श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Monday, January 30, 2012

पढ़ें नेताई, बेचें देश

अनीश कुमार उपाध्याय 
चुनावी मौसम देखकर मनसुख लाल की मंशा भी राजनीति में घुसपैठ की हुई। ऐसे में वह गुरु की तलाश में निकले तो एक गुरू घंटाल से उनकी मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में गुरू घंटाल ने उन्हें जो बताया, उसे सुनकर मानों मनसुख लाल की बांछें ही खिल उठी। पहले तो उन्हें गुरू घंटाल की बातों पर भरोसा ही नहीं हुआ। ऐसे में उन्होंने उन्हें जरा कुरेदकर पूछा कि क्या ऐसा भी हो सकता है। अब आप पूछिए कि आखिर मनसुख लाल क्यों चौंक पड़े! उन्हें गुरू घंटाल ने कुछ और नहीं देश बेचने का मंत्र दिया था। मंत्र के बोल थे, पढ़े नेताई बेचें देश...!
 पहले तो मनसुख लाल हसीन सपनों में खो गए। उन्होंने ख्यालों ही ख्यालों में देखा कि वह देश बेचकर नोटों, हीरे-जवाहरात की ढेरी पर बैठ गए हैं। जहां देखते हैं केवल उन्हें हरे-हरे नोट और हीरे-जवाहरात ही दिखता है। ऐसे में वह सोंच में पड़ गए कि अब उसे वह लेकर कहां जाएं। कहां कितना खर्च करना है। कौन-कौन सामान वह पहले खरीदें, कहां-कहां पहले जाएं, बीबी के लिए कौन से गहने बनाए, बेटे के लिए कौन सा खिलौना खरीदें वगैरह-वगैरह। इसी बीच उनके दिमाग में एक फंडा आया कि रोज अखबारों में घोटालों की खबर छपती है। देश के नेता करोड़ों का गोलमाल कर लेते हैं और डकार भी नहीं लेते। लिहाजा उनके दिमाग में भी एक ख्याल आया। मनसुख लाल अब गुरू घंटाल के मंत्र का मतलब थोड़ा-थोड़ा समझने लगे थे। लिहाजा, अचानक वहां पसरा सन्नाटा उनकी चीख के साथ टूट गया। वह बोल पड़े, अरे...अब तो मैं लूट ही लूंगा। ऐसे में वह तत्काल गुरू घंटाल के चरणों पर गिर पड़े। बोले, गुरू जी अब जब आपने मंत्र मेरे कान में फूंक ही दिया है तो आगे की शिक्षा भी हमें दे ही दीजिए।
मनसुख के बातों ही बातों में अपने पाले में आते देख गुरू घंटाल की मुर्दिनी छाई आंखों में भी अचानक चमक आने लगी। उन्हें लगने लगा कि अरसे बाद कोई सच्चा भक्त उनकी शरण में आकर अपने दुख का निदान मांग रहा है। लिहाजा उन्होंने देश में चल रहे कुछ ‘नेता प्रशिक्षण केंद्रों’ की जानकारी मनसुख को दे दी। अब मनसुख परेशान। गुरू घंटाल ने केंद्रों के बारे में तो बता दिया कि देश में नेता प्रशिक्षण केंद्र भी चलते हैं, लेकिन वह कहां चलते हैं, इसके बारे में तो उन्होंने उनसे पूछा ही नहीं। ऐसे में वह गुरू घंटाल के पास दुबारा पहुंचे और बोले। गुरू जी यह प्रशिक्षण केंद्र कहां चलते हैं, जरा यह भी बता देंगे तो आपके भक्त का कल्याण हो जाएगा। गुरू घंटाल के यहां दो बार मनसुख के पहुंचने पर उनमें भी लालच का बोध जाग गया। ऐसे में उन्होंने फट से इसके लिए गुरू दक्षिणा की डिमांड रख दी। पहले तो मनसुख अचकचाया, लेकिन नेताई पढ़कर देश बेचने का मंत्र ख्याल आते ही उसने इस पर राजीनामा भरना ही उचित समझा। गुरू घंटाल भी मंजे हुए खिलाड़ी थे। राजनीति की पाठशाला में भले ही वह अपनी धाक न जमा पाएं हों, लेकिन टूटा-फूटा ज्ञान लेकर ही वह इस क्षेत्र के मंजे हुए सन्यासी खुद को घोषित कर चुके थे।
ऐसे में वह मनसुख को लेकर सीधे एक साइबर कैफे पर पहुंच गए। कहने का आशय था कि गुरू घंटाल भी अब गुगल महाराज की शरण में थे। गुगल मे सर्च पर उन्होंने जब इसकी डिटेल डाली तो वहां एक-दो नहीं, बल्कि देश-विदेश की तमाम ऐसी संस्थाओं की डिटेल उनके सामने थी। लिहाजा उन्होंने अब अपने पास वाले केंद्र की तलाश शुरू की। जल्द ही उन्हें एक डिटेल मिल गई। वहां से पता लेकर वह नेताई का प्रशिक्षण लेने चल पड़े। बसों का धक्के खाते हुए मनसुख, गुरू घंटाल के साथ जगह पर पहुंचे। वहां एक पान की दुकान पर उन्होंने उक्त प्रशिक्षण केंद्र के बारे में पूछा तो, वह बोल पड़े। हां, हां, अबइहें त कुछ दिन भएल, खुला है। कई लोग आवत हैं बाबू। चलिए, आप भी कमीशन जमा कई दीजिए, कल आ जाइएगा, डिटेल साहेब से बात कर आपका एडमिशन पक्का करा देंगे। खैर, पहली बार राजनीति सीखने की बात थी, लिहाजा मनसुख उस संस्था के बारे में बहुत लालयित थे। पूछ बैठे। अच्छा यह बताइये, यहां कैसे राजनीति सिखते हैं। पान दुकानदार मुंह में पान का बीड़ा दबाते हुए बोला- भईया, इहवां आए तो पता चला कि राजनीतियो के पढ़ाई होता है। हमरे बिहार में त लइकवन सब, जनमें से राजनीति में माहिर होत हैं। खड़े आदमी और देश बेच दें, पता ही नाही लागत है कि कब हम बिक गए और कब हमार...।
खैर, पान दुकानदार ने मनसुख की लालसा जगा ही दी तो गुरू घंटाल की आंखों की चमक भी कई गुना बढ़ गई। ऐसे में दोनों ने वहां कमीशन का दो सौ रुपये जमा कर वापस घर को लौट आए। पूरी रात मनसुख को नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी सी झपकी आती भी तो भैया मनुसख जिंदाबाद के नारे उसके कानों में गूंजने लगते। झकझक सफेद कुर्ता, पायजामा पहने मनसुख लग्जरी गाड़ी से पान का बीड़ा चबाते हुए नीचे उतरते देखते। आंखों ही आंखों में पूरी रात जैसे-तैसे कटी और मनसुख एक बार फिर गुरू घंटाल संग पहुंच गए नेतागिरी प्रशिक्षण केंद्र पर। आज इन पर यूं कहिए तो खुदा मेहरबान थे। केंद्र में घुसते ही सफारी शूट, टाई पहने एक अधिकारी से उनका परिचय हुआ। बातचीत में पता चला कि वही इस केंद्र के संचालक हैं। हाथ में अगरबत्ती थामें महाशय पूजा में तल्लीन थे। ‘ग्राहक’ को कार्यालय में आते देख उनके चेहरे की चमक दोगुनी हो गई। देवी-देवताओं की तस्वीरों और मूर्तियों को शीश झुकाकर प्रणाम करते हुए अगरबत्ती को एक कोने में खोंस दिए। इसके बाद अपनी व्हील चेयर पर पसरते हुए बोले, हां तो आप लोग कैसे आए हैं। यह सवाल पूछना ही था कि पहले से ही व्याकुल मनसुख की दुखती नस पर जैसे किसी ने हाथ रख दिया हो। बोल पड़े- सुने हैं आप राजनीति सिखा रहे हैं। लेकिन आपने तो खद्दर पहना ही नहीं है।
ही-ही-ही कर हंसते हुए संचालक बोले, लगता है कि आप राजनीति की पाठशाला में पहली बार आ रहे हैं। आपने कभी किसी पार्टी का झंडा-बैनर ढोया है। मनसुख बोले, नहीं। कभी गाड़ी पर लगी माइक पर नेताजी के जिंदाबाद या मुर्दाबाद का नारा लगाया है। अब फिर मनसुख बोले, नहीं, लेकिन इन सब से प्रशिक्षण का क्या ताल्लुक? संचालक ने खुद को संयत किया और फिर बोला- यह जानकारी इसलिए जरूरी है कि आपके प्रशिक्षण का स्तर मापना है। हमारे यहां प्रशिक्षण के लिए दो अलग-अलग ग्रेड हैं। पहला ग्रेड वह है जिसमें थोड़ी-बहुत राजनीति से वास्ता रखने वालों को प्रशिक्षण दिया जाता है। दूसरे ग्रेड वाले राजनीति के मामले में लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर वाले होते हैं। हमें लगता है कि आप दूसरी कैटेगरी के हैं। खैर, बात आगे बढ़ी और मामला फीस पर पहुंचा। फीस मांगी गई एक लाख रुपये मात्र। रहना, खाना-पीना आदि का खर्च अलग। फीस सुनते ही मनसुख का माथा घूम गया, लेकिन अब जब उन्हें राजनीति के कीड़े ने दांत चुभो ही दिए थे, तो इससे बच पाना उनके लिए आसान नहीं था। रुआंसे मन से घर पहुंचे। बीवी के बचे गहने और बैंक में जमा रकम निकाली तो कुल जमा पूंजी इकठ्ठा हुई साठ हजार रुपये। अब 40 हजार रुपये कहां से आए?
इसी उधेड़-बुन में वह लगे ही थे कि गुरू घंटाल ने उन्हें सुझाया कि क्यों न किसी मित्र-रिश्तेदार की सहायता ली जाए। आखिर वे होते किस दिन के लिए हैं? मनसुख को गुरू घंटाल की बात जंच गई। लिहाजा वह एक परिचित मित्र के यहां पहुचें और उससे 40 हजार रुपये की डिमांड कर दी। पहले तो मित्र ने पूछा कि इतनी बड़ी रकम करोगे क्या, तो मनसुख ने उसे झूठ बतला दिया। उसे डर था कि जिस पाठशाला का वह छात्र होने जा रहा है, अगर यह भी पहुंच गया तो उसकी नैया कैसे पार लगेगी? खैर, कुल जमा एक लाख रुपये लेकर वह प्रशिक्षण के लिए चल पड़ा। पहले दिन के प्रशिक्षण में कुल जमा आधा दर्जन लोग पहुंचे थे। एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था, जबकि बाकी रईस घरानों से थे। प्रशिक्षण के पहले दिन संचालक महोदय ने राजनीति का ककहरा सिखाया। उन्होंने बताया कि राजनीति करने से पहले उसे सीखना जरूरी है। आज की राजनीति तो बिना प्रशिक्षण पूरा हो ही नहीं सकती। जल्द मुकाम पाने के लिए वह सारे गुर सीखने होंगे, जो जरूरी हैं। उनके कहने का कुल आशय यह था कि जिसे देश बेचना आ गया, वह पक्का राजनीतिज्ञ हो गया। अब मनसुख का माथा घूमने लगा। किसी तरह क्लास खत्म होने पर वह घर के लिए निकले।
इस बीच गुरू घंटाल ने उन्हें कहा कि अब आप स्कूल में पढ़िए, अपना काम तो खत्म हुआ। लाइए, मेरी फीस दीजिए। इस पर वह अचकचाए। बोले, यह तो मानवता की हद हो गई। आपने मेरा साथ दिया, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इसकी फीस हो गई। अब गुरू घंटाल पूरे ताव में बोले। चले हो राजनीति सीखने और पहले ही लंगड़ी मार रहे हो। खैर, उस समय उनकी कलाई में घड़ी बंधी थी। विवाह के वक्त ससुराल वालों ने दिलोजान से उसे दिया था। अब कुल ले-देकर मनसुख के पास वह घड़ी ही तो थी, जिसे उसने गुरू घंटाल को दे दिया। खैर, इसके बाद वह घर पहुंचे और खा-पीकर बिस्तर पर जा पहुंचे। आज भी पूरी रात उनकी आंखों से नींद गायब थी। देश बेचने का ख्याल जो उन्हें कभी सपने में भी नहीं आता, अब तरह-तरह का रूप धरकर सपने में दिखाई पड़ने लगा। कभी ख्वाबों में मुन्ना भाई आते तो कभी देश के भ्रष्टाचार के गर्त में डूबे तमाम राजनीतिक दिग्गज। उनके ख्वाब में तिथिवार वह सारी बातें आने लगी कि कैसे वह रोड पति से नेता बनते ही करोड़पति हो गए। रातभर के स्वप्न ने उन्हें अंदर से काफी मजबूत कर दिया।
लिहाजा वह पूरी उम्मीदों के साथ क्लास रूम की ओर चले। वहां पहुंचते ही मानों उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वहां न तो कोई कार्यालय था और न ही कोई कर्मचारी। अब उन्हें कुछ-कुछ माजरा समझ में आने लगा। उसके पीछे कई और राजनीति के छात्र आए। सभी की दशा एक जैसी थी। अब सभी समझ गए थे कि उक्त संचालक उन्हें चूना लगाकर राजनीति का पहला ककहरा सीखा गया था। ऐसे में मनसुख उल्टे पांव घर लौटने को हुए तो घरैतिन का ख्याल आते ही उनके पसीने छूटने लगे। जिस बीवी को उन्होंने राजनीति में चमकते ही हीरों का जड़ाऊ हार लाने का भरोसा दिया था, वह अब क्या करें। अब उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। इसी बीच गुरू घंटाल भी उनसे मिल गए। गुरू घंटाल को देखते ही मनसुख की रूलाई छूट पड़ी। गुरू घंटाल बोले, क्या हुआ चेला। क्या हो गया? क्लास में आज डांट पड़ी क्या? तिलमिलाए मनसुख बोल पड़े-आग लगे इस डांट की। ससुरा बोरिया-बिस्तर समेटकर रफूचक्कर हो गया। अब का करें? गुरू घंटाल तो मंजे हुए खिलाड़ी थे ही। उन्होंने फट से सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत में भले ही गरीबी, अशिक्षा हो, लेकिन एक   मामले में समूचे विश्व में भारत सबसे आगे है। वह है सलाह। यहां का बच्चा-बच्चा भले ही उस सलाह पर काम न करे, लेकिन किसी को मुसीबत में देख सलाह पहले देता है।
अब तो समझ रहे हो, कि मैं क्या कहना चाहता हूं। रकम डूबी नहीं, राजनीति सिखा गई। मनसुख चौंके। वह कैसे? गुरू घंटाल बोले, अरे बेवकूफ, जब वह दो दिन को छोकरा, एक दिन में ही कई लाख कमा सकता है तो तुम क्यों नहीं। यहां नहीं, चुपचाप किसी दूसरे शहर पहुंचकर तुम भी खोल दो, राजनीति की पाठशाला। अब मनसुख बहुत कुछ समझ गया था। अब सब कुछ लुटाने के बाद यह आइडिया उसके दिमाग में घर कर गया। अब उसे समझ में आ रहा था कि पढ़े नेताई, बेचे देश का मतलब क्या होता है। इस मंत्र के जाप से हकीकत में उसे अपना भला होता दिखने लगा। दूसरे दिन एक बड़े शहर की सबसे ऊंची इमारत के नीचे बोर्ड लगाया, सीखीए राजनीति।

Sunday, January 29, 2012

रुश्दी बनाम ‘धर्म के ठेकेदार’

अभिव्यक्ति की अवधारणा पर कुठाराघात
विरोध के चलते रद्द हुआ जयपुर साहित्य सम्मेलन
चंद मुस्लिम संगठनों और वोट के दबाव ने रोका
सैटेनिक वर्सेस पुस्तक से उठ खड़ा हुआ बखेड़ा
धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार की भी उपेक्षा
सलमान रुश्दी

भारतीय गणतंत्र में दो मूल अधिकार। अभिव्यक्ति की आजादी और धर्म निरपेक्षता। इसमें अधिकार हैं कि आप कहीं भी विचारों की अभिव्यक्त कर सकते हैं। बशर्ते किसी को ठेस न पहुंचे। भारत की धर्म निपरेक्षता पर तो कोई सवाल नहीं है। कारण कि आज हिंदू बाहुल्य देश का प्रधानमंत्री सिख है और उपराष्ट्रपति मुसलमान। देश की सरकार चलाने वाली पार्टी मुखिया मूलत: ईसाई हैं। लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी को केवल धर्म के ठेकेदार ही मुद्दा बना रहे हैं।
अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
आखिरकार धर्म के ठेकेदारों के मुद्दे ने अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात कर ही दिया। रुश्दी के मामले में तय था कि वह जयपुर साहित्य महोत्सव की वीडियो कांफ्रेंसिंग में सिर्फ मिडनाइट चिल्ड्रन पर बोलेंगे। विवादास्पद पुस्तक सेटेनिक वर्सेज पर नहीं। फिर भी उनका विरोध हुआ और हालात खराब होने की आशंका तथा मुस्लिम संगठनों के भारी विरोध से सम्मेलन रद्द हो गया। इससे स्पष्ट हो गया कि एक ओर हम खुद को धर्मनिपरेक्ष और अभिव्यक्ति की आजादी देने वाला देश मानते हैं, वहीं जब अमल करने की बात होती है तो हम धर्म के अनुयायियों के आगे झुक जाते हैं। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ लिखने वाले को देश में कदम भी नहीं रखने देते। क्या यही है अभिव्यक्ति की आजादी? सरकार क्या इतनी दब्बू है कि चंद मुस्लिम संगठनों के दवाब में वह एक इंटरनेशनल शख्सियत जिसने साहित्य के क्षेत्र में इतनी शोहरत कमाई है, उसे देश में सिर्फ इसलिए नहीं आने दे रही कि कहीं उसका वोट बैंक न खो जाए।
सलमान रुश्दी का सटैनिक वर्सेस
सलमान रुश्दी के भारत की भूमि पर कदम न रखने का जहां तक सवाल है, उसके मूल में है उनकी लिखित पुस्तक सटैनिक वर्सेस। यह पुस्तक 1988 में प्रकाशित हुई थी। 1989 में उसे लेकर ईरानी राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी को मार डालने का फतवा दिया। इसके बाद नौ वर्ष तक ब्रिटिश सरकार ने रुश्दी को सुरक्षा में रखा। 1998 में ईरान की नई सरकार ने घोषणा की कि वह उस फतवे का अब समर्थन नहीं करती। लिहाजा धीरे-धीरे रुश्दी सार्वजनिक जीवन में भाग लेने लगे। वक्त गुजरा और दुनिया के मुस्लिम जनमत ने भी उसे बीती बात मान लिया है। दरअसल इस किताब में पैगंबर मोहम्मद साहब का अपमानजनक चित्रण किया गया है। किताब में मोहम्मद पैगंबर साहब के साथ साथ इस्लाम, कुरान और मक्का के संबंध में भी काफी विरोधाभासी बातें की गई हैं। इन पर ही मुसलिमों को सख्त ऐतराज है।
सहम उठे आयोजक
विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी के वीडियो कांफ्रेंस के जरिए जयपुर साहित्य महोत्सव से रूबरू न होने के पीछे कारण था कि डरे-सहमे आयोजकों को हिंसा पर उतारू विरोध करने वालों ने साफ चेतावनी दी थी। कहा गया था कि उन्हें रुश्दी की शक्ल तक देखना गंवारा नहीं है। आयोजन हुआ तो पूरे राजस्थान में हिंसा भड़क जाएगी। जयपुर के दिग्गी पैलेस में पांच दिवसीय साहित्य महोत्सव 20 जनवरी को शुरू हुआ था। रुश्दी को शुरुआती सत्र में ही आना था। उनके आगमन को लेकर मुस्लिम संगठनों के विरोध से राजस्थान पुलिस ने भी रुश्दी की जान को खतरा बतायाा। नतीजा रुश्दी नहीं आए। फिर तय हुआ कि वह 24 जनवरी को वीडियो कांफ्रेंसिंग से महोत्सव में मौजूद रहेंगे। वहीं निर्धारित समय से कुछ मिनट पहले ही संयोजक संजय रॉय ने वीडियो कांफ्रेंसिंग रद्द करने की घोषणा कर दी। वहीं बताया गया कि आयोजन स्थल होटल दिग्गी पैलेस के मालिक राम प्रताप सिंह ने राजस्थान पुलिस की सलाह पर आयोजकों से रुश्दी के वीडियो लिंक कार्यक्रम के लिए स्पष्ट मना कर दिया। श्री सिंह ने कहा कि सुरक्षा खतरों से सम्मेलन जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह इस संपत्ति का मालिक हैं और उनके होटल को नुकसान की आशंका है। 
तमतमा उठे सलमान रुश्दी
आयोजकों ने जब मुस्लिम संगठनों के नेताओं संग बैठक भी की, तो मुसलमानों का कड़ा रुख देख वह आयोजन का साहस नहीं जुटा पाए। जमायते- इस्लामी, मिल्ली काउंसिल और राजस्थान मुस्लिम फोरम ने आयोजन में बाधा डालने की कोशिश की। दजर्नों लोगों ने दिग्गी पैलेस के अहाते में नमाज शुरू कर दी। कुछ ने चेतावनी दी कि यदि एक अपराधी लेखक का भाषण शुरू हुआ तो हंगामा हो जाएगा।  वहीं ऐन वक्त पर वीडियो कांफ्रेंसिंग रद्द होने से तमतमाए सलमान रुश्दी ने कहा है कि जैसे ही फुर्सत मिलेगी हिंदुस्तान आएंगे। वह भी धार्मिक उन्मादियों और सरकार में बैठे उनके दोस्तों की बिना इजाजत के। सरकार से कहूंगा कि उनसे निपटे। कांफ्रेंसिंग रद्द किया जाना भयावह है। उन्होंने ट्विट और एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में भी आक्रोश जाहिर किया। उन्होंने कहा है कि कुछ मुस्लिम संगठनों की धमकी से कार्यक्रम रद्द करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटना है। क्या भारत भी चीन की राह पर है, जहां चरमपंथियों को शर्ते आयद करने का भी हक दिया जा रहा है। रुश्दी ने माना कि उन्हें भारत इसलिए नहीं आने दिया गया, क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव है। 
क्यों है सेटेनिक वर्सेस पर विवाद
मुंबई में पैदा हुए सर अहमद सलमान रुश्दी काश्मीरी मूल के मुसलमान हैं। उनके उपन्यास   सेटेनिक वर्सेस (शैतान की आयतें) को 1988 में बुकर पुरस्कार मिल चुका है। वह लंबे से ब्रिटेन में रहते हैं। वह भारतीय नहीं, बल्कि ब्रिटिश भारतीय के तौर पर जाने जाते हैं। सैटेनिक वर्सेस में उन्होंने कथित तौर पर इमाम का जो चरित्र गढ़ा है, वह ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमैनी पर टिप्पणी करता है। जिन दिनों यह उपन्यास लिखा गया, अयातुल्ला खोमैनी पाकिस्तान में थे। अयातुल्ला खोमैनी ने 1989 में सलमान रुश्दी के खिलाफ जान से मारने का फतवा जारी किया था। वहीं राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित जयपुर फेस्टिवल में रश्दी के विरोध करने वालों के पीछे कहा जा रहा है कि विरोध करने वाले मूलत: कट्टरपंथी हिंदूवादी लोग हैं। रश्दी का साथ दे रहे लोगों के बारे में कहा जा रहा है कि यह लोग केवल मुस्लिम कौम की खिलाफत करने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी की बात कर रहे हैं, अन्यथा उनके मन में संविधान या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति किसी प्रकार का कोई सम्मान नहीं है। 
क्या कहता है संविधान
यहां यह जान लें कि संविधान क्या कहता है? संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) के अनुसार भारत के सभी नागरिकों को वाक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार है। इस आधार पर सलमान रश्दी के पक्ष में दलील दी जा रही है कि उन्हें अपने विचार व्यक्त करने से रोका जा रहा है। दलील देने वालों को यह जानकारी होनी चाहिए कि रश्दी भारत का नागरिक ही नहीं है। लिहाजा तकनीकी तौर पर उन्हें यह मूल अधिकार हासिल ही नहीं है। वहीं इसी अनुच्छेद 19 के भाग (2) में स्पष्ट किया गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अबाध नहीं है। सरकार भारत की प्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, विदेशों से मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, सदाचार के हितों में और न्यायिक अवमानना, अपराध करने को उकसाना आदि स्थिति निर्मित होने की संभावना हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जरूरत के अनुसार प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है।
लोक व्यवस्था के नाम पर लगाई रोक
संविधान निर्माताओं ने बोलने की आजादी में यह स्पष्ट किया है कि जहां आप दूसरे की इस आजादी में हस्तक्षेप करते हैं, वहीं से आपकी खुद की सीमा शुरू हो जाती है। लोक व्यवस्था के नाम पर रश्दी रोके गए हैं। इसके बारे में बिहार राज्य बनाम शैलबाला, एआईआर, 1952 सुप्रीम कोर्ट, पृष्ठ 329 पर सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया है कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) में लोक व्यवस्था पदावली शब्द के परिणामस्वरूप देश में लोेक व्यवस्था के साधारण भंग होने या अपराध करने के लिए उकसाने की संभावना पर भी इस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लग सकता है। संविधान का यह उपबंध सरकार को अधिकार देती है कि वह अभिव्यक्ति की आजादी छीन सकती है। रुशीद भारतीय नहीं है, लेकिन अनेक अंतराष्ट्रीय ऐसे समझौते तथा कानून हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी को हर देश में संरक्षण देने के लिए सरकारों को निर्देश देते हैं। इन पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इसमें मानव अधिकारों में बोलने की आजादी भी शामिल है। लिहाजा रुश्दी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण देने भी भारत का अंतर्राष्ट्रीय प्रतिमानों के अनुसार अनिवार्य दायित्व है। हालांकि इसके लिए भारत बाध्य नहीं है।
जुड़ा है धार्मिक मुद्दा भी
रश्दी के साथ धार्मिक मुद्दा भी जुड़ा है, लिहाजा इस पक्ष पर भी प्रकाश डालना जरूरी है। संविधान देश के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता का भी मूल अधिकार देता है। इसके अनुसार इस्लाम के अनुयायियों का यह कहना है कि उनको रुश्दी का और हिंदू धर्मावलंबियों का यह कहना है कि उनको अपने धर्म पर आघात करने वालों के विरोध का संवैधानिक हक है। यह गलत है। सरकार को दोनों ही धर्म के लोगों के भावनाओं का ख्याल करना चाहिए था। वहीं सलमान रश्दी के मामले में धार्मिक आजादी का मूल अधिकार मुस्लिमों के किसी भी प्रकार का संवैधानिक या कानूनी हक नहीं देता।  यह भी सही है कि रुश्दी एक शिया मुस्लिम परिवार से हैं। हालांकि वह कहते हैं कि वास्तव में वह कभी धार्मिक नहीं रहे। उनकी किताबें अक्सर समाज में धर्म की भूमिका, विभिन्न आस्थाओं के बीच और धार्मिक और बिना आस्था वालों के बीच टकराव पर प्रकाश डालती है।
तब नहीं मची हाय-तौबा
सलमान रुश्दी की सटैनिक वर्सेस 1988 में प्रकाशित हुई। वर्ष 1889 में ईरानी राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी को मार डालने का फतवा दिया। इसके बाद नौ वर्ष तक ब्रिटिश सरकार ने रुश्दी को सुरक्षा में रखा। इसके बाद 1998 में ईरान की नई सरकार ने घोषणा की कि वह उस फतवे का समर्थन नहीं करती। धीरे-धीरे रुश्दी सार्वजनिक जीवन में भाग लेने लगे। मुस्लिम जनमत ने भी उसे बीती बात मान लिया। लिहाजा नए सिरे से रुश्दी को जयपुर के अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में भाग लेने से रोकने की दारुल उलूम की मांग अचरजवाली है। रुश्दी ने कोई ‘नया अपराध’ नहीं किया है। करीब 23 वर्ष पूर्व लिखी उस पुस्तक पर वह पहले ही लगभग 10 वर्ष तक कैदी सा जीवन बिता चुके हैं। पिछले 12 साल में रुश्दी कई बार भारत आए और गए। विविध मुद्दों पर लेख भी लिखे तथा उनके बयान भी आते रहे। इसमें इस्लाम संबंधी बयान भी हैं। मसलन उन्होंने लिखा कि इस्लाम और आतंकवाद को पूरी तरह से अलग-अलग करके देखने की जिद निरर्थक है। आखिर कोई चीज तो है जो इस्लामी अनुयायियों को आतंकवाद से जोड़ती है। वह क्या   है? इन बातों पर भी मुस्लिम नेताओं ने हायतौबा नहीं मचाई।

इनसेट...
सीएम ने किया आलाकमान को खुश
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी के मामले में पार्टी की रणनीति के अनुरूप कदम उठाकर कांग्रेस आलाकमान को खुश कर दिया है। कांग्रेस नेतृत्व अब उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में चुनावी प्रचार के लिए भेजने की तैयारी कर रही है। इसके लिए नए सिरे से रणनीति बनाई जा रही है। बीते वर्ष सितंबर में हुई भंवरी देवी अपहरण व गोपालगढ़ हिंसा जैसी घटनाओं के बाद गहलोत अपने राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर थे। यूपी से सटे गोपालगढ़ में 11 अल्पसंख्यकों की मौत से तो चुनाव की तैयारी में जुटा पार्टी आलाकमान काफी नाराज था। नाराजगी इस हद तक थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व महासचिव राहुल गांधी काफी समय तक गहलोत से मिले तक नहीं, जबकि उन्होंने कई बार मुलाकात का समय मांगा था। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व को रुश्दी मामले में यूपी विस चुनाव में नुकसान की आशंका सताने लगी थी, अब वह काफी हद तक दूर हो गई है।
इनसेट...
किसने क्या कहा...
केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद- कानून में अगर किसी पर रोक लगाने की व्यवस्था है तो उस पर जरूर रोक लगनी चाहिए। हम कानून व्यवस्था से हटकर कुछ नहीं कर सकते। लिहाजा जिन्हें चिंता है और जो समझते हैं कि कारर्वाई होनी चाहिए तो वह कानून-व्यवस्था का सहारा लें।
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी- इसके पीछे कांग्रेस का चुनावी खेल है। कांग्रेस ने पहले उन्हें आमंत्रित किया और अब उन्हें रोककर सियासी फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। 
सपा नेता आजम खान- मैं रुश्दी की यात्रा का विरोध करता हूं। सरकार को ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जो देश के करोड़ों मुसलमानों की भावना को आहत करने वाला हो। 
सोशल नेटवर्किग वेबसाइट ट्विटर पर रुश्दी का लिखा संदेश-भारत आने के लिए मुझे किसी वीजा की जरूरत ही नहीं है। मेरे पास ओवरसीज इंडियन सिटिजन कार्ड है, जो बगैर वीजा भारत आने की सहूलियत देता है। सरकार अगर मुझे रोकना चाहे भी तो उसे सबसे पहले मेरा ओवरसीज इंडियन सिटिजन कार्ड वापस लेना होगा।
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश माकर्डेय काटजू-विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी 'घटिया' और 'दोयम दर्जे का लेखक' हंै। ऐसे लोग औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं, जो मानते हैं कि विदेश में रहने वाला लेखक महान होता है। आजकल के लोग कबीरदास और तुलसीदास को नहीं पूछते, क्योंकि वह बनारस के घाट पर रहे हैं। रुश्दी महान हैं क्योंकि वह टेम्स नदी के घाट पर रहे हैं।
पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक डेविड रेमनिक-रुश्दी प्रकरण शमर्नाक है। कारण कि यह समकालीन भारतीय राजनीति के घटिया चलन को प्रदर्शित करता है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण सत्ता को बरकरार रखना है।
सम्मेलन में हिस्सा लेने आए गीतकार एवं संवाद लेखक जावेद अख्तर- विवादास्पद रचना पर बैन तो सही है, लेकिन लेखक की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध समझ में नहीं आता। 
ख्यातिलब्ध पत्रकार मार्क टुली- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए यह सबसे दुखद दिन है। राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रही है। 
राज्यसभा में नेता विपक्ष भाजपा नेता अरुण जेटली-यह राज्य सरकार का तानाशाही रवैया है। अगर किसी को धमकी मिली है तो सरकार का फर्ज है कि वह उसे सुरक्षा दें। जब इस देश के नेताओं को सुरक्षा मिल सकती है तो इस लिटरेरी फेस्टीवल को भी मिल सकती थी। 
प्रसिद्ध लेखिका शोभा डे- राजनेता अपने फायदे के लिए ऐसा विवाद पैदा करते हैं। रुश्दी के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
भाजपा नेता उमा भारती- विवादित लेखक सलमान रुश्दी ने अपनी विवादास्पद किताब में हनुमान जी का भी मजाक उड़ाया है। लेकिन मैंने इसकी चर्चा भी नहीं की। कारण कि मैं मानती हूं कि कलम स्वतंत्र ही रहनी चाहिए।
केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी-भारत न आना सलमान रुश्दी का अपना फैसला था। जो रिपोर्ट मिली थी, उस आधार पर उन्होंने अपनी भारत यात्रा स्थगित की।

इनसेट...
एक नजर में रुश्दी
सर अहमद सलमान रुश्दी का जन्म 19 जून 1947 को बंबई (अब मुंबई) भारत में अनीस अहमद रुश्दी के इकलौते पुत्र के रूप में हुआ। वह एक ब्रिटिश भारतीय उपन्यासकार और निबंधकार हैं। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से वकालत की शिक्षा हासिल की। शिक्षा की बुनियाद मुंबई के कैथेड्रल एंड जॉन कानन स्कूल मुंबई से पड़ी। शेष शिक्षा उन्होंने रग्बी स्कूल, किंग्स कॉलेज से हुई। कैंब्रिज में उन्होंने इतिहास का भी अध्ययन किया। पूर्णकालिक लेखक बनने से पहले उन्होंने दो विज्ञापन एजेंसियों ओगिल्वी एंड माथेर और आयर बार्कर के लिए काम किया। इनकी चार बार शादी हुई। पहली पत्नी क्लेरिस्सा लुआर्ड से 1976 से 1987 तक विवाहित रहे। इनसे उन्हें एक पुत्र जफर हुआ। दूसरी पत्नी अमेरिकी उपन्यासकार मारिआन विगिसंथी से उनका विवाह 1988 में हुआ लेकिन 1993 में तलाक हो गया। तीसरी पत्नी एलिजावेथ वेस्ट थी। इनसे इनका नाता 1997 से 2004 तक रहा। इनसे एक पुत्र मिलन का जन्म हुआ। वर्ष 2004 में उनकी पत्नी बनीं भारतीय अमेरिकी अभिनेत्री एवं सुपर मॉडल पद्मा लक्ष्मी। यह अमेरिकी रिएलिटी टेलीविजन कार्यक्रम टॉप शेफ की मेजबान थीं। यह शादी दो जुलाई 2007 में टूट गई।   वहीं वर्ष 2008 में बालीवुड प्रेस की भारतीय मॉडल रिया सेन से प्रेम संबंध जुड़ा।
इनसेट...
किताबें : ग्राइमस (1975), मिडनाइट्स चिल्ड्रन (1981), शेम (1983), द जुआर स्माइल: अ निकारागुआ जर्नी (1987), सैटेनिक वर्सेज (1988), हारून एंड द सी आॅफ स्टोरीज (1990), इमेजिनरी होमलैंड्स: एसेज एंड क्रिटिसिज्म 1981-1991 (1992), होमलेस बाईचाइस (1992, आर.झबवाला और वीएस नायपॉल के साथ), ईस्ट-वेस्ट (1994), द मूअर्स लास्ट साई (1995), द फायरबर्ड्स नेस्ट (1997), द ग्राउंड बिनीद हर फीट (1999), द स्क्रीनप्ले आॅफ मिडनाइट्स चिल्ड्रन (1999), फ्यूरी (2001), स्टेप अक्रॉस दिस लाइन: कलेक्टेड नान फिक्शन 1992-2002 (2002), शालीमार द क्लाउन (2005), द एंचेंट्रेस आॅफ फ्लॉरेंस (2008), द बेस्ट अमरिकन शार्ट स्टोरीज (2008, अतिथि संपादक के रूप में), इन द साउथ, द न्यू यार्कर (18 मई 2009)
खास: -मिडनाइट्स चिल्ड्रन (1981) ने दी साहित्यि की प्रसिद्धि।
-सैटेनिक वर्सेज पुस्तक पर आज भी विवाद जारी है।
निबंध : अ फाइन पिकल (द गार्डियन, 28 फरवरी 2009), इमेजिन देअर इज नो हेवेन (द गार्डियन, 16 अक्टूबर 1999), मोहनदास गांधी (टाइम, 13 अप्रैल 1998)
पुरस्कार : एरिसटिओन पुरस्कार (यूरोपीय संघ), कला परिषद राइटर्स अवार्ड, राइटर आॅफ ईयर (ब्रिटिश बुक पुरस्कार), राइटर आॅफ ईयर (जर्मनी),बेस्ट बुकर पुरस्कार (2008), इंग्लिश स्पीकिंग यूनियन अवार्ड, हच क्रासवर्ड फिक्शन प्राइज (भारत), इंडिया अब्राड लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड (यूएसए), जेम्स टैट ब्लैक मेमोरियल पुरस्कार (गल्प), कर्ट टुचोल्स्कि पुरस्कार (स्वीडन),मनटुआ पुरस्कार (इटली), जेम्स जॉइस पुरस्कार (यूनिवर्सिटी कॉलेज इबलिन), मैसाचुसेट्स प्रोद्योगिकी संस्थान मानद प्रोफेसरशिप, चैपमैन यूनिवर्सिटी मानद डॉक्टरेट (डॉक्टर आॅफ द ह्यूमन लेटर्स), सांस्कृतिक मानवतावाद में आउटस्टैंडिंग लाइफ टाइम अचीवमेंट (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी), प्रेमियो ग्रिंजेन केवोर (इटली), प्रिक्स कोलेट (स्विटजरलैंड), सेंट लुइस साहित्य पुरस्कार (सेंट लुइस यूनिवर्सिटी), साहित्य के लिए स्टेट प्राइज (आस्ट्रिया), बुकर पुरस्कार की 40 वीं सालगिरह की स्मृति में बेस्ट बुकर पुरस्कार, व्हाइटबे्रड उपन्यास पुरस्कार (दो बार), बाल उपन्यास के लिए राइटर्स गिल्ड आॅफ ग्रेट ब्रिटेन पुरस्कार।
रुश्दी ने झेला विरोध
----रुश्दी ने यूगोस्लाविया के संघीय गणराज्य पर 1999 में नॉटो की बमबारी का समर्थन किया। इससे वामपंथी तारिक अली ने रुश्दी को परियुद्धक के रूप में संबोधित किया। वर्ष 2001 में अमेरिका की ओर से अफगानिस्तान में तालिबान को हटाने का समर्थन किया। वहीं इराक में 2003 के युद्ध की आलोचना करते हुए कहा कि सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिका की एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप अनुचित था। इसका विरोध उन्हें झेलना पड़ा।
---रुश्दी ने धार्मिक उग्रवाद के खतरों के खिलाफ चेतावनी देने वाले कथन के घोषणा पत्र ‘टुगेदर फेसिंग द न्यू टोटलीटेरिओनिस्म’ पर हस्ताक्षर किए। यह घोषणा पत्र 2006 में वामपंथी झुकाव वाले फ्रांसीसी साप्ताहिक चार्ली हेब्दों में प्रकाशित हुआ था।
---वर्ष 2006 में रुश्दी ने कहा कि वह तत्कालीन हाउस आॅफ कामन्स के नेता जैक स्ट्रा की टिप्पणी का समर्थन करते हैं, जिन्होंने नकाब पहनने की आलोचना की। रुश्दी ने कहा कि उनकी तीन बहनें कभी नकाब नहीं डालेंगी। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि नकाब के खिलाफ लड़ाई महिलाओं के हदों के खिलाफ एक लंबी और सतत लड़ाई रही है। इस मामले में मैं पूरी तरह से जैक स्ट्रा की ओर हूं।
---रुश्दी अपने राजनीतिक विचारों के लिए ब्रिटिश शैक्षिक प्रतिष्ठानों के आक्रोश का शिकार बनते रहे हैं। पूर्व में रुश्दी की कृतियों के प्रशंसक रह चुके मार्क्सवादी आलोचक टेरी ईगलटन ने उनके दृष्टिकोण के प्रति उन पर यह कहते हुए हमला किया कि उन्होंने पेंटागन के इराक और अफगानिस्तान में अपराधिक कार्याें पर खुशी प्रकट की। हालांकि बाद में उन्होंने रुश्दी के विचारों को गलत रूप में पेश करने पर माफी मांगी।
---92 स्ट्रीट वाई में एक प्रस्तुति के दौरान रुश्दी ने कॉपीराइट पर अपने विचार व्यक्त किए। जब उनसे पूछा गया कि क्या कॉपीराइट कानून को उन्होंने स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए एक अवरोध या बाधा माना है? इस मामले में वह चर्चा में रहे।

Saturday, January 14, 2012

अनोखी चाल!

माया ने मैदान से आउट किए जीते मोहरे
अकेले बलिया जिले बदल दिए सभी जीते प्रत्याशी
पहले आठ विस की जगह अब रह गए केवल सात
परिसीमन से खत्म चिलकहर का 45 साल का सफरनामा
नये चेहरे पर हाथी ने चला दांव, विपक्षी बने घनचक्कर
अमूमन किसी  भी दल से विधायक की कुर्सी पाने वाले अपने टिकट को लेकर आश्वस्त रहते हैं। संकट में वे रहते हैं जो पिछले चुनाव में मात खा चुके होते हैं। वहीं बसपा ने तो अबकी ऐसा बदलाव किया है, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। पार्टी ने अपने जीते विधायकों को भी अपनी पार्टी का टिकट नहीं दिया है। इस अनोखी चाल का क्या होगा असर। एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
क्रिसमस की पूर्व संध्या पर चुनावी बिगुल बज गया, लेकिन केंद्र तथा यूपी की राजनीति में अपना जोरदार दखल रखने वाला यूपी के पूर्वी छोर पर बसे बलिया जिले में राजनीतिक भूचाल का नजारा था। यहां एक झटका तो परिसीमन ने ही दे दिया कि कुल 45 वर्षों के सफरनामे के बाद चिलकहर विस का लोप हो गया था, जबकि अबकी बसपा ने यहां से अपने पूर्व में जीते सभी मोहरों को भी मैदान से हटाकर नये चेहरों पर अनोखा दांव लगा दिया है। इसकी न तो किसी राजनीतिज्ञ को उम्मीद थी और न ही जनता को ऐसा होने का भरोसा। यहां से अबकी मायावती ने न सिर्फ अपने पूर्व में जीते विधायकों का पत्ता गोल कर दिया है, बल्कि हर विस में अबकी नया चेहरा उतारा है। लिहाजा अबकी यहां विस का घमासान कैसा होगा, इसको खुद को उम्दा रणनीतिकार बताने वाले भी पेशोपेश में आ गए हैं।
इतिहास बन गया चिलकहर विस
बलिया में सन 1967 के चुनाव से पूर्व परिसीमन के बाद अस्तित्व में आये विधानसभा चिलकहर के 45 वर्षों के सफरनामे की समाप्ति की घोषणा तो वैसे पहले ही हो गई थी, लेकिन निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा के साथ ही यह क्षेत्र हमेशा के लिए इतिहास बन गया। चार दशकों से अधिक के सफर में इस विधानसभा ने वैसे तो 12 बार चुनाव में प्रतिनिधि दिये, पर बहुतेरे बार चेहरे नहीं बदले। बलिया में 45 वर्ष में सात लोग ही यहां की विधायक की कुर्सी पर बारी-बारी बैठते रहे। यहां के मतदाताओं ने सर्वाधिक पांच बार रामगोविंद चौधरी पर अपना भरोसा जताया। दो बार जगन्नाथ चौधरी को मौका मिला। वहीं शेष सभी पांच लोग एक-एक बार ही विस की ड्योढ़ी लांघ सके। इनमें रामगोविंद चौधरी व जगन्नाथ चौधरी को अपनी-अपनी सरकारों में मंत्री बनने का सुअवसर मिला। बावजूद इसके क्षेत्र को कभी वह मान-सम्मान व विकास की धार नहीं मिली जिसका वह हकदार था।
सनातन रहे अंतिम विधायक
विधानसभा चिलकहर के अस्तित्व के बाद चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों की बात करें तो वहां के सबसे पहले विधायक होने का गौरव कामता सिंह को प्राप्त है। विधानसभा के अंतिम विधायक का तमगा सनातन पांडेय के नाम रहा। वर्ष 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी के कामता सिंह निर्वाचित हुए। उसके बाद 1969 व 1974 में कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी के हाथ विधायकी रही और वे राज्यमंत्री भी बने। वर्ष 1977, 1980, 1985, 1989 व 1991 में जनता पार्टी के रामगोविंद चौधरी के नाम ही इस विधानसभा की जिम्मेदारी रही। 1993 के चुनाव में बसपा के संग्राम सिंह यादव ने रामगोविंद को हराकर कुर्सी हथिया ली। 1996 के चुनाव में विधायक तो बसपा का ही हुआ पर इस बार चेहरा छोटेलाल राजभर का रहा। 2002 के चुनाव में इस पर भगवा रंग चढ़ा और पार्टी के जुझारू नेता रामइकबाल सिंह विधायक हो गये। वर्ष 2007 के निर्वाचन में साइकिल लेकर आये सनातन पांडेय ने यहां जीत दर्ज की और परिसीमन के बाद अस्तित्व समाप्त होने पर इन्हें ही अंतिम विधायक होने का एक कीर्तिमान मिल गया।
चिलकहर को मिल चुकी है दो बार लालबत्ती
विधानसभा चिलकहर को दो बार लालबत्ती मिली। सबसे पहले कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी को 1974 में सूबे की कैबिनेट में राज्यमंत्री बनने का मौका मिला तो 1991 में जनता पार्टी के रामगोविंद चौधरी को मुलायम सिंह यादव की सरकार में काबीना मंत्री बनने का सुअवसर मिला। अबकी खास यह भी रहा कि बसपा ने 2012 के लिए सबसे पहले अपने उम्मीदवारों की विधानसभा क्षेत्र प्रभारी के रूप में घोषणा कर दी थी, पर बसपा सुप्रीमों ने अपने खास अंदाज में पूर्व निर्णय में तब्दीली करते हुए फेफना से आलोक कुमार सिंह झुनझुन को हटाकर भारती सिंह, रसड़ा से केदार वर्मा को किनारे कर उमाशंकर सिंह तथा नए सुरिक्षत क्षेत्र बिल्थरारोड से अपने पुराने सिपाहसालार घूराराम को बाहर कर जोनल कोआर्डिनेटर छट्ठू राम को उम्मीदवारी सौंप दी।
विधायकों के मैदान से हटने का असर
पिछले विधानसभा चुनाव में यूं कहें तो समूचे बलिया जिले में बसपा की ही लहर थी। यही वजह रही कि यहां की कुल आठ विधानसभाओं में से अकेले छह विजेता बसपा के रहे। केवल दो चिलकहर और कोपाचीट (अब फेफना विस) पर सपा की साइकिल ने चाल भरी। चिलकहर से सनातन पांडेय और कोपाचीट से अंबिका चौधरी ने जीत दर्ज की। इसके बावजूद यदि बसपा मुखिया मायावती ने अपने सारे उम्मीदवार बदल दिए हैं तो इसके पीछे वह रिपोर्ट है जो जिले से बसपा सुप्रीमों तक पहुंची थी। सूत्रों ने बताया कि यहां से किसी बसपा के अच्छे ओहदे पर काबिज लोगों ने रिपोर्ट की थी कि अगर बसपा ने दुबारा इन पूर्व में जीते प्रत्याशियों पर दांव खेला तो पार्टी का बेड़ा गर्क हो सकता है। लिहाजा पार्टी मुखिया ने आनन-फानन में यहां से नए चेहरों पर ही दांव खेलना वाजिब समझा। ऐसे में वह भी दरकिनार हो गए, जिन्होंने पार्टी की साख अपने विस में बनाई थी।
गलत भी नहीं थी रिपोर्ट
बसपा मुखिया को जो रिपोर्ट दी गई थी, चुनाव के रणनीतिकारों की मानें तो वह गलत भी नहीं थी। वैसे भी यह जीते विधायक कई बार अपनों के बीच यह कहते नहीं अघाते थे कि उन्होंने ‘मैडम’ को बढ़िया पैकेज देकर टिकट पाया है। लिहाजा इन जनप्रतिनिधियों ने पूरे पांच साल तक न तो क्षेत्र में विकास को तवज्जो दी थी और न ही पार्टी कार्यकर्ताओं को। जीत के वक्त जो जनता इनके रूप में अपना उद्धारक देख रही थी, पूरे पांच साल बीतने के बाद भी इसके कोई लक्षण उनमें नहीं दिखे। द्वाबा में आर्सेनिक का मुद्दा रहा हो या समूचे जिले की जर्जर और बदहाल सड़कों का। चिकित्सकीय सुविधा का सवाल हो या फिर पुल, पुलिया आदि के निर्माण का। किसी बसपा विधायक ने इस ओर रंचमात्र  भी  ध्यान नहीं दिया। जनता अपना दुख-दर्द लेकर इनकी दरबार में पहुंचती तो वहां या तो उनसे मुलाकात नहीं होती और अगर होती भी थी तो वे उनसे बात करने तक में रूचि नहीं लेते थे।
वैसे भी थी जनता में नाराजगी
राजनीति की उर्वरा जनपदीय माटी पर चुनाव पूर्व वर्ष 2011 में सियासी चालें तेज रहीं। सभी राजनीतिक दलों ने साल भर दांव चले। बीते चुनाव में प्रदेश के निर्णय संग बलिया ने भी आठ विधान सभा सीटों में से छह बसपा की झोली में डाल दी थी, लेकिन पार्टी ने इस आधार पर जिले को तवज्जो नहीं दी थी। यहां की जनता को वैसे भी  उम्मीद थी कि सपा की तरह बसपा से इतने सारे विधायक यदि एक साथ जाएंगे तो बलिया जिले का मान बसपा भी जरूर रखेगी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जिले की आठ सीटों में से आधा दर्जन विधायक देने के बाद  भी एक अदद मंत्री तक नसीब नहीं हुआ था जिले को। एकमात्र छट्ठू राम ही ऐसे नेता रहे, जिन्हे पैक्सफेड के चेयरमैन (राज्यमंत्री का दर्जा) का पद पाया। वहीं सपा शासनकाल में सपा मुखिया ने जिले से जीते कुल चारों विधायकों को मंत्री बना दिया।
विभिन्न दलों की राजनीति
सपा से अलग हुए अमर सिंह ने पूर्वांचल राज्य की मांग को लेकर जन स्वाभिमान यात्रा की शुरूआत की और बलिया से ही उन्होंने अपनी लोकमंच की फिजा बनाई। सपा इस वर्ष को बसपा के तीव्र विरोध और सरकार की कमियों को सामने लाकर साल भर आंदोलित रही। इसमें खाद, बिजली, पानी के सवाल पर सरकार को घेरने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव भी बलिया आए। इसके अलावा बाद के आंदोलनों में शिवपाल सिंह यादव ने भी शिरकत की। वहीं बलिया जिले में बसपा के इस उलटफेर का लाभ भाजपा को मिलने की आशंका रणनीतिकार जता रहे हैं। कारण कि द्वाबा (अब बैरिया) के पूर्व में विधायक और खाद्य तथा रसद राज्यमंत्री रहे भरत सिंह पहले से काफी सशक्त हो गए हैं, वहीं चिलकहर के खत्म होने के बाद रसड़ा विस से भाजपा के टिकट पर भाग्य आजमा रहे फायरब्रांड नेता रहे रामइकबाल सिंह की दावेदारी मजबूती मानी जा रही है।
कांग्रेस भी मार रही हाथ-पांव
सूबे में कांग्रेस ने अपने हाथ-पांव मारने के क्रम में बलिया पर भी विशेष ध्यान दिया। केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के बैरिया कार्यक्रम में शिक्षक नेता सुरेंद्र सिंह को शामिल किया। कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी साल भर जनपद के कार्यक्रमों में पार्टी की संभावनाएं तलाशती रहीं। पार्टी के युवराज राहुल गांधी ने भी 22 जुलाई को कार्यक्रम बना जनपद के युवाओं से सीधा संवाद किया और अपनी स्टाइल से लोगों के बीच भी पहुंचे। युवा जिलाध्यक्ष राघवेंद्र सिंह को युवाओं पर भरोसा करने का विश्वास दिलाया तथा पार्टी की पुख्ता जमीन तैयार करने की कोशिश की। इस सारी कवायद के बावजूद कांग्रेस किसी भी नये चेहरे को मैदान में उतारने से गुरेज ही करती रही। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी अपनी जन स्वाभिमान यात्रा के माध्यम से जनता में पार्टी के प्रति संभावना टटोली व माहौल बनाया।
छोटे दलों की बल्ले-बल्ले
बैरिया और फेफना में कांग्रेस, सदर और सिकंदरपुर में भाजपा को छोड़कर परिसीमन के बाद अब आठ की जगह सात हुई सीटों पर सभी सियासी दलों ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। भासपा और कौमी एकता दल ने भी इस बीच अपने गठबंधन पर संजीदा रुख अपनाया है। लोकमंच ने भी विधानसभावार अपने प्रत्याशी  भी तय कर दिए हैं। सूत्र बताते हैं कि बसपा का टिकट कटने के बाद यह विधायक इन छोटे दलों के झंडे के नीचे आने की जुगत में लग गए हैं। लिहाजा यह विधायक कौमी एकता दल सरीखे दलों की शरण में जा सकते हैं। वैसे हकीकत तो नामांकन के वक्त ही सामने आएगी कि कौन सा प्रत्याशी किसके झंडे के नीचे खड़ा होता है। लिहाजा छोटे दलों की बल्ले-बल्ले है। इन विधायकों को वह अपने लिए न सिर्फ जिताऊ मान रहे हैं, बल्कि संगठन मजबूती के लिहाज से भी काफी लाभदायक मान रहे हैं।

वर्जन...
लड़ना है मुझे चुनाव
हां, बसपा प्रमुख ने मेरा टिकट काट दिया है। लखनऊ पहुंचा है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। मैंने पूरे पांच साल संगठन मजबूती और द्वाबा के विकास के लिए दिए हैं। कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी विकास के लिए। संगठन के कुछ विरोधी लोगों के कहने मात्र से मेरा टिकट काट देना वाजिब नहीं कहा जा सकता। वैसे फिर भी पार्टी प्रमुख पर विश्वास है। लखनऊ में कार्यकर्ताओं की बैठक में जो तय होगा, उसे माना जाएगा। जहां तक अगली रणनीति का सवाल है, चुनाव तो मुझे लड़ना ही है। फिर भी नेतृत्व से अभी  आस है, जरूर मेरे हित में कोई न कोई फैसला होगा।
  सुभाष यादव,
बसपा विधायक,
     द्वाबा (वर्तमान में बैरिया)

दमखम से लडूंगा
कौन कहता है मैं बूढ़ा हो गया हूं। अभी जवान हूं। पूरे दमखम से विधानसभा चुनाव लड़ूंगा। आज कार्यकर्ताओं की फौज मेरे साथ है। कांग्रेस पहले से ज्यादा मजबूत हुई है। अबकी मेरी जीत भी पक्की है। जातिगत आंकड़ों से भी मैं वर्तमान में पहले से ज्यादा सशक्त हो चुका हूं। परिसीमन का बहुत असर मेरी सेहत पर पड़ने वाला नहीं है।
बच्चा पाठक,
कांग्रेस प्रत्याशी, बांसडीह विस


विधायक जिनके टिकट कटे
योगेश वर्मा : हस्तिनापुर
हाजी याकूब कुरैशी : मेरठ दक्षिण
विनोद हरि : सिवालखास
महिपाल                                     : नकुड़
डॉ. यशवंत                                  : जानसठ (मुजफ्फरनगर)
शाहनबाज राणा                          : बिजनौर
शीशराम                                      : नजीबाबाद
बलराम सैनी                                :मुरादाबाद पश्चिम
महेंद्र सिंह                                    : कोल (अलीगढ़)
मुस्लिम खां :उसेहत (बदायूं)
योगेंद्र सागर : बिल्सी
उर्मिलेश यादव                             : बिसौली
महिपाल माजरा                           : गंगोह
भगवान शर्मा                               :डिबाई (बुलंदशहर)
बासुदेव सिंह बाबा                        : शिकारपुर
शेखर तिवारी                               : औरैया
आनंद सेन                                   : मिल्कीपुर
फरीद महफूज किदवई                  :इसौली (बाराबंकी)
शेर बहादुर सिंह                            : जलालपुर (अंबेडकरनगर)
सतीश वर्मा                                   : मल्लावां
जितेंद्र सिंह बबलू                         : बीकापुर
दशरथ चौहान :हैसरबाजार (संतकबीरनगर)
श्यामसुंदर शर्मा                            : मथुरा
चंद्रभद्र सिंह                                 : इसौली
पुरुषोत्तम द्विवेदी                            : नरैनी
घूराराम                                       :बिल्थरारोड (बलिया)
सुभाष यादव                                : द्वाबा (बलिया)
केदारनाथ                                    : सीयर (बलिया)
श्यामनारायण यादव                     :गोपालपुर (आजमगढ़)

Thursday, January 12, 2012

हाथ खाली, दे ताली

बुनकरों की उम्मीदों पर फिरा पानी
केंद्र सरकार के 6234 करोड़ के पैकेज की हकीकत
हेंडीक्राफ्ट कारपेट को योजना में नहीं किया गया शामिल 
बदहाली की जिंदगी बिता रहे बुनकरों की दर्द-ए-दास्तां
यूपीए सरकार के खिलाफ लामबंद बुनकर सिखाएंगे सबक
केंद्र की यूपीए सरकार से बुनकरों को काफी उम्मीदें थीं। बुनकरों के लिए 6234 करोड़ का बजट की घोषणा सुनते ही बुनकरों की मानों मनमांगी मुराद मिल गई। वहीं जब हकीकत सामने आई तो वह खुद का ठगा हुआ महसूस करने लगे। उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया था। लिहाजा कल तक जो बुनकर अपने जवान बेटे को महानगरों को जाने से रोकने वाले थे, उन्हें कहना पड़ा। जा बेटा, कमाकर लौटना...!
अनीश कुमार उपाध्याय
केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने जब बनुकरों को 6234 करोड़ का राहत पैकेज देने की घोषणा की तो मानों उनकी मनमांगी मुराद मिल गई। बदहाली की जिंदगी बसर कर रहे बुनकरों के सपनों को मानों पंख लग गए। तमाम हसीन ख्वाबों में डूब-उतरा रहे बुनकरों को हालांकि यह संशय बरकरार रहा कि कहीं विस चुनाव को देखकर सरकार उन्हें फिर से छलने तो नहीं जा रही है? कारण कि पिछले दिनों पीएम मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में 2.350 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा के बाद उन्हें इसका कोई लाभ  नहीं मिला था। वही हुआ भी। बीते 19 नवंबर को हुई घोषणा के बाद बुनकरों को राहत के नाम पर एक धेला भी  नसीब नहीं हो सका है। उपेक्षा का आलम यह रहा कि केंद्र सरकार ने जो राहत दी, उसमें मूल बुनकरों को जगह न देकर केवल हैंडलूम के बुनकरों को ही लाभ दिया गया है। मूल हैंडीक्रॉप बुनकर इससे दूर कर दिए गए हैं। जबकि देश में सर्वाधिक हैंडीक्राप बुनकरों की ही तादाद है। लिहाजा चुनावी मौसम में खुद को छले जाने से वह  भी लामबंद होकर सबक सिखाने के मूड में हैं।
क्या है राहत पैकेज
बीते 19 नवंबर को केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने बुनकरों का लगभग 3884 रुपये प्रति बुनकर की कर्जमाफी समेत विभिन्न मदों व योजनाओं के लिए 6234 करोड़ रुपये पैकेज की घोषणा की। उन्होंने घोषणा के दौरान यह तीन बार दोहराया कि संपूर्ण घोषणाओं का जमीनी क्रियान्वयन हर हाल में होगा। इसकी मानिटरिंग वह खुद तथा संबंधित केंद्रीय सचिव संभालेंगे। वहीं उन्होंने बताया कि 15 हजार बुनकर सहकारी समितियों पर 50 हजार रुपये तक के कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। वहीं देश के 14 लाख निजी बुनकरों के भी 50 हजार रुपये तक के बैंक कर्ज माफ होंगे। इनमें तीन लाख बुनकर अकेले उत्तर प्रदेश के लाभान्वित होंगे। वीवर्स के्रडिट कार्ड योजना की शुरुआत करते हुए महज तीन फीसदी ब्याज पर दो लाख रुपये तक बैंक कर्ज देने की भी बात कही। तीन तरह के हैंडलूम क्लस्टर बनाने तथा 25 हजार लूम लगाने, वाराणसी, मुबारकपुर, बिजनौर, बाराबंकी में चार समूह, जिनमें हर को भारत सरकार की ओर से दो-दो करोड़ रुपये के अंश के साथ पांच हजार हथकरघे लगाने आदि का भी उन्होंने भरोसा दिया था। कुल मिलाकर सारी सुविधा हैंडलूम उद्योग को दी गई, हैंडीक्राफ्ट बुनकरों के हाथ कुछ नहीं लगा।
क्या है हकीकत
कालीन उद्योग में कभी डॉलर बेल्ट के नाम से विख्यात भदोही कारपेट इंडस्ट्री मौजूदा वक्त में विश्व आर्थिक मंदी की तपिश से झुलस रही है। कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक आज से करीब दो वर्ष पूर्व तक भारत से पूरी दुनिया को होने वाले कालीन का निर्यात 2200 करोड़ रुपये सालाना का था। इसमें 1800 करोड़ रुपये की कालीन अकेले भदोही (अब संत रविदासनगर) और मिर्जापुर से जाती थी। यही नहीं, अमरिका को भारत से होने वाले कालीन के निर्यात में 60 फीसदी हिस्सेदारी सिर्फ भदोही और मिर्जापुर की होती थी। वहीं आज यह घटकर बुमुश्किल से 30 फीसदी ही रह गई है। वाराणसी और प्रतापगढ़ के बीच बसे भदोही की समूचे एशिया में अपनी अलग धाक थी। वहीं मौजूदा हालात यह है कि यूरोप और अमेरिका में आई आर्थिक मंदी की आंच इस डॉलर बेल्ट में न सिफ महसूस की जाने लगी है, बल्कि अब तो यह स्थिति काफी दयनीय हो चुकी है। इसका एक कारण यह भी है कि कालीन लक्जरी आइटम है। भदोही, मिर्जापुर की बनी हैंड नाटेड, हैंड ओवन, फ्लैटी (दरी), हैंड टफटेड कारपेट की नजाकत ने हमेशा ही पूरी दुनिया में धूम मचाया, वही आज गर्त में जा रहा है।
हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी कमाई नहीं
भदोही जिले के जमुआ गांव के निवासी सुभाष विगत चार दशक से कालीन उद्योग में रत हैं। उनके बच्चे और सारा परिवार यही कार्य करता है। पूरा कुनबा मिलकर हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पा रहे। तीन हजार करोड़ रुपये के इस उद्योग में ऐसे 20 लाख लोग जुड़े हैं। इसमें जुड़े सभी की एक समान मजदूरी पर नजर डालें तो एक आदमी के पास महज एक हजार रुपये जाते हैं। इसमें से भी कच्चे माल का खर्च निकाल दें तो मजदूरों के पास इसका 40 प्रतिशत यानी महज 400 रुपये बचते हैं। इस कमाई में भी कई तरह की अड़चने हैं। कालीन निर्यातक, शिपिंग, ठेकेदार, दलाल आदि की कमाई को इसमे से अलग कर दिया जाए तो आंकड़ा यही होगा कि इनके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं बचती। लिहाजा बुनकरों के युवा बच्चे नौकरी की तलाश में परंपरागत कालीन उद्योग को छोड़कर निजी कंपनियों में नौकरी को बेहतर मानने लगे हैं। इससे तीन हजार करोड़ रुपये के परंपरागत कालीन उद्योग में मजदूरों की कमी के चलते भी संकट खड़ा हो गया है। भले ही इस पलायन को रोकने के लिए सरकार इन युवाओं, महिलाओं, युवतियों को प्रशिक्षण देने के लिए ट्रेनिंग सेंटर चलाने की कवायद कर रही है, लेकिन इतनी कम मजदूरी में कोई मजदूर काम करने के लिए तैयार होते नहीं दिख रहे।
सुंदर कालीन का सच
भारत के सुंदर कालीनों को देखकर कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि यह हाथ गुथी कविता है। अक्सर लोग सुंदर कालीन को देखकर यह सोचते हैं कि इसके काम को करने वाले भी सुंदर (खुशहाल) होंगे। निर्यातक भी कहते हैं कि वह इसके जरिए लाखों घरों का चूल्हा जलवाते हैं। लिहाजा सरकार को निर्यातकों को रियायत देनी चाहिए। सरकार भी कालीन उद्योग को महत्वपूर्ण उद्योगों का दर्जा तो देती है, लेकिन कभी सरकार या उसके नुमाइंदों पर इसका कोई असर नहीं है। केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने बुनकरों को जो राहत दी है, वह छल है। कालीन उद्योग की दो शाखाएं हैं। एक हैंडीक्रॉप और दूसरा हैंडलूम। दोनों उद्योग भी वस्त्र मंत्रालय के अधीन ही आते हैं। शासन ने जो बजट दिया है, वह केवल हैंडलूम व्यवसाय के लिए है। फिलहाल कोई सबसे अधिक परेशान है तो वह है हैंडीक्राप बुनकर। इनके घरों में कई-कई दिन चूल्हे नहीं जलते। मार्केट में इन्हें काम भी आसानी से नहीं मिलता। विदेशों में एक्सपोर्ट में भी कमी आई है।
पूर्व की घोषणा में नहीं मिली फूटी कौड़ी
कालीन उद्योग ग्रामीण रोजगारपरक योजना (कुटीर उद्योग) है। पांच से सात लाख बुनकरों का कुनबा इसी पर आश्रित है, जो बदहाल है। यूरोप में आई मंदी से कालीन उद्योग चौपट हो गया है। वर्ष 2009 में महिलाओं को इस क्षेत्र में लाने की पहल की गई। कारण कि पुरुषों की अपेक्षा महिला और लड़कियों के इस व्यवसाय में आने से इसके विकास होने की उम्मीद जगी थी। सरकार के ओर से तब 140 करोड़ रुपये का जो बजट दिया गया, उसमें 70 रुपये मिर्जापुर भदोही और इतनी ही रकम काश्मीर के बुनकरों को देने की बात हुई। दो वर्ष से अधिक बीत गया, पर इस पर आज तक सरकार ने अमल नहीं किया है। बुनकरों को इस मद में एक धेला भी नसीब नहीं हुआ। कालीन उद्योग एक तरह से उधार के धंधे पर चलता है। यानी माल उठने के बाद उसे बेचकर ही कालीन व्यवसायी कालीन कारीगरों को भुगतान करते हैं। टाइम गारंटी लोन 1994 में लागू हुआ, जिसे सरकार ने 2002 में बिना कारण बताए बंद भी कर दिया। ऐसे में वर्ष 2008 में बुनकरों ने एक बार फिर इसकी मांग उठाई, लेकिन इस पर केंद्र सरकार ने कोई अमल नहीं किया। 
भ्रष्टाचार की घुसपैठ
कुल मिलाकर कालीन उद्योग अकेले पूर्वांचल में 3500 करोड़ रुपये का विदेशी व्यवसाय मुद्रा देता था। मंदी के बावजूद यह करीब तीन हजार करोड़ का विदेशी मुद्रा देने वाला कारोबार है। रुपये के 20 प्रतिशत अवमूल्यन से इसमें गिरावट आई है। इतना लाभ देने के बावजूद बुनकरों के हिस्से में केवल फांकाकशी ही नसीब होती है। मूल बुनकरों की दशा में कोई सुधार नहीं है। सरकार ने वर्तमान में राहत पैकेज दिया भी है तो इसमें कालीन बुनकरों को दूर कर दिया गया है। इनके लिए भारत सरकार ने कोई कर्जमाफी भी नहीं दी है। वहीं घोषणाओं में जिसको लाभ मिलना बताया जा रहा है, वह भी लाभ से वंचित हैं। यदि बुनकरों की बातों पर यकीन करें तो हकीकत बस इतनी है कि घोषणाओं पर क्रियान्वयन या तो वक्त पर नहीं होता या इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार से सही पात्र को इसका लाभ नहीं मिलता।
खुदकुशी को विवश बुनकर 
बीते वर्ष वाराणसी के गौरगांव निवासी बुनकर सुरेश राजभर अपनी पत्नी हीरामनी एवं सात वर्षीय पुत्र छोटू की हत्या कर खुद फांसी पर झूल गया। कर्ज के बोझ तले दबे सुरेश के सामने जीने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था। मऊ के ग्राम अतरारी निवासी बुनकरों से विद्युत बकाया वसूली के लिए तहसीलकर्मियों ने जमकर उत्पीड़न किया। बुनकरों पर फर्जी मुकदमें लादे गए। इस मुद्दे पर सपा समेत अन्य विपक्षी दलों ने सूबे की सत्तासीन बसपा सरकार की मुखिया मायावती को घेरा, लेकिन बुनकरों की आत्महत्या की वजह भुखमरी मानने से सरकार ने इंकार कर दिया। चंदौली, मऊ, आजमगढ़, टाडा, मऊरानीपुर, ललितपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, भदोही एवं पिलखुआ के बुनकर गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। हथकरघा बुनकर दिहाड़ी मजदूर बन चुके हैं। पिछले एक वर्ष में लगभग छह हजार बुनकरों के रोजी-रोटी की तलाश में सूरत, मुंबई, कोलकाता, दिल्ली जैसी जगहों पर पलायन करने की सूचना है। 
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इतिहास के आइने में कालीन उद्योग
भारत में कालीन बनाने की परंपरा मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में शुरू हो गई थी। यह कालीन कई तरह से बनाये जाते थे। गुजरात के बड़ौदा में बने कालीन की खासियत यह थी कि इसे लगभग 20 लाख मोतियों, हीरा, नीलम, माणिक्य, पन्ना जैसी कीमती पत्थरों से सजाया जाता था। बसरा मोती के नाम से जाने जाने वाले छोटे प्राकृतिक मोतियों को ईरान की खाड़ी से निकाला गया था, लिहाजा इसे पर्ल कार्पेट भी कहा जाता था। इस कालीन को सजाने के लिए  सोने का भी प्रयोग होता था। 1860 के दशक में तैयार होने वाला यह कालीन लाल और नीले रंग से तैयार होता था। इसमें घुमावदार बेल-बूटे बनाए जाते थे। भदोही के कालीन का इतिहास करीब 250 साल पुराना है। 18 वीं सदी में भदोही जिले के माधोसिंह इलाके में आए ईरान के कालीन बुनकरों ने यह फन स्थानीय लोगों को दिया। 
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कहां-कहां बनते हैं कालीन
भारत में जम्मू-काश्मीर का नाम कालीन निर्माण में सबसे ऊपर है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात में भी उम्दा किस्म व डिजाइन के कालीन बनते हैं। कालीन की कई किस्मे हैं। हाथ से बना ऊनी कालीन, सिल्क कालीन, सिंथेटिक कालीन, ऊनी दरी की बाजारों में काफी मांग है। कारपेट डिजाइन के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट आफ कारपेट टेक्नालॉजी चौरी रोड भदोही (उप्र), इंडियन  इंस्टीट्यूट आफ कारपेट टेक्नालॉजी जम्मू एंड काश्मीर, श्री जेजे इंस्टीट्यूट आफ अप्लाइड आर्ट मुंबई, मुंबई विश्वविद्यालय, कॉलेज आफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स, जामिया मिलिया इस्लामिया जामिया नगर दिल्ली में प्रशिक्षण दिया जाता है।
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महिलाओं की बढ़े भागीदारी
सरकार ने जो राहत पैकेज घोषित किया है हकीकत यह है कि यह असली बुनकरों को लाभ नहीं पहुंचाएगा। यूपीए सरकार बुनकरों के कल्याण की दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। विवश बुनकर रोजी-रोजगार के लिए महानगरों को पलायन कर रहे हैं। वैसे भी कालीन व्यवसाय रेगुलर नहीं चलता। मजदूरी बढ़ी है, लेकिन बुनकरों की दशा में कोई सुधार की पहल नहीं हुई है। जरूरत है कि मूल कालीन बुनकरों को पावरलूम बुनकरों की तरह ही पैकेज का लाभ मिले। महिलाओं की इसमें भागीदारी बढ़ाई जाए। इनके लिए टेÑनिंग सेंटर खोले जाएं। वैसे हमारा संगठन इसके लिए आवाज उठा रहा है। सुधार प्रक्रिया जारी है।
ओएन मिश्रा,
अध्यक्ष, आल इंडिया कारपेट मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (एक्का)

चुनाव में सिखाएंगे सबक
हकीकत यही है कि छोटे बुनकरों जिन पर कालीन उद्योग की नींव टिकी है, उन्हें अब सरकार से कोई राहत की उम्मीद नहीं दिख रही। इंटरनेशनल मार्केट में बढ़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत के बुनकर बदहाल हैं। टर्की, चायना आदि कालीन के सबसे बड़े खरीददार हैं। यहां बिक्री में कई रुकावटे हैं। इन्हें दूर किया जाना चाहिए। नाराज बुनकर विधानसभा चुनाव में केंद्र की यूपीए सरकार को सबक सिखाएंगे। हालांकि अभी यह तय नहीं हो सका है कि बुनकरों को हमारा संगठन किस दल या प्रत्याशी को समर्थन देगा।
हाजी अब्दुल हादी अंसारी
मानद सचिव,
आल इंडिया कारपेट मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (एक्का)

राहत के नाम पर छल
केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग व वस्त्र मंत्री आनंद शर्मा ने मूल बुनकरों से राहत के नाम पर छल किया है। यह बजट हैंडलूम व्यवसाय के बुनकरों को लिए है, हैंडीक्राफ्ट बुनकरों के लिए नहीं। हैंडीक्राफ्ट बुनकरों की भी आर्थिक स्थिति बदहाल है। बाजार में उनके लिए काम के अवसर नहीं है। एक्सपोर्ट में भी बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। पानीपत, जयपुर, राजस्थान, भदोही सभी जगहों पर एक सी स्थिति है। हकीकत यह है कि बुनकरों की लड़ाई लड़ने वाला कोई मजबूत संगठन नहीं है, जिससे यह अपनी आवाज सरकार के कानों तक पहुंचा सकें।
साजिद हुसैन,
कालीन व्यवसायी, भदोही

मूर्तियों की ‘माया’


चुनाव आयोग के निर्देश से बसपा का फोकट में प्रचार
आम जनों के जुबान पर आ गया बसपा चुनाव चिन्ह
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर दिया याचिका को खारिज
मूर्तियों के ढंकने से लोगों में जगा दी गई उत्सुकता
अन्य चुनाव चिन्हों पर रोक लगी तो स्थिति विकट
अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
विधानसभा चुनाव की सियासत में एक बार फिर बवंडर उठा है। इसे किसी और ने नहीं, बल्कि खुद चुनाव आयुक्त वाईएस कुरैशी के आदेश ने उठाया है। चुनाव के ऐन वक्त जब किसी भी दल को प्रचार की महती जरूरत होती है, तब चुनाव आयोग ने ऐसा आदेश दे डाला, जिससे बसपा और उसकी मुखिया मायावती का फोकट में प्रचार हो गया है। मायावती और हाथियों की मूर्तियों की चर्चा सूबे की सत्तासीन बसपा सरकार और इसकी मुखिया मायावती के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन हाल में ही मूतिर्यों को ढकने के चुनाव आयोग के आदेश के बाद इसकी चर्चाओं को काफी बल मिल गया। राजनैतिक गलियारों में दलों की प्रतिक्रियाएं, मीडिया में चटखारे लेकर उसकी प्रस्तुति, चैनलों पर परिचर्चाएं, इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका और अंतत: उसके खारिज होने पर अगर नजर दौड़ाएं तो यह स्पष्ट है कि इसके पीछे चुनाव आयोग की क्या मंशा थी, वह जाने, लेकिन इससे मायावती और बसपा का चुनाव चिन्ह हाथी आम जनों के जुबान पर जरूर आ गया है।
हाथी और उप्र की मुख्यमंत्री व बसपा प्रमुख मायावती की मूर्तियों को ढकने की पूरी कवायद का अगर सीधा लाभ किसी को मिलेगा तो वह नि:संदेह मायावती और उसकी बसपा ही होगी। यह सब ऐसे ही नहीं है। मानव स्वभाव संग उत्सुकता जुड़ी है। इसे जितना दबाया या छुपाया जाए, वह उतनी ही बढ़ती है। अब यदि आप किसी रास्ते से जा रहे हैं तो वहां अगर आपको हाथी की पर्दे या प्लास्टिक में ढकी प्रतिमा दिखेगी तो आपके जेहन में खुद-ब-खुद उसके ढकाव को देखकर अंदाजा लग जाएगा कि यह किसकी मूर्ति होगी। नि:संदेह जो छवि आपके जेहन में उभरेगी वह या तो मायावती की होगी या बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की। लिहाजा जो प्रचार बसपा करोड़ों रुपये बहाकर भी शायद कर पाती, चुनाव आयोग के एक तिकड़म ने वह कार्य कर दिया। वैसे में पर्दे में ढके जाने के बाद क्या युवा, अधेड़, बुजुर्ग, बच्चे, महिला सभी इस ढकी मूर्ति को निहारने में जुटे हैं। ऐसा मानव स्वभाव में है। पता नहीं किस दल की शिकायत पर या अपने मन से चुनाव आयोग ने यह फैसला दिया, इस पर टिप्पणी के बजाय नीति तो यही कहती है कि हटा सकते हो तो हटा दो। अन्यथा पूर्णतया अनदेखा कर दो। ऐसी ही नीति अपनाते हुए कांग्रेस की आंख की किरकरी बने दिल्ली के कनाट प्लेस के मध्य में चल रहे एक प्रसिद्ध काफी हॉउस को आपातकाल में उखाड़कर वहां एक बड़ा सा फव्वारा बना दिया गया था। आज लोग उस काफी हॉउस को भूल चुके हैं। अब वहां मेट्रो स्टेशन बन गया है। कई दिनों से चल रही चर्चा पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने अंतत: पटाक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश में उद्यानों और चौराहों पर मायावती सरकार द्वारा स्थापित हाथियों और मायावती की मूर्तियों को ढकने के आदेश जारी कर ही दिए। चुनाव आयोग के इस आदेश का भाजपा, कांग्रेस, सपा और कई अन्य दलों ने स्वागत भी किया। चार फरवरी से 28 फरवरी तक सात चरणों में संपन्न होने जा रहे प्रदेश के चुनावी संघर्ष में सभी दल चौतरफा मार झेल रहे हैं। ऐसे माहौल में चुनाव आयोग के इस फैसले पर अन्य दलों के प्रसन्नता का होना स्वाभाविक ही है। चुनाव आयोग के इस निर्णय के औचित्य पर सवाल खड़ा करना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा की ओर से इस फैसले के विरोध में दी गई प्रतिक्रिया पर चर्चा तो अवश्य हो सकती है। बसपा के श्री मिश्रा का यह कथन है कि दलों के चुनाव चिन्ह व नेताओं के इस प्रकार के प्रतीकात्मक चिन्ह तो सभी स्थानों पर मिल जाएंगे। तो क्या उन्हें भी तोड़ा या ढका जाएगा ? भाजपा के लिए कहा कि तालाबों से कमल के फूल चुनवा लो, साइकिल पर चलना मना कर दो, हाथ के पंजे, हैंडपंप उखड़वा लो वगैरह-वगैरह। सवाल किया है कि क्या यह चिन्ह व मूर्तियों के साथ भी  ऐसा हो पाएगा? निष्पक्ष रूप से यदि गौर किया जाए तो बसपा नेता की इस बात में दम है। वैसे तो मुख्य चुनाव आयुक्त ने सरकारी खर्चे पर लगी मूर्तियों के विषय में ही अपना आदेश सुनाया है। देखा जाए तो राज्य के तमाम चौराहों पर बने फौव्वारों पर कमल के फूल बने हैं। कमल के फूल पर फौव्वारे बने है। इन सभी का निर्माण वहां की नगरपालिकाओं ने कराया है। यह भी तो सरकारी खर्च ही है। राजनैतिक दलों के नेताओं की मूर्तियां या उनके नाम पर रास्तों या चौराहों का नामकरण तो सारे देश में ही है। चंडीगढ़ प्रशासन का चिन्ह भी हाथ ही है। इन सब पर चुनाव आयोग क्या फैसला देगा? कांग्रेस के एक ही परिवार के कई सदस्यों, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि की मूर्तियां भी पूरे देश में लगी हैं। दलों के चुनाव चिन्हों पर इसी प्रकार के आरोप और शिकायतें पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के फूल पर भी अन्य दलों ने लगाए थे। इतना ही नहीं उन्होंने तो चैनलों पर चलने वाले धार्मिक धारावाहिक जिसमें ब्रह्मा जी कमलासीन या किसी भी दृश्य, जिसमें कमल का फूल दिखाया जा रहा था, को बंद करने की मांग की थी। चुनाव आयोग के वर्तमान फैसले पर शरद यादव ने भी सवाल उठाए हैं। कुछ   कानूनविद भी इसे कानूनसम्मत नहीं मान रहे हैं।     
पार्कों और उद्यानों में लगी मूर्तियों को ढकने का काम जहां अभी शुरू ही हुआ है, वहीं इसकी चर्चा  भी देश भर में होने लगी है। पार्क के अंदर स्थापित मूर्ति किसी को चुनावी लाभ दे सके या नहीं, लेकिन ढकी मूर्तियां पार्क से बाहर अवश्य ही चर्चा में हैं। सभी का ध्यान आकर्षित करने में सफल भी हो रही हैं। पार्कों में लगी सूंड उठाए हाथियों की मूर्तियां चुनाव में किसी भी प्रकार से प्रचार में सहायक नहीं हो सकती थीं। हां, इन मूर्तियों को ढकने के कार्य से आम जनमानस में जिस ढंग से प्रचार हो रहा है, उसका लाभ अवश्य ही बसपा और उसकी मुखिया मायावती को इस चुनाव में मिलेगा। इसमें दम है। भ्रष्टचार के आरोपों से घिरी माया सरकार को पलटवार करने और अपने समर्थकों को यह संदेश देने कि बहुजन समाज के साथ अन्याय हो रहा है, मूर्ति ढकने की घटना अवश्य ही काफी सहायक होगी। आपातकाल में कांग्रेस की सरकार ने समाचार पत्रों पर भी सेंसर लगाया था। समाचार पत्र छपने से पूर्व उनको सरकार के अधिकारी पढ़ते थे और सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार अमान्य समाचारों को निकाल दिया जाता था। कुछ समय बाद कुछ समाचार पत्रों ने हटाए गए समाचारों का स्थान खाली छोड़ना शुरू कर दिया। इससे आम जनता को समझ में आने लगा कि इस रिक्त स्थान पर लगा समाचार सरकार ने हटाया है। फिर देश का जनसामान्य सभी समाचार पत्रों को जांचने लगे कि कौन सा समाचार पत्र सरकार के खिलाफ लिखता है और सरकार वह समाचार हटवा देती है। खैर, हो सकता है कि अब मूर्तियों की शिकायत करने वाले पछता भी रहे हों। कुल मिलाकर मायावती और हाथी की मूर्तियों को ढकने के चुनाव आयोग के फरमान पर अमल करने में यूपी प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। लिहाजा बसपा ने हमला बोलते हुए चुनाव आयोग को कांग्रेस की कठपुतली करार दे दिया है। इतना ही नहीं, एक अधिवक्ता के मध्यम से चुनाव आयोग के मूर्ति ढकने के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। हालांकि हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया है। 
बसपा के नेता सतीश मिश्रा सर्वाेच्च न्यायालय के नामी अधिवक्ता भी हैं। उन्होंने कमल, हाथ और साइकिल चुनाव चिन्ह पर जो सवाल खड़े किए हैं, वह गैरवाजिब भी नहीं हैं। फूल ढकने से तो आम जनता को कोई परेशानी नहीं होने वाली, लेकिन अगर साइकिल पर रोक लगी तो इसे शान की सवारी समझने वाला गरीब जरूर परेशान हो जाएगा। और तो और हाथ तो मानव का खास अंग है। अगर इसको ही ढक या बांधने के आदेश दे दिए गए, तो जरा सोचिये परिस्थिति क्या होगी? सारा उत्तर प्रदेश आखिरी मतदान की तारीख तक बहुचर्चित हिंदी फिल्म शोले का ठाकुर (संजीव कुमार) बन जाएगा। तब पहले से ही यूपी को लूटते आ रहे कई ‘गब्बर’ और आराम से अपना काम करने लगेंगे। किसी के पास हाथ नहीं होंगे और लोग जय-वीरू को तलाशते रह जाएंगे।