अनीश कुमार उपाध्याय
चुनावी मौसम देखकर मनसुख लाल की मंशा भी राजनीति में घुसपैठ की हुई। ऐसे में वह गुरु की तलाश में निकले तो एक गुरू घंटाल से उनकी मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में गुरू घंटाल ने उन्हें जो बताया, उसे सुनकर मानों मनसुख लाल की बांछें ही खिल उठी। पहले तो उन्हें गुरू घंटाल की बातों पर भरोसा ही नहीं हुआ। ऐसे में उन्होंने उन्हें जरा कुरेदकर पूछा कि क्या ऐसा भी हो सकता है। अब आप पूछिए कि आखिर मनसुख लाल क्यों चौंक पड़े! उन्हें गुरू घंटाल ने कुछ और नहीं देश बेचने का मंत्र दिया था। मंत्र के बोल थे, पढ़े नेताई बेचें देश...!
पहले तो मनसुख लाल हसीन सपनों में खो गए। उन्होंने ख्यालों ही ख्यालों में देखा कि वह देश बेचकर नोटों, हीरे-जवाहरात की ढेरी पर बैठ गए हैं। जहां देखते हैं केवल उन्हें हरे-हरे नोट और हीरे-जवाहरात ही दिखता है। ऐसे में वह सोंच में पड़ गए कि अब उसे वह लेकर कहां जाएं। कहां कितना खर्च करना है। कौन-कौन सामान वह पहले खरीदें, कहां-कहां पहले जाएं, बीबी के लिए कौन से गहने बनाए, बेटे के लिए कौन सा खिलौना खरीदें वगैरह-वगैरह। इसी बीच उनके दिमाग में एक फंडा आया कि रोज अखबारों में घोटालों की खबर छपती है। देश के नेता करोड़ों का गोलमाल कर लेते हैं और डकार भी नहीं लेते। लिहाजा उनके दिमाग में भी एक ख्याल आया। मनसुख लाल अब गुरू घंटाल के मंत्र का मतलब थोड़ा-थोड़ा समझने लगे थे। लिहाजा, अचानक वहां पसरा सन्नाटा उनकी चीख के साथ टूट गया। वह बोल पड़े, अरे...अब तो मैं लूट ही लूंगा। ऐसे में वह तत्काल गुरू घंटाल के चरणों पर गिर पड़े। बोले, गुरू जी अब जब आपने मंत्र मेरे कान में फूंक ही दिया है तो आगे की शिक्षा भी हमें दे ही दीजिए।
मनसुख के बातों ही बातों में अपने पाले में आते देख गुरू घंटाल की मुर्दिनी छाई आंखों में भी अचानक चमक आने लगी। उन्हें लगने लगा कि अरसे बाद कोई सच्चा भक्त उनकी शरण में आकर अपने दुख का निदान मांग रहा है। लिहाजा उन्होंने देश में चल रहे कुछ ‘नेता प्रशिक्षण केंद्रों’ की जानकारी मनसुख को दे दी। अब मनसुख परेशान। गुरू घंटाल ने केंद्रों के बारे में तो बता दिया कि देश में नेता प्रशिक्षण केंद्र भी चलते हैं, लेकिन वह कहां चलते हैं, इसके बारे में तो उन्होंने उनसे पूछा ही नहीं। ऐसे में वह गुरू घंटाल के पास दुबारा पहुंचे और बोले। गुरू जी यह प्रशिक्षण केंद्र कहां चलते हैं, जरा यह भी बता देंगे तो आपके भक्त का कल्याण हो जाएगा। गुरू घंटाल के यहां दो बार मनसुख के पहुंचने पर उनमें भी लालच का बोध जाग गया। ऐसे में उन्होंने फट से इसके लिए गुरू दक्षिणा की डिमांड रख दी। पहले तो मनसुख अचकचाया, लेकिन नेताई पढ़कर देश बेचने का मंत्र ख्याल आते ही उसने इस पर राजीनामा भरना ही उचित समझा। गुरू घंटाल भी मंजे हुए खिलाड़ी थे। राजनीति की पाठशाला में भले ही वह अपनी धाक न जमा पाएं हों, लेकिन टूटा-फूटा ज्ञान लेकर ही वह इस क्षेत्र के मंजे हुए सन्यासी खुद को घोषित कर चुके थे।
ऐसे में वह मनसुख को लेकर सीधे एक साइबर कैफे पर पहुंच गए। कहने का आशय था कि गुरू घंटाल भी अब गुगल महाराज की शरण में थे। गुगल मे सर्च पर उन्होंने जब इसकी डिटेल डाली तो वहां एक-दो नहीं, बल्कि देश-विदेश की तमाम ऐसी संस्थाओं की डिटेल उनके सामने थी। लिहाजा उन्होंने अब अपने पास वाले केंद्र की तलाश शुरू की। जल्द ही उन्हें एक डिटेल मिल गई। वहां से पता लेकर वह नेताई का प्रशिक्षण लेने चल पड़े। बसों का धक्के खाते हुए मनसुख, गुरू घंटाल के साथ जगह पर पहुंचे। वहां एक पान की दुकान पर उन्होंने उक्त प्रशिक्षण केंद्र के बारे में पूछा तो, वह बोल पड़े। हां, हां, अबइहें त कुछ दिन भएल, खुला है। कई लोग आवत हैं बाबू। चलिए, आप भी कमीशन जमा कई दीजिए, कल आ जाइएगा, डिटेल साहेब से बात कर आपका एडमिशन पक्का करा देंगे। खैर, पहली बार राजनीति सीखने की बात थी, लिहाजा मनसुख उस संस्था के बारे में बहुत लालयित थे। पूछ बैठे। अच्छा यह बताइये, यहां कैसे राजनीति सिखते हैं। पान दुकानदार मुंह में पान का बीड़ा दबाते हुए बोला- भईया, इहवां आए तो पता चला कि राजनीतियो के पढ़ाई होता है। हमरे बिहार में त लइकवन सब, जनमें से राजनीति में माहिर होत हैं। खड़े आदमी और देश बेच दें, पता ही नाही लागत है कि कब हम बिक गए और कब हमार...।
खैर, पान दुकानदार ने मनसुख की लालसा जगा ही दी तो गुरू घंटाल की आंखों की चमक भी कई गुना बढ़ गई। ऐसे में दोनों ने वहां कमीशन का दो सौ रुपये जमा कर वापस घर को लौट आए। पूरी रात मनसुख को नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी सी झपकी आती भी तो भैया मनुसख जिंदाबाद के नारे उसके कानों में गूंजने लगते। झकझक सफेद कुर्ता, पायजामा पहने मनसुख लग्जरी गाड़ी से पान का बीड़ा चबाते हुए नीचे उतरते देखते। आंखों ही आंखों में पूरी रात जैसे-तैसे कटी और मनसुख एक बार फिर गुरू घंटाल संग पहुंच गए नेतागिरी प्रशिक्षण केंद्र पर। आज इन पर यूं कहिए तो खुदा मेहरबान थे। केंद्र में घुसते ही सफारी शूट, टाई पहने एक अधिकारी से उनका परिचय हुआ। बातचीत में पता चला कि वही इस केंद्र के संचालक हैं। हाथ में अगरबत्ती थामें महाशय पूजा में तल्लीन थे। ‘ग्राहक’ को कार्यालय में आते देख उनके चेहरे की चमक दोगुनी हो गई। देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों को शीश झुकाकर प्रणाम करते हुए अगरबत्ती को एक कोने में खोंस दिए। इसके बाद अपनी व्हील चेयर पर पसरते हुए बोले, हां तो आप लोग कैसे आए हैं। यह सवाल पूछना ही था कि पहले से ही व्याकुल मनसुख की दुखती नस पर जैसे किसी ने हाथ रख दिया हो। बोल पड़े- सुने हैं आप राजनीति सिखा रहे हैं। लेकिन आपने तो खद्दर पहना ही नहीं है।
ही-ही-ही कर हंसते हुए संचालक बोले, लगता है कि आप राजनीति की पाठशाला में पहली बार आ रहे हैं। आपने कभी किसी पार्टी का झंडा-बैनर ढोया है। मनसुख बोले, नहीं। कभी गाड़ी पर लगी माइक पर नेताजी के जिंदाबाद या मुर्दाबाद का नारा लगाया है। अब फिर मनसुख बोले, नहीं, लेकिन इन सब से प्रशिक्षण का क्या ताल्लुक? संचालक ने खुद को संयत किया और फिर बोला- यह जानकारी इसलिए जरूरी है कि आपके प्रशिक्षण का स्तर मापना है। हमारे यहां प्रशिक्षण के लिए दो अलग-अलग ग्रेड हैं। पहला ग्रेड वह है जिसमें थोड़ी-बहुत राजनीति से वास्ता रखने वालों को प्रशिक्षण दिया जाता है। दूसरे ग्रेड वाले राजनीति के मामले में लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर वाले होते हैं। हमें लगता है कि आप दूसरी कैटेगरी के हैं। खैर, बात आगे बढ़ी और मामला फीस पर पहुंचा। फीस मांगी गई एक लाख रुपये मात्र। रहना, खाना-पीना आदि का खर्च अलग। फीस सुनते ही मनसुख का माथा घूम गया, लेकिन अब जब उन्हें राजनीति के कीड़े ने दांत चुभो ही दिए थे, तो इससे बच पाना उनके लिए आसान नहीं था। रुआंसे मन से घर पहुंचे। बीवी के बचे गहने और बैंक में जमा रकम निकाली तो कुल जमा पूंजी इकठ्ठा हुई साठ हजार रुपये। अब 40 हजार रुपये कहां से आए?
इसी उधेड़-बुन में वह लगे ही थे कि गुरू घंटाल ने उन्हें सुझाया कि क्यों न किसी मित्र-रिश्तेदार की सहायता ली जाए। आखिर वे होते किस दिन के लिए हैं? मनसुख को गुरू घंटाल की बात जंच गई। लिहाजा वह एक परिचित मित्र के यहां पहुचें और उससे 40 हजार रुपये की डिमांड कर दी। पहले तो मित्र ने पूछा कि इतनी बड़ी रकम करोगे क्या, तो मनसुख ने उसे झूठ बतला दिया। उसे डर था कि जिस पाठशाला का वह छात्र होने जा रहा है, अगर यह भी पहुंच गया तो उसकी नैया कैसे पार लगेगी? खैर, कुल जमा एक लाख रुपये लेकर वह प्रशिक्षण के लिए चल पड़ा। पहले दिन के प्रशिक्षण में कुल जमा आधा दर्जन लोग पहुंचे थे। एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था, जबकि बाकी रईस घरानों से थे। प्रशिक्षण के पहले दिन संचालक महोदय ने राजनीति का ककहरा सिखाया। उन्होंने बताया कि राजनीति करने से पहले उसे सीखना जरूरी है। आज की राजनीति तो बिना प्रशिक्षण पूरा हो ही नहीं सकती। जल्द मुकाम पाने के लिए वह सारे गुर सीखने होंगे, जो जरूरी हैं। उनके कहने का कुल आशय यह था कि जिसे देश बेचना आ गया, वह पक्का राजनीतिज्ञ हो गया। अब मनसुख का माथा घूमने लगा। किसी तरह क्लास खत्म होने पर वह घर के लिए निकले।
इस बीच गुरू घंटाल ने उन्हें कहा कि अब आप स्कूल में पढ़िए, अपना काम तो खत्म हुआ। लाइए, मेरी फीस दीजिए। इस पर वह अचकचाए। बोले, यह तो मानवता की हद हो गई। आपने मेरा साथ दिया, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इसकी फीस हो गई। अब गुरू घंटाल पूरे ताव में बोले। चले हो राजनीति सीखने और पहले ही लंगड़ी मार रहे हो। खैर, उस समय उनकी कलाई में घड़ी बंधी थी। विवाह के वक्त ससुराल वालों ने दिलोजान से उसे दिया था। अब कुल ले-देकर मनसुख के पास वह घड़ी ही तो थी, जिसे उसने गुरू घंटाल को दे दिया। खैर, इसके बाद वह घर पहुंचे और खा-पीकर बिस्तर पर जा पहुंचे। आज भी पूरी रात उनकी आंखों से नींद गायब थी। देश बेचने का ख्याल जो उन्हें कभी सपने में भी नहीं आता, अब तरह-तरह का रूप धरकर सपने में दिखाई पड़ने लगा। कभी ख्वाबों में मुन्ना भाई आते तो कभी देश के भ्रष्टाचार के गर्त में डूबे तमाम राजनीतिक दिग्गज। उनके ख्वाब में तिथिवार वह सारी बातें आने लगी कि कैसे वह रोड पति से नेता बनते ही करोड़पति हो गए। रातभर के स्वप्न ने उन्हें अंदर से काफी मजबूत कर दिया।
लिहाजा वह पूरी उम्मीदों के साथ क्लास रूम की ओर चले। वहां पहुंचते ही मानों उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वहां न तो कोई कार्यालय था और न ही कोई कर्मचारी। अब उन्हें कुछ-कुछ माजरा समझ में आने लगा। उसके पीछे कई और राजनीति के छात्र आए। सभी की दशा एक जैसी थी। अब सभी समझ गए थे कि उक्त संचालक उन्हें चूना लगाकर राजनीति का पहला ककहरा सीखा गया था। ऐसे में मनसुख उल्टे पांव घर लौटने को हुए तो घरैतिन का ख्याल आते ही उनके पसीने छूटने लगे। जिस बीवी को उन्होंने राजनीति में चमकते ही हीरों का जड़ाऊ हार लाने का भरोसा दिया था, वह अब क्या करें। अब उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। इसी बीच गुरू घंटाल भी उनसे मिल गए। गुरू घंटाल को देखते ही मनसुख की रूलाई छूट पड़ी। गुरू घंटाल बोले, क्या हुआ चेला। क्या हो गया? क्लास में आज डांट पड़ी क्या? तिलमिलाए मनसुख बोल पड़े-आग लगे इस डांट की। ससुरा बोरिया-बिस्तर समेटकर रफूचक्कर हो गया। अब का करें? गुरू घंटाल तो मंजे हुए खिलाड़ी थे ही। उन्होंने फट से सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत में भले ही गरीबी, अशिक्षा हो, लेकिन एक मामले में समूचे विश्व में भारत सबसे आगे है। वह है सलाह। यहां का बच्चा-बच्चा भले ही उस सलाह पर काम न करे, लेकिन किसी को मुसीबत में देख सलाह पहले देता है।
अब तो समझ रहे हो, कि मैं क्या कहना चाहता हूं। रकम डूबी नहीं, राजनीति सिखा गई। मनसुख चौंके। वह कैसे? गुरू घंटाल बोले, अरे बेवकूफ, जब वह दो दिन को छोकरा, एक दिन में ही कई लाख कमा सकता है तो तुम क्यों नहीं। यहां नहीं, चुपचाप किसी दूसरे शहर पहुंचकर तुम भी खोल दो, राजनीति की पाठशाला। अब मनसुख बहुत कुछ समझ गया था। अब सब कुछ लुटाने के बाद यह आइडिया उसके दिमाग में घर कर गया। अब उसे समझ में आ रहा था कि पढ़े नेताई, बेचे देश का मतलब क्या होता है। इस मंत्र के जाप से हकीकत में उसे अपना भला होता दिखने लगा। दूसरे दिन एक बड़े शहर की सबसे ऊंची इमारत के नीचे बोर्ड लगाया, सीखीए राजनीति।
पहले तो मनसुख लाल हसीन सपनों में खो गए। उन्होंने ख्यालों ही ख्यालों में देखा कि वह देश बेचकर नोटों, हीरे-जवाहरात की ढेरी पर बैठ गए हैं। जहां देखते हैं केवल उन्हें हरे-हरे नोट और हीरे-जवाहरात ही दिखता है। ऐसे में वह सोंच में पड़ गए कि अब उसे वह लेकर कहां जाएं। कहां कितना खर्च करना है। कौन-कौन सामान वह पहले खरीदें, कहां-कहां पहले जाएं, बीबी के लिए कौन से गहने बनाए, बेटे के लिए कौन सा खिलौना खरीदें वगैरह-वगैरह। इसी बीच उनके दिमाग में एक फंडा आया कि रोज अखबारों में घोटालों की खबर छपती है। देश के नेता करोड़ों का गोलमाल कर लेते हैं और डकार भी नहीं लेते। लिहाजा उनके दिमाग में भी एक ख्याल आया। मनसुख लाल अब गुरू घंटाल के मंत्र का मतलब थोड़ा-थोड़ा समझने लगे थे। लिहाजा, अचानक वहां पसरा सन्नाटा उनकी चीख के साथ टूट गया। वह बोल पड़े, अरे...अब तो मैं लूट ही लूंगा। ऐसे में वह तत्काल गुरू घंटाल के चरणों पर गिर पड़े। बोले, गुरू जी अब जब आपने मंत्र मेरे कान में फूंक ही दिया है तो आगे की शिक्षा भी हमें दे ही दीजिए।
मनसुख के बातों ही बातों में अपने पाले में आते देख गुरू घंटाल की मुर्दिनी छाई आंखों में भी अचानक चमक आने लगी। उन्हें लगने लगा कि अरसे बाद कोई सच्चा भक्त उनकी शरण में आकर अपने दुख का निदान मांग रहा है। लिहाजा उन्होंने देश में चल रहे कुछ ‘नेता प्रशिक्षण केंद्रों’ की जानकारी मनसुख को दे दी। अब मनसुख परेशान। गुरू घंटाल ने केंद्रों के बारे में तो बता दिया कि देश में नेता प्रशिक्षण केंद्र भी चलते हैं, लेकिन वह कहां चलते हैं, इसके बारे में तो उन्होंने उनसे पूछा ही नहीं। ऐसे में वह गुरू घंटाल के पास दुबारा पहुंचे और बोले। गुरू जी यह प्रशिक्षण केंद्र कहां चलते हैं, जरा यह भी बता देंगे तो आपके भक्त का कल्याण हो जाएगा। गुरू घंटाल के यहां दो बार मनसुख के पहुंचने पर उनमें भी लालच का बोध जाग गया। ऐसे में उन्होंने फट से इसके लिए गुरू दक्षिणा की डिमांड रख दी। पहले तो मनसुख अचकचाया, लेकिन नेताई पढ़कर देश बेचने का मंत्र ख्याल आते ही उसने इस पर राजीनामा भरना ही उचित समझा। गुरू घंटाल भी मंजे हुए खिलाड़ी थे। राजनीति की पाठशाला में भले ही वह अपनी धाक न जमा पाएं हों, लेकिन टूटा-फूटा ज्ञान लेकर ही वह इस क्षेत्र के मंजे हुए सन्यासी खुद को घोषित कर चुके थे।
ऐसे में वह मनसुख को लेकर सीधे एक साइबर कैफे पर पहुंच गए। कहने का आशय था कि गुरू घंटाल भी अब गुगल महाराज की शरण में थे। गुगल मे सर्च पर उन्होंने जब इसकी डिटेल डाली तो वहां एक-दो नहीं, बल्कि देश-विदेश की तमाम ऐसी संस्थाओं की डिटेल उनके सामने थी। लिहाजा उन्होंने अब अपने पास वाले केंद्र की तलाश शुरू की। जल्द ही उन्हें एक डिटेल मिल गई। वहां से पता लेकर वह नेताई का प्रशिक्षण लेने चल पड़े। बसों का धक्के खाते हुए मनसुख, गुरू घंटाल के साथ जगह पर पहुंचे। वहां एक पान की दुकान पर उन्होंने उक्त प्रशिक्षण केंद्र के बारे में पूछा तो, वह बोल पड़े। हां, हां, अबइहें त कुछ दिन भएल, खुला है। कई लोग आवत हैं बाबू। चलिए, आप भी कमीशन जमा कई दीजिए, कल आ जाइएगा, डिटेल साहेब से बात कर आपका एडमिशन पक्का करा देंगे। खैर, पहली बार राजनीति सीखने की बात थी, लिहाजा मनसुख उस संस्था के बारे में बहुत लालयित थे। पूछ बैठे। अच्छा यह बताइये, यहां कैसे राजनीति सिखते हैं। पान दुकानदार मुंह में पान का बीड़ा दबाते हुए बोला- भईया, इहवां आए तो पता चला कि राजनीतियो के पढ़ाई होता है। हमरे बिहार में त लइकवन सब, जनमें से राजनीति में माहिर होत हैं। खड़े आदमी और देश बेच दें, पता ही नाही लागत है कि कब हम बिक गए और कब हमार...।
खैर, पान दुकानदार ने मनसुख की लालसा जगा ही दी तो गुरू घंटाल की आंखों की चमक भी कई गुना बढ़ गई। ऐसे में दोनों ने वहां कमीशन का दो सौ रुपये जमा कर वापस घर को लौट आए। पूरी रात मनसुख को नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी सी झपकी आती भी तो भैया मनुसख जिंदाबाद के नारे उसके कानों में गूंजने लगते। झकझक सफेद कुर्ता, पायजामा पहने मनसुख लग्जरी गाड़ी से पान का बीड़ा चबाते हुए नीचे उतरते देखते। आंखों ही आंखों में पूरी रात जैसे-तैसे कटी और मनसुख एक बार फिर गुरू घंटाल संग पहुंच गए नेतागिरी प्रशिक्षण केंद्र पर। आज इन पर यूं कहिए तो खुदा मेहरबान थे। केंद्र में घुसते ही सफारी शूट, टाई पहने एक अधिकारी से उनका परिचय हुआ। बातचीत में पता चला कि वही इस केंद्र के संचालक हैं। हाथ में अगरबत्ती थामें महाशय पूजा में तल्लीन थे। ‘ग्राहक’ को कार्यालय में आते देख उनके चेहरे की चमक दोगुनी हो गई। देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों को शीश झुकाकर प्रणाम करते हुए अगरबत्ती को एक कोने में खोंस दिए। इसके बाद अपनी व्हील चेयर पर पसरते हुए बोले, हां तो आप लोग कैसे आए हैं। यह सवाल पूछना ही था कि पहले से ही व्याकुल मनसुख की दुखती नस पर जैसे किसी ने हाथ रख दिया हो। बोल पड़े- सुने हैं आप राजनीति सिखा रहे हैं। लेकिन आपने तो खद्दर पहना ही नहीं है।
ही-ही-ही कर हंसते हुए संचालक बोले, लगता है कि आप राजनीति की पाठशाला में पहली बार आ रहे हैं। आपने कभी किसी पार्टी का झंडा-बैनर ढोया है। मनसुख बोले, नहीं। कभी गाड़ी पर लगी माइक पर नेताजी के जिंदाबाद या मुर्दाबाद का नारा लगाया है। अब फिर मनसुख बोले, नहीं, लेकिन इन सब से प्रशिक्षण का क्या ताल्लुक? संचालक ने खुद को संयत किया और फिर बोला- यह जानकारी इसलिए जरूरी है कि आपके प्रशिक्षण का स्तर मापना है। हमारे यहां प्रशिक्षण के लिए दो अलग-अलग ग्रेड हैं। पहला ग्रेड वह है जिसमें थोड़ी-बहुत राजनीति से वास्ता रखने वालों को प्रशिक्षण दिया जाता है। दूसरे ग्रेड वाले राजनीति के मामले में लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर वाले होते हैं। हमें लगता है कि आप दूसरी कैटेगरी के हैं। खैर, बात आगे बढ़ी और मामला फीस पर पहुंचा। फीस मांगी गई एक लाख रुपये मात्र। रहना, खाना-पीना आदि का खर्च अलग। फीस सुनते ही मनसुख का माथा घूम गया, लेकिन अब जब उन्हें राजनीति के कीड़े ने दांत चुभो ही दिए थे, तो इससे बच पाना उनके लिए आसान नहीं था। रुआंसे मन से घर पहुंचे। बीवी के बचे गहने और बैंक में जमा रकम निकाली तो कुल जमा पूंजी इकठ्ठा हुई साठ हजार रुपये। अब 40 हजार रुपये कहां से आए?
इसी उधेड़-बुन में वह लगे ही थे कि गुरू घंटाल ने उन्हें सुझाया कि क्यों न किसी मित्र-रिश्तेदार की सहायता ली जाए। आखिर वे होते किस दिन के लिए हैं? मनसुख को गुरू घंटाल की बात जंच गई। लिहाजा वह एक परिचित मित्र के यहां पहुचें और उससे 40 हजार रुपये की डिमांड कर दी। पहले तो मित्र ने पूछा कि इतनी बड़ी रकम करोगे क्या, तो मनसुख ने उसे झूठ बतला दिया। उसे डर था कि जिस पाठशाला का वह छात्र होने जा रहा है, अगर यह भी पहुंच गया तो उसकी नैया कैसे पार लगेगी? खैर, कुल जमा एक लाख रुपये लेकर वह प्रशिक्षण के लिए चल पड़ा। पहले दिन के प्रशिक्षण में कुल जमा आधा दर्जन लोग पहुंचे थे। एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था, जबकि बाकी रईस घरानों से थे। प्रशिक्षण के पहले दिन संचालक महोदय ने राजनीति का ककहरा सिखाया। उन्होंने बताया कि राजनीति करने से पहले उसे सीखना जरूरी है। आज की राजनीति तो बिना प्रशिक्षण पूरा हो ही नहीं सकती। जल्द मुकाम पाने के लिए वह सारे गुर सीखने होंगे, जो जरूरी हैं। उनके कहने का कुल आशय यह था कि जिसे देश बेचना आ गया, वह पक्का राजनीतिज्ञ हो गया। अब मनसुख का माथा घूमने लगा। किसी तरह क्लास खत्म होने पर वह घर के लिए निकले।
इस बीच गुरू घंटाल ने उन्हें कहा कि अब आप स्कूल में पढ़िए, अपना काम तो खत्म हुआ। लाइए, मेरी फीस दीजिए। इस पर वह अचकचाए। बोले, यह तो मानवता की हद हो गई। आपने मेरा साथ दिया, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इसकी फीस हो गई। अब गुरू घंटाल पूरे ताव में बोले। चले हो राजनीति सीखने और पहले ही लंगड़ी मार रहे हो। खैर, उस समय उनकी कलाई में घड़ी बंधी थी। विवाह के वक्त ससुराल वालों ने दिलोजान से उसे दिया था। अब कुल ले-देकर मनसुख के पास वह घड़ी ही तो थी, जिसे उसने गुरू घंटाल को दे दिया। खैर, इसके बाद वह घर पहुंचे और खा-पीकर बिस्तर पर जा पहुंचे। आज भी पूरी रात उनकी आंखों से नींद गायब थी। देश बेचने का ख्याल जो उन्हें कभी सपने में भी नहीं आता, अब तरह-तरह का रूप धरकर सपने में दिखाई पड़ने लगा। कभी ख्वाबों में मुन्ना भाई आते तो कभी देश के भ्रष्टाचार के गर्त में डूबे तमाम राजनीतिक दिग्गज। उनके ख्वाब में तिथिवार वह सारी बातें आने लगी कि कैसे वह रोड पति से नेता बनते ही करोड़पति हो गए। रातभर के स्वप्न ने उन्हें अंदर से काफी मजबूत कर दिया।
लिहाजा वह पूरी उम्मीदों के साथ क्लास रूम की ओर चले। वहां पहुंचते ही मानों उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वहां न तो कोई कार्यालय था और न ही कोई कर्मचारी। अब उन्हें कुछ-कुछ माजरा समझ में आने लगा। उसके पीछे कई और राजनीति के छात्र आए। सभी की दशा एक जैसी थी। अब सभी समझ गए थे कि उक्त संचालक उन्हें चूना लगाकर राजनीति का पहला ककहरा सीखा गया था। ऐसे में मनसुख उल्टे पांव घर लौटने को हुए तो घरैतिन का ख्याल आते ही उनके पसीने छूटने लगे। जिस बीवी को उन्होंने राजनीति में चमकते ही हीरों का जड़ाऊ हार लाने का भरोसा दिया था, वह अब क्या करें। अब उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। इसी बीच गुरू घंटाल भी उनसे मिल गए। गुरू घंटाल को देखते ही मनसुख की रूलाई छूट पड़ी। गुरू घंटाल बोले, क्या हुआ चेला। क्या हो गया? क्लास में आज डांट पड़ी क्या? तिलमिलाए मनसुख बोल पड़े-आग लगे इस डांट की। ससुरा बोरिया-बिस्तर समेटकर रफूचक्कर हो गया। अब का करें? गुरू घंटाल तो मंजे हुए खिलाड़ी थे ही। उन्होंने फट से सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत में भले ही गरीबी, अशिक्षा हो, लेकिन एक मामले में समूचे विश्व में भारत सबसे आगे है। वह है सलाह। यहां का बच्चा-बच्चा भले ही उस सलाह पर काम न करे, लेकिन किसी को मुसीबत में देख सलाह पहले देता है।
अब तो समझ रहे हो, कि मैं क्या कहना चाहता हूं। रकम डूबी नहीं, राजनीति सिखा गई। मनसुख चौंके। वह कैसे? गुरू घंटाल बोले, अरे बेवकूफ, जब वह दो दिन को छोकरा, एक दिन में ही कई लाख कमा सकता है तो तुम क्यों नहीं। यहां नहीं, चुपचाप किसी दूसरे शहर पहुंचकर तुम भी खोल दो, राजनीति की पाठशाला। अब मनसुख बहुत कुछ समझ गया था। अब सब कुछ लुटाने के बाद यह आइडिया उसके दिमाग में घर कर गया। अब उसे समझ में आ रहा था कि पढ़े नेताई, बेचे देश का मतलब क्या होता है। इस मंत्र के जाप से हकीकत में उसे अपना भला होता दिखने लगा। दूसरे दिन एक बड़े शहर की सबसे ऊंची इमारत के नीचे बोर्ड लगाया, सीखीए राजनीति।




