श्री गणेशाय नमः

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Wednesday, December 5, 2012

‘नागलोक’ की सैर


जहां फैली है नागराज की सल्तनत

आकर्षण
अदम्य साहस और कठिन लक्ष्य की परीक्षा
छिंदवाड़ा जिले से है 160 किलोमीटर दूर
नागद्वारी में है 100 फीट लंबी चिंतामणि गुफा
प्रकृति की सुंदरता का दिखता अदभूत नजारा
भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में स्थित नागद्वारी। छिंदवाड़ा जिला स्थित नागद्वारी एक पर्यटन स्थल के तौर पर काफी प्रसिद्ध है। लोग इसके प्रति आस्था भी रखते हैं। यहां की खूबसूरती को देख प्रतीत होता है कि जैसे प्रकृति ने अपनी सारी सुंदरता और मोहकता इसी स्थान पर बिखेर दी है। इसी सौंदर्य के बीच में नागद्वार स्थित है।
 
अनीश कुमार उपाध्याय
जरा कल्पना कीजिए कि आप कहीं खड़े हैं और आप के सामने एक सांप आ जाए, तो क्या होगा? जाहिर है कि आप घबरा जाएंगे। वहीं यदि आप एक धैयर्वान, साहसी  व्यक्ति हैं तथा आप दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ने और उतरने का खतरा उठाने को तैयार हैं, तो आप नागराज की दुनिया के दर्शन कर सकते हैं। जी हां, यह कोई किवंदती या इतिहास नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत सच है। मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा जिले से  लगभग 160 किमी दूर सतपुड़ा नामक पहाड़ियां हैं। इन्हीं पहाड़ियों पर नाग गुफा स्थित है। यहां पंचमढ़ी की पहाड़ियां हैं और यह गुफा इनमें ही स्थित है। पहाड़ियां होने के कारण यह बहुत ही खतरनाक स्थान है। यहां आपको सचेत रहने की जरूरत है। यहां भोपाल होकर भी पंहुचा जा सकता है। भोपाल के रास्ते यहां आने के लिए आपको पहले पिपरिया जाना होगा, फिर पिपरिया से पंचमढ़ी। इसके बाद आपको मिलेगी घने जंगलों और बड़ी-बड़ी पहा़ड़ियों के बीच स्थित नागद्वारी। नागपंचमी के अवसर पर यहां मेला भी लगता है, लेकिन इस मेले में शामिल होने का साहस बहुत कम लोग ही अर्जित कर पाते हैं। कारण है यहां के घने जंगल और खतरनाक पहाड़ियां, जिनके बीच से नागद्वारी तक पहुंचना आसान नहीं है।
यात्रा के लिए चाहिए अदम्य साहस 
नागद्वार अथवा नागद्वारी पूरी दुनिया के हिंदुओं तथा धर्मप्रेमियों के लिए एक ऐसा स्थान है, जहां सभी लोग दर्शन करने और निहारने की कामना करते हैं। हालांकि यहां आने की इच्छा कम लोगों की ही पूरी होती है। पंचमढ़ी की पश्चिम दिशा में नागद्वार स्थित है। नागद्वारी की यात्रा अत्यंत दुष्कर है। अर्थात यह एक ऐसी यात्रा है, जिसको साहस, हौसले और धैर्य के बलबूते पर ही पार किया जा सकता है। साथ ही आपके अंदर जोखिम उठाने का हुनर भी होना जरूरी है। यद्यपि यहां लोगों का आना-जाना, तो साल भर लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास में तो नागपंचमी के 10 दिन पहले से ही कई प्रांतों के श्रद्धालु, विशेषकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के भक्तों का आना प्रारंभ हो जाता है। नागद्वारी के अंदर चिंतामणि की गुफा है। एक अनुमान के मुताबिक यह गुफा 100 फीट लंबी है। इस गुफा में नागदेव की मूर्तियां विराजमान हैं। स्वर्ग द्वार चिंतामणि गुफा से लगभग आधा किमी की दूरी पर एक गुफा में स्थित है। स्वर्ग द्वार में भी नागदेव की ही मूर्तियां हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा मानना है कि जो लोग नागद्वार जाते हैं, उनकी मांगी गई मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
भक्तों को नुकसान नहीं पहुंचाते सांप
आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व आरंभ हुई नागद्वारी की यात्रा कश्मीर की अमरनाथ यात्रा की तरह ही अत्यंत कठिन तथा खतरनाक है। कई मायनों तथा परिस्थितियों में तो यह उससे भी ज्यादा खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है। यहां एक अन्य समस्या भी है। ऊंची-नीची तथा दुर्गम पहाड़ियों के बीच बने रास्तों पर श्रद्धालुओं के लिए किसी तरह का आश्रय अथवा विराम स्थान नहीं है। अर्थात आपको अनवरत चलते ही रहना है। यहां आपको बैठने का भी कोई स्थान नहीं मिलेगा। नागद्वारी की यात्रा करते समय आपकी आस्था, साहस तथा धैर्य की कठिन परीक्षा होती है। यदि आप इसमें सफल होते हैं, तो आपको नागद्वारी के दर्शन होते हैं। यहां तक वे भक्त ही पंहुच पाते हैं, जिनके अंदर पूरे रास्ते मंजिल तक पंहुचने का जज्बा कायम रहता है। सतपुड़ा के जंगल काफी घने हैं। गर्मियों के मौसम को छोड़कर यहां हमेशा कोहरा बना रहता है। इस कोहरे तथा ठंड के मध्य यात्रा करने का अपना अलग ही आनंद है। नागद्वारी की यात्रा करते समय रास्ते में आपका सामना कई जहरीले सांपों से हो सकता है, लेकिन राहत की बात है कि यह सांप भक्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। हालांकि यह आपके अंदर डर जरूर पैदा करते हैं। चूंकि आप नागद्वारी जा रहे हैं, अत: इनका सम्मान करना भी आपका कर्तव्य है।
पंचमढ़ी : मध्य प्रदेश का कश्मीर
भारत के हृदय स्थल मध्य प्रदेश के दो जिलों की सीमाओं से लगा सतपुड़ा की वादियों में बसा पचमढ़ी है। जो देश के पर्यटकों, पर्यटन स्थल के साथ यह धार्मिक आस्था से जुड़ा भी है और आकर्षण में एक है। यहां जैसे प्रकृति ने अपना सारा सौंदर्य बिखेर दिया है। इसे मध्य प्रदेश का कश्मीर भी कहा जाता है। प्रकृति यहां अपनी सुंदरता का ताना-बाना बुनती रहती है। यहां की सुंदरता को बार-बार देखने का मन करता है। इसी सुंदरता के बीच में ही नागद्वार है। सतपुड़ा की वनाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं में बसे पचमढ़ी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे प्रकृति को अनायास ही भान हो कि भारत के हृदय में बसी इस धरती पर पर्वतीय अंचल का अभाव है। शायद इसीलिए प्रकृति ने एक विशाल पठार पर स्थित पचमढ़ी को बड़ी तन्मयता से नैसर्गिक श्रृंगार के हर अलंकरण से संवारा है। यहां हरियाली के आलिंगन में लिपटी पहाड़ियां हैं। घाटियां हैं। दर्रों की भूल-भुलैया है। चांदी के समान चमकते झरने हैं। आकाश जैसे दिखने वाले नीले जलाशय हैं। प्राणदायक वायु प्रदान करते वन-उपवन हैं। इन सबसे बढ़कर प्रकृति की बनाई हुई वे पवित्र गुफाएं हैं, जिनमें ईश्वर के दर्शन होते हैं। यहां आने वाले सैलानी प्रकृति के मोहपाश में इस कदर उलझ जाते हैं कि उससे निकलने का मन ही नहीं करता। पचमढ़ी की ऐसी ही रमणीयता को आत्मसात करने की चाहत यहां पहुंचने वाले हर किसी में होती है।
एक नहीं, मिलती हैं कई धार्मिक गुफाएं
वैसे भी भारतीय समाज में गुफाओं के रहस्य को लेकर कई कथा-कहानियां प्रचलन में हैं। खासकर भारत में जितनी मशहूर गुफाएं हैं, वे किसी न किसी देवी-देवता से संबंध रखती हैं। शायद इसी कारण लोग देवी-देवताओं के दर्शन करने के लिए गुफाओं में जाते हैं और साथ ही लोगों का इन गुफाओं पर विश्वास इतना ज्यादा होता है कि लोगों को लगता है कि पवित्र गुफाओं में जाकर जो भी इच्छा की जाएगी, वह जरूर पूरी होगी। नागलोक जाते वक्त रास्ते में जटाशंकर नामक स्थान है। ये भी एक पवित्र गुफा है। इस गुफा में कई सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचने पर भगवान शिव की प्रतिमा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव जब भस्मासुर से बचने के लिए भाग रहे थे, तब वे यहीं छिपे थे। आसपास बरगद के पेड़ों की झूलती शाखाएं तथा यहां की रॉक फॉर्मेशन ऐसा आभास देती हैं, जैसे चारों तरफ भगवान शिव की जटाएं फैली हुई हों। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम जटाशंकर पड़ा होगा। यहां शिवलिंग पर झुकी चट्टान तो ऐसी प्रतीत होती है मानो विशाल नाग ने अपना फन फैला रखा हो। इस गुफा से कुछ आगे जाने पर एक कुंड है। इसके आगे पांडव गुफा है। यह पांच गुफाओं का एक समूह है। ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास के दौरान कुछ अवधि इन गुफाओं में बिताई थी। इन पांच गुफाओं के आधार पर ही इस स्थान का नाम भी पचमढ़ी पड़ा है। इसमें पच वस्तुत: पंच का अपभ्रंश  है। इसका अर्थ है पांच और मढ़ी का अर्थ है कुटी। कहा जाता है कि पांडवों ने इन्हीं गुफाओं में अपना बसेरा बनाया था। ऊंचाई पर स्थित इन गुफाओं तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। प्राचीन काल में रेतीली चट्टान में अपने-आप बनी इन गुफाओं को आज बाहर से ही देखा जा सकता है।
एक अजूबा प्रकृति का
पचमढ़ी में प्रकृति का ही बनाया हुआ एक ऐसा अजूबा भी है, जिसे देख पर्यटकों को अचरज होता है। इसका नाम है हांडी खोह अर्थात अंधी खोह। यह लगभग 300 फुट गहरी है। इसके दोनों ओर की चट्टानें किसी दीवार के समान सीधी खड़ी हैं। रेलिंग के सहारे खड़े सैलानी अपनी आंखों से तो खोह की गहराई का अनुमान नहीं लगा पाते, लेकिन यदि वे उसमें कोई पत्थर आदि फेंकते हैं तो उसके तलहटी तक पहुंचने की आवाज काफी देर बाद सुनाई पड़ती है। दंतकथा है कि इस खोह में एक विशाल नाग रहता था और उसके कारण लोगों का आना-जाना मुश्किल था। ऋषियों ने भगवान शिव को अपनी व्यथा बताई तो उन्होंने अपने त्रिशूल से ऐसा प्रहार किया कि वह चट्टानों के मध्य कैद हो गया। त्रिशूल के उसी प्रहार से यह खोह बन गई थी। हांड़ी खोह से आगे बढ़ने पर महादेव गुफा स्थित है। महादेव गुफा करीब 40-45 फुट लंबी और करीब 15 फुट चौड़ी है। इस गुफा में एक शिवलिंग तथा भगवान शंकर की एक प्रतिमा है। इस गुफा से कई मिथक जुड़े हैं। गुफा में एक लंबा सा कुंड है। कहते हैं शिवलिंग के तेज को शांत रखने के लिए उस पर निरंतर जल की बूंदें गिरती रहनी चाहिए। शिव के तेज का यह भान शायद प्रकृति को भी है और इसीलिए इस गुफा में प्रकृति ने स्वयं यह व्यवस्था कर दी है। यहां प्राकृतिक रूप से लगातार भूमिगत जल रिसता रहता है, जिसकी बूंदें शिवलिंग पर तथा जलकुंड में गिरती रहती हैं। महादेव गुफा से कुछ दूर गुप्त महादेव नामक एक अत्यंत संकरी गुफा है। लगभग 40 फुट लंबी इस गुफा में एक बार में एक ही व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। अंदर कुछ खुला सा स्थान है, जहां शिवलिंग व गणेश प्रतिमा स्थित है। वहां सूर्य का प्रकाश तनिक भी नहीं पहुंचता। अंदर कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था है। गुफा के बाहर हनुमान जी की भी एक प्रतिमा है।
धूप का गढ़ है धूपगढ़
नागलोक जाते वक्त रास्तें में प्रियदशर्नी व्यू प्वाइंट है। पहले इस स्थान को फोर्सिथ प्वाइंट कहा जाता था। दरअसल 1857 में कैप्टन फोर्सिथ इस स्थान पर आया था। तब इस प्वाइंट से नजर आती नैसर्गिक आभा ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने पचमढ़ी को एक सैरगाह का दर्जा दिलवाया। यहां से चौरागढ़ एवं महादेव पहाड़ियों के शिखर स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके आगे पंचमढ़ी की परिधि में सतपुड़ा पर्वतमाला का सर्वोच्च शिखर धूपगढ़ स्थित है। यह समुद्र तल से करीब 4430 फुट की ऊंचाई पर है। कहते हैं सूर्य की किरणें सुबह सबसे पहले इस शिखर को ही स्पर्श करती हैं। इस शिखर पर प्रतिदिन लगभग 12 घंटे सूर्य का प्रकाश रहता है। शायद इसीलिए इसे धूपगढ़ कहते हैं। संध्याकाल में जब सूर्य की किरणें यहां के पहाड़ों की बलुआ चट्टानों पर पड़ती हैं, तो सूर्य का प्रकाश पल-पल बदलते विभिन्न रंगों में प्रतिबिंबित होता है। यही सब देखने के लिए यहां शाम होते ही सैलानियों का जमघट लगना शुरू हो जाता है। क्षितिज पर फैले रंग सुर्ख पड़ने लगते हैं और दिन भर उष्मा बिखेरता सूर्य जैसे थककर क्षितिज की ओर बढ़ने लगता है। सूर्यास्त का यह लुभावना दृश्य पर्यटकों को बहुत भाता है। पचमढ़ी की दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ी चौरागढ़ है। वहां भी शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। समुद्रतल से 4315 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर से अधिक पहाड़ी मार्ग पैदल तय करना होता है। सैलानी करीब 1175 सीढ़ियां चढ़कर या साथ ही बने कच्चे रास्ते पर चलते हुए चौरागढ़ पहुंचते हैं। मंदिर के नजदीक सीढ़ियों के आसपास कई कतारों में त्रिशूल गड़े हैं। यहां श्रद्धालु मनौतियां मानते हैं और मांगी मुराद पूरी होने पर वे परंपरा के अनुसार त्रिशूल चढ़ाते हैं। इसीलिए यहां छोटे-बड़े हजारों त्रिशूल रखे नजर आते हैं।

इनसेट

नागलोक से जुड़ी है पांडु पुत्र भीम की कथा

कहा जाता है कि पांचों पांडवों में अकेले भीम के पास हजारों हाथियों का बल था। यह बल उन्हें जहां से मिला था, वह नागलोक ही था। महाभारत की कथा के अनुसार बलशाली भीम का बल देखकर दुर्योधन काफी ईर्ष्या रखता था। उसने भीमसेन को मारने के लिए एक दिन युधिष्ठिर के समक्ष गंगा तट पर स्नान, भोजन तथा क्रीडा करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद गंगा तट पर विविध व्यंजन तैयार करवाया। स्नानादि के बाद जब सभी ने भोजन किया तो मौका पाकर दुर्योधन ने भीम को विषयुक्त भोजन खिला दिया। भोजन के बाद सब बालक वहीं सो गये। भीम को विष के प्रभाव से मूर्छा आ गई। मूर्छित भीम को दुर्योधन ने गंगा में डुबो दिया। मूर्छित भीम डूबते-उतराते नागलोक पहुंच गए। वहां उन्हें भयंकर विषधर नाग डसने लगे। विषधरों के विष के प्रभाव से भीम के शरीर के भीतर का विष नष्ट हो गया और वे सचेतावस्था में आ गए। चेतना लौटने पर वे नागों को मारने लगे। भीम के इस विनाशलीला देख कुछ नाग भागकर अपने राजा वासुकि के पास पहुंचे और उन्हें घटना से अवगत कराया। नागराज वासुकि अपने मंत्री आर्यक के साथ भीम के पास आए। आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया और उनका परिचय राजा वासुकि को दिया। वासुकि नाग ने भीम को अपना अतिथि बना लिया। नागलोक में आठ ऐसे कुंड थे, जिनका जल पीने से मनुष्य के शरीर में हजारों हाथियों का बल आ जाता था। नागराज वासुकि ने भीम को उपहार में उन आठों कुंडों का जल पिला दिया। इन कुंडों का जल पीने के बाद भीम गहन निद्रा में चले गए। आठवें दिन जब उनकी निद्रा टूटी तो उनके शरीर में हजारों हाथियों का बल आ चुका था। भीम के विदा मांगने पर नागराज वासुकी ने उन्हें उनकी वाटिका में पहुंचा दिया।

(यह  खबर नेशनल वीकली न्यूज़ पेपर हमवतन में प्रकाशित है )

Thursday, October 25, 2012

...जहां अंग्रेज हुक्मरानों के झुकते थे सिर


गाजीपुर की पहली प्रोटेस्टियन चर्च का है गौरवशाली इतिहास
धनाभाव के चलते आज बदहाली पर बहा रही आंसू
अनीश कुमार उपाध्याय / गाजीपुर 
नगर के प्रोटेस्टियन चर्च का गौरवशाली इतिहास है। यही वह स्थल है जहां ब्रिटिश हुक्मरानों के सिर श्रद्धा से झुक जाया करते थे। इस बात की गवाह है वहां पत्थरों पर खुदी इबारतें, उसकी दीवारें व मीनार। अफसोस...पूर्वांचल का यह पहला चर्च इन दिनों उपेक्षा का शिकार है। पूरे 22 बीघा क्षेत्रफल में स्थापित इस चर्च के लिए आज न कायदे का संपर्क मार्ग है और न ही स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था।
वर्ष 1962 में बना जिले का इकलौता सेंट थॉमस चर्च है, जहां ब्रिटिश हुकूमत की कई बड़ी शख्सियतें प्रार्थना कर चुकी हैं। चर्च कंपाउंड में लगे पत्थर आज भी इसकी एतिहासिकता की कहानी को बयां कर रहे हैं। अपने जमाने में चर्चित हस्तियां यहां के कंपाउंड में दफन हैं। पत्थरों पर अंकित उनके नाम, पदनाम आदि इन हस्तियों के अतीत को अपने में समेटे हैं। इनमें तत्कालीन आईसीएस राबर्ट ओसवाल्ड डगलस, कैप्टन एन प्लैंटा गैनेट राबिन हुड होस्टिंगलस समेत गोरी हुकूमत के तत्कालीन जिला जज रहे एसिहेकिग्ड की धर्मपत्नी एली अलेक्जेंडर की स्मृति में चर्च की दीवारों पर पत्थर लगे हैं। पत्थरों पर यहां तक जानकारी दी गई है कि डगलस की मौत कालरा की वजह से हुई। पादरी रेवरेंट अभय सोंस ने बताया कि यह चर्च शुरू में प्रोस्टेटियन विचारधारा के मैथाडिस्ट संस्था के अधीन निर्मित हुआ था। तदुपरांत वर्ष 1978 में यह चर्च ऑफ नार्थ इंडिया संस्था से जुड़ा। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत में चर्च में वह सारी चीजें सुलभ थीं, जो होनी चाहिए। आजादी के बाद जब ब्रितानी यहां से कूच कर गए तो दिनोंदिन चर्च की दुर्दशा होती गई। यहां तक कि पादरियों के रहने वाली कोठी (पार्सनेज) आज बदहाल हो चुकी है। आलम यह है कि यहां की दीवारें, छत जर्जर हैं। वहीं पोर्टिको जमींदोज हो चुका है। रख-रखाव के बाबत जानकारी दी कि हर रविवार को होने वाली प्रार्थना सभा  में शामिल होने वाले लोगों के सहयोग से मिली धनराशि से ही सारा कार्य कराना पड़ता है। पिछले वर्ष एक लाख 22 हजार रुपये से चर्च के एक ध्वस्त हिस्से का निर्माण कराया गया। स्वीकार किया कि चर्च ऑफ नार्थ इंडिया की इलाहाबाद ब्रांच से दो-तीन वर्षों के अंतराल पर थोड़ी-बहुत सहायता राशि जरूर मिलती है। इससे पर्याप्त कार्य नहीं कराया जा सकता। श्री सोंस ने कहा कि पुलिस अधीक्षक एल रविकुमार भी नियमित रूप से हर रविवार को चर्च पर प्रार्थना के लिए आते हैं। यहां के पाश्टर अभय सोंस ने बताया कि प्रतिवर्ष क्रिसमस, गुड फ्राइडे, ईस्टर व मंडे ईस्टर फेयर मनाया जाता है। चर्च कंपाउंड में रहने वाले लोगों की पुत्रियों की शादी भी यहीं होती है।
इनसेट...
हिंदू था पहला पादरी
चर्च के इतिहास में भारतीयों के लिए गौरव की बात यह है कि इस चर्च के पहले पादरी बनने का सौभाग्य ब्रिटिश हुकूमत में एक हिंदुस्तानी चंद्रिका प्रसाद को मिला। चर्च के वर्तमान पादरी रेवरेंट अभय सोंस ने बताया कि चंद्रिका प्रसाद पहले हिंदू थे। तदुपरांत ईसाई धर्म को अपनाया और वर्ष 1934 में पादरी बने। इसके पूर्व यहां किसी अन्य के पादरी होने का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता। ऐसे में इन्हें ही पहला पादरी माना जाता है।
(यह खबर दैनिक जागरण के वाराणसी संस्करण अंतगर्त गाजीपुर जिले में 28 जुलाई 2009 को प्रकाशित हुई थी।)

भृगु नगरी को आज भी दाढ़ी जैसे व्यक्तित्व की तलाश

जनता पार्टी के कभी अलंबरदार रहे चंद्रशेखर
वैश्विक व्यक्तित्व का अभी नहीं दिख रहा कोई प्रत्याशी
अनीश उपाध्याय
बलिया। लोकसभा चुनाव हो और दाढ़ी की चर्चा सियासी गलियारों में न गूंजे। शायद आगे के एक दशक तक ऐसा संभव भीनहीं है। दाढ़ी यानी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर का वैश्विक व्यक्तित्व आज के जनप्रतिनिधियों के लिए आदर्श है। यह दीगर है कि बलिया में उनकी विरासत पर उनके पुत्र ही काबिज हैं, फिर भी भृगुनगरी को आज भी दाढ़ी सरीखे व्यक्तित्व की तलाश है। चंद्रशेखर ने जिन संघंर्षों से यह मुकाम हासिल किया था, शायद कमजोर साहस वाला कभी का राजनीति से तौबा कर चुका होता।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण से राजनीतिक गुर सीखने वाले चंद्रशेखर भले ही आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें इस लोस चुनाव में लोगों की जुबां पर तैर रही हैं। उनका वैश्विक व्यक्तित्व, उनके विचार, उनकी राष्ट्रीय सोच, आज भी जनपदवासियों के जेहन में  उसी तरह सुरक्षित है, जैसी चंद्रशेखर के जीवित रहते हुआ करती थी। चंद्रशेखर की असली परीक्षा जनता पार्टी के टूटने के बाद शुरू हुई। जुलाई 1979 में चौधरी चरण सिंह पार्टी से निकाले गए। इसी वर्ष अगस्त में मोरारजी देसाई ने नेता का पद छोड़ा। दिसंबर में लोस चुनाव में जनता पार्टी की पराजय के दो माह बाद जगजीवन राम ने अपना रास्ता नाप लिया। अप्रैल 1980 में पूर्व जनसंघ गुट के लोग भी भाजपा बनाकर अलग हो गए। जनता पार्टी का केवल ढांचा ही बच गया। इसका सारा दारोमदार चंद्रशेखर पर आ पड़ा। थोड़े दिन बाद ही राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। यूपी में जनता पार्टी को केवल तीन सीटें मिलीं। चंद्रशेखर ने फिर से पार्टी को खड़ा करने का बीड़ा उठाया। पहला पड़ाव था 1981 की शुरुआत में सारनाथ में जनता पार्टी का पहला अधिवेशन। पार्टी के पुर्नजन्म के चार साल बाद, जिसकी सफलता के लिए चंद्रशेखर और गिने-चुने साथियों ने व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर काम किया। इस सम्मेलन में उन्होंने पार्टी को नए सिरे से ढालने की कोशिश की। सारनाथ से ही चंद्रशेखर ने अपनी असली राजनीति शुरू की। बाद में जनता दल बना। बीपी सिंह के बाद चार माह के लिए चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। तदुपरांत समाजवादी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। मौत के दिन तक सांसद होने का गौरव भी उन्हें नसीब हुआ।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण अंतगर्त बलिया जिले में 21 मार्च 2009 को पृष्ठ सात पर प्रकाशित हुई थी।)


नारद गाथा: हर जगह डिमांड, किसी का पकड़ो साथ

धनबल-बाहुबल की होती पूजा

बलिया। विष्णुलोक से मृत्युलोक पर चुनाव का मजा लेने पहुंचे देवर्षि नारद भृगुनगरी में आकाश मार्ग से उतरे। पृथ्वी पर आते ही उन्होंने अपना रूप परिवर्तन कर आम आदमी की वेशभूषा धारण कर लिया। अचानक उनकी नजर आपस में कुछ बातचीत कर रहे लोगों पर जा टिकी। चुनाव संबंधी चर्चा चल रही थी। नारदजी तो आए थे चुनाव का मजा लूटने। सो, बेहिचक उस बैठक में शामिल हो गए। एक व्यक्ति बोल रहा था, समझ में नहीं आता किस नेताजी का दामन पकड़ा जाए। दूसरा बोला, अरे, इसमें क्या बात है, किसी का पकड़ लो। चुनाव है तो हर जगह डिमांड है। जिस झंडा-बैनर ढोओगे, मलाई काटने को मिलेगी। पहला बोला, नहीं यार, तू समझता क्यों नहीं। अब अपनी पहले वाली पार्टी में भी रहता हूं तो...विपक्षी इसमें आ गया है। बहुत बुराई की थी मैंने...। पहुंचा तो घास नहीं पड़ने देगा। दूसरा बोला, तो ठीक है, दूसरे किसी का भी झंडा-बैनर ढो लो। ...काफी देर तक उनकी जद्दोजहद सुनने के बाद नारदजी टोक दिए। बोले, रामायण काल में राम-रावण युद्ध हुआ था तो विभीषण ने अत्याचारी भाई का साथ छोड़ा था। महाभारतकाल में श्रीकृष्ण ने अपने रिश्ते के भाई के शिशुपाल का वध कर डाला था। ऐसे में सत्य का साथ दो, सब भला होगा। अचानक सभी का चेहरा तमतमाकर लाल हो गए। बोल पड़े, तुम्हारा नाम क्या है? देवर्षि नारद चौंके। बोले...न..न...नारद। बाप का नाम...ब्रह्मा। तीसरा बोला, ऐ भईया कुछ जाति-वाति भी है। सकपकाए नारद अभी कुछ बोलते कि उनमें से एक बोल पड़ा। ये राम-कृष्ण का युग नहीं है। यहां धनबल, बाहुबल, क्षेत्रवाद, जातिवाद की पूजा ज्यादा हो रही है।...वहां खड़ा दूसरा टोक पड़ा। ऐ भईया, यह कलियुग है और यहां सतयुग-द्वापर की बात मत सुनाओ, अपना रास्ता नापो। नारद आखिर करते भी क्या, चुपके से वहां से खिसकने में ही भलाई समझी। इसके बाद सभी आपस में बड़बड़ा रहे थे। कह रहा है, सत्य का साथ दो। अरे सच्चाई बची किसमें है। यदि बची भी है तो उन्हें मलाई काटने कौन देगा। कौन चुनाव में जेबखर्च चलाएगा। सारा काला धन इस चुनाव में ही सफेद रंग लेता है। खैर, इस पर नारद को •ागवान विष्णु की कही बात सहसा याद हो आई। उन्होंने कहा था, कि नारद आगे देखो होता है क्या? इस पर नारद भी हौले से मुस्कुराये और चल पड़े लोस चुनाव का मजा लूटने।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण अंतगर्त बलिया जिले में 21 मार्च 2009 को पृष्ठ सात पर प्रकाशित हुई थी।)


अमर उजाला एक्सक्लूसिव...

पानी में एक और जहर, कैसे जिएंगे

अनीश उपाध्याय/बलिया
समूचे जनपद में भूगर्भीय जलस्रोत लगातार जहरीला होता जा रहा है। चौंकिए नहीं, सच यही है। जलस्रोतों में आर्सेनिक की अधिकता पहले से ही थी, अब मानक से पांच गुना अधिक आयरन मुसीबत बनने जा रहा है। बीते दिनों जल नमूनों की जांच के दौरान इसका खुलासा हुआ है। संबंधित इससे सकते में हैं, लेकिन पानी को जहर बनने से बचाया कैसे जाए इसकी कोई तरकीब उन्हें सूझ नहीं रही। जल निगम ने इतना जरूर कर दिया है कि उसने जांच रिपोर्ट शाासन एवं जिला प्रशासन के संज्ञान में ला दी है। अधिक आयरन युक्त पानी पीने का मतलब है बीमारियों को न्यौता देना। सीएमओ डॉ. केएम तिवारी की मानें तो इससे किडनी तक डैमेज हो सकती है।
जनपद के भूजल स्रोतों में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक पाए जाने से उपजी स्थिति पर अभी नियंत्रण हो ही नहीं सका है कि जल में पांच गुना अधिक आयरन की मात्रा ने संबंधितों में खलबली मचा दी है। मानक है प्रति लीटर जल में अधिकतम 1.00 मिलीग्राम आयरन का, लेकिन यह है प्रति लीटर 5.00 मिलीग्राम। जिले की कुल 11 बस्तियां आर्सेनिक के साथ-साथ आयरन की अधिकता के संकट से जूझ रहीं हैं। इसमें सोहांव ब्लॉक के गांव इटहीं, कुल्हड़िया, दुबहर ब्लॉक के आमघाट, घोरौली, चकरी (बघौली), सरयां, डुमरी तथा रेवती ब्लॉक के पकहां, पकहां भर टोला, उदहां, उदहां लक्ष्मीपुर टोला चिन्हित हैं। इन गांवों में मानक से पांच गुना अधिक आयरन पाया गया है। आर्सेनिक की अधिकता से 188 गांवों की 5156 में से 310 बस्तियां प्रभावित थीं। 11 बस्तियों के जलस्रोतों में आयरन की अधिकता पाए जाने के बाद दूषित पेयजल वाली बस्तियों की संख्या बढ़कर 321 हो गई है। जल निगम प्रथम प्रकल्प शाखा के सहायक अभियंता इस्लामुद्दीन ने बताया कि इसका खुलासा बीते दिनों लखनऊ भेजे गए नमूनों की जांच के दौरान हुआ। इसकी सूचना शासन समेत जिला प्रशासन को दे दी गई है। हालांकि एई का मानना है कि आर्सेनिक  उन्मूलन कार्यक्रम के तहत आयरन की समस्या से भी निजात मिल जाएगी। उन्होंने जानकारी दी कि अधिक गहरे हैंडपंप एवं पानी टंकी सप्लाई में आर्सेनिक के साथ ही आयरन भी कम पाया गया है। स्वास्थ्य महकमे के पास अब तक ऐसी कोई सूचना नहीं है, लेकिन जानकारी को मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ.केएम तिवारी ने गंभीरता से लिया है। उनका कहना है कि आयरन की अधिकता से तमाम तरह की बीमारियां हो सकती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पानी के माध्यम से शरीर के भीतर जाने वाला आयरन किसी स्लो प्वाइजन से कम नहीं। इसकी अधिकता हुई तो यह किडनी डैमेज करने का सबब बन सकता है।
आर्सेनिक के बाद आयरन मिला पांच गुना अधिक
जल बना जहर
शरीर को होने वाला नुकसान
-दस्त की शिकायत बढ़ती है और शरीर में पानी की कमी हो जाती है।
-सीधा असर लीवर और गुर्दे पर। लीवर बढ़ सकता है। गुर्दे के भी क्षतिग्रस्त होने की आशंका।
-पाचन क्रिया प्रभावित होती है, उदर संबंधित बीमारियों का खतरा।
कितना खतरनाक है ज्यादा लोहा
-सीएमओ बोले, लीवर में संक्रमण की शिकायत होना आम बात है।
-आयरन रक्त निर्माण में आवश्यक तत्व है, जो 11 से 13 प्रतिशत ही होना चाहिए, उससे अधिक नहीं।
-शरीर के भीतर अधिक आयरन जाना स्लो प्वाइजन से कम नहीं।
बचाव का तरीका
-पानी उबालकर पीया जाए, क्लोरीन की गोली डालना बेहतर होगा।
-किसी बर्तन में निथारने पर भी पानी का आयरन नीचे बैठ जाता है।
-आयरनयुक्त चीजों के सेवन से परहेज भी बचाव है।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण अंतगर्त बलिया जिले में दो सितंबर 2007 को पृष्ठ तीन पर प्रकाशित हुई थी।)


यूपी : जल में जानलेवा आर्सेनिक की घुसपैठ

चिंताजनक
गंगा किनारे भूमिगत जल में भारी मात्रा में मिला रसायन
पेयजल सामान्य से नौ गुना के स्तर तक ज्यादा दूषित
नई दिल्ली। जीवनदायिनी गंगा के तटीय क्षेत्रों का भूमिगत जल जीवन के लिए गंभीर खतरा बन गया है। कारण है इस समूचे इलाके के भूमिगत जल में जानलेवा आर्सेनिक की बढ़ती घुसपैठ। हाल ही में गंगा किनारे यूपी के 14 जिलों में की गई जांच में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से नौ गुना तक ज्यादा पाई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक कारखाने के प्रदूषित पानी और शहरों की गंदगी बहकर गंगा में मिलने के कारण भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है।
आर्सेनिक नामक यह धीमा जहर शरीर के भीतर धमनियों में आक्सीजन के प्रवाह को घटाकर कई तरह की जानलेवा बीमारियों की वजह बनता है। हाल ही में भूमिगत जल के लिए गए नमूनों की जांच से पता चलता है कि इस इलाके का भूमिगत जल अब जहर में तब्दील हो रहा है। यूपी के 14 जिलों में गंगा किनारे के भूमिगत जल के लिए गए नमूनों में से पांच जिलों के 690 वाटर सैंपल में आर्सेनिक मिला। दर्जन भर सैंपल में तो आर्सेनिक की मात्रा 50 पार्ट पर बिलियन से ज्यादा पाई गई। सबसे ज्यादा मात्रा मेरठ के हस्तिनापुर ब्लॉक के गांव हस्तिनापुर नौरंगा में मिली। बलिया में तो पानी में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक निकला। यहां आर्सेनिक 50 से 450 पीपीबी तक है। मुरलीछपरा, बेलहरी, दुबहर, बैरिया एवं रेवती विकास खंड में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक है। हनुमानगंज, सोहांव और मनियर ब्लॉक में भी आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। कुछ सैंपल दोबारा जांच के लिए इंडियन टॉक्सिकोलाजी रिसर्च सेंटर लखनऊ भेजे गए हैं। जल निगम के स्थानीय निर्माण शाखा बलिया के एई इस्लामुद्दीन के मुताबिक 50 पीपीबी तक आर्सेनिक को खतरनाक नहीं माना जा सकता है। गाजीपुर के करंडा क्षेत्र में भूजल में आर्सेनिक से लोग पथरी, पीलिया सहित कई रोगों से पीड़ित हैं। यह खतरा अब वाराणसी और इलाहाबाद की ओर बढ़ रहा है।
(दिल्ली से हरीश लखेड़ा, मुरादाबाद से आशीष त्रिपाठी, बलिया से अनीश उपाध्याय, गाजीपुर से शैलेंद्र मणि त्रिपाठी)
(यह खबर अमर उजाला के सभी संस्करणों में 12 जुलाई 2007 को प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था।)


अमर उजाला एक्सक्लूसिव

अग्नि सुरक्षा को लेकर कितने तैयार हैं हम!

सुरक्षा के नाम पर फिसड्डी है फायर ब्रिगेड की व्यवस्था
पिछले वर्ष आग की तबाही में 15 की मौत
अनीश उपाध्याय
बलिया। फाल्गुनी अल्हड़ मस्ती के बीच एक भयावह त्रासदी है आग। पूर्वांचल में हर साल आग से करोड़ों की क्षति होती है। सैकड़ों की जान चली जाती है। सूर्य की तपिश से बचने के लिए जिस छप्पर की इस मौसम में ज्यादा जरूरत होती है, उसे आग छीन लेती है। तमाम गरीब खुले आसमान के नीचे आ जाते हैं। यह लंबे समय से चला आ रहा है। रूकने का नाम नहीं ले रहा। इसकी एक बड़ी सच्चाई है साधनों का नितांत अभाव। जिलों में कई इलाके ऐसे हैं, जहां आग लगने पर जब तक फायर ब्रिगेड पहुंचती है, तब तक सब कुछ स्वाह हो जाता है। बलिया जिले को ही लें, फिलवक्त फायर ब्रिगेड के कई संसाधन इलाहाबाद में लगे माघ मेला में चार फरवरी से ही गए हैं। संसाधन का जहां तक सवाल है वर्तमान में फायर ब्रिगेड के के पास दो बड़ी गाड़ियां (क्षमता 4000 लीटर), एक मीडियम (क्षमता 2200 लीटर) तथा डीजल पंप संचालित दो छोटी गाड़िया उपलब्ध हैं। इसी के बूते जिले के समूचे गांवों की आबादी और खेत-खलिहानों की सुरक्षा निर्भर है। महकमा की ओर से फायर सीजन मार्च माह से 30   जून तक माना जाता है। इस दौरान उभाव और बैरिया थाने पर फायर ब्रिगेड के कर्मी वाहन लेकर मुश्तैद रहते हैं। फरवरी से ही जहां आग की घटनाओं में इजाफा शुरू हो जाता है, वहीं महकमा मार्च से राहत एवं बचाव कार्य के लिए तत्पर होता है।
बचाव का इंतजाम न होने से हर साल मचती तबाही
बलिया। जनपद के ग्रामीण अंचलों में आग लगने पर तबाही तय है। जिला प्रशासन की ओर से आग पर काबू पाने की जो व्यवस्था है, वह बेमतलब है। कई दफा आग लगने पर जब तक फायर ब्रिगेड की गाड़ी पहुंचती है, आग सब कुछ नष्ट कर चुकी होती है।
बैरिया: द्वाबा विस के तमाम गांवों में आग पर काबू पाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से काई माकूल व्यवस्था नहीं हो सकी है। इब्राहिमाबाद में अग्निशमन केंद्र स्थापना का तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा भी की थी, बावजूद बरसों बाद भी इस पर अमल नहीं हो सका है। भरौली : आग की घटनाओं से बचाने के लिए हर साल नरहीं थाने पर अग्निशमन चौकी की स्थापना होती है, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो सका है। इसको लेकर क्षेत्रवासियों में आक्रोश है। सुखपुरा : थाना क्षेत्र में आग की घटना पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी आने का घंटों इंतजार करना पड़ता है। थाना पर गाड़ी मौजूद न होने से जिला मुख्यालय से फायर ब्रिगेड की गाड़ी मंगानी पड़ती है। बांसडीह : तहसील मुख्यालय बांसडीह पर फायर ब्रिगेड चौकी की स्थापना नहीं हो सकी है। रसड़ा और बलिया को छोड़ इस तहसील पर फायर ब्रिगेड की चौकी की स्थापना न होने से क्षेत्रवासियों में आक्रोश है। घोघा : इलाके में अभी पिछले दिनों ही कठबंधवा (बांसडीह नगर पंचायत के वार्ड नंबर 12) में अगलगी की घटना में रमाशंकर, रामदेव, सुदर्शन समेत एक दर्जन लोगों की रिहायशी झोपड़ियां जलकर खाक हो गई।
वर्जन...
सुरक्षा को लेकर कितना संवेदनशील है महकमा!
आग से सुरक्षा का जहां तक सवाल है, अग्निशमन दल इसके लिए सतर्क है। थोड़ी-बहुत दिक्कतें संसाधन की कमी की वजह से सामने आ रही है। यदि भरपूर संसाधन मिले तो वक्त रहते आग पर काबू पाया जा सकता है। जहां तक अग्निशमन चौकियों की स्थापना का सवाल है, यह उच्चाधिकारी तय करते हैं।
कुमार रमाशंकर तिवारी, अग्निशमन अधिकारी, बलिया
इनसेट...
अगलगी में क्या बरतें सावधानी
-बिजली प्रवाहित हो रही हो और स्पार्किंग से आग लगने का खतरा हो तो कनेक्शन काट दें।
-खलिहान गांव के नजदीक न बनाया जाए, अन्यथा आग लगने का खतरा बढ़ेगा।
-आग लगते ही सहयोग के लिए लोगों को पुकारें। खुद का बचाव करते हुए मदद करें।
-गैस सिलिंडर, पेट्रोल, डीजल आदि ज्वलनशील पदार्थों को तुरंत हटा दें।
-आग बुझाने को पानी, रेत अथवा धूल का प्रयोग करें। झुलसे व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाएं।
-आग लगने पर तत्काल इसकी सूचना निकटवर्ती थाना अथवा फायर ब्रिगेड को 101 पर दें।
इनसेट...
आग से बचाव के लिए रहें तत्पर
-आग से सुरक्षा के लिए गांवों के युवा आपस में अग्निशमन टोलियों की स्थापना करें। टोलियों में हर किसी का कार्य तय होना चाहिए।
-यह टोली आग बुझाने के संसाधन अथवा पानी वगैरह पहुंचाने वालों की हो। इस टोली में आग से बचाव करने के लिए लोगों की व्यवस्था करें।
-जल संसाधन का अभाव होने से दिक्कत होती है। कई गांवों में कुएं, पोखरे आदि पाट दिए गए हैं, जिससे पानी संचय नहीं हो पा रहा है। आग से सुरक्षा के लिए इनका संरक्षण जरूरी है। मकान ऐसे बनाए जाएं, जहां फायर ब्रिगेड के संसाधन पहुंचने की सुविधा हो।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण में छह फरवरी 2009 को पृष्ठ सात पर प्रकाशित हुई थी।)


याद आया 1998 की बाढ़ का कहर

चंद्रशेखर ने कहा था, बाढ़ और आग बलिया के लिए अभिशाप
अनीश कुमार उपाध्याय/बलिया
पूर्व प्रधानमंत्री स्व.चंद्रशेखर ने शायद ठीक ही कहा था कि बलिया के लिए बाढ़ और आग अभिशाप है। तीन नदियों से घिरे जनपद में गंगा, घाघरा और टौंस कहर बन बरपती रही है और बलिया के विकास पर ग्रहण लगता रहा है। इस साल घाघरा नदी में आई प्रलंयकारी बाढ़ की विभीषिका देख सन 1998 की बाढ़ जेहन में एक बार फिर ताजा हो गई। तब सेना आ गई थी और पीएसी जवानों ने मोर्चा संभाल लिया था।
जनपद बलिया तीन दिशाओं से नदियों से घिरा हुआ है। बारिश के दिनों में गंगा, घाघरा और टौंस नदी उफान पर होती है। नदियों से इन दिनों में 23,000 घनमीटर प्रति सेकेंड की दर से जल प्रवाहित होता है। वर्ष 1970 में गंगा एवं घाघरा का एक साथ प्रकोप हुआ था। गायघाट पर गंगा नदी का जलस्तर 59.56 मीटर तक पहुंच गया था। वर्ष 1971 में जलस्तर हालांकि 58.24 मीटर ही रहा, लेकिन 1983 में गंगा जलस्तर में इजाफा हुआ और जलस्तर 59.73 मीटर पर पहुंच गया। 1983 में घाघरा का जलस्तर चांदपुर गेज स्थल पर 67.15 मीटर पर पहुंच गया। वर्ष 1986 में गंगा का जलस्तर 59.08 मीटर पर था। वर्ष 1987 में गंगा का जलस्तर 58.76 मीटर तथा घाघरा का जलस्तर 59.20 मीटर तक पहुंचा था। इस वर्ष लग•ाग 362 गांव तथा 39670 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्र•ाावित हुआ था। 1988 में बाढ़ से 210 गांव तथा 28051 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित हुआ था। 1990 में 46 ग्राम तथा 5695 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित हुआ। 1991 में गंगा का जलस्तर 59.38 मीटर और घाघरा का जलस्तर 59.34 मीटर था। वर्ष 1992 में गंगा का जलस्तर 59.01 अधिकतम मीटर तथा   घाघरा का 57.26 मीटर रहा। वर्ष 1993 में गंगा का जलस्तर 59.1 एवं घाघरा का 60.1 मीटर तक पहुंच गया। इस वर्ष 300 ग्राम तथा 19471 हेक्टेयर क्षेत्रफल तबाह हो गया।
वर्ष 1998 में भारी बाढ़ में कुल 312 गांव प्रभावित हुए थे। हालात इतना भयावह था कि बचाव, राहत के लिए जिला प्रशासन को सेना एवं पीएसी जवानों की मदद लेनी पड़ी थी। अगले साल यानी 1999 में 221 ग्राम और वर्ष 2000 में 93 गांवों पर बाढ़ का कहर बरपा था। घाघरा नदी की विनाशलीला से बचने के लिए देवरिया के तुर्तीपार से लेकर श्रीनगर तक 77 किलोमीटर लंबे बांध का निर्माण किया गया है। इस बांध पर बाढ़ के जल पर नियंत्रण के लिए रेगुलेटर बनाए गए हैं। यह जब तक घाघरा का जलस्तर नीचा रहता है, यह रेगुलेटर खुले रहते हैं, लेकिन जैसे ही जलस्तर ऊपर उठता है, रेगुलेटर बंद कर दिए जाते हैं। सामान्य तौर पर वर्षाकाल में नदियों का जलस्तर उफान पर होता है। बाढ़ की विकराल स्थिति तब पैदा हो जाती है, जब गंगा एवं घाघरा में एक साथ बाढ़ आ जाती है। गंगा में जलस्तर नीचे होने से यदि घाघरा में बाढ़ आती है तो गंगा बाढ़ के जल को अपने में आत्मसात कर लेती है। बावजूद जब दोनों नदियां उफान पर होती हैं तो स्थिति भयावह हो जाती है।
(यह खबर अमर उजाला के वाराणसी संस्करण में प्रकाशित हुई थी।)

Wednesday, August 1, 2012

...खून के बदले खून नहीं, बस नजर से उतार दिया

अनीश कुमार उपाध्याय / जमानिया [गाजीपुर] : बात काफी पुरानी है। जमानिया के बघरी गांव के एक बुजुर्ग की करीब 250 वर्ष पहले बरुईन गांव के लोगों ने हत्या कर दी। बघरी के लोगों ने बदले में कोई खून-खराबा नहीं किया। लेकिन बरुईन के लोगों को नजर से ही उतार दिया। इस सामाजिक बहिष्कार के फलस्वरूप आज गांव की नौंवी पीढ़ी के लोग भी उस गांव का अन्न-जल ग्रहण नहीं करते। बरुईन महाविद्यालय में बघरी के लड़के-लड़कियां पढने जरूर जाते है, लेकिन वहां का पानी भी नहीं पीते। दोनों गांवों के बीच दरार के पीछे एक लम्बी कहानी गांव के बुजुर्ग बताते है। दोनों गांवों के जमींदारों के बीच सीमांकन को लेकर विवाद हो गया। मामला गोरी हुकूमत के यहां पहुंचा। उसने अजीबोगरीब फैसला सुनाया। तय किया जमानिया तहसील के पूरब व दक्षिण से बघरी के मौजा की शुरुआत होती है। यहां से दोनों गांव का जो व्यक्ति हथेली पर शुद्ध घी लगे पीपल के पत्ते पर आग में तपाकर लाल किया गया लोहे गोला रख जहां तक एक दिन में दौड़ लगाएगा, उतनी जमीन उस गांव की हो जाएगी। बरुईन के ग्रामीणों ने हाथ पीछे खींच लिए। बघरी के नृपति तिवारी ने साहस दिखाया। आग में तपा गोला नृपति तिवारी ने हथेली पर रखकर दौड़ना शुरू किया। उन्होंने 16 सौ बीघा भूमि नाप डाली। बरुईन के जमींदारों को आशंका हुई कि नृपति बघरी गांव ही नाप लेंगे। इस पर जमींदारों में से किसी ने नृपति के सिर पर लाठी से प्रहार कर दिया। वे बघरी-बरुईन गांव के बीच की एक गड्ढे के पास गिरे और उनकी मृत्यु हो गयी। खैर, नृपति की ओर से नापी गई भूमि तो बघरी गांव को मिल गई। इसे 16 सौ बीघा का मौजा कहा जाता है। मान्यता है मौत के बाद नृपति किसी के सपने में आए और अपनी मौत वाली जगह पर चौरा बनाने का निर्देश दिया। साथ ही चेताया गांव का कोई भी व्यक्ति बरुईन गांव का पानी नहीं पीएगा। ऐसा नहीं करने पर अनिष्ट होगा। स्वप्न की बात परंपरा बन गई। करीब नौ पीढि़यों के बाद भी गांव का कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति-बिरादरी का क्यों न हो, बरुईन का पानी नहीं पीता। मान्यता है भूल या अन्य कारण से किसी ने दुस्साहस भी किसी ने किया तो उसकी हानि तय है। गांववासी न तो उस गांव का पानी पीते है, न दाना खाते है। अपने बेटे-बेटियों की शादी भी इस गांव में नहीं करते।
मिथक तोड़ने का प्रयास विफल
अंधविश्वास बता मिथक को तोड़ने के कई प्रयास भी हुए, लेकिन सब विफल। ग्रामीण बताते है बघरी के अंतू राम ने करीब 17 साल पहले बरुईन गांव में शादी की। शादी क्या हुई परिवार पर मुसीबत ही टूट पड़ी। जब कभी इस परिवार में मांगलिक बेला का आगाज होता कोई न कोई अनहोनी हो जाती।
-02 Sep 2008, दैनिक जागरण 

Monday, July 16, 2012

‘हमें बचाओ’


गंगा कहे पुकार के...

संघर्ष
गंगा की अविरल धारा के लिए सड़क पर उतरे संत
प्रदूषित होती गंगा पर रोक लगाने की भरी हुंकार
टिहरी में कैद गंगा नदी को मुक्त करने की जरूरत
जनजागरुकता से ही दूर हो सकता नदी का प्रदूषण

गंगा की धारा को अविरल, निर्मल तथा आचमन लायक बनाने का संतों ने बीड़ा उठाया है। उनका सवाल ही जायज है। युगों-युगों से आस्था की पर्याय रही गंगा में जहां मानव, औद्योगिक कचरा गिराया जा रहा है, वहीं टिहरी में गंगा को कैद कर रही-सही कसर भी पूरी कर दी गई है। क्या संतों का यह आंदोलन हकीकत में गंगा नदी को ‘गंगा मईया’ बना पाएगा? एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय, मीडिया इन्चार्जे, हमवतन, साप्ताहिक समाचार पत्र, नई दिल्ली
दिनोंदिन प्रदूषित होती गंगा पर रोक लगाने के लिए हुंकार भरते हुए संत समाज सड़क पर उतर गया। संतों की अगुवाई की कमान खुद जगदगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने संभाली है। दिल्ली के राजघाट पर जुटे पर्यावरणविद् और संतों ने बापू की समाधि पर जलाभिषेक, सर्वधर्म सभा के बाद प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर पर पहुंचकर गंगा मुक्ति की आवाज बुलंद की। अविरल, निर्मल गंगा के मसले पर केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट घोषणा न होने से क्षुब्ध संतों ने गंगा तपस्या जारी रखने की घोषणा की है। आस्था का पर्याय रही गंगा में व्याप्त प्रदूषण को लेकर मुखर हुए संतों की यह आवाज इसका आगाज है कि अगर जल्द गंगा को अविरल नहीं किया गया और उसे कचरे से मुक्ति नहीं मिली तो न सिर्फ गंगा अपना अस्तित्व खो देगी, बल्कि मानव समाज एक विशाल जलस्रोत को भी खो देगा। संतों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें देश के विकास से कोई ऐतराज नहीं है। विकास हो, लेकिन भागीरथी को मिटाने की शर्त पर नहीं।
यह हैं हालात
देश में कुल नौ हजार 987 छोटे-बड़े नाले गंगा नदी में गिराए जा रहे हैं। वहीं अकेले पूर्वांचल के इलाहाबाद, वाराणसी, गाजीपुर और बलिया जिले में एक हजार 67 नाले गंगा नदी में गिरते हैं। वहीं अकेले कानपुर में चमड़ा शोधक कारखाने से आज भी काफी तादाद में रसायनिक कचरा गंगा नदी में गिराया जाता है। वहीं विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच हिमालय और हिमालयवासियों के दर्द को समझना जरूरी है। मध्य हिमालय दुनिया के सबसे कच्चा पहाड़ हैं। उत्तराखंड में नीति-नियंताओं ने माना है कि यहां की जल संपदा से 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादित हो सकती है। इसके लिए उन्हें एक उपाय सूझा जिल विद्युत परियोजना बनाने का। इसकी शुरुआत 70 के दशक में टिहरी बांध निर्माण से हुई। कुल 2400 मेगावाट की इस परियोजना को दुनिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक बताया गया। सरकारों ने कहा कि इससे पहाड़ का जीवन बदलेगा। देश की संपन्नता में यह बांध मील का पत्थर बनेगा। इसके लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर टिहरी के अलावा 125 गांवों को जलसमाधि दे दी गई। काफी लोग विस्थापित हुए। जिस परियोजना से दावा किया जा रहा था कि इससे 2400 मेगावाट बिजली पैदा होगी, उससे आज महज 700 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है।

कंपनियों के आगे झुकी सरकार
मौजूदा हालात को देखकर यह कहा जा सकता है कि केंद्र हो या प्रदेश की सरकारें। उन्होंने मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के हितों के सामने सर्मपण कर दिया है। अगर सरकारें ऐसे ही ढर्रे पर चलती रहीं, तो आने वाले दिनों में अकेले उत्तराखंड में 558 बांध अस्तित्व में आ सकते हैं। मौजूदा समय में अलकनंदा और भागीरथी पर 76 से अधिक बांध बन रहे हैं। आने वाले दिनों में अकेले उत्तराखंड में 176 बांध होंगे। इन बांधों से निकलने वाली सुरंगों की लंबाई 1600 किलोमीटर से अधिक है। बदरीनाथ से लेकर देवप्रयाग तक की 135 किलोमीटर की लंबाई में 76 बांध प्रस्तावित हैं। औसत हर तीन किलोमीटर पर एक बांध बनेगा। इन सभी बांधों से दो से लेकर नौ किलोमीटर तक की सुरंगे बनने वाली हैं। एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है, तो उत्तराखंड की 27 लाख से अधिक आबादी इन सुरंगों के ऊपर होगी। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर जोशीमठ के नीचे से तपोवन-विष्णुगाड परियोजना के लिए सुरंग खोद दी गई है। जोशीमठ के सामने बसे चांई गांव को विष्णुगाड परियोजना के पावर हाउस ने पहले ही निगल लिया है। चमोली के छह गांव पहले ही नेस्तनाबूत हो गए हैं, जबकि 38 गांवों पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। पर्यावरण की प्रहरी रही गौरा देवी का गांव और रैंणी जंगल ताला जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंग के उपर आ गया है। दो वर्ष पूर्व बागेश्वर जनपद के कपकोट में सरयू नदी पर बन रही परियोजना की सुरंग की जद में आकर स्कूल भवन टूट गया था। इसमें 18 बच्चों की मौत हो गई थी।
औद्योगिकीकरण का मंडराता खतरा
एक तो नदियां पहले से ही प्रदूषित हैं। उस पर औद्योगिक इकाईयां भी इसमें इजाफा कर रही हैं। अकेले कानपुर में ही रोजाना करीब 400 चमड़ा शोधक फैक्टरियों से करीब तीन करोड़ लीटर गंदा जल रोजाना गंगा के जल में समाहित होता है। इसमें बड़े पैमाने में क्रोमियम, लेड, रासायनिक बाई प्रोडक्ट होते हैं। वाराणसी, गाजीपुर, बलिया सरीखे छोटे-बड़े जिले से भी तकरीबन 19 करोड़ लीटर गंदा पानी खुली नालियों से गंगा की जलधारा में गिराया जाता है। वहीं उत्तरांचल में पेपर इंडस्ट्री से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों से तो पानी का रंग भी बदरंग होता जा रहा है। हालांकि उत्तर प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड में पेपर इंडस्ट्री से फैल रहे जल प्रदूषण को केंद्र सरकार   ने गंभीरता से लिया है। विशेषकर उन इकाइयों से जहां एग्री वेस्ट से कागज निर्माण के बाद इससे निकलने वाले ब्लैक लीकर के निस्तारण को कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। केंद्र सरकार की पहल पर उत्तराखंड सरकार ने पेपर इंडस्ट्री पर कड़ी नजर रखने का निर्णय लिया है। इसके तहत जिन इकाईयों में एग्री वेस्ट से कागज बनता है, वहां से निकलने वाले ब्लैक लीकर के निस्तारण के लिए रिकवरी प्लांट लगेंगे। ताकि, नदी-नालों में साफ पानी प्रवाहित हो। साथ ही सैंपलिंग में भी तेजी आएगी। उत्तराखंड के पेपर मिलों पर नजर डालें तो ऊधमसिंह नगर में 35 तथा हरिद्वार, नैनीताल में इनकी संख्या पांच-पांच हैं। पेपर मिलों में एग्रीकल्चर वेस्ट और वेस्ट पेपर से कागज बनता है। बगास (गन्ने की पेराई के बाद बचा वेस्ट), धान व गेहूं का भूसा जैसे एग्री वेस्ट से कागज बनाने के प्रोसेस से सर्वाधिक प्रदूषण फैल रहा है। इस प्रक्रि या में कास्टिक सोडे के इस्तेमाल के बाद निकलने वाले रसायनयुक्त वेस्ट (ब्लैक लीकर) के निस्तारण की व्यवस्था नहीं है। इसे नदी-नालों में छोड़ दिया जाता है। इसमें मौजूद कास्टिक सोडा समेत अन्य तत्व जल प्रदूषण का सबब बन रहे हैं।
काश! जाग गई होती सरकार
वर्ष 1986 से शुरू हुई गंगा सफाई की मुहिम तभी मुकाम पा सकती थी, अगर उसे गंभीरता से लिया गया होता। पांच सौ करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई गंगा सफाई परियोजना पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन मामला जस का तस है। वहीं यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा तटीय यूपी के 14 जिलों के भूमिगत जल में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक की पुष्टि हुई है। यूनीसेफ के मानक के मुताबिक 10 पीपीबी (पार्ट पर बिलियन) से अधिक आर्सेनिक की मात्रा मानव शरीर के लिए घातक है। वहीं अकेले यूपी में 50 से लेकर 450 पीपीबी तक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है। जानकार बताते हैं कि गंगा में व्याप्त प्रदूषण के चलते ही गंगा का रिसा जल भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहा है। यही वजह है कि इन इलाकों में आर्सेनिक की मात्रा मानक से कई गुना अधिक हो चुकी है। वहीं हरिद्वार की दवा कंपनियां खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाइड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देते हैं। इससे गंगा जल में आक्सीजन की मात्रा में भी अप्रत्याशित गिरावट आई है।

खफा हैं संत समाज
हालांकि सरकार बार-बार कारखानों के दूषित जल को शोधित कर गंगा में गिरवाने का भरोसा देती है, लेकिन अब तक इस पर पूर्णतया अमल नहीं हो सका है। हालांकि अब संत समाज शोधित जल को भी गंगा में नहीं गिरने देना चाहता। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनिजी का कहना है कि गंगा में प्रदूषित जल की तो बात छोड़िए, शोधित जल की भी एक बूंद गिराना स्वीकार नहीं है। संत समाज को गंगात्री से गंगा सागर तक गंगा अविरल-निर्मल चाहिए। वहीं रमा रावरकर राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की विशेषज्ञ सदस्य रमा रावरकर का कहना है कि अकेले वह नहीं देश के सारे वैज्ञानिक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से बोल रहे हैं कि गंगा की अविरलता बेहद जरूरी है। इसके बाद भी गंगा पर बांधों की श्रृंखला जारी है। गंगा केवल देश की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की धरोहर है। इसके सूखते ही भारत के 46 फीसदी लोगों का जीवन गहरे संकट में आ जाएगा। उन्होंने अफसोस जताया कि 15 वर्ष पूर्व यह तपस्या शुरू हुई होती, तो टिहरी डैम न बन पाता और गंगा की ऐसी दशा न होती। 
गंगा अभियान को विश्वव्यापी बनाने की रणनीति
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन की अगुवाई ज्योतिष और द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का कहना था कि दिल्ली में गंगा मुक्ति महासंग्राम का श्रीगणेश करने के बाद संत समाज अब गंगा अभियान को विश्वव्यापी बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पूरी कोशिश प्रयाग में आयोजित कुंभ से पहले गंगा की अविरलता सुनिश्चित कराने की है। इसके लिए विश्वव्यापी गंगा अभियान का पूरा कार्यक्रम भी तैयार है। इस प्लान के मुताबिक तपस्या जारी रखते हुए गंगा अभियान को अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर विस्तार देना है। इसमें पहली प्राथमिकता विश्व के कोने-कोने तक गंगा यात्रा पहुंचाकर वहां प्रवास कर रहे भारतीयों के बीच भागीरथी की पुकार पहुंचाने की है। प्रांतीय व जिला स्तर पर भी गंगा यात्रा निकालने की रणनीति तय है। रोडमैप में पद यात्रा और छोटी-छोटी संभावनाओं के जरिए जन जागृति पैदा की जाएगी। गंगा में गिर रहे हर बड़े  नालों के निकट धरना-उपवास का भी कार्यक्रम होगा। इन कार्यक्रमों का मकसद यह है कि 30 सितंबर को चातुर्मास समाप्त होने तक गंगा आंदोलन की एक मजबूत बुनियाद खड़ी की जा सके। साथ ही 25 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित संतों और गंगा भक्तों का आंदोलन महज राष्ट्रीय न हो कर विश्वव्यापी हो सके। 
छात्र आंदोलन का करेंगे आगाज

पूर्वांचल आध्यात्मिक चिंतन संस्थान के संयोजक रमाशंकर तिवारी ने मोबाइल पर बताया कि संतों ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि उन्हें जल्द स्वच्छ, अविरल गंगा चाहिए। सभी संत गंगा की सौगंध खाकर इस आंदोलन में कूद रहे हैं। हर हाल में हिंदुओं की प्राणाधार गंगा अविरल चाहिए। टिहरी के कैद से मुक्त हुए बिना अविरल गंगा का सपना अधूरा है। इस आंदोलन के साथ ही संस्थान के कार्यकर्ता 15 जुलाई से 15 अगस्त तक पूरे पूर्वांचल और निकटवर्ती बिहार प्रांत में गंगा मुक्ति छात्र आंदोलन चलाएंगे। यह आंदोलन पूरी तरह से छात्र शक्ति का होगा। इससे न सिर्फ छात्रों को गंगा की स्वच्छता और निर्मलता के  बारे में अवगत कराया जाएगा, बल्कि उन्हें इस आंदोलन से जोड़कर गंगा की टिहरी से आजादी की दूसरी जंग लड़ी जाएगी। उन्होंने गंगा मुक्ति के लिए केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि एक तरफ सरकार यह कहती है कि दिनोंदिन पेयजलस्रोत में कमी आ रही है। जल संरक्षण पर ध्यान देने के लिए कई नियम और कानून बनाए जाते हैं, लेकिन अतिप्राचीन भारतीयों के पेयजल स्रोत गंगा को टिहरी में बांधकर गंगा तटवर्ती इलाकों के वाशिंदों को पेयजल से दूर किया जा रहा है। इससे केंद्र सरकार की दोहरी मानसिकता का पता चलता है। उन्होंने दावा किया कि अगर टिहरी में कैद गंगा को अविरल छोड़ दिया जाए तो न सिर्फ प्रदूषित गंगा से मुक्ति मिल जाएगी, बल्कि भूमिगत जलस्रोत में इजाफा होगा और गंगा तटवर्ती इलाकों के वासियों को पेयजल के लिए भटकना भी नहीं पड़ेगा। गंगा की जलधारा में आज भी इतनी शक्ति है कि वह तमाम प्रदूषित जल को अपने में आत्मसात कर उस जल को भी आचमन योग्य बना सकती है।

  

Thursday, July 12, 2012

कर्नाटक का ‘नाटक’


राजनीति
बदलते समीकरण, राजनीति में घुसा जातिवाद
लिंगायत-वोक्कलिगा के बाद दलितों की जोर आजमाइश
क्षेत्रीयकरण की ओर बढ़ रही हैं भाजपा-कांग्रेस पार्टियां
राष्ट्रपति-विधानसभा चुनाव की आहट से माहौल तल्ख
मुख्यमंत्री संग उप मुख्यमंत्री पद पर जातिवाद की आहट

कर्नाटक में दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कलिगा का हमेशा आमना-सामना होता रहा है। दोनों एक-दूसरे पर राजनीतिक रूप से भारी पड़ने की कवायद में जुटे रहे हैं। अब यहां दलितों की जोर आजमाइश भी सामने आने लगी है। सीएम की ताजपोशी को लेकर मचे बवंडर के बाद यहां का राजनीतिक समीकरण बदलता दिख रहा है। आखिर क्या होगा इसका असर? पढ़िए एक रिपोर्ट...
 

अनीश कुमार उपाध्याय / दिल्ली
एक तरफ पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियों को पीछे धकेल कर क्षेत्रीय पार्टियां अपना रुतबा बढ़ा रही हैं, तो दूसरी तरफ कर्नाटक में एक अलग ही राजनीतिक परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है। देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का यहां क्षेत्रीयकरण हो रहा है। दोनों पार्टियां स्थानीय जातीय समीकरणों के जाल में अजीब तरह से उलझ चुकी हैं। इन पार्टियों के संगठनों में बहुसंख्यक समुदायों की पकड़ मजबूत बनाने की जंग तेज है। इस जंग में यह पार्टियां खेमों में बंट चुकी हैं। दरअसल इसे कर्नाटक की राजनीति का पुराना ट्रेंड ही माना जा सकता है। दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कलिगा के बाद अब यहां दलितों की जोर आजमाइश भी शुरू हो चुकी है। तय है कि ऐसे में राजनीतिक वजन बढ़ाने की जंग काफी तीखी हो चुकी है। राष्ट्रपति चुनाव और राज्य विधानसभा का चुनाव समय से पहले होने की कयासबाजियों तथा नए सीएम की ताजपोशी ने पूरे माहौल में एक तड़का सा डाल दिया है। 
दो प्रमुख जातियों पर टिका दारोमदार
गौरतलब है कि राज्य में एक वर्ष से कम ही समय में विधानसभा चुनाव होना है। दशकों से कर्नाटक की राजनीति का रास्ता तय करने वाली दो प्रमुख जातियों ने फिर से अपना लोहा मनवाने के लिए दोनों पार्टियों के प्रमुख पदों पर कब्जा जमाने की होड़ में है। राज्य की साढेÞ छह करोड़ की आबादी में से 17 प्रतिशत लिंगायत और 16 प्रतिशत वोक्कलिगा हैं। इन दोनों समुदायों के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के अंदर जबर्दस्त खेमेबाजी शुरू कर दी है। जब भाजपा ने वर्ष 2008 में कर्नाटक के रूप में दक्षिण भारत के किसी राज्य की सत्ता पर पहली बार अपनी ताकत पर पकड़ बनाई तो उसे कथित तौर पर ‘लिंगायतों को वोक्कलिगा समुदाय के धोखे’ की भावना का पूरा फायदा मिला था। वोक्कलिगा समुदाय जनता दल (एस) का समर्थक माना जाता है। लिंगायत समुदाय ने जद (एस) के प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी द्वारा अपने वादे से हटते हुए लिंगायत बीएस येदुरप्पा को सत्ता न सौंपने को वोक्कलिगा समुदाय की धोखेबाजी मानी थी। 
भारी पड़ते रहे हैं लिंगायत
मई 2008 में हुए चुनाव में येदुरप्पा के प्रति लिंगायतों की सहानुभूति की लहर का भरपूर फायदा मिला। उस चुनावी जीत के बाद भ्रष्टाचार के कई आरोपों में उलझे येदुरप्पा को अपनी कुर्सी खाली करनी पड़ी। उनके स्थान पर डीवी सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। ये वोक्कलिगा समुदाय के हैं। अब लिंगायतों ने उन पर छह महीने के अंदर अपना पद छोड़कर येदुरप्पा की वापसी का रास्ता साफ करने के वादे से मुकरने का आरोप लगाया जा रहा है। भाजपा में येदुरप्पा समर्थक विधायकों का एक बड़ा खेमा बन चुका है। ये पार्टी के अंदर ही आर-पार की जंग लड़ने को तैयार दिख रहे हैं। सदानंद गौड़ा ने हाल में बेंगलूर में आयोजित वोक्कलिगा समुदाय के एक सम्मेलन में यह कहकर लिंगायतों की भावनाओं को आहत कर दिया कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी वोक्कलिगा समुदाय के समर्थन के कारण मिली। उसी समय से पार्टी के लिंगायत विधायकों और मंत्रियों ने सदानंद गौड़ा को कुर्सी से हटाने के लिए ‘करो या मरो’ की जंग छेड़ रखी है।
लिंगायत नेता शेट्टर की ताजपोशी
जातिगत राजनीति को ही इसके मूल में माना जा रहा है कि लंबी जद्दोजहद के बाद येदुरप्पा के आगे झुकते हुए भाजपा नेतृत्व ने वहां के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को हटाकर उनकी जगह लिंगायत नेता जगदीश शेट्टर की ताजपोशी करने का फैसला कर लिया है। इस आशय की घोषणा सप्ताह भर के भीतर होने की उम्मीद है। इस ताजपोशी से यह माना जा रहा है कि भाजपा ने लंबी जद्दोजहद के बाद अब इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है कि कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री वीएस येदुरप्पा की ही चलेगी। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भी इस बात को मानने के लिए विवश हो गए हैं कि शेट्टर को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाने के अलावा अब और कोई विकल्प नहीं है। इस फैसले पर भाजपा संसदीय बोर्ड की मुहर लगनी आवश्यक है। यह पार्टी की निर्णय लेने वाली शीर्ष संस्था है और अधिकांश सदस्यों के बीच इसको लेकर सहमति है कि राज्य में भाजपा के असंतुष्ट खेमे की ओर से चार साल से दी जा रही धमकियों से पार्टी की छवि देशभर में खराब हो रही है।
ऐसे बनी ताजपोशी की बात
भाजपा के केंद्रीय नेताओं को इस बात की चिंता थी कि आगामी विधानसभा चुनाव घोषित होने तक पार्टी में दुबारा बगावत न हो और अगले चुनाव के बाद पार्टी की सत्ता में वापसी हो सके। हालांकि मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को बदलने का विरोध लालकृष्ण आडवाणी कर चुके थे। इसके बाद भी भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का मानना है कि शेट्टर को मुख्यमंत्री   होना चाहिए। वहीं शेट्टर ने मीडिया के सामने कहा है कि आलाकमान का फैसला हफ्ते भर के भीतर आने की उम्मीद है। हमने सब कुछ पार्टी नेतृत्व पर छोड़ दिया है। वहीं सूत्रों का यह भी कहना है कि भाजपा संसदीय दल के नेता लालकृष्ण आडवाणी हालांकि मौजूदा विधानसभा में तीसरा मुख्यमंत्री चुनने के पक्ष में नहीं हैं। वे येदुरप्पा के भी खिलाफ हैं, क्योंकि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण आडवाणी की काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर की गई यात्रा पर प्रतिकूल असर पड़ा था। आडवाणी नहीं चाहते थे कि येदुरप्पा के किसी मनोनीत व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और पार्टी महासचिव अनंत कुमार भी येदुरप्पा के करीबी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे।
कुरूबा-वोक्कलिगा को लुभाने की कोशिश
जातिगत राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि यहां सत्तासीन भाजपा कुरूबा-वोक्कलिगा को लुभाने के लिए भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। लिंगायत नेता के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद ये दोनों समुदाय भाजपा से कट न सके इसके लिए भाजपा नेतृत्व उप मुख्यमंत्री पद पर भी विचार कर सकता है। शायद यही वजह है कि भाजपा की कर्नाटक इकाई के प्रमुख केएस ईश्वरप्पा उप मुख्यमंत्री पद के लिए खेमेबंदी कर रहे हैं। वे कुरूबा समुदाय के हैं। उनके अलावा आर अशोक भी इस दौड़ में हैं, जो सदानंद गौड़ा की तरह वोक्कलिगा समुदाय से हैं। ईश्वरप्पा ने इससे पहले सरकार में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई थी। वहीं पार्टी में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर आलाकमान के सामने दो उप मुख्यमंत्री नियुक्त करने के सुझाव हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव 2013 के उत्तरार्ध में होने हैं। अगर यहां दो उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति हो जाती है तो इस चुनाव में भाजपा को जातिगत समीकरणों का लाभ मिल सकता है।
कांग्रेस भी डाल रही डोरे
कांग्रेस की हालत राज्य के जातीय समीकरण में काफी अजीब सी है। इसे कुछ हद तक बेईमानी भी कह सकते हैं। हाल में इस समीकरण में कांग्रेस की रणनीतिक पैठ बेहतर बनाने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने टुमकूर के सिद्धगंगा मठ जाकर लिंगायत समुदाय के धर्मगुरु  शिवकुमार स्वामी से मिलकर अपनी दिशा का संकेत दे दिया था। वहीं इस पार्टी के सबसे असरदार और विधानसभा में विपक्ष के नेता सिद्दरामैया दलित कुरुबा समाज से आते हैं। हालांकि उनका पार्टी के अंदर फिलहाल कोई विरोध नहीं हो रहा है, लेकिन जंग यहां भी मची है। यह जंग पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए लड़ी जा रही है। इसका नेतृत्व कांग्रेस के 82 वर्षीय वरिष्ठ लिंगायत नेता और पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष शामनूर शिवशंकरप्पा कर रहे हैं। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को इस बात का भरोसा दिलाना चाहते हैं कि कर्नाटक में अगले चुनाव का विजेता वही होगा, जो लिंगायतों की सहानुभूति जीतने में सफल होगा।
कितने सशक्त हैं शिवशंकरप्पा
वरिष्ठ लिंगायत नेता शामनूर शिवशंकरप्पा का कहना है कि वोक्कलिगा समुदाय से कांग्रेस को समर्थन की उम्मीद बेमानी होगी। यह समुदाय हमेशा जद (एस) के पाले में रहा है। वहीं पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर अनुसूचित जाति के डॉ. जी परमेश्वर के होने से पार्टी किसी भी संख्या बहुल समुदाय से समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकेगी। उनका कहना है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को वापस सत्ता में लाना है, तो इसका एक ही रास्ता है कि किसी लिंगायत नेता को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंप दी जाए। वे वादा भी कर चुके हैं कि ऐसा करने से पार्टी को 225 सदस्यों वाली विधानसभा में 150 सीटें मिलेंगी। उल्लेखनीय है कि हाल में लिंगायत समुदाय के राजनीतिक नेताओं ने बेंगलूर में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर अपनी अगली रणनीति तय करने का प्रयास किया। इस सम्मेलन के बाद लिंगायतों ने भी प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष पद पर काबिज होने के लिए ‘करो या मरो’ की जंग छेड़ने की घोषणा कर दी। साफ है कि इस प्रकार की जाति आधारित राजनीतिक रणनीति बनाने वाले इस विश्वास के आधार पर काम कर रहे हैं कि इन दिनों भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेतृत्व में अंदरूनी मतभेद चरम पर है। कहीं ऐसा न हो कि दोनों पार्टियों को इस अंदरूनी ‘करो या मरो’ की जंग जारी रखते हुए कर्नाटक की जनता का समर्थन मांगने के लिए चुनाव मैदान में उतरना पडेÞ।
ऐसे खड़ा हुआ तूफान
कर्नाटक में 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा को दक्षिण में पहली बार सरकार बनाने का मौका मिला। हालांकि येदुरप्पा 2007 में भी कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री रहे, लेकिन 30 मई 2008 को राज्य के 25 वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उनका राज्य इकाई में सिक्का चलने लगा। भ्रष्टाचार तथा अवैध खनन के मुद्दे पर आलाकमान की ओर से इस्तीफा मांगने तथा आरोपमुक्त होने के बाद पुन: पद प्राप्ति के आश्वासन पर उन्होंने अपने विश्वसनीय सदानंद गौड़ा को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनवा दिया। बस यहीं से कर्नाटक में ऐसा राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ, जो आज तक थमने की राह देख रहा है। कर्नाटक में बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय के एकमात्र कद्दावर नेता येदुरप्पा को राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा कई बार दरिकनार किए जाने से येदुरप्पा समेत उनके समर्थक भी नाराज हैं। पिछले दिनों येदुरप्पा समर्थक नौ मंत्रियों की ओर से मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को अपने इस्तीफे सौंप राज्य में नए सियासी नाटक की नींव रख दी थी। हालांकि संवैधानिक रूप से ये इस्तीफे उन्हें राज्यपाल को सौंपने चाहिए थे, लेकिन मुख्यमंत्री को इस्तीफा सौंपने के पीछे   उनकी दबाव की राजनीति थी। इसके आगे केंद्रीय नेतृत्व भी झुकता दिखा। 
आज भी ‘दबंग’ हैं येदुरप्पा
पांच जुलाई तक राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग पर अडेÞ 50 विधायकों की ओर से भी केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया जाना इसका परिचायक है कि येदुरप्पा आज भी कर्नाटक की राजनीति में निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ हैं। उन्हें चुनौती देना राज्य भाजपा इकाई से लेकर केंद्रीय नेतृत्व के बस से बाहर की बात है। सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री पदभार संभालने के बाद जिस तरह से येदुरप्पा को हाशिये पर पहुंचाने का कार्य हुआ, उससे उन्होंने येदुरप्पा सहित उनके समर्थकों की नाराजगी मोल ले ली। येदुरप्पा समर्थक इससे पूर्व भी कई बार केंद्रीय नेतृत्व पर गौड़ा को पदच्युत करने का दबाव बना चुके थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ‘जो होगा, देखा जाएगा’ की तर्ज पर मूकदर्शक बनना आज राज्य में पार्टी की नींव को तो कमजोर कर ही गया है, राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी की छवि नकारात्मक बनती जा रही है। येदुरप्पा के ही कट्टर समर्थक जगदीश शेट्टार को राज्य की कमान सौंपने की जिद पर अडेÞ ये समर्थक पार्टी की कार्यकर्ता आधारित छवि को तोड़ उसे भी कांग्रेस की भांति एक सत्तात्मक व्यक्तिवादी पार्टी का चोला ओढ़ाना चाहते हैं। यह संघ को कतई मंजूर नहीं है, लेकिन येदुरप्पा की बढ़ी ताकत और उन्हें प्राप्त समर्थन से उसका अनुशासन का डंडा भी जोर नहीं मार रहा। 
अब खड़े हैं यक्ष प्रश्न
अब जगदीश शेट्टार यदि मुख्यमंत्री नियुक्त हो भी गए तो क्या यह परंपरा भाजपा में कुरीतियों को जन्म नहीं दे रही? यह यक्ष प्रश्न है। सवाल यह भी भाजपा शासित अन्य राज्यों से भी यदि ऐसा ही असंतोष उभरा तब केंद्रीय नेतृत्व क्या करेगा? क्या सभी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदल देना ही इस संकट का समाधान होगा? इसमें संशय नहीं कि येदुरप्पा कर्नाटक में अभूतपूर्व जनसमर्थन रखते हैं, लेकिन इससे उन्हें मनमानी की छूट तो नहीं दी जा सकती! कांग्रेस के नक्श-ए-कदम पर चल रही भाजपा में यदि यही हाल रहा तो शासित राज्यों में हर वर्ष एक नए मुख्यमंत्री को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलानी पडेगी। ऐसे में सुशासन व सुराज के पार्टी के दावे का क्या होगा? क्या भाजपा में नेतृत्व का संकट इतना गहरा गया है कि मामूली सा कार्यकर्ता सत्ता में आते ही खुद को सर्वेसर्वा मानने लगता है। अंदर ही अंदर पार्टी कमजोर होती है? जहां तक बात येदुरप्पा की है तो वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे है। क्या वर्तमान में संघ के प्रचारक येदुरप्पा की भांति पद पिपासु हैं? आखिर येदुरप्पा किसके सामने और क्या आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं?

Thursday, February 16, 2012

कुछ खास पल बैरिया विस की गलियों में

अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
अबकी विस चुनाव में पूर्वांचल के अंतिम छोर पर बसे बागी बलिया की धरती पर मतदान का नजारा देखने का अवसर मिला। खास तौर पर बलिया जिले के पूर्वी सीमा पर बसे बैरिया (पहले द्वाबा) विस क्षेत्र का। यही वह द्वाबा है जिससे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का दिली लगाव था। चाहें वह छात्र राजनीति की बात हो या प्रधानमंत्रित्व काल की। द्वाबा की सरजमीं पर नतमस्तक हुए बिना वह किसी प्रकार की कोई राजनीति नहीं करते थे।
द्वाबा की गलियों में घुसते ही राजनीतिक  चर्चाओं का अखाड़ा कहे जाने वाले हल्दी चट्टी पर कुछ राजनीतिज्ञों से सामना हुआ। हल्दी चट्टी की राजनीतिक विरासत काफी पुरानी है। यह छोटी सी चट्टी बमुश्किल आधा किलोमीटर के दायरे में सिमटी इस चट्टी पर बैठकर आप समूचे द्वाबा ही नहीं, बल्कि सदर विस समेत हर विस की तहकीकात कर सकते हैं। राजनीतिक अखाड़ा मानी जाने वाली इस चट्टी की खासियत यह है कि यहां हर प्रत्याशी दिन भर कहीं भी रहे, एकाध चक्कर तो मार ही लेता है। समर्थकों से दुआ सलाम के साथ ही कहां कौन से मतदाता किस दल की ओर जा रहे हैं, इसकी पूरी टोह प्रत्याशी यहां अपने समर्थकों से लेते हैं। बातों ही बातों में बैरिया विस में रोचक मुकाबला होने की चर्चा खास रही। मुद्दा था प्रदेश सरकार के खाद्य तथा रसद राज्यमंत्री व भाजपा प्रत्याशी भरत सिंह तथा वर्तमान विधायक व कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष यादव के बीच रोमांचक मुकाबले का।
बीच में पूर्व मंत्री शारदानंद अंचल के पुत्र व सपा प्रत्याशी जयप्रकाश अंचल की बैरिया विस में पहली मर्तबा में दखलंदाजी को लेकर भी चर्चाएं हो रहीं थीं। हर आंखों में चमक थी, चाहें वह किसी भी दल का समर्थक क्यों न हो? मानों उसका प्रत्याशी दमदार जीत हासिल कर रहा हो। यहां हमारी मुलाकात हल्दी के रहने वाले संजय सिंह से हुई। बकौल संजय, बैरिया विस की लड़ाई में अबकी जातिगत आंकड़ों के बजाय विकास को मुद्दा मतदाता मान रहे हैं। पूर्व मंत्री भरत सिंह ने यहां विकास को काफी गति दी थी। बात चाहें द्वाबा के जल में घुले आर्सेनिक के मुद्दे की हो, या यहां की सड़कों की। सड़क निर्माण में कुछ ठेकेदारों ने लूट-खसोट जरूर की, लेकिन फिर भी विकास दिख रहा था। अब तो हालात पांच साल में इतने बदतर हो गए हैं कि लगता ही नहीं कि वह पांच साल पहले वाला द्वाबा है। जर्जर सड़कों पर वाहन तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है।
आर्सेनिक से मुक्ति की बात कौन कहे, लोग इसे ही नीयति मान अब जहरीले जल का सेवन करने लगे थे। अरसे से खराब हैंडपंप पूरे पांच साल में जंग खा गए। कोई पूछने तक नहीं पहुंचा। पूरे सूबे में जातिगत आंकड़ों को जीत का पैमाना मानने की बात को टटोलने की गरज से जब इस संवाददाता ने संजय सिंह से सवाल किया तो उसका दो टूक जवाब था। जाति क्या करेगी। विकास कहने से नहीं होता। जमीन पर दिखना भी चाहिए। उसने सवाल किया, आप पहले भी यहां आते-जाते रहे हैं। हल्दी से चार किमी की दूरी तय करने का औसत समय कितना होना चाहिए। जनाब, पूरे एक घंटे लगते हैं इस चार किमी की दूरी तय करने में। अगर पहाड़ भी होता तो इतना ही वक्त लगता। उसकी बातों में दम भी था।
कारण कि जब मैं हल्दी से सोनवानी चट्टी पर पहुंचा तो जर्जर सड़क से जाने में पूरे 50 मिनट का वक्त लग गया था। सड़क भी इतनी खतरनाक थी कि जब जीप हिचकोले लेती थी तो कलेजा मुंह को आ जाता था। मानों सड़क और जीप के बीच 90 डिग्री का कोण बन रहा हो। यह तो माहिर जीप चालक ही हैं तो थोड़ा अधिक किराया लेकर भी यात्रियों को वक्त रहते उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचा दे रहे हैं। अभी बात आगे ही बढ़ी थी कि वहां मौजूद एक तत्कालीन विधायक सुभाष यादव के समर्थक से रहा नहीं गया। उसने कहा कि आखिर विधायक जी क्या कर लेते, जब सूबे की मुख्यिा ही उनकी सुनने को तैयार नहीं थीं। कई बार तो विधायक जी ने मुद्दा उठाया, लेकिन कोई सुने तब न। अचानक उनके बीच में बोलने पर हमने उनका नाम, पता जानना चाहा तो वह टाल गए। खैर, अब जरा उनकी बातों को विस्तार से सुनिए कि उन्होंने क्या कहा? उस समर्थक ने पूरे जोश से कहा कि विधायक जी हर बार सूबे की मुख्यमंत्री ही नहीं, संबंधित मंत्रियों से अगर लखनऊ में मिलते थे तो द्वाबा की समस्याओं से रुबरू कराते थे। हर बार वही आश्वासन कि हां देख रहे हैं। विधायक जी खुद कहते थे कि फलां मंत्री से बात हुई है, कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।
जब उनसे यह कहा गया कि विधायक निधि से विधायक जी ने विकास को अमलीजामा क्यों नहीं पहनाया गया। इस पर वह समर्थक तुनक गया। बोल पड़ा कि विधायक निधि मिलती है तो उससे केवल एक इलाके का ही विकास ठीक से नहीं हो सकता। इसके अलावा कई जरूरतमंदो की मदद भी उसी विधायक निधि पर टिकी होती है। सारी विधायक निधि यदि सड़क निर्माण या आर्सेनिक मुक्ति में ही निबटा दी जाए तो और विकास कार्यों का क्या होगा। सच मानिए यह तो अच्छा हुआ कि नेताजी (निवर्तमान विधायक सुभाष यादव) ने खुद बसपा से नाता नहीं तोड़ा, बसपा की मुखिया ने ही उन्हें झटक कर दूर कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो जल्द ही नेताजी खुद बसपा से नाता तोड़ लेते। अब कांग्रेस के साथ आए हैं और अगर   उन्हें जीत मिलती है तो देखिएगा, कैसे विकास होता है द्वाबा का। खैर, उस समर्थक ने हमारी और संजय सिंह की बातों में खलल डाल दिया था, लिहाजा काफी देर की चुप्पी के बाद संजय सिंह ने अपना मौन तोड़ा।
संजय ने कहा कि विकास करने के लिए बातों की नहीं, जमीन पर कार्य करने की जरूरत होती है। वह जनप्रतिनिधि ही क्या जो अपना हक न छीन सके। जब हमारे विधायक कमजोर होंगे तो हकीकत में किसी की भी सत्ता हो वह विकास जरूर करेगा। क्या भरत सिंह सपा शासनकाल में विधायक नहीं थे। सपा की सत्ता रहते हुए भी उन्होंने द्वाबा के गली-कूंचो तक विकास की किरण को पहुंचाया। यह तो कोरी बकवास है कि मुख्यमंत्री ने सुना ही नहीं। बलिया तो वैसे ही बागी के नाम से जाना जाता है। अगर विधायक की कही बात की सुनवाई नहीं हुई तो पूरे पांच साल तक वह कौन सा धर्म निभाते रहे। क्यों नहीं तभी नाता तोड़ लिया, जो आज नाता तोड़ने की बात कह रहे हैं। बातचीत के दौरान आई गर्माहट के बीच चाय की उस दुकान पर काफी लोगों का जमावड़ा लग गया था। बीसीयों की संख्या में मौजूद लोग मौन साधे दोनों समर्थकों की बातों को गौर से सुन रहे थे।
खैर, मैंने उन्हें टालने की मूड से घर जल्दी निकलने की बात कही और आगे बढ़ गया। हालांकि इन समर्थकों की बतकही के बीच एक बात तो स्पष्ट थी कि बैरिया विस के चुनाव में जातिगत आंकड़ों में कोई दम नजर नहीं आया। हां, विकास का मुद्दा यहा भारी दिखा। खैर, मतदान हो चुका था और प्रत्याशियों की किस्मत इवीएम की मेमोरी में फीड हो चुकी थी। अब देखना यह है कि द्वाबा की जनता ने किस ओर अपना रुझान किया है। 

Monday, January 30, 2012

पढ़ें नेताई, बेचें देश

अनीश कुमार उपाध्याय 
चुनावी मौसम देखकर मनसुख लाल की मंशा भी राजनीति में घुसपैठ की हुई। ऐसे में वह गुरु की तलाश में निकले तो एक गुरू घंटाल से उनकी मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में गुरू घंटाल ने उन्हें जो बताया, उसे सुनकर मानों मनसुख लाल की बांछें ही खिल उठी। पहले तो उन्हें गुरू घंटाल की बातों पर भरोसा ही नहीं हुआ। ऐसे में उन्होंने उन्हें जरा कुरेदकर पूछा कि क्या ऐसा भी हो सकता है। अब आप पूछिए कि आखिर मनसुख लाल क्यों चौंक पड़े! उन्हें गुरू घंटाल ने कुछ और नहीं देश बेचने का मंत्र दिया था। मंत्र के बोल थे, पढ़े नेताई बेचें देश...!
 पहले तो मनसुख लाल हसीन सपनों में खो गए। उन्होंने ख्यालों ही ख्यालों में देखा कि वह देश बेचकर नोटों, हीरे-जवाहरात की ढेरी पर बैठ गए हैं। जहां देखते हैं केवल उन्हें हरे-हरे नोट और हीरे-जवाहरात ही दिखता है। ऐसे में वह सोंच में पड़ गए कि अब उसे वह लेकर कहां जाएं। कहां कितना खर्च करना है। कौन-कौन सामान वह पहले खरीदें, कहां-कहां पहले जाएं, बीबी के लिए कौन से गहने बनाए, बेटे के लिए कौन सा खिलौना खरीदें वगैरह-वगैरह। इसी बीच उनके दिमाग में एक फंडा आया कि रोज अखबारों में घोटालों की खबर छपती है। देश के नेता करोड़ों का गोलमाल कर लेते हैं और डकार भी नहीं लेते। लिहाजा उनके दिमाग में भी एक ख्याल आया। मनसुख लाल अब गुरू घंटाल के मंत्र का मतलब थोड़ा-थोड़ा समझने लगे थे। लिहाजा, अचानक वहां पसरा सन्नाटा उनकी चीख के साथ टूट गया। वह बोल पड़े, अरे...अब तो मैं लूट ही लूंगा। ऐसे में वह तत्काल गुरू घंटाल के चरणों पर गिर पड़े। बोले, गुरू जी अब जब आपने मंत्र मेरे कान में फूंक ही दिया है तो आगे की शिक्षा भी हमें दे ही दीजिए।
मनसुख के बातों ही बातों में अपने पाले में आते देख गुरू घंटाल की मुर्दिनी छाई आंखों में भी अचानक चमक आने लगी। उन्हें लगने लगा कि अरसे बाद कोई सच्चा भक्त उनकी शरण में आकर अपने दुख का निदान मांग रहा है। लिहाजा उन्होंने देश में चल रहे कुछ ‘नेता प्रशिक्षण केंद्रों’ की जानकारी मनसुख को दे दी। अब मनसुख परेशान। गुरू घंटाल ने केंद्रों के बारे में तो बता दिया कि देश में नेता प्रशिक्षण केंद्र भी चलते हैं, लेकिन वह कहां चलते हैं, इसके बारे में तो उन्होंने उनसे पूछा ही नहीं। ऐसे में वह गुरू घंटाल के पास दुबारा पहुंचे और बोले। गुरू जी यह प्रशिक्षण केंद्र कहां चलते हैं, जरा यह भी बता देंगे तो आपके भक्त का कल्याण हो जाएगा। गुरू घंटाल के यहां दो बार मनसुख के पहुंचने पर उनमें भी लालच का बोध जाग गया। ऐसे में उन्होंने फट से इसके लिए गुरू दक्षिणा की डिमांड रख दी। पहले तो मनसुख अचकचाया, लेकिन नेताई पढ़कर देश बेचने का मंत्र ख्याल आते ही उसने इस पर राजीनामा भरना ही उचित समझा। गुरू घंटाल भी मंजे हुए खिलाड़ी थे। राजनीति की पाठशाला में भले ही वह अपनी धाक न जमा पाएं हों, लेकिन टूटा-फूटा ज्ञान लेकर ही वह इस क्षेत्र के मंजे हुए सन्यासी खुद को घोषित कर चुके थे।
ऐसे में वह मनसुख को लेकर सीधे एक साइबर कैफे पर पहुंच गए। कहने का आशय था कि गुरू घंटाल भी अब गुगल महाराज की शरण में थे। गुगल मे सर्च पर उन्होंने जब इसकी डिटेल डाली तो वहां एक-दो नहीं, बल्कि देश-विदेश की तमाम ऐसी संस्थाओं की डिटेल उनके सामने थी। लिहाजा उन्होंने अब अपने पास वाले केंद्र की तलाश शुरू की। जल्द ही उन्हें एक डिटेल मिल गई। वहां से पता लेकर वह नेताई का प्रशिक्षण लेने चल पड़े। बसों का धक्के खाते हुए मनसुख, गुरू घंटाल के साथ जगह पर पहुंचे। वहां एक पान की दुकान पर उन्होंने उक्त प्रशिक्षण केंद्र के बारे में पूछा तो, वह बोल पड़े। हां, हां, अबइहें त कुछ दिन भएल, खुला है। कई लोग आवत हैं बाबू। चलिए, आप भी कमीशन जमा कई दीजिए, कल आ जाइएगा, डिटेल साहेब से बात कर आपका एडमिशन पक्का करा देंगे। खैर, पहली बार राजनीति सीखने की बात थी, लिहाजा मनसुख उस संस्था के बारे में बहुत लालयित थे। पूछ बैठे। अच्छा यह बताइये, यहां कैसे राजनीति सिखते हैं। पान दुकानदार मुंह में पान का बीड़ा दबाते हुए बोला- भईया, इहवां आए तो पता चला कि राजनीतियो के पढ़ाई होता है। हमरे बिहार में त लइकवन सब, जनमें से राजनीति में माहिर होत हैं। खड़े आदमी और देश बेच दें, पता ही नाही लागत है कि कब हम बिक गए और कब हमार...।
खैर, पान दुकानदार ने मनसुख की लालसा जगा ही दी तो गुरू घंटाल की आंखों की चमक भी कई गुना बढ़ गई। ऐसे में दोनों ने वहां कमीशन का दो सौ रुपये जमा कर वापस घर को लौट आए। पूरी रात मनसुख को नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी सी झपकी आती भी तो भैया मनुसख जिंदाबाद के नारे उसके कानों में गूंजने लगते। झकझक सफेद कुर्ता, पायजामा पहने मनसुख लग्जरी गाड़ी से पान का बीड़ा चबाते हुए नीचे उतरते देखते। आंखों ही आंखों में पूरी रात जैसे-तैसे कटी और मनसुख एक बार फिर गुरू घंटाल संग पहुंच गए नेतागिरी प्रशिक्षण केंद्र पर। आज इन पर यूं कहिए तो खुदा मेहरबान थे। केंद्र में घुसते ही सफारी शूट, टाई पहने एक अधिकारी से उनका परिचय हुआ। बातचीत में पता चला कि वही इस केंद्र के संचालक हैं। हाथ में अगरबत्ती थामें महाशय पूजा में तल्लीन थे। ‘ग्राहक’ को कार्यालय में आते देख उनके चेहरे की चमक दोगुनी हो गई। देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों को शीश झुकाकर प्रणाम करते हुए अगरबत्ती को एक कोने में खोंस दिए। इसके बाद अपनी व्हील चेयर पर पसरते हुए बोले, हां तो आप लोग कैसे आए हैं। यह सवाल पूछना ही था कि पहले से ही व्याकुल मनसुख की दुखती नस पर जैसे किसी ने हाथ रख दिया हो। बोल पड़े- सुने हैं आप राजनीति सिखा रहे हैं। लेकिन आपने तो खद्दर पहना ही नहीं है।
ही-ही-ही कर हंसते हुए संचालक बोले, लगता है कि आप राजनीति की पाठशाला में पहली बार आ रहे हैं। आपने कभी किसी पार्टी का झंडा-बैनर ढोया है। मनसुख बोले, नहीं। कभी गाड़ी पर लगी माइक पर नेताजी के जिंदाबाद या मुर्दाबाद का नारा लगाया है। अब फिर मनसुख बोले, नहीं, लेकिन इन सब से प्रशिक्षण का क्या ताल्लुक? संचालक ने खुद को संयत किया और फिर बोला- यह जानकारी इसलिए जरूरी है कि आपके प्रशिक्षण का स्तर मापना है। हमारे यहां प्रशिक्षण के लिए दो अलग-अलग ग्रेड हैं। पहला ग्रेड वह है जिसमें थोड़ी-बहुत राजनीति से वास्ता रखने वालों को प्रशिक्षण दिया जाता है। दूसरे ग्रेड वाले राजनीति के मामले में लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर वाले होते हैं। हमें लगता है कि आप दूसरी कैटेगरी के हैं। खैर, बात आगे बढ़ी और मामला फीस पर पहुंचा। फीस मांगी गई एक लाख रुपये मात्र। रहना, खाना-पीना आदि का खर्च अलग। फीस सुनते ही मनसुख का माथा घूम गया, लेकिन अब जब उन्हें राजनीति के कीड़े ने दांत चुभो ही दिए थे, तो इससे बच पाना उनके लिए आसान नहीं था। रुआंसे मन से घर पहुंचे। बीवी के बचे गहने और बैंक में जमा रकम निकाली तो कुल जमा पूंजी इकठ्ठा हुई साठ हजार रुपये। अब 40 हजार रुपये कहां से आए?
इसी उधेड़-बुन में वह लगे ही थे कि गुरू घंटाल ने उन्हें सुझाया कि क्यों न किसी मित्र-रिश्तेदार की सहायता ली जाए। आखिर वे होते किस दिन के लिए हैं? मनसुख को गुरू घंटाल की बात जंच गई। लिहाजा वह एक परिचित मित्र के यहां पहुचें और उससे 40 हजार रुपये की डिमांड कर दी। पहले तो मित्र ने पूछा कि इतनी बड़ी रकम करोगे क्या, तो मनसुख ने उसे झूठ बतला दिया। उसे डर था कि जिस पाठशाला का वह छात्र होने जा रहा है, अगर यह भी पहुंच गया तो उसकी नैया कैसे पार लगेगी? खैर, कुल जमा एक लाख रुपये लेकर वह प्रशिक्षण के लिए चल पड़ा। पहले दिन के प्रशिक्षण में कुल जमा आधा दर्जन लोग पहुंचे थे। एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था, जबकि बाकी रईस घरानों से थे। प्रशिक्षण के पहले दिन संचालक महोदय ने राजनीति का ककहरा सिखाया। उन्होंने बताया कि राजनीति करने से पहले उसे सीखना जरूरी है। आज की राजनीति तो बिना प्रशिक्षण पूरा हो ही नहीं सकती। जल्द मुकाम पाने के लिए वह सारे गुर सीखने होंगे, जो जरूरी हैं। उनके कहने का कुल आशय यह था कि जिसे देश बेचना आ गया, वह पक्का राजनीतिज्ञ हो गया। अब मनसुख का माथा घूमने लगा। किसी तरह क्लास खत्म होने पर वह घर के लिए निकले।
इस बीच गुरू घंटाल ने उन्हें कहा कि अब आप स्कूल में पढ़िए, अपना काम तो खत्म हुआ। लाइए, मेरी फीस दीजिए। इस पर वह अचकचाए। बोले, यह तो मानवता की हद हो गई। आपने मेरा साथ दिया, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इसकी फीस हो गई। अब गुरू घंटाल पूरे ताव में बोले। चले हो राजनीति सीखने और पहले ही लंगड़ी मार रहे हो। खैर, उस समय उनकी कलाई में घड़ी बंधी थी। विवाह के वक्त ससुराल वालों ने दिलोजान से उसे दिया था। अब कुल ले-देकर मनसुख के पास वह घड़ी ही तो थी, जिसे उसने गुरू घंटाल को दे दिया। खैर, इसके बाद वह घर पहुंचे और खा-पीकर बिस्तर पर जा पहुंचे। आज भी पूरी रात उनकी आंखों से नींद गायब थी। देश बेचने का ख्याल जो उन्हें कभी सपने में भी नहीं आता, अब तरह-तरह का रूप धरकर सपने में दिखाई पड़ने लगा। कभी ख्वाबों में मुन्ना भाई आते तो कभी देश के भ्रष्टाचार के गर्त में डूबे तमाम राजनीतिक दिग्गज। उनके ख्वाब में तिथिवार वह सारी बातें आने लगी कि कैसे वह रोड पति से नेता बनते ही करोड़पति हो गए। रातभर के स्वप्न ने उन्हें अंदर से काफी मजबूत कर दिया।
लिहाजा वह पूरी उम्मीदों के साथ क्लास रूम की ओर चले। वहां पहुंचते ही मानों उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वहां न तो कोई कार्यालय था और न ही कोई कर्मचारी। अब उन्हें कुछ-कुछ माजरा समझ में आने लगा। उसके पीछे कई और राजनीति के छात्र आए। सभी की दशा एक जैसी थी। अब सभी समझ गए थे कि उक्त संचालक उन्हें चूना लगाकर राजनीति का पहला ककहरा सीखा गया था। ऐसे में मनसुख उल्टे पांव घर लौटने को हुए तो घरैतिन का ख्याल आते ही उनके पसीने छूटने लगे। जिस बीवी को उन्होंने राजनीति में चमकते ही हीरों का जड़ाऊ हार लाने का भरोसा दिया था, वह अब क्या करें। अब उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। इसी बीच गुरू घंटाल भी उनसे मिल गए। गुरू घंटाल को देखते ही मनसुख की रूलाई छूट पड़ी। गुरू घंटाल बोले, क्या हुआ चेला। क्या हो गया? क्लास में आज डांट पड़ी क्या? तिलमिलाए मनसुख बोल पड़े-आग लगे इस डांट की। ससुरा बोरिया-बिस्तर समेटकर रफूचक्कर हो गया। अब का करें? गुरू घंटाल तो मंजे हुए खिलाड़ी थे ही। उन्होंने फट से सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत में भले ही गरीबी, अशिक्षा हो, लेकिन एक   मामले में समूचे विश्व में भारत सबसे आगे है। वह है सलाह। यहां का बच्चा-बच्चा भले ही उस सलाह पर काम न करे, लेकिन किसी को मुसीबत में देख सलाह पहले देता है।
अब तो समझ रहे हो, कि मैं क्या कहना चाहता हूं। रकम डूबी नहीं, राजनीति सिखा गई। मनसुख चौंके। वह कैसे? गुरू घंटाल बोले, अरे बेवकूफ, जब वह दो दिन को छोकरा, एक दिन में ही कई लाख कमा सकता है तो तुम क्यों नहीं। यहां नहीं, चुपचाप किसी दूसरे शहर पहुंचकर तुम भी खोल दो, राजनीति की पाठशाला। अब मनसुख बहुत कुछ समझ गया था। अब सब कुछ लुटाने के बाद यह आइडिया उसके दिमाग में घर कर गया। अब उसे समझ में आ रहा था कि पढ़े नेताई, बेचे देश का मतलब क्या होता है। इस मंत्र के जाप से हकीकत में उसे अपना भला होता दिखने लगा। दूसरे दिन एक बड़े शहर की सबसे ऊंची इमारत के नीचे बोर्ड लगाया, सीखीए राजनीति।

Sunday, January 29, 2012

रुश्दी बनाम ‘धर्म के ठेकेदार’

अभिव्यक्ति की अवधारणा पर कुठाराघात
विरोध के चलते रद्द हुआ जयपुर साहित्य सम्मेलन
चंद मुस्लिम संगठनों और वोट के दबाव ने रोका
सैटेनिक वर्सेस पुस्तक से उठ खड़ा हुआ बखेड़ा
धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार की भी उपेक्षा
सलमान रुश्दी

भारतीय गणतंत्र में दो मूल अधिकार। अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म निरपेक्षता। इसमें अधिकार हैं कि आप कहीं भी विचारों की अभिव्यक्त कर सकते हैं। बशर्ते किसी को ठेस न पहुंचे। भारत की धर्म निपरेक्षता पर तो कोई सवाल नहीं है। कारण कि आज हिंदू बाहुल्य देश का प्रधानमंत्री सिख है और उपराष्ट्रपति मुसलमान। देश की सरकार चलाने वाली पार्टी मुखिया मूलत: ईसाई हैं। लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी को केवल धर्म के ठेकेदार ही मुद्दा बना रहे हैं।
अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
आखिरकार धर्म के ठेकेदारों के मुद्दे ने अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात कर ही दिया। रुश्दी के मामले में तय था कि वह जयपुर साहित्य महोत्सव की वीडियो कांफ्रेंसिंग में सिर्फ मिडनाइट चिल्ड्रन पर बोलेंगे। विवादास्पद पुस्तक सेटेनिक वर्सेज पर नहीं। फिर भी उनका विरोध हुआ और हालात खराब होने की आशंका तथा मुस्लिम संगठनों के भारी विरोध से सम्मेलन रद्द हो गया। इससे स्पष्ट हो गया कि एक ओर हम खुद को धर्मनिपरेक्ष और अभिव्यक्ति की आजादी देने वाला देश मानते हैं, वहीं जब अमल करने की बात होती है तो हम धर्म के अनुयायियों के आगे झुक जाते हैं। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ लिखने वाले को देश में कदम भी नहीं रखने देते। क्या यही है अभिव्यक्ति की आजादी? सरकार क्या इतनी दब्बू है कि चंद मुस्लिम संगठनों के दवाब में वह एक इंटरनेशनल शख्सियत जिसने साहित्य के क्षेत्र में इतनी शोहरत कमाई है, उसे देश में सिर्फ इसलिए नहीं आने दे रही कि कहीं उसका वोट बैंक न खो जाए।
सलमान रुश्दी का सटैनिक वर्सेस
सलमान रुश्दी के भारत की भूमि पर कदम न रखने का जहां तक सवाल है, उसके मूल में है उनकी लिखित पुस्तक सटैनिक वर्सेस। यह पुस्तक 1988 में प्रकाशित हुई थी। 1989 में उसे लेकर ईरानी राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी को मार डालने का फतवा दिया। इसके बाद नौ वर्ष तक ब्रिटिश सरकार ने रुश्दी को सुरक्षा में रखा। 1998 में ईरान की नई सरकार ने घोषणा की कि वह उस फतवे का अब समर्थन नहीं करती। लिहाजा धीरे-धीरे रुश्दी सार्वजनिक जीवन में भाग लेने लगे। वक्त गुजरा और दुनिया के मुस्लिम जनमत ने भी उसे बीती बात मान लिया है। दरअसल इस किताब में पैगंबर मोहम्मद साहब का अपमानजनक चित्रण किया गया है। किताब में मोहम्मद पैगंबर साहब के साथ साथ इस्लाम, कुरान और मक्का के संबंध में भी काफी विरोधाभासी बातें की गई हैं। इन पर ही मुसलिमों को सख्त ऐतराज है।
सहम उठे आयोजक
विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी के वीडियो कांफ्रेंस के जरिए जयपुर साहित्य महोत्सव से रूबरू न होने के पीछे कारण था कि डरे-सहमे आयोजकों को हिंसा पर उतारू विरोध करने वालों ने साफ चेतावनी दी थी। कहा गया था कि उन्हें रुश्दी की शक्ल तक देखना गंवारा नहीं है। आयोजन हुआ तो पूरे राजस्थान में हिंसा भड़क जाएगी। जयपुर के दिग्गी पैलेस में पांच दिवसीय साहित्य महोत्सव 20 जनवरी को शुरू हुआ था। रुश्दी को शुरुआती सत्र में ही आना था। उनके आगमन को लेकर मुस्लिम संगठनों के विरोध से राजस्थान पुलिस ने भी रुश्दी की जान को खतरा बतायाा। नतीजा रुश्दी नहीं आए। फिर तय हुआ कि वह 24 जनवरी को वीडियो कांफ्रेंसिंग से महोत्सव में मौजूद रहेंगे। वहीं निर्धारित समय से कुछ मिनट पहले ही संयोजक संजय रॉय ने वीडियो कांफ्रेंसिंग रद्द करने की घोषणा कर दी। वहीं बताया गया कि आयोजन स्थल होटल दिग्गी पैलेस के मालिक राम प्रताप सिंह ने राजस्थान पुलिस की सलाह पर आयोजकों से रुश्दी के वीडियो लिंक कार्यक्रम के लिए स्पष्ट मना कर दिया। श्री सिंह ने कहा कि सुरक्षा खतरों से सम्मेलन जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह इस संपत्ति का मालिक हैं और उनके होटल को नुकसान की आशंका है। 
तमतमा उठे सलमान रुश्दी
आयोजकों ने जब मुस्लिम संगठनों के नेताओं संग बैठक भी की, तो मुसलमानों का कड़ा रुख देख वह आयोजन का साहस नहीं जुटा पाए। जमायते- इस्लामी, मिल्ली काउंसिल और राजस्थान मुस्लिम फोरम ने आयोजन में बाधा डालने की कोशिश की। दजर्नों लोगों ने दिग्गी पैलेस के अहाते में नमाज शुरू कर दी। कुछ ने चेतावनी दी कि यदि एक अपराधी लेखक का भाषण शुरू हुआ तो हंगामा हो जाएगा।  वहीं ऐन वक्त पर वीडियो कांफ्रेंसिंग रद्द होने से तमतमाए सलमान रुश्दी ने कहा है कि जैसे ही फुर्सत मिलेगी हिंदुस्तान आएंगे। वह भी धार्मिक उन्मादियों और सरकार में बैठे उनके दोस्तों की बिना इजाजत के। सरकार से कहूंगा कि उनसे निपटे। कांफ्रेंसिंग रद्द किया जाना भयावह है। उन्होंने ट्विट और एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में भी आक्रोश जाहिर किया। उन्होंने कहा है कि कुछ मुस्लिम संगठनों की धमकी से कार्यक्रम रद्द करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटना है। क्या भारत भी चीन की राह पर है, जहां चरमपंथियों को शर्ते आयद करने का भी हक दिया जा रहा है। रुश्दी ने माना कि उन्हें भारत इसलिए नहीं आने दिया गया, क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव है। 
क्यों है सेटेनिक वर्सेस पर विवाद
मुंबई में पैदा हुए सर अहमद सलमान रुश्दी काश्मीरी मूल के मुसलमान हैं। उनके उपन्यास   सेटेनिक वर्सेस (शैतान की आयतें) को 1988 में बुकर पुरस्कार मिल चुका है। वह लंबे से ब्रिटेन में रहते हैं। वह भारतीय नहीं, बल्कि ब्रिटिश भारतीय के तौर पर जाने जाते हैं। सैटेनिक वर्सेस में उन्होंने कथित तौर पर इमाम का जो चरित्र गढ़ा है, वह ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमैनी पर टिप्पणी करता है। जिन दिनों यह उपन्यास लिखा गया, अयातुल्ला खोमैनी पाकिस्तान में थे। अयातुल्ला खोमैनी ने 1989 में सलमान रुश्दी के खिलाफ जान से मारने का फतवा जारी किया था। वहीं राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित जयपुर फेस्टिवल में रश्दी के विरोध करने वालों के पीछे कहा जा रहा है कि विरोध करने वाले मूलत: कट्टरपंथी हिंदूवादी लोग हैं। रश्दी का साथ दे रहे लोगों के बारे में कहा जा रहा है कि यह लोग केवल मुस्लिम कौम की खिलाफत करने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी की बात कर रहे हैं, अन्यथा उनके मन में संविधान या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति किसी प्रकार का कोई सम्मान नहीं है। 
क्या कहता है संविधान
यहां यह जान लें कि संविधान क्या कहता है? संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) के अनुसार भारत के सभी नागरिकों को वाक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार है। इस आधार पर सलमान रश्दी के पक्ष में दलील दी जा रही है कि उन्हें अपने विचार व्यक्त करने से रोका जा रहा है। दलील देने वालों को यह जानकारी होनी चाहिए कि रश्दी भारत का नागरिक ही नहीं है। लिहाजा तकनीकी तौर पर उन्हें यह मूल अधिकार हासिल ही नहीं है। वहीं इसी अनुच्छेद 19 के भाग (2) में स्पष्ट किया गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अबाध नहीं है। सरकार भारत की प्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, विदेशों से मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, सदाचार के हितों में और न्यायिक अवमानना, अपराध करने को उकसाना आदि स्थिति निर्मित होने की संभावना हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जरूरत के अनुसार प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है।
लोक व्यवस्था के नाम पर लगाई रोक
संविधान निर्माताओं ने बोलने की आजादी में यह स्पष्ट किया है कि जहां आप दूसरे की इस आजादी में हस्तक्षेप करते हैं, वहीं से आपकी खुद की सीमा शुरू हो जाती है। लोक व्यवस्था के नाम पर रश्दी रोके गए हैं। इसके बारे में बिहार राज्य बनाम शैलबाला, एआईआर, 1952 सुप्रीम कोर्ट, पृष्ठ 329 पर सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया है कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) में लोक व्यवस्था पदावली शब्द के परिणामस्वरूप देश में लोेक व्यवस्था के साधारण भंग होने या अपराध करने के लिए उकसाने की संभावना पर भी इस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लग सकता है। संविधान का यह उपबंध सरकार को अधिकार देती है कि वह अभिव्यक्ति की आजादी छीन सकती है। रुशीद भारतीय नहीं है, लेकिन अनेक अंतराष्ट्रीय ऐसे समझौते तथा कानून हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी को हर देश में संरक्षण देने के लिए सरकारों को निर्देश देते हैं। इन पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इसमें मानव अधिकारों में बोलने की आजादी भी शामिल है। लिहाजा रुश्दी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण देने भी भारत का अंतर्राष्ट्रीय प्रतिमानों के अनुसार अनिवार्य दायित्व है। हालांकि इसके लिए भारत बाध्य नहीं है।
जुड़ा है धार्मिक मुद्दा भी
रश्दी के साथ धार्मिक मुद्दा भी जुड़ा है, लिहाजा इस पक्ष पर भी प्रकाश डालना जरूरी है। संविधान देश के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता का भी मूल अधिकार देता है। इसके अनुसार इस्लाम के अनुयायियों का यह कहना है कि उनको रुश्दी का और हिंदू धर्मावलंबियों का यह कहना है कि उनको अपने धर्म पर आघात करने वालों के विरोध का संवैधानिक हक है। यह गलत है। सरकार को दोनों ही धर्म के लोगों के भावनाओं का ख्याल करना चाहिए था। वहीं सलमान रश्दी के मामले में धार्मिक आजादी का मूल अधिकार मुस्लिमों के किसी भी प्रकार का संवैधानिक या कानूनी हक नहीं देता।  यह भी सही है कि रुश्दी एक शिया मुस्लिम परिवार से हैं। हालांकि वह कहते हैं कि वास्तव में वह कभी धार्मिक नहीं रहे। उनकी किताबें अक्सर समाज में धर्म की भूमिका, विभिन्न आस्थाओं के बीच और धार्मिक और बिना आस्था वालों के बीच टकराव पर प्रकाश डालती है।
तब नहीं मची हाय-तौबा
सलमान रुश्दी की सटैनिक वर्सेस 1988 में प्रकाशित हुई। वर्ष 1889 में ईरानी राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी को मार डालने का फतवा दिया। इसके बाद नौ वर्ष तक ब्रिटिश सरकार ने रुश्दी को सुरक्षा में रखा। इसके बाद 1998 में ईरान की नई सरकार ने घोषणा की कि वह उस फतवे का समर्थन नहीं करती। धीरे-धीरे रुश्दी सार्वजनिक जीवन में भाग लेने लगे। मुस्लिम जनमत ने भी उसे बीती बात मान लिया। लिहाजा नए सिरे से रुश्दी को जयपुर के अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में भाग लेने से रोकने की दारुल उलूम की मांग अचरजवाली है। रुश्दी ने कोई ‘नया अपराध’ नहीं किया है। करीब 23 वर्ष पूर्व लिखी उस पुस्तक पर वह पहले ही लगभग 10 वर्ष तक कैदी सा जीवन बिता चुके हैं। पिछले 12 साल में रुश्दी कई बार भारत आए और गए। विविध मुद्दों पर लेख भी लिखे तथा उनके बयान भी आते रहे। इसमें इस्लाम संबंधी बयान भी हैं। मसलन उन्होंने लिखा कि इस्लाम और आतंकवाद को पूरी तरह से अलग-अलग करके देखने की जिद निरर्थक है। आखिर कोई चीज तो है जो इस्लामी अनुयायियों को आतंकवाद से जोड़ती है। वह क्या   है? इन बातों पर भी मुस्लिम नेताओं ने हायतौबा नहीं मचाई।

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सीएम ने किया आलाकमान को खुश
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी के मामले में पार्टी की रणनीति के अनुरूप कदम उठाकर कांग्रेस आलाकमान को खुश कर दिया है। कांग्रेस नेतृत्व अब उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में चुनावी प्रचार के लिए भेजने की तैयारी कर रही है। इसके लिए नए सिरे से रणनीति बनाई जा रही है। बीते वर्ष सितंबर में हुई भंवरी देवी अपहरण व गोपालगढ़ हिंसा जैसी घटनाओं के बाद गहलोत अपने राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर थे। यूपी से सटे गोपालगढ़ में 11 अल्पसंख्यकों की मौत से तो चुनाव की तैयारी में जुटा पार्टी आलाकमान काफी नाराज था। नाराजगी इस हद तक थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व महासचिव राहुल गांधी काफी समय तक गहलोत से मिले तक नहीं, जबकि उन्होंने कई बार मुलाकात का समय मांगा था। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व को रुश्दी मामले में यूपी विस चुनाव में नुकसान की आशंका सताने लगी थी, अब वह काफी हद तक दूर हो गई है।
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किसने क्या कहा...
केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद- कानून में अगर किसी पर रोक लगाने की व्यवस्था है तो उस पर जरूर रोक लगनी चाहिए। हम कानून व्यवस्था से हटकर कुछ नहीं कर सकते। लिहाजा जिन्हें चिंता है और जो समझते हैं कि कारर्वाई होनी चाहिए तो वह कानून-व्यवस्था का सहारा लें।
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी- इसके पीछे कांग्रेस का चुनावी खेल है। कांग्रेस ने पहले उन्हें आमंत्रित किया और अब उन्हें रोककर सियासी फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। 
सपा नेता आजम खान- मैं रुश्दी की यात्रा का विरोध करता हूं। सरकार को ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो देश के करोड़ों मुसलमानों की भावना को आहत करने वाला हो। 
सोशल नेटवर्किग वेबसाइट ट्विटर पर रुश्दी का लिखा संदेश-भारत आने के लिए मुझे किसी वीजा की जरूरत ही नहीं है। मेरे पास ओवरसीज इंडियन सिटिजन कार्ड है, जो बगैर वीजा भारत आने की सहूलियत देता है। सरकार अगर मुझे रोकना चाहे भी तो उसे सबसे पहले मेरा ओवरसीज इंडियन सिटिजन कार्ड वापस लेना होगा।
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश माकर्डेय काटजू-विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी 'घटिया' और 'दोयम दर्जे का लेखक' हंै। ऐसे लोग औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं, जो मानते हैं कि विदेश में रहने वाला लेखक महान होता है। आजकल के लोग कबीरदास और तुलसीदास को नहीं पूछते, क्योंकि वह बनारस के घाट पर रहे हैं। रुश्दी महान हैं क्योंकि वह टेम्स नदी के घाट पर रहे हैं।
पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक डेविड रेमनिक-रुश्दी प्रकरण शमर्नाक है। कारण कि यह समकालीन भारतीय राजनीति के घटिया चलन को प्रदर्शित करता है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण सत्ता को बरकरार रखना है।
सम्मेलन में हिस्सा लेने आए गीतकार एवं संवाद लेखक जावेद अख्तर- विवादास्पद रचना पर बैन तो सही है, लेकिन लेखक की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध समझ में नहीं आता। 
ख्यातिलब्ध पत्रकार मार्क टुली- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए यह सबसे दुखद दिन है। राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रही है। 
राज्यसभा में नेता विपक्ष भाजपा नेता अरुण जेटली-यह राज्य सरकार का तानाशाही रवैया है। अगर किसी को धमकी मिली है तो सरकार का फर्ज है कि वह उसे सुरक्षा दें। जब इस देश के नेताओं को सुरक्षा मिल सकती है तो इस लिटरेरी फेस्टीवल को भी मिल सकती थी। 
प्रसिद्ध लेखिका शोभा डे- राजनेता अपने फायदे के लिए ऐसा विवाद पैदा करते हैं। रुश्दी के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
भाजपा नेता उमा भारती- विवादित लेखक सलमान रुश्दी ने अपनी विवादास्पद किताब में हनुमान जी का भी मजाक उड़ाया है। लेकिन मैंने इसकी चर्चा भी नहीं की। कारण कि मैं मानती हूं कि कलम स्वतंत्र ही रहनी चाहिए।
केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी-भारत न आना सलमान रुश्दी का अपना फैसला था। जो रिपोर्ट मिली थी, उस आधार पर उन्होंने अपनी भारत यात्रा स्थगित की।

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एक नजर में रुश्दी
सर अहमद सलमान रुश्दी का जन्म 19 जून 1947 को बंबई (अब मुंबई) भारत में अनीस अहमद रुश्दी के इकलौते पुत्र के रूप में हुआ। वह एक ब्रिटिश भारतीय उपन्यासकार और निबंधकार हैं। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से वकालत की शिक्षा हासिल की। शिक्षा की बुनियाद मुंबई के कैथेड्रल एंड जॉन कानन स्कूल मुंबई से पड़ी। शेष शिक्षा उन्होंने रग्बी स्कूल, किंग्स कॉलेज से हुई। कैंब्रिज में उन्होंने इतिहास का भी अध्ययन किया। पूर्णकालिक लेखक बनने से पहले उन्होंने दो विज्ञापन एजेंसियों ओगिल्वी एंड माथेर और आयर बार्कर के लिए काम किया। इनकी चार बार शादी हुई। पहली पत्नी क्लेरिस्सा लुआर्ड से 1976 से 1987 तक विवाहित रहे। इनसे उन्हें एक पुत्र जफर हुआ। दूसरी पत्नी अमेरिकी उपन्यासकार मारिआन विगिसंथी से उनका विवाह 1988 में हुआ लेकिन 1993 में तलाक हो गया। तीसरी पत्नी एलिजावेथ वेस्ट थी। इनसे इनका नाता 1997 से 2004 तक रहा। इनसे एक पुत्र मिलन का जन्म हुआ। वर्ष 2004 में उनकी पत्नी बनीं भारतीय अमेरिकी अभिनेत्री एवं सुपर मॉडल पद्मा लक्ष्मी। यह अमेरिकी रिएलिटी टेलीविजन कार्यक्रम टॉप शेफ की मेजबान थीं। यह शादी दो जुलाई 2007 में टूट गई।   वहीं वर्ष 2008 में बालीवुड प्रेस की भारतीय मॉडल रिया सेन से प्रेम संबंध जुड़ा।
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किताबें : ग्राइमस (1975), मिडनाइट्स चिल्ड्रन (1981), शेम (1983), द जुआर स्माइल: अ निकारागुआ जर्नी (1987), सैटेनिक वर्सेज (1988), हारून एंड द सी आॅफ स्टोरीज (1990), इमेजिनरी होमलैंड्स: एसेज एंड क्रिटिसिज्म 1981-1991 (1992), होमलेस बाईचाइस (1992, आर.झबवाला और वीएस नायपॉल के साथ), ईस्ट-वेस्ट (1994), द मूअर्स लास्ट साई (1995), द फायरबर्ड्स नेस्ट (1997), द ग्राउंड बिनीद हर फीट (1999), द स्क्रीनप्ले आॅफ मिडनाइट्स चिल्ड्रन (1999), फ्यूरी (2001), स्टेप अक्रॉस दिस लाइन: कलेक्टेड नान फिक्शन 1992-2002 (2002), शालीमार द क्लाउन (2005), द एंचेंट्रेस आॅफ फ्लॉरेंस (2008), द बेस्ट अमरिकन शार्ट स्टोरीज (2008, अतिथि संपादक के रूप में), इन द साउथ, द न्यू यार्कर (18 मई 2009)
खास: -मिडनाइट्स चिल्ड्रन (1981) ने दी साहित्यि की प्रसिद्धि।
-सैटेनिक वर्सेज पुस्तक पर आज भी विवाद जारी है।
निबंध : अ फाइन पिकल (द गार्डियन, 28 फरवरी 2009), इमेजिन देअर इज नो हेवेन (द गार्डियन, 16 अक्टूबर 1999), मोहनदास गांधी (टाइम, 13 अप्रैल 1998)
पुरस्कार : एरिसटिओन पुरस्कार (यूरोपीय संघ), कला परिषद राइटर्स अवार्ड, राइटर आॅफ ईयर (ब्रिटिश बुक पुरस्कार), राइटर आॅफ ईयर (जर्मनी),बेस्ट बुकर पुरस्कार (2008), इंग्लिश स्पीकिंग यूनियन अवार्ड, हच क्रासवर्ड फिक्शन प्राइज (भारत), इंडिया अब्राड लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड (यूएसए), जेम्स टैट ब्लैक मेमोरियल पुरस्कार (गल्प), कर्ट टुचोल्स्कि पुरस्कार (स्वीडन),मनटुआ पुरस्कार (इटली), जेम्स जॉइस पुरस्कार (यूनिवर्सिटी कॉलेज इबलिन), मैसाचुसेट्स प्रोद्योगिकी संस्थान मानद प्रोफेसरशिप, चैपमैन यूनिवर्सिटी मानद डॉक्टरेट (डॉक्टर आॅफ द ह्यूमन लेटर्स), सांस्कृतिक मानवतावाद में आउटस्टैंडिंग लाइफ टाइम अचीवमेंट (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी), प्रेमियो ग्रिंजेन केवोर (इटली), प्रिक्स कोलेट (स्विटजरलैंड), सेंट लुइस साहित्य पुरस्कार (सेंट लुइस यूनिवर्सिटी), साहित्य के लिए स्टेट प्राइज (आस्ट्रिया), बुकर पुरस्कार की 40 वीं सालगिरह की स्मृति में बेस्ट बुकर पुरस्कार, व्हाइटबे्रड उपन्यास पुरस्कार (दो बार), बाल उपन्यास के लिए राइटर्स गिल्ड आॅफ ग्रेट ब्रिटेन पुरस्कार।
रुश्दी ने झेला विरोध
----रुश्दी ने यूगोस्लाविया के संघीय गणराज्य पर 1999 में नॉटो की बमबारी का समर्थन किया। इससे वामपंथी तारिक अली ने रुश्दी को परियुद्धक के रूप में संबोधित किया। वर्ष 2001 में अमेरिका की ओर से अफगानिस्तान में तालिबान को हटाने का समर्थन किया। वहीं इराक में 2003 के युद्ध की आलोचना करते हुए कहा कि सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिका की एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप अनुचित था। इसका विरोध उन्हें झेलना पड़ा।
---रुश्दी ने धार्मिक उग्रवाद के खतरों के खिलाफ चेतावनी देने वाले कथन के घोषणा पत्र ‘टुगेदर फेसिंग द न्यू टोटलीटेरिओनिस्म’ पर हस्ताक्षर किए। यह घोषणा पत्र 2006 में वामपंथी झुकाव वाले फ्रांसीसी साप्ताहिक चार्ली हेब्दों में प्रकाशित हुआ था।
---वर्ष 2006 में रुश्दी ने कहा कि वह तत्कालीन हाउस आॅफ कामन्स के नेता जैक स्ट्रा की टिप्पणी का समर्थन करते हैं, जिन्होंने नकाब पहनने की आलोचना की। रुश्दी ने कहा कि उनकी तीन बहनें कभी नकाब नहीं डालेंगी। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि नकाब के खिलाफ लड़ाई महिलाओं के हदों के खिलाफ एक लंबी और सतत लड़ाई रही है। इस मामले में मैं पूरी तरह से जैक स्ट्रा की ओर हूं।
---रुश्दी अपने राजनीतिक विचारों के लिए ब्रिटिश शैक्षिक प्रतिष्ठानों के आक्रोश का शिकार बनते रहे हैं। पूर्व में रुश्दी की कृतियों के प्रशंसक रह चुके मार्क्सवादी आलोचक टेरी ईगलटन ने उनके दृष्टिकोण के प्रति उन पर यह कहते हुए हमला किया कि उन्होंने पेंटागन के इराक और अफगानिस्तान में अपराधिक कार्याें पर खुशी प्रकट की। हालांकि बाद में उन्होंने रुश्दी के विचारों को गलत रूप में पेश करने पर माफी मांगी।
---92 स्ट्रीट वाई में एक प्रस्तुति के दौरान रुश्दी ने कॉपीराइट पर अपने विचार व्यक्त किए। जब उनसे पूछा गया कि क्या कॉपीराइट कानून को उन्होंने स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए एक अवरोध या बाधा माना है? इस मामले में वह चर्चा में रहे।