाजीपुर के सूत्रों ने बताया कि इसके लिए कौमी एकता दल के कार्यकर्ता छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर समूचे पूर्वांचल में कौमी एकता का संदेश दे रहे हैं। वैसे अबकी इस चुनाव में वे किसी भी प्रकार का लफड़ा मोल लेने के मूड में नहीं हैं। पार्टी के एक खास सूत्र ने बताया कि उन्होंने अपने कारिंदों को सख्त हिदायत दे रखी है कि किसी भी कीमत पर जोर-जबर्दस्ती का भाव न लाया जाए। जितना संभव हो मतदाताओं का विश्वास जीता जाए। इसके लिए उन्होंने कार्यकर्ताओं को गरीबों, मजलूमों की नि:स्वार्थ सेवा करने का भी निर्देश दे रखा है ताकि उनकी माफिया की छवि न बनने पाए। वैसे हकीकत क्या है, ये चुनाव के वक्त ही पता लगेगा।
बलिया में चल रही वर्चस्व की लड़ाई
इस विधानसभा चुनाव में बलिया में तस्वीर कुछ अलग ही दिख रही है। यहां पूर्व मंत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, जो इस चुनाव में अपने वर्चस्व की रक्षा की मुहिम में अभी से ही जुटे हैं। पूर्व मंत्रियों में कांग्रेस के बच्चा पाठक, सपा के शारदानंद अंचल, अंबिका चौधरी, रामगोविंद चौधरी, नारद राय, भाजपा के भरत सिंह वगैरह शामिल हैं। मंत्रियों की ये फौज एक बार फिर विस चुनावी दंगल में उतरने के लिए तैयार है। लिहाजा इनमें से कई मंत्रियों की विधायकी भी खतरे में दिख रही है। हालांकि भाजपा के भरत सिंह, नारद राय आदि पिछले चुनाव में हार का मुंह देख भी चुके हैं, लिहाजा इस बार वे किसी भी प्रकार का रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। मंत्री कार्यकाल में इनका सिर जो सातवें आसमान पर पहुंच चुका था, हार का मुंह देखने के बाद वे अब सीधे जनता से जुड़ रहे हैं। इसके लिए न सिर्फ ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं को तरजीह दी जा रही है, बल्कि ग्राम स्तर के कार्यकर्ताओं की एक कॉल को भी वे अब गंभीरता से ले रहे हैं।
द्वाबा की राजनीति में हलचल
बलिया जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों में द्वाबा को सर्वाधिक संवेदनशील इलाका माना जाता है। यहां की संवेदनशील जनता कब किधर बह जाए, कुछ कह पाना मतदान के दिन तक संभव नहीं रहता। यहां से करीब दो मर्तबा विधायक रहे एवं एक बार भाजपा के राजनाथ सिंह शासनकाल में खाद्य एवं रसद राज्यमंत्री का ओहदा संभालने वाले भरत सिंह हर हाल में अबकी जीत का ताज पहनने के लिए आतुर हैं। यहां के राजनीतिज्ञों की मानें तो भरत जमीनी नेता रहे हैं। यह दीगर है कि पूर्व में मंत्री पद पाने के बाद ये जनता से थोड़ा दूर हुए, तो जनता ने इन्हें आंखों से हटा लिया। लिहाजा बसपा से सुभाष यादव को टीका लग गया। अब वे एक बार फिर अपने पुराने रौ में लौट आए हैं। वैसे भी हकीकत है कि भरत की पहचान भाजपा पार्टी के नेता के रूप से ज्यादा जमीनी नेता के रूप में होती रही है। लिहाजा मौके की नजाकत को भांपते हुए यहां से सपा ने खुद को मजबूत करने के लिए सीयर विधायक व पूर्व मंत्री शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश अंचल को चुनावी मैदान में उतारने का मन बनाया है। माना जा रहा है कि यहां पूर्व के चुनावों में सपा के प्रत्याशी रहे पूर्व विधायक विक्रम सिंह क्षत्रिय मतों को बंटवारे के साथ अपने साथ जोड़ लेते थे, लेकिन यादव मत उनसे नहीं जुड़ पाते थे। जयप्रकाश अंचल यादव बिरादरी के हैं, लिहाजा सपा का मानना है कि इससे यादव मत उनसे जुड़ेंगे और द्वाबा में सपा की साइकिल चल निकलेगी। 
बांसडीह में दो दिग्गज आमने-सामने
यहां का बांसडीह विस का चुनाव भी अबकी कम रोचक नहीं होगा। खास तौर पर यहां दो ‘बूढ़े शेर’ चुनावी दंगल में उतरने के लिए तैयार हैं। एक तरफ कांग्रेस से पूर्व मंत्री रहे बच्चा पाठक चुनावी मैदान में हैं, तो दूसरी ओर पूर्व बाल विकास एवं पुष्टाहार मंत्री रामगोविंद चौधरी हैं। दोनों दिग्गजों का टकराव यादव बिरादरी पर निर्भर करता है। अमूमन ये माना जाता है कि बांसडीह विस यादव बाहुल्य इलाका है। यहां के यादव जिस ओर अपना रुख करते हैं, उसकी जीत पक्की हो जाती है। पूर्व में बच्चा पाठक ने अपनी तानाशाह राजनीति से यादवों से बैर मोल ले लिया था, जिसका खामियाजा उन्हें हार के रूप में चखना पड़ा। ये सभी यादव वोट रामगोविंद चौधरी के खाते में चले गए। इसके पीछे दूसरा कारण ये भी रहा कि सपा और खुद यादव बिरादरी से जुडे होने के नाते यादवों को इनकी साइकिल पर सवारी करने से कोई हर्ज नजर नहीं आया। लिहाजा रामगोविंद चौधरी बाजी मार ले गए। अबकी बच्चा पाठक ने इन यादवों को रिझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा अगर वोटों का बंटवारा हुआ तो पलड़ा किसका भारी होगा अभी कह पाना आसान नहीं है।
सदर विस में  घमासान
बलिया शहर से जुड़ा सदर विस हर मायने में अव्वल है। यहां के मतदाता हर बार बदलाव चाहते रहे हैं। लिहाजा यहां बसपा से मंजू सिंह और सपा से पूर्व नगर विकास राज्यमंत्री नारद के बीच कांटे की टक्कर होने का अनुमान है। हालांकि यहां अबकी कांग्रेस ने युवा चेहरे को तरजीह दी है। इन द्विकोणीय संघर्ष के बीच कांग्रेस ने नागेंद्र पांडेय के रूप में युवा चेहरा मैदान में उतारकर यहां की राजनीति में युवाओं का रुख अपनी ओर करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि महंगाई, भ्रष्टाचार आदि की आग में ये युवा चेहरा झुलसता दिख रहा है। नागेंद्र युवा कांग्रेसी हैं और छात्र राजनीति के बाद ये पहला अवसर है जब वे विधानसभा चुनाव में विस सदर से भाग्य आजमा रहे हैं। बलिया सदर विस में खास बात ये भी है कि नए परिसीमन ने कई नेताओं की सारी राजनीतिक गणित को ही गड़बड़ा दिया है। पूर्व में यहां तीन बड़ी आबादी वाले गांव मिड्ढा, अखार और बसंतपुर किसी भी प्रत्याशी के भाग्य  का फैसला करने का दंभ भरते थे। वहीं अब परिसीमन के बाद मिड्ढा फेफना विस में चला गया है। लिहाजा अखार और बसंतपुर अब इतने सक्षम नहीं रहे कि किसी भी प्रत्याशी को जीत का सेहरा बांध सकें। लिहाजा यहां अब प्रत्याशियों को नया गुणा-गणित लगाना पड़ेगा। इस गणित में कौन ज्यादा सफल होगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।
अन्य विस में भी जंग
वहीं सिकंदरपुर से राजधारी सिंह, रसड़ा से बब्बन राजभर कांग्रेस के बैनर तले चुनावी ताल ठाकेंगे। यहां भाजपा ने अभी पत्ता नहीं खोला है। बसपा ने केवल दो सीटों रसड़ा से उमाशंकर सिंह व सीयर से छठ्ठू राम के नाम की घोषणा की है। छठ्ठू राम बसपा शासनकाल में डेस्को उपाध्यक्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने जनता से सीधे जुड़ने का काफी प्रयास किया है। काफी दिनों तक बसपा जिलाध्यक्ष का ओहदा संभालने के बाद पूर्व सीएम मायावती ने उन्हें लाल बत्ती दी थी। लिहाजा सीयर में वे अपने पूर्व में किए विकास कार्यों को भूनाने की मुहिम में जुटे हैं। हालांकि वे इस मुहिम में कितना सफल हो पाते हैं, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। वहीं सपा ने छह सीटों में से पांच की घोषणा कर दी है। इनमें चारों पूर्व मंत्रियों में से किसी का टिकट नहीं कटेगा, ऐसी उम्मीद है। यहां फेफना से पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी, सदर से पूर्व नगर विकास राज्यमंत्री नारद राय, रसड़ा से सनातन पांडेय, बांसडीह विस से रामगोविंद चौधरी तथा द्वाबा विस से पूर्व मंत्री एवं सीयर विधायक शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश अंचल को टिकट मिला है। सीयर विस से अभी सपा ने प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। कुल मिलाकर यहां के हालात काफी रोचक होते दिख रहे हैं। 
जो जितना भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी
खास तौर पर बलिया को उत्तर प्रदेश की राजनीति का अखाड़ा माना जाता है। यहां जिस दल के प्रत्याशी ज्यादा जीतते हैं, इतिहास गवाह रहा है कि अमूमन प्रदेश में उन्हीं की सत्ता रही है। यही वजह रही कि पूर्व की सपा सरकार ने बलिया के चार विधायकों को मंत्री पद से नवाजा था। लिहाजा अबकी चुनाव में यहां के चारों पूर्व मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। खास तौर पर शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश अंचल पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यहीं से उनके कदम राजनीति की ओर बढ़े हैं। शारदानंद अंचल भी जी-जान से अपने बेटे को जीत दिलाने की कवायद में अभी से ही जुट गए हैं। इसके लिए पुराने सपा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियों का बंटवारा भी कर दिया गया है। वैसे शारदानंद अंचल की बनी बनाई जमीन पर जयप्रकाश अपनी राह कैसे निकालते हैं, ये अभी वक्त के गर्भ में है। हालांकि वहां के राजनीतिज्ञों की मानें तो शारदानंद अंचल के बेहतर व्यक्तित्व का लाभ, बसपा और कांग्रेस के विरोध में उठे स्वर का लाभ जयप्रकाश अंचल को अगर मिलता है तो उनकी सीट पक्की हो सकती है। हालांकि इस बारे में अभी कुछ कहना गलत होगा, लेकिन हां, यहां उनके विपक्ष में उतरने वाले प्रत्याशियों की राह कांटों भरी जरूर दिख रही है।