श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः
श्री गणेशाय नमः

Monday, July 16, 2012

‘हमें बचाओ’


गंगा कहे पुकार के...

संघर्ष
गंगा की अविरल धारा के लिए सड़क पर उतरे संत
प्रदूषित होती गंगा पर रोक लगाने की भरी हुंकार
टिहरी में कैद गंगा नदी को मुक्त करने की जरूरत
जनजागरुकता से ही दूर हो सकता नदी का प्रदूषण

गंगा की धारा को अविरल, निर्मल तथा आचमन लायक बनाने का संतों ने बीड़ा उठाया है। उनका सवाल ही जायज है। युगों-युगों से आस्था की पर्याय रही गंगा में जहां मानव, औद्योगिक कचरा गिराया जा रहा है, वहीं टिहरी में गंगा को कैद कर रही-सही कसर भी पूरी कर दी गई है। क्या संतों का यह आंदोलन हकीकत में गंगा नदी को ‘गंगा मईया’ बना पाएगा? एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय, मीडिया इन्चार्जे, हमवतन, साप्ताहिक समाचार पत्र, नई दिल्ली
दिनोंदिन प्रदूषित होती गंगा पर रोक लगाने के लिए हुंकार भरते हुए संत समाज सड़क पर उतर गया। संतों की अगुवाई की कमान खुद जगदगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने संभाली है। दिल्ली के राजघाट पर जुटे पर्यावरणविद् और संतों ने बापू की समाधि पर जलाभिषेक, सर्वधर्म सभा के बाद प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर पर पहुंचकर गंगा मुक्ति की आवाज बुलंद की। अविरल, निर्मल गंगा के मसले पर केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट घोषणा न होने से क्षुब्ध संतों ने गंगा तपस्या जारी रखने की घोषणा की है। आस्था का पर्याय रही गंगा में व्याप्त प्रदूषण को लेकर मुखर हुए संतों की यह आवाज इसका आगाज है कि अगर जल्द गंगा को अविरल नहीं किया गया और उसे कचरे से मुक्ति नहीं मिली तो न सिर्फ गंगा अपना अस्तित्व खो देगी, बल्कि मानव समाज एक विशाल जलस्रोत को भी खो देगा। संतों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें देश के विकास से कोई ऐतराज नहीं है। विकास हो, लेकिन भागीरथी को मिटाने की शर्त पर नहीं।
यह हैं हालात
देश में कुल नौ हजार 987 छोटे-बड़े नाले गंगा नदी में गिराए जा रहे हैं। वहीं अकेले पूर्वांचल के इलाहाबाद, वाराणसी, गाजीपुर और बलिया जिले में एक हजार 67 नाले गंगा नदी में गिरते हैं। वहीं अकेले कानपुर में चमड़ा शोधक कारखाने से आज भी काफी तादाद में रसायनिक कचरा गंगा नदी में गिराया जाता है। वहीं विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच हिमालय और हिमालयवासियों के दर्द को समझना जरूरी है। मध्य हिमालय दुनिया के सबसे कच्चा पहाड़ हैं। उत्तराखंड में नीति-नियंताओं ने माना है कि यहां की जल संपदा से 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादित हो सकती है। इसके लिए उन्हें एक उपाय सूझा जिल विद्युत परियोजना बनाने का। इसकी शुरुआत 70 के दशक में टिहरी बांध निर्माण से हुई। कुल 2400 मेगावाट की इस परियोजना को दुनिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक बताया गया। सरकारों ने कहा कि इससे पहाड़ का जीवन बदलेगा। देश की संपन्नता में यह बांध मील का पत्थर बनेगा। इसके लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर टिहरी के अलावा 125 गांवों को जलसमाधि दे दी गई। काफी लोग विस्थापित हुए। जिस परियोजना से दावा किया जा रहा था कि इससे 2400 मेगावाट बिजली पैदा होगी, उससे आज महज 700 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है।

कंपनियों के आगे झुकी सरकार
मौजूदा हालात को देखकर यह कहा जा सकता है कि केंद्र हो या प्रदेश की सरकारें। उन्होंने मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के हितों के सामने सर्मपण कर दिया है। अगर सरकारें ऐसे ही ढर्रे पर चलती रहीं, तो आने वाले दिनों में अकेले उत्तराखंड में 558 बांध अस्तित्व में आ सकते हैं। मौजूदा समय में अलकनंदा और भागीरथी पर 76 से अधिक बांध बन रहे हैं। आने वाले दिनों में अकेले उत्तराखंड में 176 बांध होंगे। इन बांधों से निकलने वाली सुरंगों की लंबाई 1600 किलोमीटर से अधिक है। बदरीनाथ से लेकर देवप्रयाग तक की 135 किलोमीटर की लंबाई में 76 बांध प्रस्तावित हैं। औसत हर तीन किलोमीटर पर एक बांध बनेगा। इन सभी बांधों से दो से लेकर नौ किलोमीटर तक की सुरंगे बनने वाली हैं। एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है, तो उत्तराखंड की 27 लाख से अधिक आबादी इन सुरंगों के ऊपर होगी। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर जोशीमठ के नीचे से तपोवन-विष्णुगाड परियोजना के लिए सुरंग खोद दी गई है। जोशीमठ के सामने बसे चांई गांव को विष्णुगाड परियोजना के पावर हाउस ने पहले ही निगल लिया है। चमोली के छह गांव पहले ही नेस्तनाबूत हो गए हैं, जबकि 38 गांवों पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। पर्यावरण की प्रहरी रही गौरा देवी का गांव और रैंणी जंगल ताला जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंग के उपर आ गया है। दो वर्ष पूर्व बागेश्वर जनपद के कपकोट में सरयू नदी पर बन रही परियोजना की सुरंग की जद में आकर स्कूल भवन टूट गया था। इसमें 18 बच्चों की मौत हो गई थी।
औद्योगिकीकरण का मंडराता खतरा
एक तो नदियां पहले से ही प्रदूषित हैं। उस पर औद्योगिक इकाईयां भी इसमें इजाफा कर रही हैं। अकेले कानपुर में ही रोजाना करीब 400 चमड़ा शोधक फैक्टरियों से करीब तीन करोड़ लीटर गंदा जल रोजाना गंगा के जल में समाहित होता है। इसमें बड़े पैमाने में क्रोमियम, लेड, रासायनिक बाई प्रोडक्ट होते हैं। वाराणसी, गाजीपुर, बलिया सरीखे छोटे-बड़े जिले से भी तकरीबन 19 करोड़ लीटर गंदा पानी खुली नालियों से गंगा की जलधारा में गिराया जाता है। वहीं उत्तरांचल में पेपर इंडस्ट्री से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों से तो पानी का रंग भी बदरंग होता जा रहा है। हालांकि उत्तर प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड में पेपर इंडस्ट्री से फैल रहे जल प्रदूषण को केंद्र सरकार   ने गंभीरता से लिया है। विशेषकर उन इकाइयों से जहां एग्री वेस्ट से कागज निर्माण के बाद इससे निकलने वाले ब्लैक लीकर के निस्तारण को कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। केंद्र सरकार की पहल पर उत्तराखंड सरकार ने पेपर इंडस्ट्री पर कड़ी नजर रखने का निर्णय लिया है। इसके तहत जिन इकाईयों में एग्री वेस्ट से कागज बनता है, वहां से निकलने वाले ब्लैक लीकर के निस्तारण के लिए रिकवरी प्लांट लगेंगे। ताकि, नदी-नालों में साफ पानी प्रवाहित हो। साथ ही सैंपलिंग में भी तेजी आएगी। उत्तराखंड के पेपर मिलों पर नजर डालें तो ऊधमसिंह नगर में 35 तथा हरिद्वार, नैनीताल में इनकी संख्या पांच-पांच हैं। पेपर मिलों में एग्रीकल्चर वेस्ट और वेस्ट पेपर से कागज बनता है। बगास (गन्ने की पेराई के बाद बचा वेस्ट), धान व गेहूं का भूसा जैसे एग्री वेस्ट से कागज बनाने के प्रोसेस से सर्वाधिक प्रदूषण फैल रहा है। इस प्रक्रि या में कास्टिक सोडे के इस्तेमाल के बाद निकलने वाले रसायनयुक्त वेस्ट (ब्लैक लीकर) के निस्तारण की व्यवस्था नहीं है। इसे नदी-नालों में छोड़ दिया जाता है। इसमें मौजूद कास्टिक सोडा समेत अन्य तत्व जल प्रदूषण का सबब बन रहे हैं।
काश! जाग गई होती सरकार
वर्ष 1986 से शुरू हुई गंगा सफाई की मुहिम तभी मुकाम पा सकती थी, अगर उसे गंभीरता से लिया गया होता। पांच सौ करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई गंगा सफाई परियोजना पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन मामला जस का तस है। वहीं यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा तटीय यूपी के 14 जिलों के भूमिगत जल में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक की पुष्टि हुई है। यूनीसेफ के मानक के मुताबिक 10 पीपीबी (पार्ट पर बिलियन) से अधिक आर्सेनिक की मात्रा मानव शरीर के लिए घातक है। वहीं अकेले यूपी में 50 से लेकर 450 पीपीबी तक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है। जानकार बताते हैं कि गंगा में व्याप्त प्रदूषण के चलते ही गंगा का रिसा जल भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहा है। यही वजह है कि इन इलाकों में आर्सेनिक की मात्रा मानक से कई गुना अधिक हो चुकी है। वहीं हरिद्वार की दवा कंपनियां खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाइड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देते हैं। इससे गंगा जल में आक्सीजन की मात्रा में भी अप्रत्याशित गिरावट आई है।

खफा हैं संत समाज
हालांकि सरकार बार-बार कारखानों के दूषित जल को शोधित कर गंगा में गिरवाने का भरोसा देती है, लेकिन अब तक इस पर पूर्णतया अमल नहीं हो सका है। हालांकि अब संत समाज शोधित जल को भी गंगा में नहीं गिरने देना चाहता। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनिजी का कहना है कि गंगा में प्रदूषित जल की तो बात छोड़िए, शोधित जल की भी एक बूंद गिराना स्वीकार नहीं है। संत समाज को गंगात्री से गंगा सागर तक गंगा अविरल-निर्मल चाहिए। वहीं रमा रावरकर राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की विशेषज्ञ सदस्य रमा रावरकर का कहना है कि अकेले वह नहीं देश के सारे वैज्ञानिक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से बोल रहे हैं कि गंगा की अविरलता बेहद जरूरी है। इसके बाद भी गंगा पर बांधों की श्रृंखला जारी है। गंगा केवल देश की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की धरोहर है। इसके सूखते ही भारत के 46 फीसदी लोगों का जीवन गहरे संकट में आ जाएगा। उन्होंने अफसोस जताया कि 15 वर्ष पूर्व यह तपस्या शुरू हुई होती, तो टिहरी डैम न बन पाता और गंगा की ऐसी दशा न होती। 
गंगा अभियान को विश्वव्यापी बनाने की रणनीति
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन की अगुवाई ज्योतिष और द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का कहना था कि दिल्ली में गंगा मुक्ति महासंग्राम का श्रीगणेश करने के बाद संत समाज अब गंगा अभियान को विश्वव्यापी बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पूरी कोशिश प्रयाग में आयोजित कुंभ से पहले गंगा की अविरलता सुनिश्चित कराने की है। इसके लिए विश्वव्यापी गंगा अभियान का पूरा कार्यक्रम भी तैयार है। इस प्लान के मुताबिक तपस्या जारी रखते हुए गंगा अभियान को अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर विस्तार देना है। इसमें पहली प्राथमिकता विश्व के कोने-कोने तक गंगा यात्रा पहुंचाकर वहां प्रवास कर रहे भारतीयों के बीच भागीरथी की पुकार पहुंचाने की है। प्रांतीय व जिला स्तर पर भी गंगा यात्रा निकालने की रणनीति तय है। रोडमैप में पद यात्रा और छोटी-छोटी संभावनाओं के जरिए जन जागृति पैदा की जाएगी। गंगा में गिर रहे हर बड़े  नालों के निकट धरना-उपवास का भी कार्यक्रम होगा। इन कार्यक्रमों का मकसद यह है कि 30 सितंबर को चातुर्मास समाप्त होने तक गंगा आंदोलन की एक मजबूत बुनियाद खड़ी की जा सके। साथ ही 25 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित संतों और गंगा भक्तों का आंदोलन महज राष्ट्रीय न हो कर विश्वव्यापी हो सके। 
छात्र आंदोलन का करेंगे आगाज

पूर्वांचल आध्यात्मिक चिंतन संस्थान के संयोजक रमाशंकर तिवारी ने मोबाइल पर बताया कि संतों ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि उन्हें जल्द स्वच्छ, अविरल गंगा चाहिए। सभी संत गंगा की सौगंध खाकर इस आंदोलन में कूद रहे हैं। हर हाल में हिंदुओं की प्राणाधार गंगा अविरल चाहिए। टिहरी के कैद से मुक्त हुए बिना अविरल गंगा का सपना अधूरा है। इस आंदोलन के साथ ही संस्थान के कार्यकर्ता 15 जुलाई से 15 अगस्त तक पूरे पूर्वांचल और निकटवर्ती बिहार प्रांत में गंगा मुक्ति छात्र आंदोलन चलाएंगे। यह आंदोलन पूरी तरह से छात्र शक्ति का होगा। इससे न सिर्फ छात्रों को गंगा की स्वच्छता और निर्मलता के  बारे में अवगत कराया जाएगा, बल्कि उन्हें इस आंदोलन से जोड़कर गंगा की टिहरी से आजादी की दूसरी जंग लड़ी जाएगी। उन्होंने गंगा मुक्ति के लिए केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि एक तरफ सरकार यह कहती है कि दिनोंदिन पेयजलस्रोत में कमी आ रही है। जल संरक्षण पर ध्यान देने के लिए कई नियम और कानून बनाए जाते हैं, लेकिन अतिप्राचीन भारतीयों के पेयजल स्रोत गंगा को टिहरी में बांधकर गंगा तटवर्ती इलाकों के वाशिंदों को पेयजल से दूर किया जा रहा है। इससे केंद्र सरकार की दोहरी मानसिकता का पता चलता है। उन्होंने दावा किया कि अगर टिहरी में कैद गंगा को अविरल छोड़ दिया जाए तो न सिर्फ प्रदूषित गंगा से मुक्ति मिल जाएगी, बल्कि भूमिगत जलस्रोत में इजाफा होगा और गंगा तटवर्ती इलाकों के वासियों को पेयजल के लिए भटकना भी नहीं पड़ेगा। गंगा की जलधारा में आज भी इतनी शक्ति है कि वह तमाम प्रदूषित जल को अपने में आत्मसात कर उस जल को भी आचमन योग्य बना सकती है।

  

Thursday, July 12, 2012

कर्नाटक का ‘नाटक’


राजनीति
बदलते समीकरण, राजनीति में घुसा जातिवाद
लिंगायत-वोक्कलिगा के बाद दलितों की जोर आजमाइश
क्षेत्रीयकरण की ओर बढ़ रही हैं भाजपा-कांग्रेस पार्टियां
राष्ट्रपति-विधानसभा चुनाव की आहट से माहौल तल्ख
मुख्यमंत्री संग उप मुख्यमंत्री पद पर जातिवाद की आहट

कर्नाटक में दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कलिगा का हमेशा आमना-सामना होता रहा है। दोनों एक-दूसरे पर राजनीतिक रूप से भारी पड़ने की कवायद में जुटे रहे हैं। अब यहां दलितों की जोर आजमाइश भी सामने आने लगी है। सीएम की ताजपोशी को लेकर मचे बवंडर के बाद यहां का राजनीतिक समीकरण बदलता दिख रहा है। आखिर क्या होगा इसका असर? पढ़िए एक रिपोर्ट...
 

अनीश कुमार उपाध्याय / दिल्ली
एक तरफ पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियों को पीछे धकेल कर क्षेत्रीय पार्टियां अपना रुतबा बढ़ा रही हैं, तो दूसरी तरफ कर्नाटक में एक अलग ही राजनीतिक परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है। देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का यहां क्षेत्रीयकरण हो रहा है। दोनों पार्टियां स्थानीय जातीय समीकरणों के जाल में अजीब तरह से उलझ चुकी हैं। इन पार्टियों के संगठनों में बहुसंख्यक समुदायों की पकड़ मजबूत बनाने की जंग तेज है। इस जंग में यह पार्टियां खेमों में बंट चुकी हैं। दरअसल इसे कर्नाटक की राजनीति का पुराना ट्रेंड ही माना जा सकता है। दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कलिगा के बाद अब यहां दलितों की जोर आजमाइश भी शुरू हो चुकी है। तय है कि ऐसे में राजनीतिक वजन बढ़ाने की जंग काफी तीखी हो चुकी है। राष्ट्रपति चुनाव और राज्य विधानसभा का चुनाव समय से पहले होने की कयासबाजियों तथा नए सीएम की ताजपोशी ने पूरे माहौल में एक तड़का सा डाल दिया है। 
दो प्रमुख जातियों पर टिका दारोमदार
गौरतलब है कि राज्य में एक वर्ष से कम ही समय में विधानसभा चुनाव होना है। दशकों से कर्नाटक की राजनीति का रास्ता तय करने वाली दो प्रमुख जातियों ने फिर से अपना लोहा मनवाने के लिए दोनों पार्टियों के प्रमुख पदों पर कब्जा जमाने की होड़ में है। राज्य की साढेÞ छह करोड़ की आबादी में से 17 प्रतिशत लिंगायत और 16 प्रतिशत वोक्कलिगा हैं। इन दोनों समुदायों के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के अंदर जबर्दस्त खेमेबाजी शुरू कर दी है। जब भाजपा ने वर्ष 2008 में कर्नाटक के रूप में दक्षिण भारत के किसी राज्य की सत्ता पर पहली बार अपनी ताकत पर पकड़ बनाई तो उसे कथित तौर पर ‘लिंगायतों को वोक्कलिगा समुदाय के धोखे’ की भावना का पूरा फायदा मिला था। वोक्कलिगा समुदाय जनता दल (एस) का समर्थक माना जाता है। लिंगायत समुदाय ने जद (एस) के प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी द्वारा अपने वादे से हटते हुए लिंगायत बीएस येदुरप्पा को सत्ता न सौंपने को वोक्कलिगा समुदाय की धोखेबाजी मानी थी। 
भारी पड़ते रहे हैं लिंगायत
मई 2008 में हुए चुनाव में येदुरप्पा के प्रति लिंगायतों की सहानुभूति की लहर का भरपूर फायदा मिला। उस चुनावी जीत के बाद भ्रष्टाचार के कई आरोपों में उलझे येदुरप्पा को अपनी कुर्सी खाली करनी पड़ी। उनके स्थान पर डीवी सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। ये वोक्कलिगा समुदाय के हैं। अब लिंगायतों ने उन पर छह महीने के अंदर अपना पद छोड़कर येदुरप्पा की वापसी का रास्ता साफ करने के वादे से मुकरने का आरोप लगाया जा रहा है। भाजपा में येदुरप्पा समर्थक विधायकों का एक बड़ा खेमा बन चुका है। ये पार्टी के अंदर ही आर-पार की जंग लड़ने को तैयार दिख रहे हैं। सदानंद गौड़ा ने हाल में बेंगलूर में आयोजित वोक्कलिगा समुदाय के एक सम्मेलन में यह कहकर लिंगायतों की भावनाओं को आहत कर दिया कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी वोक्कलिगा समुदाय के समर्थन के कारण मिली। उसी समय से पार्टी के लिंगायत विधायकों और मंत्रियों ने सदानंद गौड़ा को कुर्सी से हटाने के लिए ‘करो या मरो’ की जंग छेड़ रखी है।
लिंगायत नेता शेट्टर की ताजपोशी
जातिगत राजनीति को ही इसके मूल में माना जा रहा है कि लंबी जद्दोजहद के बाद येदुरप्पा के आगे झुकते हुए भाजपा नेतृत्व ने वहां के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को हटाकर उनकी जगह लिंगायत नेता जगदीश शेट्टर की ताजपोशी करने का फैसला कर लिया है। इस आशय की घोषणा सप्ताह भर के भीतर होने की उम्मीद है। इस ताजपोशी से यह माना जा रहा है कि भाजपा ने लंबी जद्दोजहद के बाद अब इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है कि कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री वीएस येदुरप्पा की ही चलेगी। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भी इस बात को मानने के लिए विवश हो गए हैं कि शेट्टर को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाने के अलावा अब और कोई विकल्प नहीं है। इस फैसले पर भाजपा संसदीय बोर्ड की मुहर लगनी आवश्यक है। यह पार्टी की निर्णय लेने वाली शीर्ष संस्था है और अधिकांश सदस्यों के बीच इसको लेकर सहमति है कि राज्य में भाजपा के असंतुष्ट खेमे की ओर से चार साल से दी जा रही धमकियों से पार्टी की छवि देशभर में खराब हो रही है।
ऐसे बनी ताजपोशी की बात
भाजपा के केंद्रीय नेताओं को इस बात की चिंता थी कि आगामी विधानसभा चुनाव घोषित होने तक पार्टी में दुबारा बगावत न हो और अगले चुनाव के बाद पार्टी की सत्ता में वापसी हो सके। हालांकि मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को बदलने का विरोध लालकृष्ण आडवाणी कर चुके थे। इसके बाद भी भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का मानना है कि शेट्टर को मुख्यमंत्री   होना चाहिए। वहीं शेट्टर ने मीडिया के सामने कहा है कि आलाकमान का फैसला हफ्ते भर के भीतर आने की उम्मीद है। हमने सब कुछ पार्टी नेतृत्व पर छोड़ दिया है। वहीं सूत्रों का यह भी कहना है कि भाजपा संसदीय दल के नेता लालकृष्ण आडवाणी हालांकि मौजूदा विधानसभा में तीसरा मुख्यमंत्री चुनने के पक्ष में नहीं हैं। वे येदुरप्पा के भी खिलाफ हैं, क्योंकि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण आडवाणी की काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर की गई यात्रा पर प्रतिकूल असर पड़ा था। आडवाणी नहीं चाहते थे कि येदुरप्पा के किसी मनोनीत व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और पार्टी महासचिव अनंत कुमार भी येदुरप्पा के करीबी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे।
कुरूबा-वोक्कलिगा को लुभाने की कोशिश
जातिगत राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि यहां सत्तासीन भाजपा कुरूबा-वोक्कलिगा को लुभाने के लिए भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। लिंगायत नेता के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद ये दोनों समुदाय भाजपा से कट न सके इसके लिए भाजपा नेतृत्व उप मुख्यमंत्री पद पर भी विचार कर सकता है। शायद यही वजह है कि भाजपा की कर्नाटक इकाई के प्रमुख केएस ईश्वरप्पा उप मुख्यमंत्री पद के लिए खेमेबंदी कर रहे हैं। वे कुरूबा समुदाय के हैं। उनके अलावा आर अशोक भी इस दौड़ में हैं, जो सदानंद गौड़ा की तरह वोक्कलिगा समुदाय से हैं। ईश्वरप्पा ने इससे पहले सरकार में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई थी। वहीं पार्टी में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर आलाकमान के सामने दो उप मुख्यमंत्री नियुक्त करने के सुझाव हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव 2013 के उत्तरार्ध में होने हैं। अगर यहां दो उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति हो जाती है तो इस चुनाव में भाजपा को जातिगत समीकरणों का लाभ मिल सकता है।
कांग्रेस भी डाल रही डोरे
कांग्रेस की हालत राज्य के जातीय समीकरण में काफी अजीब सी है। इसे कुछ हद तक बेईमानी भी कह सकते हैं। हाल में इस समीकरण में कांग्रेस की रणनीतिक पैठ बेहतर बनाने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने टुमकूर के सिद्धगंगा मठ जाकर लिंगायत समुदाय के धर्मगुरु  शिवकुमार स्वामी से मिलकर अपनी दिशा का संकेत दे दिया था। वहीं इस पार्टी के सबसे असरदार और विधानसभा में विपक्ष के नेता सिद्दरामैया दलित कुरुबा समाज से आते हैं। हालांकि उनका पार्टी के अंदर फिलहाल कोई विरोध नहीं हो रहा है, लेकिन जंग यहां भी मची है। यह जंग पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए लड़ी जा रही है। इसका नेतृत्व कांग्रेस के 82 वर्षीय वरिष्ठ लिंगायत नेता और पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष शामनूर शिवशंकरप्पा कर रहे हैं। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को इस बात का भरोसा दिलाना चाहते हैं कि कर्नाटक में अगले चुनाव का विजेता वही होगा, जो लिंगायतों की सहानुभूति जीतने में सफल होगा।
कितने सशक्त हैं शिवशंकरप्पा
वरिष्ठ लिंगायत नेता शामनूर शिवशंकरप्पा का कहना है कि वोक्कलिगा समुदाय से कांग्रेस को समर्थन की उम्मीद बेमानी होगी। यह समुदाय हमेशा जद (एस) के पाले में रहा है। वहीं पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर अनुसूचित जाति के डॉ. जी परमेश्वर के होने से पार्टी किसी भी संख्या बहुल समुदाय से समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकेगी। उनका कहना है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को वापस सत्ता में लाना है, तो इसका एक ही रास्ता है कि किसी लिंगायत नेता को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंप दी जाए। वे वादा भी कर चुके हैं कि ऐसा करने से पार्टी को 225 सदस्यों वाली विधानसभा में 150 सीटें मिलेंगी। उल्लेखनीय है कि हाल में लिंगायत समुदाय के राजनीतिक नेताओं ने बेंगलूर में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर अपनी अगली रणनीति तय करने का प्रयास किया। इस सम्मेलन के बाद लिंगायतों ने भी प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष पद पर काबिज होने के लिए ‘करो या मरो’ की जंग छेड़ने की घोषणा कर दी। साफ है कि इस प्रकार की जाति आधारित राजनीतिक रणनीति बनाने वाले इस विश्वास के आधार पर काम कर रहे हैं कि इन दिनों भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेतृत्व में अंदरूनी मतभेद चरम पर है। कहीं ऐसा न हो कि दोनों पार्टियों को इस अंदरूनी ‘करो या मरो’ की जंग जारी रखते हुए कर्नाटक की जनता का समर्थन मांगने के लिए चुनाव मैदान में उतरना पडेÞ।
ऐसे खड़ा हुआ तूफान
कर्नाटक में 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा को दक्षिण में पहली बार सरकार बनाने का मौका मिला। हालांकि येदुरप्पा 2007 में भी कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री रहे, लेकिन 30 मई 2008 को राज्य के 25 वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उनका राज्य इकाई में सिक्का चलने लगा। भ्रष्टाचार तथा अवैध खनन के मुद्दे पर आलाकमान की ओर से इस्तीफा मांगने तथा आरोपमुक्त होने के बाद पुन: पद प्राप्ति के आश्वासन पर उन्होंने अपने विश्वसनीय सदानंद गौड़ा को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनवा दिया। बस यहीं से कर्नाटक में ऐसा राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ, जो आज तक थमने की राह देख रहा है। कर्नाटक में बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय के एकमात्र कद्दावर नेता येदुरप्पा को राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा कई बार दरिकनार किए जाने से येदुरप्पा समेत उनके समर्थक भी नाराज हैं। पिछले दिनों येदुरप्पा समर्थक नौ मंत्रियों की ओर से मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को अपने इस्तीफे सौंप राज्य में नए सियासी नाटक की नींव रख दी थी। हालांकि संवैधानिक रूप से ये इस्तीफे उन्हें राज्यपाल को सौंपने चाहिए थे, लेकिन मुख्यमंत्री को इस्तीफा सौंपने के पीछे   उनकी दबाव की राजनीति थी। इसके आगे केंद्रीय नेतृत्व भी झुकता दिखा। 
आज भी ‘दबंग’ हैं येदुरप्पा
पांच जुलाई तक राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग पर अडेÞ 50 विधायकों की ओर से भी केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया जाना इसका परिचायक है कि येदुरप्पा आज भी कर्नाटक की राजनीति में निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ हैं। उन्हें चुनौती देना राज्य भाजपा इकाई से लेकर केंद्रीय नेतृत्व के बस से बाहर की बात है। सदानंद गौड़ा ने मुख्यमंत्री पदभार संभालने के बाद जिस तरह से येदुरप्पा को हाशिये पर पहुंचाने का कार्य हुआ, उससे उन्होंने येदुरप्पा सहित उनके समर्थकों की नाराजगी मोल ले ली। येदुरप्पा समर्थक इससे पूर्व भी कई बार केंद्रीय नेतृत्व पर गौड़ा को पदच्युत करने का दबाव बना चुके थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ‘जो होगा, देखा जाएगा’ की तर्ज पर मूकदर्शक बनना आज राज्य में पार्टी की नींव को तो कमजोर कर ही गया है, राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी की छवि नकारात्मक बनती जा रही है। येदुरप्पा के ही कट्टर समर्थक जगदीश शेट्टार को राज्य की कमान सौंपने की जिद पर अडेÞ ये समर्थक पार्टी की कार्यकर्ता आधारित छवि को तोड़ उसे भी कांग्रेस की भांति एक सत्तात्मक व्यक्तिवादी पार्टी का चोला ओढ़ाना चाहते हैं। यह संघ को कतई मंजूर नहीं है, लेकिन येदुरप्पा की बढ़ी ताकत और उन्हें प्राप्त समर्थन से उसका अनुशासन का डंडा भी जोर नहीं मार रहा। 
अब खड़े हैं यक्ष प्रश्न
अब जगदीश शेट्टार यदि मुख्यमंत्री नियुक्त हो भी गए तो क्या यह परंपरा भाजपा में कुरीतियों को जन्म नहीं दे रही? यह यक्ष प्रश्न है। सवाल यह भी भाजपा शासित अन्य राज्यों से भी यदि ऐसा ही असंतोष उभरा तब केंद्रीय नेतृत्व क्या करेगा? क्या सभी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदल देना ही इस संकट का समाधान होगा? इसमें संशय नहीं कि येदुरप्पा कर्नाटक में अभूतपूर्व जनसमर्थन रखते हैं, लेकिन इससे उन्हें मनमानी की छूट तो नहीं दी जा सकती! कांग्रेस के नक्श-ए-कदम पर चल रही भाजपा में यदि यही हाल रहा तो शासित राज्यों में हर वर्ष एक नए मुख्यमंत्री को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलानी पडेगी। ऐसे में सुशासन व सुराज के पार्टी के दावे का क्या होगा? क्या भाजपा में नेतृत्व का संकट इतना गहरा गया है कि मामूली सा कार्यकर्ता सत्ता में आते ही खुद को सर्वेसर्वा मानने लगता है। अंदर ही अंदर पार्टी कमजोर होती है? जहां तक बात येदुरप्पा की है तो वे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे है। क्या वर्तमान में संघ के प्रचारक येदुरप्पा की भांति पद पिपासु हैं? आखिर येदुरप्पा किसके सामने और क्या आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं?