जहां फैली है नागराज की सल्तनत
आकर्षण
अदम्य साहस और कठिन लक्ष्य की परीक्षा
छिंदवाड़ा जिले से है 160 किलोमीटर दूर
नागद्वारी में है 100 फीट लंबी चिंतामणि गुफा
प्रकृति की सुंदरता का दिखता अदभूत नजारा
भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में स्थित नागद्वारी। छिंदवाड़ा जिला स्थित नागद्वारी एक पर्यटन स्थल के तौर पर काफी प्रसिद्ध है। लोग इसके प्रति आस्था भी रखते हैं। यहां की खूबसूरती को देख प्रतीत होता है कि जैसे प्रकृति ने अपनी सारी सुंदरता और मोहकता इसी स्थान पर बिखेर दी है। इसी सौंदर्य के बीच में नागद्वार स्थित है।

अनीश कुमार उपाध्याय
जरा कल्पना कीजिए कि आप कहीं खड़े हैं और आप के सामने एक सांप आ जाए, तो क्या होगा? जाहिर है कि आप घबरा जाएंगे। वहीं यदि आप एक धैयर्वान, साहसी व्यक्ति हैं तथा आप दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ने और उतरने का खतरा उठाने को तैयार हैं, तो आप नागराज की दुनिया के दर्शन कर सकते हैं। जी हां, यह कोई किवंदती या इतिहास नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत सच है। मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा जिले से लगभग 160 किमी दूर सतपुड़ा नामक पहाड़ियां हैं। इन्हीं पहाड़ियों पर नाग गुफा स्थित है। यहां पंचमढ़ी की पहाड़ियां हैं और यह गुफा इनमें ही स्थित है। पहाड़ियां होने के कारण यह बहुत ही खतरनाक स्थान है। यहां आपको सचेत रहने की जरूरत है। यहां भोपाल होकर भी पंहुचा जा सकता है। भोपाल के रास्ते यहां आने के लिए आपको पहले पिपरिया जाना होगा, फिर पिपरिया से पंचमढ़ी। इसके बाद आपको मिलेगी घने जंगलों और बड़ी-बड़ी पहा़ड़ियों के बीच स्थित नागद्वारी। नागपंचमी के अवसर पर यहां मेला भी लगता है, लेकिन इस मेले में शामिल होने का साहस बहुत कम लोग ही अर्जित कर पाते हैं। कारण है यहां के घने जंगल और खतरनाक पहाड़ियां, जिनके बीच से नागद्वारी तक पहुंचना आसान नहीं है।
यात्रा के लिए चाहिए अदम्य साहस
नागद्वार अथवा नागद्वारी पूरी दुनिया के हिंदुओं तथा धर्मप्रेमियों के लिए एक ऐसा स्थान है, जहां सभी लोग दर्शन करने और निहारने की कामना करते हैं। हालांकि यहां आने की इच्छा कम लोगों की ही पूरी होती है। पंचमढ़ी की पश्चिम दिशा में नागद्वार स्थित है। नागद्वारी की यात्रा अत्यंत दुष्कर है। अर्थात यह एक ऐसी यात्रा है, जिसको साहस, हौसले और धैर्य के बलबूते पर ही पार किया जा सकता है। साथ ही आपके अंदर जोखिम उठाने का हुनर भी होना जरूरी है। यद्यपि यहां लोगों का आना-जाना, तो साल भर लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास में तो नागपंचमी के 10 दिन पहले से ही कई प्रांतों के श्रद्धालु, विशेषकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के भक्तों का आना प्रारंभ हो जाता है। नागद्वारी के अंदर चिंतामणि की गुफा है। एक अनुमान के मुताबिक यह गुफा 100 फीट लंबी है। इस गुफा में नागदेव की मूर्तियां विराजमान हैं। स्वर्ग द्वार चिंतामणि गुफा से लगभग आधा किमी की दूरी पर एक गुफा में स्थित है। स्वर्ग द्वार में भी नागदेव की ही मूर्तियां हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा मानना है कि जो लोग नागद्वार जाते हैं, उनकी मांगी गई मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
भक्तों को नुकसान नहीं पहुंचाते सांप
आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व आरंभ हुई नागद्वारी की यात्रा कश्मीर की अमरनाथ यात्रा की तरह ही अत्यंत कठिन तथा खतरनाक है। कई मायनों तथा परिस्थितियों में तो यह उससे भी ज्यादा खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है। यहां एक अन्य समस्या भी है। ऊंची-नीची तथा दुर्गम पहाड़ियों के बीच बने रास्तों पर श्रद्धालुओं के लिए किसी तरह का आश्रय अथवा विराम स्थान नहीं है। अर्थात आपको अनवरत चलते ही रहना है। यहां आपको बैठने का भी कोई स्थान नहीं मिलेगा। नागद्वारी की यात्रा करते समय आपकी आस्था, साहस तथा धैर्य की कठिन परीक्षा होती है। यदि आप इसमें सफल होते हैं, तो आपको नागद्वारी के दर्शन होते हैं। यहां तक वे भक्त ही पंहुच पाते हैं, जिनके अंदर पूरे रास्ते मंजिल तक पंहुचने का जज्बा कायम रहता है। सतपुड़ा के जंगल काफी घने हैं। गर्मियों के मौसम को छोड़कर यहां हमेशा कोहरा बना रहता है। इस कोहरे तथा ठंड के मध्य यात्रा करने का अपना अलग ही आनंद है। नागद्वारी की यात्रा करते समय रास्ते में आपका सामना कई जहरीले सांपों से हो सकता है, लेकिन राहत की बात है कि यह सांप भक्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। हालांकि यह आपके अंदर डर जरूर पैदा करते हैं। चूंकि आप नागद्वारी जा रहे हैं, अत: इनका सम्मान करना भी आपका कर्तव्य है।
पंचमढ़ी : मध्य प्रदेश का कश्मीर
भारत के हृदय स्थल मध्य प्रदेश के दो जिलों की सीमाओं से लगा सतपुड़ा की वादियों में बसा पचमढ़ी है। जो देश के पर्यटकों, पर्यटन स्थल के साथ यह धार्मिक आस्था से जुड़ा भी है और आकर्षण में एक है। यहां जैसे प्रकृति ने अपना सारा सौंदर्य बिखेर दिया है। इसे मध्य प्रदेश का कश्मीर भी कहा जाता है। प्रकृति यहां अपनी सुंदरता का ताना-बाना बुनती रहती है। यहां की सुंदरता को बार-बार देखने का मन करता है। इसी सुंदरता के बीच में ही नागद्वार है। सतपुड़ा की वनाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं में बसे पचमढ़ी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे प्रकृति को अनायास ही भान हो कि भारत के हृदय में बसी इस धरती पर पर्वतीय अंचल का अभाव है। शायद इसीलिए प्रकृति ने एक विशाल पठार पर स्थित पचमढ़ी को बड़ी तन्मयता से नैसर्गिक श्रृंगार के हर अलंकरण से संवारा है। यहां हरियाली के आलिंगन में लिपटी पहाड़ियां हैं। घाटियां हैं। दर्रों की भूल-भुलैया है। चांदी के समान चमकते झरने हैं। आकाश जैसे दिखने वाले नीले जलाशय हैं। प्राणदायक वायु प्रदान करते वन-उपवन हैं। इन सबसे बढ़कर प्रकृति की बनाई हुई वे पवित्र गुफाएं हैं, जिनमें ईश्वर के दर्शन होते हैं। यहां आने वाले सैलानी प्रकृति के मोहपाश में इस कदर उलझ जाते हैं कि उससे निकलने का मन ही नहीं करता। पचमढ़ी की ऐसी ही रमणीयता को आत्मसात करने की चाहत यहां पहुंचने वाले हर किसी में होती है।
एक नहीं, मिलती हैं कई धार्मिक गुफाएं
वैसे भी भारतीय समाज में गुफाओं के रहस्य को लेकर कई कथा-कहानियां प्रचलन में हैं। खासकर भारत में जितनी मशहूर गुफाएं हैं, वे किसी न किसी देवी-देवता से संबंध रखती हैं। शायद इसी कारण लोग देवी-देवताओं के दर्शन करने के लिए गुफाओं में जाते हैं और साथ ही लोगों का इन गुफाओं पर विश्वास इतना ज्यादा होता है कि लोगों को लगता है कि पवित्र गुफाओं में जाकर जो भी इच्छा की जाएगी, वह जरूर पूरी होगी। नागलोक जाते वक्त रास्ते में जटाशंकर नामक स्थान है। ये भी एक पवित्र गुफा है। इस गुफा में कई सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचने पर भगवान शिव की प्रतिमा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव जब भस्मासुर से बचने के लिए भाग रहे थे, तब वे यहीं छिपे थे। आसपास बरगद के पेड़ों की झूलती शाखाएं तथा यहां की रॉक फॉर्मेशन ऐसा आभास देती हैं, जैसे चारों तरफ भगवान शिव की जटाएं फैली हुई हों। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम जटाशंकर पड़ा होगा। यहां शिवलिंग पर झुकी चट्टान तो ऐसी प्रतीत होती है मानो विशाल नाग ने अपना फन फैला रखा हो। इस गुफा से कुछ आगे जाने पर एक कुंड है। इसके आगे पांडव गुफा है। यह पांच गुफाओं का एक समूह है। ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास के दौरान कुछ अवधि इन गुफाओं में बिताई थी। इन पांच गुफाओं के आधार पर ही इस स्थान का नाम भी पचमढ़ी पड़ा है। इसमें पच वस्तुत: पंच का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है पांच और मढ़ी का अर्थ है कुटी। कहा जाता है कि पांडवों ने इन्हीं गुफाओं में अपना बसेरा बनाया था। ऊंचाई पर स्थित इन गुफाओं तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। प्राचीन काल में रेतीली चट्टान में अपने-आप बनी इन गुफाओं को आज बाहर से ही देखा जा सकता है।
एक अजूबा प्रकृति का
पचमढ़ी में प्रकृति का ही बनाया हुआ एक ऐसा अजूबा भी है, जिसे देख पर्यटकों को अचरज होता है। इसका नाम है हांडी खोह अर्थात अंधी खोह। यह लगभग 300 फुट गहरी है। इसके दोनों ओर की चट्टानें किसी दीवार के समान सीधी खड़ी हैं। रेलिंग के सहारे खड़े सैलानी अपनी आंखों से तो खोह की गहराई का अनुमान नहीं लगा पाते, लेकिन यदि वे उसमें कोई पत्थर आदि फेंकते हैं तो उसके तलहटी तक पहुंचने की आवाज काफी देर बाद सुनाई पड़ती है। दंतकथा है कि इस खोह में एक विशाल नाग रहता था और उसके कारण लोगों का आना-जाना मुश्किल था। ऋषियों ने भगवान शिव को अपनी व्यथा बताई तो उन्होंने अपने त्रिशूल से ऐसा प्रहार किया कि वह चट्टानों के मध्य कैद हो गया। त्रिशूल के उसी प्रहार से यह खोह बन गई थी। हांड़ी खोह से आगे बढ़ने पर महादेव गुफा स्थित है। महादेव गुफा करीब 40-45 फुट लंबी और करीब 15 फुट चौड़ी है। इस गुफा में एक शिवलिंग तथा भगवान शंकर की एक प्रतिमा है। इस गुफा से कई मिथक जुड़े हैं। गुफा में एक लंबा सा कुंड है। कहते हैं शिवलिंग के तेज को शांत रखने के लिए उस पर निरंतर जल की बूंदें गिरती रहनी चाहिए। शिव के तेज का यह भान शायद प्रकृति को भी है और इसीलिए इस गुफा में प्रकृति ने स्वयं यह व्यवस्था कर दी है। यहां प्राकृतिक रूप से लगातार भूमिगत जल रिसता रहता है, जिसकी बूंदें शिवलिंग पर तथा जलकुंड में गिरती रहती हैं। महादेव गुफा से कुछ दूर गुप्त महादेव नामक एक अत्यंत संकरी गुफा है। लगभग 40 फुट लंबी इस गुफा में एक बार में एक ही व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। अंदर कुछ खुला सा स्थान है, जहां शिवलिंग व गणेश प्रतिमा स्थित है। वहां सूर्य का प्रकाश तनिक भी नहीं पहुंचता। अंदर कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था है। गुफा के बाहर हनुमान जी की भी एक प्रतिमा है।
धूप का गढ़ है धूपगढ़
नागलोक जाते वक्त रास्तें में प्रियदशर्नी व्यू प्वाइंट है। पहले इस स्थान को फोर्सिथ प्वाइंट कहा जाता था। दरअसल 1857 में कैप्टन फोर्सिथ इस स्थान पर आया था। तब इस प्वाइंट से नजर आती नैसर्गिक आभा ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने पचमढ़ी को एक सैरगाह का दर्जा दिलवाया। यहां से चौरागढ़ एवं महादेव पहाड़ियों के शिखर स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके आगे पंचमढ़ी की परिधि में सतपुड़ा पर्वतमाला का सर्वोच्च शिखर धूपगढ़ स्थित है। यह समुद्र तल से करीब 4430 फुट की ऊंचाई पर है। कहते हैं सूर्य की किरणें सुबह सबसे पहले इस शिखर को ही स्पर्श करती हैं। इस शिखर पर प्रतिदिन लगभग 12 घंटे सूर्य का प्रकाश रहता है। शायद इसीलिए इसे धूपगढ़ कहते हैं। संध्याकाल में जब सूर्य की किरणें यहां के पहाड़ों की बलुआ चट्टानों पर पड़ती हैं, तो सूर्य का प्रकाश पल-पल बदलते विभिन्न रंगों में प्रतिबिंबित होता है। यही सब देखने के लिए यहां शाम होते ही सैलानियों का जमघट लगना शुरू हो जाता है। क्षितिज पर फैले रंग सुर्ख पड़ने लगते हैं और दिन भर उष्मा बिखेरता सूर्य जैसे थककर क्षितिज की ओर बढ़ने लगता है। सूर्यास्त का यह लुभावना दृश्य पर्यटकों को बहुत भाता है। पचमढ़ी की दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ी चौरागढ़ है। वहां भी शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। समुद्रतल से 4315 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर से अधिक पहाड़ी मार्ग पैदल तय करना होता है। सैलानी करीब 1175 सीढ़ियां चढ़कर या साथ ही बने कच्चे रास्ते पर चलते हुए चौरागढ़ पहुंचते हैं। मंदिर के नजदीक सीढ़ियों के आसपास कई कतारों में त्रिशूल गड़े हैं। यहां श्रद्धालु मनौतियां मानते हैं और मांगी मुराद पूरी होने पर वे परंपरा के अनुसार त्रिशूल चढ़ाते हैं। इसीलिए यहां छोटे-बड़े हजारों त्रिशूल रखे नजर आते हैं।
भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में स्थित नागद्वारी। छिंदवाड़ा जिला स्थित नागद्वारी एक पर्यटन स्थल के तौर पर काफी प्रसिद्ध है। लोग इसके प्रति आस्था भी रखते हैं। यहां की खूबसूरती को देख प्रतीत होता है कि जैसे प्रकृति ने अपनी सारी सुंदरता और मोहकता इसी स्थान पर बिखेर दी है। इसी सौंदर्य के बीच में नागद्वार स्थित है।

अनीश कुमार उपाध्याय
जरा कल्पना कीजिए कि आप कहीं खड़े हैं और आप के सामने एक सांप आ जाए, तो क्या होगा? जाहिर है कि आप घबरा जाएंगे। वहीं यदि आप एक धैयर्वान, साहसी व्यक्ति हैं तथा आप दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ने और उतरने का खतरा उठाने को तैयार हैं, तो आप नागराज की दुनिया के दर्शन कर सकते हैं। जी हां, यह कोई किवंदती या इतिहास नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत सच है। मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा जिले से लगभग 160 किमी दूर सतपुड़ा नामक पहाड़ियां हैं। इन्हीं पहाड़ियों पर नाग गुफा स्थित है। यहां पंचमढ़ी की पहाड़ियां हैं और यह गुफा इनमें ही स्थित है। पहाड़ियां होने के कारण यह बहुत ही खतरनाक स्थान है। यहां आपको सचेत रहने की जरूरत है। यहां भोपाल होकर भी पंहुचा जा सकता है। भोपाल के रास्ते यहां आने के लिए आपको पहले पिपरिया जाना होगा, फिर पिपरिया से पंचमढ़ी। इसके बाद आपको मिलेगी घने जंगलों और बड़ी-बड़ी पहा़ड़ियों के बीच स्थित नागद्वारी। नागपंचमी के अवसर पर यहां मेला भी लगता है, लेकिन इस मेले में शामिल होने का साहस बहुत कम लोग ही अर्जित कर पाते हैं। कारण है यहां के घने जंगल और खतरनाक पहाड़ियां, जिनके बीच से नागद्वारी तक पहुंचना आसान नहीं है।
यात्रा के लिए चाहिए अदम्य साहस
नागद्वार अथवा नागद्वारी पूरी दुनिया के हिंदुओं तथा धर्मप्रेमियों के लिए एक ऐसा स्थान है, जहां सभी लोग दर्शन करने और निहारने की कामना करते हैं। हालांकि यहां आने की इच्छा कम लोगों की ही पूरी होती है। पंचमढ़ी की पश्चिम दिशा में नागद्वार स्थित है। नागद्वारी की यात्रा अत्यंत दुष्कर है। अर्थात यह एक ऐसी यात्रा है, जिसको साहस, हौसले और धैर्य के बलबूते पर ही पार किया जा सकता है। साथ ही आपके अंदर जोखिम उठाने का हुनर भी होना जरूरी है। यद्यपि यहां लोगों का आना-जाना, तो साल भर लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास में तो नागपंचमी के 10 दिन पहले से ही कई प्रांतों के श्रद्धालु, विशेषकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के भक्तों का आना प्रारंभ हो जाता है। नागद्वारी के अंदर चिंतामणि की गुफा है। एक अनुमान के मुताबिक यह गुफा 100 फीट लंबी है। इस गुफा में नागदेव की मूर्तियां विराजमान हैं। स्वर्ग द्वार चिंतामणि गुफा से लगभग आधा किमी की दूरी पर एक गुफा में स्थित है। स्वर्ग द्वार में भी नागदेव की ही मूर्तियां हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा मानना है कि जो लोग नागद्वार जाते हैं, उनकी मांगी गई मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
भक्तों को नुकसान नहीं पहुंचाते सांप
आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व आरंभ हुई नागद्वारी की यात्रा कश्मीर की अमरनाथ यात्रा की तरह ही अत्यंत कठिन तथा खतरनाक है। कई मायनों तथा परिस्थितियों में तो यह उससे भी ज्यादा खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है। यहां एक अन्य समस्या भी है। ऊंची-नीची तथा दुर्गम पहाड़ियों के बीच बने रास्तों पर श्रद्धालुओं के लिए किसी तरह का आश्रय अथवा विराम स्थान नहीं है। अर्थात आपको अनवरत चलते ही रहना है। यहां आपको बैठने का भी कोई स्थान नहीं मिलेगा। नागद्वारी की यात्रा करते समय आपकी आस्था, साहस तथा धैर्य की कठिन परीक्षा होती है। यदि आप इसमें सफल होते हैं, तो आपको नागद्वारी के दर्शन होते हैं। यहां तक वे भक्त ही पंहुच पाते हैं, जिनके अंदर पूरे रास्ते मंजिल तक पंहुचने का जज्बा कायम रहता है। सतपुड़ा के जंगल काफी घने हैं। गर्मियों के मौसम को छोड़कर यहां हमेशा कोहरा बना रहता है। इस कोहरे तथा ठंड के मध्य यात्रा करने का अपना अलग ही आनंद है। नागद्वारी की यात्रा करते समय रास्ते में आपका सामना कई जहरीले सांपों से हो सकता है, लेकिन राहत की बात है कि यह सांप भक्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। हालांकि यह आपके अंदर डर जरूर पैदा करते हैं। चूंकि आप नागद्वारी जा रहे हैं, अत: इनका सम्मान करना भी आपका कर्तव्य है।
पंचमढ़ी : मध्य प्रदेश का कश्मीर
भारत के हृदय स्थल मध्य प्रदेश के दो जिलों की सीमाओं से लगा सतपुड़ा की वादियों में बसा पचमढ़ी है। जो देश के पर्यटकों, पर्यटन स्थल के साथ यह धार्मिक आस्था से जुड़ा भी है और आकर्षण में एक है। यहां जैसे प्रकृति ने अपना सारा सौंदर्य बिखेर दिया है। इसे मध्य प्रदेश का कश्मीर भी कहा जाता है। प्रकृति यहां अपनी सुंदरता का ताना-बाना बुनती रहती है। यहां की सुंदरता को बार-बार देखने का मन करता है। इसी सुंदरता के बीच में ही नागद्वार है। सतपुड़ा की वनाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं में बसे पचमढ़ी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे प्रकृति को अनायास ही भान हो कि भारत के हृदय में बसी इस धरती पर पर्वतीय अंचल का अभाव है। शायद इसीलिए प्रकृति ने एक विशाल पठार पर स्थित पचमढ़ी को बड़ी तन्मयता से नैसर्गिक श्रृंगार के हर अलंकरण से संवारा है। यहां हरियाली के आलिंगन में लिपटी पहाड़ियां हैं। घाटियां हैं। दर्रों की भूल-भुलैया है। चांदी के समान चमकते झरने हैं। आकाश जैसे दिखने वाले नीले जलाशय हैं। प्राणदायक वायु प्रदान करते वन-उपवन हैं। इन सबसे बढ़कर प्रकृति की बनाई हुई वे पवित्र गुफाएं हैं, जिनमें ईश्वर के दर्शन होते हैं। यहां आने वाले सैलानी प्रकृति के मोहपाश में इस कदर उलझ जाते हैं कि उससे निकलने का मन ही नहीं करता। पचमढ़ी की ऐसी ही रमणीयता को आत्मसात करने की चाहत यहां पहुंचने वाले हर किसी में होती है।
एक नहीं, मिलती हैं कई धार्मिक गुफाएं
वैसे भी भारतीय समाज में गुफाओं के रहस्य को लेकर कई कथा-कहानियां प्रचलन में हैं। खासकर भारत में जितनी मशहूर गुफाएं हैं, वे किसी न किसी देवी-देवता से संबंध रखती हैं। शायद इसी कारण लोग देवी-देवताओं के दर्शन करने के लिए गुफाओं में जाते हैं और साथ ही लोगों का इन गुफाओं पर विश्वास इतना ज्यादा होता है कि लोगों को लगता है कि पवित्र गुफाओं में जाकर जो भी इच्छा की जाएगी, वह जरूर पूरी होगी। नागलोक जाते वक्त रास्ते में जटाशंकर नामक स्थान है। ये भी एक पवित्र गुफा है। इस गुफा में कई सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचने पर भगवान शिव की प्रतिमा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव जब भस्मासुर से बचने के लिए भाग रहे थे, तब वे यहीं छिपे थे। आसपास बरगद के पेड़ों की झूलती शाखाएं तथा यहां की रॉक फॉर्मेशन ऐसा आभास देती हैं, जैसे चारों तरफ भगवान शिव की जटाएं फैली हुई हों। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम जटाशंकर पड़ा होगा। यहां शिवलिंग पर झुकी चट्टान तो ऐसी प्रतीत होती है मानो विशाल नाग ने अपना फन फैला रखा हो। इस गुफा से कुछ आगे जाने पर एक कुंड है। इसके आगे पांडव गुफा है। यह पांच गुफाओं का एक समूह है। ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास के दौरान कुछ अवधि इन गुफाओं में बिताई थी। इन पांच गुफाओं के आधार पर ही इस स्थान का नाम भी पचमढ़ी पड़ा है। इसमें पच वस्तुत: पंच का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है पांच और मढ़ी का अर्थ है कुटी। कहा जाता है कि पांडवों ने इन्हीं गुफाओं में अपना बसेरा बनाया था। ऊंचाई पर स्थित इन गुफाओं तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। प्राचीन काल में रेतीली चट्टान में अपने-आप बनी इन गुफाओं को आज बाहर से ही देखा जा सकता है।
एक अजूबा प्रकृति का
पचमढ़ी में प्रकृति का ही बनाया हुआ एक ऐसा अजूबा भी है, जिसे देख पर्यटकों को अचरज होता है। इसका नाम है हांडी खोह अर्थात अंधी खोह। यह लगभग 300 फुट गहरी है। इसके दोनों ओर की चट्टानें किसी दीवार के समान सीधी खड़ी हैं। रेलिंग के सहारे खड़े सैलानी अपनी आंखों से तो खोह की गहराई का अनुमान नहीं लगा पाते, लेकिन यदि वे उसमें कोई पत्थर आदि फेंकते हैं तो उसके तलहटी तक पहुंचने की आवाज काफी देर बाद सुनाई पड़ती है। दंतकथा है कि इस खोह में एक विशाल नाग रहता था और उसके कारण लोगों का आना-जाना मुश्किल था। ऋषियों ने भगवान शिव को अपनी व्यथा बताई तो उन्होंने अपने त्रिशूल से ऐसा प्रहार किया कि वह चट्टानों के मध्य कैद हो गया। त्रिशूल के उसी प्रहार से यह खोह बन गई थी। हांड़ी खोह से आगे बढ़ने पर महादेव गुफा स्थित है। महादेव गुफा करीब 40-45 फुट लंबी और करीब 15 फुट चौड़ी है। इस गुफा में एक शिवलिंग तथा भगवान शंकर की एक प्रतिमा है। इस गुफा से कई मिथक जुड़े हैं। गुफा में एक लंबा सा कुंड है। कहते हैं शिवलिंग के तेज को शांत रखने के लिए उस पर निरंतर जल की बूंदें गिरती रहनी चाहिए। शिव के तेज का यह भान शायद प्रकृति को भी है और इसीलिए इस गुफा में प्रकृति ने स्वयं यह व्यवस्था कर दी है। यहां प्राकृतिक रूप से लगातार भूमिगत जल रिसता रहता है, जिसकी बूंदें शिवलिंग पर तथा जलकुंड में गिरती रहती हैं। महादेव गुफा से कुछ दूर गुप्त महादेव नामक एक अत्यंत संकरी गुफा है। लगभग 40 फुट लंबी इस गुफा में एक बार में एक ही व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। अंदर कुछ खुला सा स्थान है, जहां शिवलिंग व गणेश प्रतिमा स्थित है। वहां सूर्य का प्रकाश तनिक भी नहीं पहुंचता। अंदर कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था है। गुफा के बाहर हनुमान जी की भी एक प्रतिमा है।
धूप का गढ़ है धूपगढ़
नागलोक जाते वक्त रास्तें में प्रियदशर्नी व्यू प्वाइंट है। पहले इस स्थान को फोर्सिथ प्वाइंट कहा जाता था। दरअसल 1857 में कैप्टन फोर्सिथ इस स्थान पर आया था। तब इस प्वाइंट से नजर आती नैसर्गिक आभा ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने पचमढ़ी को एक सैरगाह का दर्जा दिलवाया। यहां से चौरागढ़ एवं महादेव पहाड़ियों के शिखर स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके आगे पंचमढ़ी की परिधि में सतपुड़ा पर्वतमाला का सर्वोच्च शिखर धूपगढ़ स्थित है। यह समुद्र तल से करीब 4430 फुट की ऊंचाई पर है। कहते हैं सूर्य की किरणें सुबह सबसे पहले इस शिखर को ही स्पर्श करती हैं। इस शिखर पर प्रतिदिन लगभग 12 घंटे सूर्य का प्रकाश रहता है। शायद इसीलिए इसे धूपगढ़ कहते हैं। संध्याकाल में जब सूर्य की किरणें यहां के पहाड़ों की बलुआ चट्टानों पर पड़ती हैं, तो सूर्य का प्रकाश पल-पल बदलते विभिन्न रंगों में प्रतिबिंबित होता है। यही सब देखने के लिए यहां शाम होते ही सैलानियों का जमघट लगना शुरू हो जाता है। क्षितिज पर फैले रंग सुर्ख पड़ने लगते हैं और दिन भर उष्मा बिखेरता सूर्य जैसे थककर क्षितिज की ओर बढ़ने लगता है। सूर्यास्त का यह लुभावना दृश्य पर्यटकों को बहुत भाता है। पचमढ़ी की दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ी चौरागढ़ है। वहां भी शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। समुद्रतल से 4315 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर से अधिक पहाड़ी मार्ग पैदल तय करना होता है। सैलानी करीब 1175 सीढ़ियां चढ़कर या साथ ही बने कच्चे रास्ते पर चलते हुए चौरागढ़ पहुंचते हैं। मंदिर के नजदीक सीढ़ियों के आसपास कई कतारों में त्रिशूल गड़े हैं। यहां श्रद्धालु मनौतियां मानते हैं और मांगी मुराद पूरी होने पर वे परंपरा के अनुसार त्रिशूल चढ़ाते हैं। इसीलिए यहां छोटे-बड़े हजारों त्रिशूल रखे नजर आते हैं।
इनसेट
नागलोक से जुड़ी है पांडु पुत्र भीम की कथा
कहा जाता है कि पांचों पांडवों में अकेले भीम के पास हजारों हाथियों का बल था। यह बल उन्हें जहां से मिला था, वह नागलोक ही था। महाभारत की कथा के अनुसार बलशाली भीम का बल देखकर दुर्योधन काफी ईर्ष्या रखता था। उसने भीमसेन को मारने के लिए एक दिन युधिष्ठिर के समक्ष गंगा तट पर स्नान, भोजन तथा क्रीडा करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद गंगा तट पर विविध व्यंजन तैयार करवाया। स्नानादि के बाद जब सभी ने भोजन किया तो मौका पाकर दुर्योधन ने भीम को विषयुक्त भोजन खिला दिया। भोजन के बाद सब बालक वहीं सो गये। भीम को विष के प्रभाव से मूर्छा आ गई। मूर्छित भीम को दुर्योधन ने गंगा में डुबो दिया। मूर्छित भीम डूबते-उतराते नागलोक पहुंच गए। वहां उन्हें भयंकर विषधर नाग डसने लगे। विषधरों के विष के प्रभाव से भीम के शरीर के भीतर का विष नष्ट हो गया और वे सचेतावस्था में आ गए। चेतना लौटने पर वे नागों को मारने लगे। भीम के इस विनाशलीला देख कुछ नाग भागकर अपने राजा वासुकि के पास पहुंचे और उन्हें घटना से अवगत कराया। नागराज वासुकि अपने मंत्री आर्यक के साथ भीम के पास आए। आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया और उनका परिचय राजा वासुकि को दिया। वासुकि नाग ने भीम को अपना अतिथि बना लिया। नागलोक में आठ ऐसे कुंड थे, जिनका जल पीने से मनुष्य के शरीर में हजारों हाथियों का बल आ जाता था। नागराज वासुकि ने भीम को उपहार में उन आठों कुंडों का जल पिला दिया। इन कुंडों का जल पीने के बाद भीम गहन निद्रा में चले गए। आठवें दिन जब उनकी निद्रा टूटी तो उनके शरीर में हजारों हाथियों का बल आ चुका था। भीम के विदा मांगने पर नागराज वासुकी ने उन्हें उनकी वाटिका में पहुंचा दिया।
(यह खबर नेशनल वीकली न्यूज़ पेपर हमवतन में प्रकाशित है )


















