अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
अबकी विस चुनाव में पूर्वांचल के अंतिम छोर पर बसे बागी बलिया की धरती पर मतदान का नजारा देखने का अवसर मिला। खास तौर पर बलिया जिले के पूर्वी सीमा पर बसे बैरिया (पहले द्वाबा) विस क्षेत्र का। यही वह द्वाबा है जिससे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का दिली लगाव था। चाहें वह छात्र राजनीति की बात हो या प्रधानमंत्रित्व काल की। द्वाबा की सरजमीं पर नतमस्तक हुए बिना वह किसी प्रकार की कोई राजनीति नहीं करते थे।
द्वाबा की गलियों में घुसते ही राजनीतिक चर्चाओं का अखाड़ा कहे जाने वाले हल्दी चट्टी पर कुछ राजनीतिज्ञों से सामना हुआ। हल्दी चट्टी की राजनीतिक विरासत काफी पुरानी है। यह छोटी सी चट्टी बमुश्किल आधा किलोमीटर के दायरे में सिमटी इस चट्टी पर बैठकर आप समूचे द्वाबा ही नहीं, बल्कि सदर विस समेत हर विस की तहकीकात कर सकते हैं। राजनीतिक अखाड़ा मानी जाने वाली इस चट्टी की खासियत यह है कि यहां हर प्रत्याशी दिन भर कहीं भी रहे, एकाध चक्कर तो मार ही लेता है। समर्थकों से दुआ सलाम के साथ ही कहां कौन से मतदाता किस दल की ओर जा रहे हैं, इसकी पूरी टोह प्रत्याशी यहां अपने समर्थकों से लेते हैं। बातों ही बातों में बैरिया विस में रोचक मुकाबला होने की चर्चा खास रही। मुद्दा था प्रदेश सरकार के खाद्य तथा रसद राज्यमंत्री व भाजपा प्रत्याशी भरत सिंह तथा वर्तमान विधायक व कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष यादव के बीच रोमांचक मुकाबले का।
बीच में पूर्व मंत्री शारदानंद अंचल के पुत्र व सपा प्रत्याशी जयप्रकाश अंचल की बैरिया विस में पहली मर्तबा में दखलंदाजी को लेकर भी चर्चाएं हो रहीं थीं। हर आंखों में चमक थी, चाहें वह किसी भी दल का समर्थक क्यों न हो? मानों उसका प्रत्याशी दमदार जीत हासिल कर रहा हो। यहां हमारी मुलाकात हल्दी के रहने वाले संजय सिंह से हुई। बकौल संजय, बैरिया विस की लड़ाई में अबकी जातिगत आंकड़ों के बजाय विकास को मुद्दा मतदाता मान रहे हैं। पूर्व मंत्री भरत सिंह ने यहां विकास को काफी गति दी थी। बात चाहें द्वाबा के जल में घुले आर्सेनिक के मुद्दे की हो, या यहां की सड़कों की। सड़क निर्माण में कुछ ठेकेदारों ने लूट-खसोट जरूर की, लेकिन फिर भी विकास दिख रहा था। अब तो हालात पांच साल में इतने बदतर हो गए हैं कि लगता ही नहीं कि वह पांच साल पहले वाला द्वाबा है। जर्जर सड़कों पर वाहन तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है।
आर्सेनिक से मुक्ति की बात कौन कहे, लोग इसे ही नीयति मान अब जहरीले जल का सेवन करने लगे थे। अरसे से खराब हैंडपंप पूरे पांच साल में जंग खा गए। कोई पूछने तक नहीं पहुंचा। पूरे सूबे में जातिगत आंकड़ों को जीत का पैमाना मानने की बात को टटोलने की गरज से जब इस संवाददाता ने संजय सिंह से सवाल किया तो उसका दो टूक जवाब था। जाति क्या करेगी। विकास कहने से नहीं होता। जमीन पर दिखना भी चाहिए। उसने सवाल किया, आप पहले भी यहां आते-जाते रहे हैं। हल्दी से चार किमी की दूरी तय करने का औसत समय कितना होना चाहिए। जनाब, पूरे एक घंटे लगते हैं इस चार किमी की दूरी तय करने में। अगर पहाड़ भी होता तो इतना ही वक्त लगता। उसकी बातों में दम भी था।
कारण कि जब मैं हल्दी से सोनवानी चट्टी पर पहुंचा तो जर्जर सड़क से जाने में पूरे 50 मिनट का वक्त लग गया था। सड़क भी इतनी खतरनाक थी कि जब जीप हिचकोले लेती थी तो कलेजा मुंह को आ जाता था। मानों सड़क और जीप के बीच 90 डिग्री का कोण बन रहा हो। यह तो माहिर जीप चालक ही हैं तो थोड़ा अधिक किराया लेकर भी यात्रियों को वक्त रहते उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचा दे रहे हैं। अभी बात आगे ही बढ़ी थी कि वहां मौजूद एक तत्कालीन विधायक सुभाष यादव के समर्थक से रहा नहीं गया। उसने कहा कि आखिर विधायक जी क्या कर लेते, जब सूबे की मुख्यिा ही उनकी सुनने को तैयार नहीं थीं। कई बार तो विधायक जी ने मुद्दा उठाया, लेकिन कोई सुने तब न। अचानक उनके बीच में बोलने पर हमने उनका नाम, पता जानना चाहा तो वह टाल गए। खैर, अब जरा उनकी बातों को विस्तार से सुनिए कि उन्होंने क्या कहा? उस समर्थक ने पूरे जोश से कहा कि विधायक जी हर बार सूबे की मुख्यमंत्री ही नहीं, संबंधित मंत्रियों से अगर लखनऊ में मिलते थे तो द्वाबा की समस्याओं से रुबरू कराते थे। हर बार वही आश्वासन कि हां देख रहे हैं। विधायक जी खुद कहते थे कि फलां मंत्री से बात हुई है, कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।
जब उनसे यह कहा गया कि विधायक निधि से विधायक जी ने विकास को अमलीजामा क्यों नहीं पहनाया गया। इस पर वह समर्थक तुनक गया। बोल पड़ा कि विधायक निधि मिलती है तो उससे केवल एक इलाके का ही विकास ठीक से नहीं हो सकता। इसके अलावा कई जरूरतमंदो की मदद भी उसी विधायक निधि पर टिकी होती है। सारी विधायक निधि यदि सड़क निर्माण या आर्सेनिक मुक्ति में ही निबटा दी जाए तो और विकास कार्यों का क्या होगा। सच मानिए यह तो अच्छा हुआ कि नेताजी (निवर्तमान विधायक सुभाष यादव) ने खुद बसपा से नाता नहीं तोड़ा, बसपा की मुखिया ने ही उन्हें झटक कर दूर कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो जल्द ही नेताजी खुद बसपा से नाता तोड़ लेते। अब कांग्रेस के साथ आए हैं और अगर उन्हें जीत मिलती है तो देखिएगा, कैसे विकास होता है द्वाबा का। खैर, उस समर्थक ने हमारी और संजय सिंह की बातों में खलल डाल दिया था, लिहाजा काफी देर की चुप्पी के बाद संजय सिंह ने अपना मौन तोड़ा।
संजय ने कहा कि विकास करने के लिए बातों की नहीं, जमीन पर कार्य करने की जरूरत होती है। वह जनप्रतिनिधि ही क्या जो अपना हक न छीन सके। जब हमारे विधायक कमजोर होंगे तो हकीकत में किसी की भी सत्ता हो वह विकास जरूर करेगा। क्या भरत सिंह सपा शासनकाल में विधायक नहीं थे। सपा की सत्ता रहते हुए भी उन्होंने द्वाबा के गली-कूंचो तक विकास की किरण को पहुंचाया। यह तो कोरी बकवास है कि मुख्यमंत्री ने सुना ही नहीं। बलिया तो वैसे ही बागी के नाम से जाना जाता है। अगर विधायक की कही बात की सुनवाई नहीं हुई तो पूरे पांच साल तक वह कौन सा धर्म निभाते रहे। क्यों नहीं तभी नाता तोड़ लिया, जो आज नाता तोड़ने की बात कह रहे हैं। बातचीत के दौरान आई गर्माहट के बीच चाय की उस दुकान पर काफी लोगों का जमावड़ा लग गया था। बीसीयों की संख्या में मौजूद लोग मौन साधे दोनों समर्थकों की बातों को गौर से सुन रहे थे।
खैर, मैंने उन्हें टालने की मूड से घर जल्दी निकलने की बात कही और आगे बढ़ गया। हालांकि इन समर्थकों की बतकही के बीच एक बात तो स्पष्ट थी कि बैरिया विस के चुनाव में जातिगत आंकड़ों में कोई दम नजर नहीं आया। हां, विकास का मुद्दा यहा भारी दिखा। खैर, मतदान हो चुका था और प्रत्याशियों की किस्मत इवीएम की मेमोरी में फीड हो चुकी थी। अब देखना यह है कि द्वाबा की जनता ने किस ओर अपना रुझान किया है।
द्वाबा की गलियों में घुसते ही राजनीतिक चर्चाओं का अखाड़ा कहे जाने वाले हल्दी चट्टी पर कुछ राजनीतिज्ञों से सामना हुआ। हल्दी चट्टी की राजनीतिक विरासत काफी पुरानी है। यह छोटी सी चट्टी बमुश्किल आधा किलोमीटर के दायरे में सिमटी इस चट्टी पर बैठकर आप समूचे द्वाबा ही नहीं, बल्कि सदर विस समेत हर विस की तहकीकात कर सकते हैं। राजनीतिक अखाड़ा मानी जाने वाली इस चट्टी की खासियत यह है कि यहां हर प्रत्याशी दिन भर कहीं भी रहे, एकाध चक्कर तो मार ही लेता है। समर्थकों से दुआ सलाम के साथ ही कहां कौन से मतदाता किस दल की ओर जा रहे हैं, इसकी पूरी टोह प्रत्याशी यहां अपने समर्थकों से लेते हैं। बातों ही बातों में बैरिया विस में रोचक मुकाबला होने की चर्चा खास रही। मुद्दा था प्रदेश सरकार के खाद्य तथा रसद राज्यमंत्री व भाजपा प्रत्याशी भरत सिंह तथा वर्तमान विधायक व कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष यादव के बीच रोमांचक मुकाबले का।
बीच में पूर्व मंत्री शारदानंद अंचल के पुत्र व सपा प्रत्याशी जयप्रकाश अंचल की बैरिया विस में पहली मर्तबा में दखलंदाजी को लेकर भी चर्चाएं हो रहीं थीं। हर आंखों में चमक थी, चाहें वह किसी भी दल का समर्थक क्यों न हो? मानों उसका प्रत्याशी दमदार जीत हासिल कर रहा हो। यहां हमारी मुलाकात हल्दी के रहने वाले संजय सिंह से हुई। बकौल संजय, बैरिया विस की लड़ाई में अबकी जातिगत आंकड़ों के बजाय विकास को मुद्दा मतदाता मान रहे हैं। पूर्व मंत्री भरत सिंह ने यहां विकास को काफी गति दी थी। बात चाहें द्वाबा के जल में घुले आर्सेनिक के मुद्दे की हो, या यहां की सड़कों की। सड़क निर्माण में कुछ ठेकेदारों ने लूट-खसोट जरूर की, लेकिन फिर भी विकास दिख रहा था। अब तो हालात पांच साल में इतने बदतर हो गए हैं कि लगता ही नहीं कि वह पांच साल पहले वाला द्वाबा है। जर्जर सड़कों पर वाहन तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है।
आर्सेनिक से मुक्ति की बात कौन कहे, लोग इसे ही नीयति मान अब जहरीले जल का सेवन करने लगे थे। अरसे से खराब हैंडपंप पूरे पांच साल में जंग खा गए। कोई पूछने तक नहीं पहुंचा। पूरे सूबे में जातिगत आंकड़ों को जीत का पैमाना मानने की बात को टटोलने की गरज से जब इस संवाददाता ने संजय सिंह से सवाल किया तो उसका दो टूक जवाब था। जाति क्या करेगी। विकास कहने से नहीं होता। जमीन पर दिखना भी चाहिए। उसने सवाल किया, आप पहले भी यहां आते-जाते रहे हैं। हल्दी से चार किमी की दूरी तय करने का औसत समय कितना होना चाहिए। जनाब, पूरे एक घंटे लगते हैं इस चार किमी की दूरी तय करने में। अगर पहाड़ भी होता तो इतना ही वक्त लगता। उसकी बातों में दम भी था।
कारण कि जब मैं हल्दी से सोनवानी चट्टी पर पहुंचा तो जर्जर सड़क से जाने में पूरे 50 मिनट का वक्त लग गया था। सड़क भी इतनी खतरनाक थी कि जब जीप हिचकोले लेती थी तो कलेजा मुंह को आ जाता था। मानों सड़क और जीप के बीच 90 डिग्री का कोण बन रहा हो। यह तो माहिर जीप चालक ही हैं तो थोड़ा अधिक किराया लेकर भी यात्रियों को वक्त रहते उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचा दे रहे हैं। अभी बात आगे ही बढ़ी थी कि वहां मौजूद एक तत्कालीन विधायक सुभाष यादव के समर्थक से रहा नहीं गया। उसने कहा कि आखिर विधायक जी क्या कर लेते, जब सूबे की मुख्यिा ही उनकी सुनने को तैयार नहीं थीं। कई बार तो विधायक जी ने मुद्दा उठाया, लेकिन कोई सुने तब न। अचानक उनके बीच में बोलने पर हमने उनका नाम, पता जानना चाहा तो वह टाल गए। खैर, अब जरा उनकी बातों को विस्तार से सुनिए कि उन्होंने क्या कहा? उस समर्थक ने पूरे जोश से कहा कि विधायक जी हर बार सूबे की मुख्यमंत्री ही नहीं, संबंधित मंत्रियों से अगर लखनऊ में मिलते थे तो द्वाबा की समस्याओं से रुबरू कराते थे। हर बार वही आश्वासन कि हां देख रहे हैं। विधायक जी खुद कहते थे कि फलां मंत्री से बात हुई है, कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।
जब उनसे यह कहा गया कि विधायक निधि से विधायक जी ने विकास को अमलीजामा क्यों नहीं पहनाया गया। इस पर वह समर्थक तुनक गया। बोल पड़ा कि विधायक निधि मिलती है तो उससे केवल एक इलाके का ही विकास ठीक से नहीं हो सकता। इसके अलावा कई जरूरतमंदो की मदद भी उसी विधायक निधि पर टिकी होती है। सारी विधायक निधि यदि सड़क निर्माण या आर्सेनिक मुक्ति में ही निबटा दी जाए तो और विकास कार्यों का क्या होगा। सच मानिए यह तो अच्छा हुआ कि नेताजी (निवर्तमान विधायक सुभाष यादव) ने खुद बसपा से नाता नहीं तोड़ा, बसपा की मुखिया ने ही उन्हें झटक कर दूर कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो जल्द ही नेताजी खुद बसपा से नाता तोड़ लेते। अब कांग्रेस के साथ आए हैं और अगर उन्हें जीत मिलती है तो देखिएगा, कैसे विकास होता है द्वाबा का। खैर, उस समर्थक ने हमारी और संजय सिंह की बातों में खलल डाल दिया था, लिहाजा काफी देर की चुप्पी के बाद संजय सिंह ने अपना मौन तोड़ा।
संजय ने कहा कि विकास करने के लिए बातों की नहीं, जमीन पर कार्य करने की जरूरत होती है। वह जनप्रतिनिधि ही क्या जो अपना हक न छीन सके। जब हमारे विधायक कमजोर होंगे तो हकीकत में किसी की भी सत्ता हो वह विकास जरूर करेगा। क्या भरत सिंह सपा शासनकाल में विधायक नहीं थे। सपा की सत्ता रहते हुए भी उन्होंने द्वाबा के गली-कूंचो तक विकास की किरण को पहुंचाया। यह तो कोरी बकवास है कि मुख्यमंत्री ने सुना ही नहीं। बलिया तो वैसे ही बागी के नाम से जाना जाता है। अगर विधायक की कही बात की सुनवाई नहीं हुई तो पूरे पांच साल तक वह कौन सा धर्म निभाते रहे। क्यों नहीं तभी नाता तोड़ लिया, जो आज नाता तोड़ने की बात कह रहे हैं। बातचीत के दौरान आई गर्माहट के बीच चाय की उस दुकान पर काफी लोगों का जमावड़ा लग गया था। बीसीयों की संख्या में मौजूद लोग मौन साधे दोनों समर्थकों की बातों को गौर से सुन रहे थे।
खैर, मैंने उन्हें टालने की मूड से घर जल्दी निकलने की बात कही और आगे बढ़ गया। हालांकि इन समर्थकों की बतकही के बीच एक बात तो स्पष्ट थी कि बैरिया विस के चुनाव में जातिगत आंकड़ों में कोई दम नजर नहीं आया। हां, विकास का मुद्दा यहा भारी दिखा। खैर, मतदान हो चुका था और प्रत्याशियों की किस्मत इवीएम की मेमोरी में फीड हो चुकी थी। अब देखना यह है कि द्वाबा की जनता ने किस ओर अपना रुझान किया है।
