गंगा कहे पुकार के...
संघर्ष
गंगा की अविरल धारा के लिए सड़क पर उतरे संत
प्रदूषित होती गंगा पर रोक लगाने की भरी हुंकार
टिहरी में कैद गंगा नदी को मुक्त करने की जरूरत
जनजागरुकता से ही दूर हो सकता नदी का प्रदूषण
गंगा की धारा को अविरल, निर्मल तथा आचमन लायक बनाने का संतों ने बीड़ा उठाया है। उनका सवाल ही जायज है। युगों-युगों से आस्था की पर्याय रही गंगा में जहां मानव, औद्योगिक कचरा गिराया जा रहा है, वहीं टिहरी में गंगा को कैद कर रही-सही कसर भी पूरी कर दी गई है। क्या संतों का यह आंदोलन हकीकत में गंगा नदी को ‘गंगा मईया’ बना पाएगा? एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय, मीडिया इन्चार्जे, हमवतन, साप्ताहिक समाचार पत्र, नई दिल्ली
दिनोंदिन प्रदूषित होती गंगा पर रोक लगाने के लिए हुंकार भरते हुए संत समाज सड़क पर उतर गया। संतों की अगुवाई की कमान खुद जगदगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने संभाली है। दिल्ली के राजघाट पर जुटे पर्यावरणविद् और संतों ने बापू की समाधि पर जलाभिषेक, सर्वधर्म सभा के बाद प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर पर पहुंचकर गंगा मुक्ति की आवाज बुलंद की। अविरल, निर्मल गंगा के मसले पर केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट घोषणा न होने से क्षुब्ध संतों ने गंगा तपस्या जारी रखने की घोषणा की है। आस्था का पर्याय रही गंगा में व्याप्त प्रदूषण को लेकर मुखर हुए संतों की यह आवाज इसका आगाज है कि अगर जल्द गंगा को अविरल नहीं किया गया और उसे कचरे से मुक्ति नहीं मिली तो न सिर्फ गंगा अपना अस्तित्व खो देगी, बल्कि मानव समाज एक विशाल जलस्रोत को भी खो देगा। संतों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें देश के विकास से कोई ऐतराज नहीं है। विकास हो, लेकिन भागीरथी को मिटाने की शर्त पर नहीं।
यह हैं हालात
देश में कुल नौ हजार 987 छोटे-बड़े नाले गंगा नदी में गिराए जा रहे हैं। वहीं अकेले पूर्वांचल के इलाहाबाद, वाराणसी, गाजीपुर और बलिया जिले में एक हजार 67 नाले गंगा नदी में गिरते हैं। वहीं अकेले कानपुर में चमड़ा शोधक कारखाने से आज भी काफी तादाद में रसायनिक कचरा गंगा नदी में गिराया जाता है। वहीं विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच हिमालय और हिमालयवासियों के दर्द को समझना जरूरी है। मध्य हिमालय दुनिया के सबसे कच्चा पहाड़ हैं। उत्तराखंड में नीति-नियंताओं ने माना है कि यहां की जल संपदा से 40 हजार मेगावाट बिजली उत्पादित हो सकती है। इसके लिए उन्हें एक उपाय सूझा जिल विद्युत परियोजना बनाने का। इसकी शुरुआत 70 के दशक में टिहरी बांध निर्माण से हुई। कुल 2400 मेगावाट की इस परियोजना को दुनिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक बताया गया। सरकारों ने कहा कि इससे पहाड़ का जीवन बदलेगा। देश की संपन्नता में यह बांध मील का पत्थर बनेगा। इसके लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर टिहरी के अलावा 125 गांवों को जलसमाधि दे दी गई। काफी लोग विस्थापित हुए। जिस परियोजना से दावा किया जा रहा था कि इससे 2400 मेगावाट बिजली पैदा होगी, उससे आज महज 700 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है।
कंपनियों के आगे झुकी सरकार
मौजूदा हालात को देखकर यह कहा जा सकता है कि केंद्र हो या प्रदेश की सरकारें। उन्होंने मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के हितों के सामने सर्मपण कर दिया है। अगर सरकारें ऐसे ही ढर्रे पर चलती रहीं, तो आने वाले दिनों में अकेले उत्तराखंड में 558 बांध अस्तित्व में आ सकते हैं। मौजूदा समय में अलकनंदा और भागीरथी पर 76 से अधिक बांध बन रहे हैं। आने वाले दिनों में अकेले उत्तराखंड में 176 बांध होंगे। इन बांधों से निकलने वाली सुरंगों की लंबाई 1600 किलोमीटर से अधिक है। बदरीनाथ से लेकर देवप्रयाग तक की 135 किलोमीटर की लंबाई में 76 बांध प्रस्तावित हैं। औसत हर तीन किलोमीटर पर एक बांध बनेगा। इन सभी बांधों से दो से लेकर नौ किलोमीटर तक की सुरंगे बनने वाली हैं। एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है, तो उत्तराखंड की 27 लाख से अधिक आबादी इन सुरंगों के ऊपर होगी। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर जोशीमठ के नीचे से तपोवन-विष्णुगाड परियोजना के लिए सुरंग खोद दी गई है। जोशीमठ के सामने बसे चांई गांव को विष्णुगाड परियोजना के पावर हाउस ने पहले ही निगल लिया है। चमोली के छह गांव पहले ही नेस्तनाबूत हो गए हैं, जबकि 38 गांवों पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। पर्यावरण की प्रहरी रही गौरा देवी का गांव और रैंणी जंगल ताला जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंग के उपर आ गया है। दो वर्ष पूर्व बागेश्वर जनपद के कपकोट में सरयू नदी पर बन रही परियोजना की सुरंग की जद में आकर स्कूल भवन टूट गया था। इसमें 18 बच्चों की मौत हो गई थी।
औद्योगिकीकरण का मंडराता खतरा
एक तो नदियां पहले से ही प्रदूषित हैं। उस पर औद्योगिक इकाईयां भी इसमें इजाफा कर रही हैं। अकेले कानपुर में ही रोजाना करीब 400 चमड़ा शोधक फैक्टरियों से करीब तीन करोड़ लीटर गंदा जल रोजाना गंगा के जल में समाहित होता है। इसमें बड़े पैमाने में क्रोमियम, लेड, रासायनिक बाई प्रोडक्ट होते हैं। वाराणसी, गाजीपुर, बलिया सरीखे छोटे-बड़े जिले से भी तकरीबन 19 करोड़ लीटर गंदा पानी खुली नालियों से गंगा की जलधारा में गिराया जाता है। वहीं उत्तरांचल में पेपर इंडस्ट्री से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों से तो पानी का रंग भी बदरंग होता जा रहा है। हालांकि उत्तर प्रदेश के साथ ही उत्तराखंड में पेपर इंडस्ट्री से फैल रहे जल प्रदूषण को केंद्र सरकार ने गंभीरता से लिया है। विशेषकर उन इकाइयों से जहां एग्री वेस्ट से कागज निर्माण के बाद इससे निकलने वाले ब्लैक लीकर के निस्तारण को कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। केंद्र सरकार की पहल पर उत्तराखंड सरकार ने पेपर इंडस्ट्री पर कड़ी नजर रखने का निर्णय लिया है। इसके तहत जिन इकाईयों में एग्री वेस्ट से कागज बनता है, वहां से निकलने वाले ब्लैक लीकर के निस्तारण के लिए रिकवरी प्लांट लगेंगे। ताकि, नदी-नालों में साफ पानी प्रवाहित हो। साथ ही सैंपलिंग में भी तेजी आएगी। उत्तराखंड के पेपर मिलों पर नजर डालें तो ऊधमसिंह नगर में 35 तथा हरिद्वार, नैनीताल में इनकी संख्या पांच-पांच हैं। पेपर मिलों में एग्रीकल्चर वेस्ट और वेस्ट पेपर से कागज बनता है। बगास (गन्ने की पेराई के बाद बचा वेस्ट), धान व गेहूं का भूसा जैसे एग्री वेस्ट से कागज बनाने के प्रोसेस से सर्वाधिक प्रदूषण फैल रहा है। इस प्रक्रि या में कास्टिक सोडे के इस्तेमाल के बाद निकलने वाले रसायनयुक्त वेस्ट (ब्लैक लीकर) के निस्तारण की व्यवस्था नहीं है। इसे नदी-नालों में छोड़ दिया जाता है। इसमें मौजूद कास्टिक सोडा समेत अन्य तत्व जल प्रदूषण का सबब बन रहे हैं।
काश! जाग गई होती सरकार
वर्ष 1986 से शुरू हुई गंगा सफाई की मुहिम तभी मुकाम पा सकती थी, अगर उसे गंभीरता से लिया गया होता। पांच सौ करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई गंगा सफाई परियोजना पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन मामला जस का तस है। वहीं यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा तटीय यूपी के 14 जिलों के भूमिगत जल में मानक से नौ गुना अधिक आर्सेनिक की पुष्टि हुई है। यूनीसेफ के मानक के मुताबिक 10 पीपीबी (पार्ट पर बिलियन) से अधिक आर्सेनिक की मात्रा मानव शरीर के लिए घातक है। वहीं अकेले यूपी में 50 से लेकर 450 पीपीबी तक आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है। जानकार बताते हैं कि गंगा में व्याप्त प्रदूषण के चलते ही गंगा का रिसा जल भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहा है। यही वजह है कि इन इलाकों में आर्सेनिक की मात्रा मानक से कई गुना अधिक हो चुकी है। वहीं हरिद्वार की दवा कंपनियां खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाइड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देते हैं। इससे गंगा जल में आक्सीजन की मात्रा में भी अप्रत्याशित गिरावट आई है।
खफा हैं संत समाज
हालांकि सरकार बार-बार कारखानों के दूषित जल को शोधित कर गंगा में गिरवाने का भरोसा देती है, लेकिन अब तक इस पर पूर्णतया अमल नहीं हो सका है। हालांकि अब संत समाज शोधित जल को भी गंगा में नहीं गिरने देना चाहता। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनिजी का कहना है कि गंगा में प्रदूषित जल की तो बात छोड़िए, शोधित जल की भी एक बूंद गिराना स्वीकार नहीं है। संत समाज को गंगात्री से गंगा सागर तक गंगा अविरल-निर्मल चाहिए। वहीं रमा रावरकर राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की विशेषज्ञ सदस्य रमा रावरकर का कहना है कि अकेले वह नहीं देश के सारे वैज्ञानिक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से बोल रहे हैं कि गंगा की अविरलता बेहद जरूरी है। इसके बाद भी गंगा पर बांधों की श्रृंखला जारी है। गंगा केवल देश की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की धरोहर है। इसके सूखते ही भारत के 46 फीसदी लोगों का जीवन गहरे संकट में आ जाएगा। उन्होंने अफसोस जताया कि 15 वर्ष पूर्व यह तपस्या शुरू हुई होती, तो टिहरी डैम न बन पाता और गंगा की ऐसी दशा न होती।
गंगा अभियान को विश्वव्यापी बनाने की रणनीति
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन की अगुवाई ज्योतिष और द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का कहना था कि दिल्ली में गंगा मुक्ति महासंग्राम का श्रीगणेश करने के बाद संत समाज अब गंगा अभियान को विश्वव्यापी बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पूरी कोशिश प्रयाग में आयोजित कुंभ से पहले गंगा की अविरलता सुनिश्चित कराने की है। इसके लिए विश्वव्यापी गंगा अभियान का पूरा कार्यक्रम भी तैयार है। इस प्लान के मुताबिक तपस्या जारी रखते हुए गंगा अभियान को अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर विस्तार देना है। इसमें पहली प्राथमिकता विश्व के कोने-कोने तक गंगा यात्रा पहुंचाकर वहां प्रवास कर रहे भारतीयों के बीच भागीरथी की पुकार पहुंचाने की है। प्रांतीय व जिला स्तर पर भी गंगा यात्रा निकालने की रणनीति तय है। रोडमैप में पद यात्रा और छोटी-छोटी संभावनाओं के जरिए जन जागृति पैदा की जाएगी। गंगा में गिर रहे हर बड़े नालों के निकट धरना-उपवास का भी कार्यक्रम होगा। इन कार्यक्रमों का मकसद यह है कि 30 सितंबर को चातुर्मास समाप्त होने तक गंगा आंदोलन की एक मजबूत बुनियाद खड़ी की जा सके। साथ ही 25 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित संतों और गंगा भक्तों का आंदोलन महज राष्ट्रीय न हो कर विश्वव्यापी हो सके।
पूर्वांचल आध्यात्मिक चिंतन संस्थान के संयोजक रमाशंकर तिवारी ने मोबाइल पर बताया कि संतों ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि उन्हें जल्द स्वच्छ, अविरल गंगा चाहिए। सभी संत गंगा की सौगंध खाकर इस आंदोलन में कूद रहे हैं। हर हाल में हिंदुओं की प्राणाधार गंगा अविरल चाहिए। टिहरी के कैद से मुक्त हुए बिना अविरल गंगा का सपना अधूरा है। इस आंदोलन के साथ ही संस्थान के कार्यकर्ता 15 जुलाई से 15 अगस्त तक पूरे पूर्वांचल और निकटवर्ती बिहार प्रांत में गंगा मुक्ति छात्र आंदोलन चलाएंगे। यह आंदोलन पूरी तरह से छात्र शक्ति का होगा। इससे न सिर्फ छात्रों को गंगा की स्वच्छता और निर्मलता के बारे में अवगत कराया जाएगा, बल्कि उन्हें इस आंदोलन से जोड़कर गंगा की टिहरी से आजादी की दूसरी जंग लड़ी जाएगी। उन्होंने गंगा मुक्ति के लिए केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि एक तरफ सरकार यह कहती है कि दिनोंदिन पेयजलस्रोत में कमी आ रही है। जल संरक्षण पर ध्यान देने के लिए कई नियम और कानून बनाए जाते हैं, लेकिन अतिप्राचीन भारतीयों के पेयजल स्रोत गंगा को टिहरी में बांधकर गंगा तटवर्ती इलाकों के वाशिंदों को पेयजल से दूर किया जा रहा है। इससे केंद्र सरकार की दोहरी मानसिकता का पता चलता है। उन्होंने दावा किया कि अगर टिहरी में कैद गंगा को अविरल छोड़ दिया जाए तो न सिर्फ प्रदूषित गंगा से मुक्ति मिल जाएगी, बल्कि भूमिगत जलस्रोत में इजाफा होगा और गंगा तटवर्ती इलाकों के वासियों को पेयजल के लिए भटकना भी नहीं पड़ेगा। गंगा की जलधारा में आज भी इतनी शक्ति है कि वह तमाम प्रदूषित जल को अपने में आत्मसात कर उस जल को भी आचमन योग्य बना सकती है।






