श्री गणेशाय नमः

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Thursday, May 23, 2013

भारत की बिजली, पाक में देगी ‘झटका’


भारत-पाक संबंधों की खटास कोई नई बात नहीं है। इस बीच परिस्थितियों को सामान्य करने की लाख कोशिश हुई, लेकिन हर बार भारत को धोखा ही मिला। यह बात दीगर है कि आज भी पाक कई मामलों में भारत पर ही निर्भर है। कम से कम बिजली के मामले में उसे एक बार फिर भारत के पास ही आना पड़ा है। एक रिपोर्ट...
अनीश कुमार उपाध्याय/ दिल्ली
अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो काफी हद तक संभव है कि भारत में तैयार बिजली का झटका पाकिस्तान में महसूस किया जाएगा। चौंकिए मत! पाकिस्तान की नई सरकार भारत से अगले दो साल में करीब एक हजार मेगावॉट बिजली इंपोर्ट कर सकती है। देश में व्याप्त बिजली संकट को दूर करने के लिए पाकिस्तान इस योजना पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इस्लामाबाद के रहने वाले वर्ल्ड बैंक के एक अधिकारी के मुताबिक बिजली इंपोर्ट करने की संभावना को देखते हुए फिजिबिलिटी सर्वे भी कर लिया गया है। मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि भारत,  ईरान और अन्य सेंट्रल एशियाई देशों से पाक में बिजली आयात किए जाने की संभावना है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि देश के आर्थिक विकास को पटरी पर लाने के लिए ऐसा किया जाना बेहद जरूरी है। सत्ता पर काबिज होने की तैयारी कर रही नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) बिजली संकट को दूर करने के लिए सभी विकल्पों पर विचार कर रही है। 
यह है हालात
पाकिस्तान के मौसम में गर्मी की तेजी के साथ ही बिजली संकट भी गहराता जा रहा है। पाकिस्तान को हर दिन छह हजार मेगावॉट की कमी का सामना करना पड़ रहा है। हालात इस कदर हैं कि देश के विभिन्न शहरों और कस्बों में कई घंटों की लोड शेडिंग की जा रही है। इससे आम जनजीवन काफी प्रभावित हो रहा है। बिजली प्रदाता कंपनी पाकिस्तान इलेक्ट्रिक पॉवर कंपनी (पेपको) के अनुसार पाकिस्तान में बिजली का उत्पादन घटकर प्रतिदिन महज 10 हजार मेगावॉट रह गया है। वहीं इसके सापेक्ष बिजली की मांग 16 हजार मेगावॉट तक पहुंच चुकी है। ऐसे में इस समय पाकिस्तान में छह हजार मेगावॉट बिजली की कमी है। पेपको के पास तेल खरीदने के लिए धन नहीं है। इससे देश के विभिन्न शहरों में करीब 10 ग्रिड स्टेशन बंद पड़े हैं। इस समस्या से देश का उद्योग काफी प्रभावित है। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इससे निपटने के लिए वित्त मंत्रालय को आदेश दिया है कि वह पेपको को तेल खरीदने के लिए तत्काल धन दे। पूर्व में भी प्रधानमंत्री रहे यूसुफ रजा गिलानी ने भी बिजली की कमी को स्वीकार करते हुए विद्युत उत्पादन बढ़ाने के लिए नई परियोजनाओं पर काम होने की बात कही थी। बिजली उत्पादन में कमी के चलते लोडशेडिंग की अवधि शहरों में 10 से 12 घंटे तथा ग्रामीण अंचलों में 16 घंटे की गई है।
एसी-मोजे पर लगी पाबंदी
पाकिस्तान सरकार ने बिजली संकट से उबरने के लिए सरकारी दफ्तरों में एसी चलाने पर पाबंदी लगाने के साथ ही सरकारी कर्मचारियों पर मोजे पहनकर कार्यालय आने पर भी पाबंदी लगा दी है। पाक सरकार ने गत सप्ताह ही इस संबंध में एक परिपत्र जारी किया था। सरकार ने इसमें कहा था कि अगले सप्ताह से सभी सरकारी दफ्तरों में एसी नहीं चलेगी। कर्मचारी निर्धारित ड्रेस कोड में ही कार्यालय आएंगे। ड्रेस कोड में कर्मचारियों को हल्के रंग या सफेद रंग की शर्ट, हल्के रंग की पैंट या सलवार कमीज पहनकर दफ्तर आना होगा। कर्मचारी अब सिर्फ बिना फीते वाले जूते या सैंडल पहनकर दफ्तर आएंगे, लेकिन इसके साथ मोजा नहीं पहनना होगा। सरकार का तर्क है कि मोजे और फीते वाले जूते से गर्मी ज्यादा लगती है। इस नये कोड की तैयारी के लिए सात दिन का समय दिया है। इसके बाद सभी कर्मचारियों को नए ड्रेस कोड में ही दफ्तर आना होगा। यह भी हकीकत है कि आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे पाकिस्तान ने कभी इस समस्या को गंभीरता से लिया ही नहीं है। आतंकवाद समेत तमाम समस्याओं के चलते किसी राजनीतिज्ञ ने भी इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। अगर दिया भी गया, तो वहां की राजनीति में पिछले बरसों में हुए उलटफेर में उसकी सारी रणनीति धरी की धरी रह गई। वर्तमान में पाकिस्तान के पास जो बिजली उत्पादन इकाइयां हैं, वह 60 के दशक की हैं, जो अब धीरे-धीरे क्षमताहीन हो गई हैं। पूरे पाकिस्तान की बात कौन करे, यहां तक कि पाक की राजधानी इस्लामाबाद में ही कई-कई घंटे बिजली गुल रहती है। पाकिस्तान में बिजली आपूर्ति का संकट इतना अधिक गहराया है कि यहां के दूसरे सबसे बडे और व्यस्त शहर लाहौर में भी 12 से 13 घंटे तक बिजली नहीं रहती है। पेशावर में हर दिन 14 घंटे बिजली नहीं रहती और फैसलाबाद तथा गुजरांवाला में 20 घंटे तक बिजली गुल रहती है। बिजली आपूर्ति के संकट से सबसे अधिक पंजाब प्रांत जूझ रहा है और उत्तरी कबायली इलाकों में तो मात्र चार-पांच घंटे ही बिजली रहती है।
दो साल में पूरा होगा प्रोजेक्ट 
वर्ल्ड बैंक के अधिकारी के मुताबिक पाकिस्तान और भारत के बीच बिजली खरीदने की डील अगले दो साल में पूरी हो जाएगी। इसमें फिजिबिलिटी सर्वे, कीमत का निर्धारण, ट्रांसमिशन लाइन तैयार करने की प्रक्रिया भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान ऊर्जा के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। हालांकि, दोनों के बीच इसके लिए कोई मैकेनिज्म फिलहाल विकसित नहीं है। हालांकि इन सबके बीच यह भी सही है कि  पिछली पाक सरकार ने बीते साल भारत से 500 मेगावॉट बिजली इंपोर्ट किए जाने पर सैद्धांतिक तौर पर मंजूरी दी थी। दोनों देशों के जानकारों के बीच इस्लामाबाद में हुई मीटिंग में एक हाई वोल्टेज डायरेक्ट करेंट लिंक तैयार करने पर भी चर्चा हुई थी। भारतीय अधिकारियों ने उन जगहों का दौरा भी किया था, जहां इलेक्ट्रिक ग्रिड का निर्माण किया जाना था, लेकिन बाद में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया गया।

Monday, May 20, 2013

सियासत की धुरी पर ब्राह्मण समुदाय


अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
जातिगत राजनीति की धुरी पर हर दल अब ब्राह्मण को घुमाने की फिराक में है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब राजनितिक दल ब्राह्मणों पर डोरे डाल रहें हैं। कभी बसपा ने  ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा  का नारा दिया था, तो पिछले दिनों सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सपा की बैठक में खुद को ब्राह्मणों का सबसे बडा शुभचिंतक बताने में कोई कोर कसर नहीं छोडी। हालांकि यूपी की सियासत में ब्राह्मणों की दमदारी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उप्र में ब्राह्मण वोटरों की तादात करीब 21 फीसदी है। ऐसे अगर इनका पलडा जिसके खेमे में चला जाय, तो उसकी जीत पक्की हो सकती है। यही कारण है कि न सिर्फ बडी राजनितिक पार्टियाँ, बल्कि क्षेत्रीय दल भी ब्राह्मणों पर डोरे डालने के लिए बेसब्र हैं। अगर यह मान भी लें कि ब्राह्मण तख्ता पलट नहीं भी कर सकते, तो किसी भी दल का राजनीतिक समीकरण तो बिगड ही सकती है।  यूपी का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में ब्राह्मणों ने खूब राज किया है। यहाँ के अब तक के 19 मुख्यमंत्रियों में से सबसे ज्यादा छह मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे। इस तरह इन ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने यूपी में 23 साल तक राज्य किया। कांग्रेस हो या भाजपा, ये दल जहाँ आज भीराजनीती में ब्राह्मणों की महत्ता को बेबाकी से स्वीकार करते है, वहीँ क्षेत्रीय दल भी अब राजनीती में ब्राह्मणों की महत्ता को स्वीकारने लगे हैं। 
बसपा जहां सतीश चंद्र मिश्र को आगे कर खुद को ब्राह्मणों का सबसे बड़ा शुभचिंतक बताने में जुटी है, वहीं सपा जनेश्वर मिश्र यानी छोटे लोहिया के अलावा अमर शहीद मंगल पांडेय के नाम को भुनाने की जुगत में लगी है। पिछले दिनों सहारनपुर में सपा ने ब्राह्मण समाज पर डोरे डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। भगवान परशुराम जयंती समारोह में शिरकत करने आए विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि बसपा शासन में ब्राह्मणों पर दलित उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए थे। इन झूठे मुकदमों को वापस लेने का काम सपा ने किया है, ऐसे में ब्राह्मण समाज का भी दायित्व बनता है कि वह सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के इस अहसान को न भूलें। पूर्व की बसपा सरकार ने परशुराम जयंती का अवकाश समाप्त कर दिया था, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने इसे फिर से बहाल कर दिया। इतना ही नहीं, पदोन्नति में आरक्षण को खत्म कराने का सराहनीय काम भी मुलायम सिंह यादव ने ही किया है। खास बात यह रही कि उन्होंने अपने भाषण में बसपा को भी राजनीतिक पछाड़ देते हुए इशारों-इशारों में उस दल के ब्राह्मण अगुवा सतीश चंद्र मिश्रा को भी आड़े हाथ ले डाला। उन्होंने कहा कि बसपा शासन में ब्राह्मणों पर सबसे ज्यादा उत्पीड़न हुआ। तब सतीश चंद्र मिश्रा कहां थे, जब उनके भाइयों पर फर्जी मुकदमे लादे जा रहे थे। अब वही प्रदेश में घूमकर ब्राह्मण समाज को गुमराह करने पर जुटे हैं।
यूपी की सत्ता पर काबिज सपा का जनाधार परंपरागत रूप से पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लोग रहे हैं। सपा ने इसके बाद ऊंची जातियों में ठाकुर बिरादरी को जोड़कर अपना वोट बैंक बढ़ाया। इसके विपरीत बसपा ने वर्ष 2007 में परंपरागत दलित वोट बैंक में ब्राह्मणों को जोड़ा। इनके समर्थन से बसपा सत्ता में तो आ गई, लेकिन 2007 से 2012 तक पांच साल के शासनकाल में मायावती ने इनके लिए कुछ करने के बजाय केवल और केवल दलित एजेंडे पर ही काम किया। इस तरह जब ब्राह्मण खुद को छला महसूस करने लगे, तो उन्होंने बसपा को सबक सिखाने की ठानी और इसका नतीजा यह हुआ कि बसपा 2012 का विधानसभा चुनाव जीत नहीं सकी और इसका सीधा फायदा उसके कट्टर विरोधी दल सपा को मिल गया। बहुमत के साथ सपा उत्तर प्रदेश में लौटी और पिछले साल सत्ता में वापस आने के बाद ही सपा ने मायावती के प्रोन्नति में आरक्षण का कानून खत्म कर दिया। इसका सीधा फायदा ऊंची जातियों और सर्वाधिक ब्राह्मणों को मिला। विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय के अलावा अखिलेश सरकार के दो मंत्री तेज नारायण  पांडेय और मनोज पांडेय सपा की इस मुहिम की अगुवाई कर रहे हैं। 
अब जब बसपा ब्राह्मणों को पटाने की जुगत में है,  तो यह बात भी   यहां कहना जरूरी हो जाता है कि ये वही बसपा सुप्रीमों मायावती हैं, जिन्होंने कभी ब्राह्मणों को अपने नारों के जरिये खूब भला-बुरा कहा था। भाषणों में भी ब्राह्मणों के खिलाफ आग उगलने में उनका मुकाबला कोई नहीं कर सकता था। हालांकि इसे वक्त की करवट ही मान लें कि भाजपा के साथ साझा सरकार चलाने के बाद बसपा नेतृत्व ने जब महसूस किया कि बिना ब्राह्मणों के सहयोग से सरकार नहीं बन सकती, तो उन्होंने ब्राह्मणों को पटाने की कोशिश शुरू कर दी। क्षमाशील माने जाने वाले ब्राह्मण समाज ने उसे बिसरा दिया और बसपा के झांसे में आ गए और इसका नतीजा यह हुआ कि तब बसपा की सरकार बन गई। लेकिन जल्द ही बसपा से उनका मोह भी टूट गया।    यह तो रहा सपा-बसपा का ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश, अब यदि भाजपा को लें, तो इस दल के अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं कि समतामूलक समाज की स्थापना में ब्राह्मण समाज की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि वह बुद्धिजीवी है, शिक्षित है और किसी चीज को समझने की क्षमता उनमें ज्यादा है। अगर वह दिल-दिमाग से खड़ा हो जाए,     तो समतामूलक समाज की स्थापना काफी आसान हो जाएगी। 
उत्तर प्रदेश की 80 में  से करीब 25 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण मतदाता चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। संभवत: इसीलिए सपा-बसपा दोनों करीब 20-20 सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशी उतार रही हैं। ब्राह्मण समुदाय परंपरागत रूप से पहले कांग्रेस के साथ जुड़ा था। कांग्रेस के कमजोर पड़ने के बाद वह भाजपा से जा जुड़ा। वहीं भाजपा ने जब से अपनी बागडोर दोबारा राजनाथ सिंह को सौंप दी, तो ठाकुर समुदाय का रुझान भाजपा की ओर बढ़ता दिख रहा है। ऐसे में ठाकुर समुदाय अगर भाजपा की ओर झुकता है, तो इसका सीधा नुकसान सपा को होगा। माना जा रहा है कि इसी नुकसान की भरपाई के लिए मुलायम सिंह यादव ब्राह्मण समुदाय को रिझाने में लगे हैं।

Sunday, May 19, 2013

यूं न भोजपुरी को बिसराएं


अनीश कुमार उपाध्याय/दिल्ली
भोजपुरी लोकभाषा एवं जनभाषा है। इसमें जनजीवन के संवेदनात्मक अनभूतियों का काफी मार्मिक, विश्वसनीय चित्रण दिखता है। हालांकि वर्तमान में एक ऐसा दौर चल पड़ा है, जिसमें भोजपुरी को नितांत ही फूहड़, अश्लील माना जा रहा है। इससे उसका अतीत और भविष्य अंधेरे में जाता दिखने लगा है। हकीकत में ऐसा भोजपुरी को बढ़ावा देने के नाम पर किया जा रहा है, जिससे उसे बढ़ावा तो नहीं मिल रहा, बल्कि कभी अपनी मीठी जुबान से लोगों के कानों में मिश्री घोलने वाली भाषा आज तिरस्कार की नजरों से ज्यादा देखी जा रही है। यदि हम भोजपुरी भाषा में बनी फिल्मों की चर्चा करें, तो इसकी शुरूआत होती है वर्ष 1963 में, जब विश्वनाथ शाहाबादी ने भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ से की थी। हालांकि एक समय ऐसा भी आया, जब भोजपुरी क्षेत्र के कई कवि, लेखक, कलाकार मुंबई की सिनेमाई चमक-दमक में स्टार बनकर उभरे।

मोती बीए का जलवा 

मोती बीए
देवरिया के बरहज के मोती बीए को हिंदी फिल्मों में भोजपुरी गीतों के प्रचलन कराने का श्रेय दिया जाता है। यह वह काल था, जब इस भाषा की मिठास को देश के कोने-कोने के लोगों ने न सिर्फ सराहा, बल्कि जमकर गुनगुनाया भी। जनवरी 1961 में नजीर हुसैन की अगुवाई में ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण की योजना बनी और महज दो साल बाद वर्ष 1963 में यह फिल्म बनारस में प्रदर्शित हो गई। इसके बाद तो मानों भोजपुरी के स्वर्णिम काल की शुरुआत का बोध होने लगा। इसके बाद एक-एक कर कई भोजपुरी फिल्में सुनहले पर्दे पर आने लगी। इनमें ‘विदेशिया’, ‘लागी नाही छूटे रामा’, ‘नईहर छूटल जाय’, ‘हमार संसार’, ‘बलमा बड़ा नादान’, ‘सीता मईया’, ‘सईयां से अइसे मिलनवा’, ‘भौजी’, ‘गंगा’ आदि फिल्मों की धड़ाधड़ प्रस्तुति के बाद अन्य फिल्म निर्माताओं का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ और इसी थीम पर आज भी कई फिल्में बन रही हैं।

फिल्मों में भोजपुरी की भूमिका 

बानगी के तौर पर ही लें तो ‘नदिया के पार’ भोजपुरी फिल्म की थीम पर ही माधुरी दीक्षित-सलमान खान अभिनीत ‘हम आपके हैं कौन’ फिल्म बनी है। हां, इतना जरूर है कि इसमें गंवई संस्कृति को न दर्शाकर आधुनिक शहरी जीवन को दिखाया गया है। ‘विदेशिया’ में भोजपुरी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाटककार व कवि भिखारी ठाकुर को गाते दिखाया गया है, जो आज भोजपुरी समाज के लिए अपने आप में एक दुर्लभ दस्तावेज है। अगर भोजपुरी को सिनेमा जैसा माध्यम नहीं मिला होता, तो भोजपुरी के शेक्सपीयर माने जाने वाले इस महान नाट्यकर्मी को परदे पर जीवित देखने का मौका भोजपुरियों को शायद ही मिल पाता। हालांकि यह भी सत्य है कि भोजपुरी सिनेमा के पहले दौर में जो फिल्में प्रदर्शित हुईं, उनमें अधिकांश का मकसद समाज में व्याप्त दहेज, नशाखोरी, छुआछूत, आर्थिक विषमता और पूंजी की संस्कृति पर प्रहार करना था। 

द्विअर्थी संवादों ने किया बेड़ा गर्क

आज जब हम 21 वीं सदी की भोजपुर की दशा और दिशा पर गौर करें, तो आज के कलाकार जैसे वह चाहें मनोज तिवारी हों, निरहुआ या फिर गुड्डू रंगीला। इन भोजपुर गायकों ने अपनी गायकी में द्विअर्थी संवादों का ऐसा घाल-मेल किया है कि कभी मिठास की पहचान रही, भोजपुरी आज अश्लीलता का दर्जा पा चुकी है। जिन्हें आज भी मोती बीए, बलेसर, भरत शर्मा, शारदा सिन्हा याद हैं, उनके लिए भोजपुरी आज भी कानों में मिश्री घोलने वाली मीठी बोली ही है। अगर भोजपुरी भाषा की तह में जाएं, तो एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि वैश्वीकरण के दौर में भोजपुरी ने अपने मूल्यों की स्वीकार्यता के लिए ऐसा सब कुछ किया है। यहां बाजारवाद को ऐसा चलन चल पड़ा है कि यहां जो बिकने लायक लगा, उसे ही गाया गया और सुनहले पर्दे पर उसे ही परोसा गया। यह भी सच है कि यदि भोजपुरी की अश्लीलता और द्विअर्थी गीत अगर बिकते हैं, तो इसकी सरलता, संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई को चाहने वाले न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी बड़ी संख्या में है।

आखिर क्यों नहीं मिला मुकाम 

भोजपुरी में सबसे बड़ी कमी इसमें प्रकाशित उच्च श्रेणी के साहित्य का अभाव है। भोजपुरियों को अपनी भाषा के प्रति इतना अनुराग होने पर भी यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इस भाषा को वह मुकाम आज तक नहीं मिल सका, जिसकी यह अधिकारिणी है। यह सही है कि आज के दौर में चाहें वह कस्बाई, नगरीय या महानगरीय संस्कृति में रचा-बसा शहर हो, वहां आपको भोजपुरी कैसेट बजते आसानी से सुनने को मिल सकते हैं। चाहें उसे बजाने वाले पूर्वांचल के गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, बनारस, गाजीपुर, मऊ या फिर बिहार राज्य के वाशिंदे ही क्यों न हो, आज अश्लील और फूहड़ गाने ही ज्यादा सुने जाते हैं। आखिर इसके श्रोता करें भी तो क्या, सच्चाई यह है कि आज शारदा सिन्हा, भरत शर्मा जैसे गायक मिल ही कहां रहे हैं, जिन्होंने अच्छे गीतों को रचा। इस समय जो भोजपुरी के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है, उससे भोजपुरी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि हर जगह की सभ्यता और संस्कृति पर इसका दुष्प्रभाव साफ देखा जा सकता है। इन गानों को सुनने वाला श्रोताओं में अधिकांश वह है, जो अपनी श्रम शक्ति बेचता है। उसके जीवन में मनोरंजन का कोई दूसरा साधन उपलब्ध नहीं है। रिक्शा चालक, आटो चालक, ट्रक चालक, मजदूर ऐसे गानों को तेज कानफाड़ू आवाज में सुनना अपनी शान समझता है। ऐसे में समाज के जागरूक लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे समाज में इस अपसंस्कृति के खिलाफ आगे आएं।

भोजपुरी भाषा का इतिहास

भोजपुरी हिंदी के बाद दूसरे भारतीय भाषाओं के बीच सबसे बड़ी है। हालांकि इसे अभी प्रतीक्षा है, जब भारत सरकार एक आधिकारिक भाषा के रूप में भोजपुरी को पहचान देगी। भोजपुरी भाषा का इतिहास सातवीं सदी से शुरू होता है। करीब 1100 वर्ष पूर्व गुरु गोरखनाथ ने गोरख बानी की रचना की थी। संत कबीरदास, जिनका जन्म 16 जुलाई 1297 को हुआ था, उनका जन्म दिवस विश्व भोजपुरी दिवस के रूप में भारत में मनाया जा रहा है। जहां तक भोजपुरी भाषा के नामकरण का सवाल है, तो इसका नामकरण बिहार राज्य कें आरा (शाहाबाद) जिले में स्थित भोजपुरी नामक गांव के नाम पर हुआ है। पूर्ववर्ती आरा जिले के बक्सर सब डिविजन (अब बक्सर जिला अलग हो गया है) में भोजपुर नाम का एक बड़ा परगना है, जिसमें  नवका भोजपुर  और पुरनका भोजपुर  दो गांव हैं। मध्य काल में इस स्थान को मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने बसाया था। उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर भोजपुर रखा था। इसी कारण इसके पास बोली जाने वाली भाषा का नाम भोजपुरी पड़ गया।

पांच करोड़ लोगों की है भाषा

भोजपुरी भाषियों की संख्या भारत की समृद्ध भाषाओं बंगला, गुजराती और मराठी आदि बोलने वालों से कत्तई कम नहीं है। इस दृष्टि से इस भाषा का महत्व काफी अधिक हो जाता है। भोजपुरी भाषाई परिवार के स्तर पर एक आर्य भाषा है और मुख्य रुप से पश्चिम बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी झारखण्ड क्षेत्रों में बोली जाती है। आधिकारिक और व्यवहारिक रूप से भोजपुरी हिंदी की एक उपभाषा या बोली है। भोजपुरी अपने शब्दावली के लिए मुख्यत: संस्कृत एवं हिंदी पर निर्भर है। कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण कर लिए हैं।भोजपुरी जानने-समझने वालों का विस्तार विश्व के सभी महाद्वीपों पर है। इसका मुख्य कारण है ब्रिटिश राज के दौरान उत्तर भारत से अंग्रेज जब इन्हें मजदूर के रूप में ले गए, तो उनके वंशज अब भी वहीं हैं। इनमें सूरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो, फिजी आदि देश प्रमुख है। भारत के जनगणना आंकड़ों के अनुसार भारत मे लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। पूरे विश्व मे भोजपुरी जानने वालों की संख्या लगभग पांच करोड़ है। इसके अलावा कलकत्ता (अब कोलकाता) नगर में बंगाल के ‘चटकलों’ में, असम राज्य के चाय बगानों में और बंबई के अंधेरी और जोगेश्वरी नामक स्थानों में लाखों की संख्या में भोजपुरी भाषी लोग रहते हैं। इतना ही नहीं, मॉरिशस, फिजी, ट्रिनीडाड, केनिया, नैरोबी, ब्रिटिश गाइना, दक्षिण अफ्रीका, बर्मा (टांगू जिला) आदि देशों में काफी बड़ी संख्या में भोजपुरी लोग रहते हैं।

अपनी लिपी करनी होगी विकसित

भोजपुरी भाषा में निबद्ध साहित्य हालांकि अब तक प्रचुर मात्रा में नहीं उपलब्ध है और अभी तक भोजपुरी की अपनी न तो कोई लिपी विकसित हो सकी है और न ही इसकी कोई डिक्सनरी ही है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि भोजपुरी जल्द ही अपना मुकाम पा जाएगी। वर्तमान में जो प्रयास हो रहे हैं, वह नाकाफी है। जब तक समूचा भोजपुरी समाज जागेगा नहीं और भोजपुरी को उसका असली हक दिलाने के लिए अपना योगदान नहीं देगा, भोजपुरी को मुकाम मिलना कठिन ही नहीं, असंभव होगा। हालांकि यह सत्य है कि अनेक सरस कवि और लेखक भोजपुरी भाषा को समृद्ध करने की कोशिश में जुटे हैं। भोजपुरिया या यूं कहें भोजपुरी प्रदेश के निवासी लोगों को अपनी भाषा से बड़ा प्रेम है। कई पत्र-पत्रिकाएं आज भोजपुरी भाषा में देवनागरी लिपी में लिखी जा रही हैं। भोजपुरी सांस्कृतिक सम्मेलन वाराणसी इसके प्रचार में लगा है। विश्व भोजपुरी सम्मेलन समय-समय पर आंदोलनात्मक, रचनात्मक और बैद्धिक तीन स्तरों पर भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में निरंतर जुटा हुआ है। देवरिया (यूपी), दिल्ली, मुंबई, कोलकता, पोर्ट लुईस(मारीशस), सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और अमेरिका में भी इसकी शाखाएं खोली जा चुकी हैं।

क्यो बरपा हंगामा?


वंदे मातरम’ को लेकर खड़ा हुआ भूचाल

अनीश कुमार उपाध्याय / नई दिल्ली 
संसद के बजट सत्र के समापन पर एक बीएसपी सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने राष्ट्रीय गान वंदे मातरम’ का बहिष्कार क्या कियामानों पूरे देश में भूचाल आ गया। तकरीबन सभी ने इसको जमकर कोसा। यह सही है कि वंदे मातरम’ देश का राष्ट्रीय गान और एकता और सौहार्द का प्रतीक भी है, लेकिन यह मापदंड कहां तक सही है कि इसे गाने वाला देशभक्त है और इसे न गाने वाला देशद्रोही। इस मसले को जानने से पहले यह जान लेना उचिता होगा कि आखिर शफीकुर्रहमान बर्क हैं कौनशफीकुर्रहमान उत्तर प्रदेश के लोकसभा क्षेत्र संभल से निर्वाचित सांसद हैं। इनकी उम्र करीब 83 साल है। इसके पूर्व भी वह कई राजनीतिक गतिविधियों में बेहतर ढंग से सक्रिय रहे हैं। अब जब बात वंदे मातरम’ को लेकर उठ खड़ी हुई हैतो इसे जानने के लिए पहले इस गीत के इतिहास को जानना बेहद जरूरी हो जाता है।

क्या है वंदे मातरम का इतिहास

बंकिम चंद्र चटर्जी ने सात नवंबर 1876 को बंगाल के कंतलपाड़ा गांव में इस गीत की रचना की थी। उनका चर्चित उपन्यास आनंद मठ’ हालांकि सन 1882 में अस्तित्व में आयाजिसमें उन्होंने इस गीत को इसमें शामिल किया था। यह उपन्यास सन्यासी विद्रोह पर केंद्रित थी। सन 1896 में कांग्रेस के सम्मेलन में भी यह गीत गाया गया। वर्ष 1901 में कांग्रेस के कलकत्ता सम्मेलन के लिए इस गीत की संगीतमय प्रस्तुति दिकना चरण सेन के मार्गदर्शन में किया गया। इसके बाद 16 अक्टूबर 1905 के बंग-भंग आंदोलन और सात अगस्त 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत पूरे देश में हर जातिधर्म से जुड़े कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाता रहा। सात सितंबर 1905 को कांग्रेस के बनारस सम्मेलन में रवींद्र नाथ ठाकुर की तीजी सरला देवी चौधरानी ने गीत गायाहालांकि तब अंग्रेज सरकार ने इस गीत पर पाबंदी लगा रखी थी। इसके बाद सन 1906 में लाल लाजपत राय ने वंदे मातरम’ के नाम से लाहौर से एक  पत्रिका निकालीजबकि इसी साल छह अगस्त को अरविंद ने इसी नाम से एक अखबार निकालना शुरू किया।

पहले भी हो चुका है विरोध

सन 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने कांग्रेस के लिए तिरंगा झंडा तैयार किया। इस झंडे की सफेद पट्टी पर वंदे मातरम’ लिखा था। इसके बाद शुरू हुआ इस गीत का स्याह पक्ष। मुस्लिम लीग का विकास और सांप्रदायिक आधार पर देश के विभाजन की अंग्रेजों की साजिश सफल हो रही थी। अब कुछ मुस्लिम नेता इस गीत का इसलिए विरोध करने लगे थेक्योंकि इसमें दुर्गा तथा अन्य हिंदू देवियों की महिमा बखानी गई थी। मुस्लिम मूर्ति पूजा नहीं करतेयही विरोध का मूल कारण था। विवाद बढ़ा और 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस ने एक कमेटी गठित की। इसमें महात्मा गांधीमौलाना अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस को शामिल किया गया। कमेटी ने पाया कि गीत के पहले दो पदों में कोई धार्मिक तत्व नहीं है। ऐसे में तय हुआ कि विष्य में कांग्रेस के सम्मेलन में केवल दो प्रारंभिक पद ही गाये जाएंगे। इसके बाद यही गीत स्वतंत्रता संग्राम के लिए महागीत’ बना। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस की ओर से सिंगापुर में स्थापित किए गए रेडियो स्टेशन से इस गीत का सतत प्रसारण होता रहा।

छिटपुट सांप्रदायिक दंगे भी भड़के

आजादी के बाद जनवरी 1950 में इस गीत को राष्ट्रगीत’ का दर्जा मिलाहालांकि 1940 के आसपास इस गीत को गाने को लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार में छिटपुट सांप्रदायिक दंगे भी ड़के। हालांकि इसे मुस्लिम लीग की हरकत करार दिया गया था। पिछले एक दशक के भीतर की घटनाओं का जिक्र करें तोवर्ष 2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने सबसे लोकप्रिय गीत का जब दुनियार में सर्वे किया और इसमें विभिन्न भाषाओं के सात हजार गाने शामिल हुए। इस सर्वे में वंदे मातरम’ को टॉप टेन में जगह मिली। दारूल उलूम मानता है कि उसे मुल्क से प्यार हैलेकिन किसी को वह अल्लाह के बराबर का दर्जा नहीं दे सकता। मुल्क को पूजना इस्लाम विरोधी है। हालांकि दारूल उलूम ने यह भाव महज वंदे’ शब्द की व्याख्या के बाद जताया था। सात सितंबर 2005 को वंदे मातरम’ गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने पर देश के समस्त स्कूलों में इसके गायन का निर्णय लिया गया। अभी यह बात उठी ही थी कि तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि इस गीत को गाना इसलिए अनिवार्य नहीं किया जा सकताक्योंकि इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत होंगी। विवाद ने तूल पकड़ा और सितंबर 2006 में दारूल उलूमदेवबंद के सालाना जलसे में यह गीत न गाने के लिए बाकायदा फतवा जारी कर दिया गया।

केवल वोट की राजनीति

तीन नवंबर 2009 को भी यह मसला खड़ा हुआ था। हालांकि इससे दो साल पहले नई दिल्ली के संसद परिसर के हाल में उलेमाओं की एक बैठक चल रही थी। ठीक उसी दौरान मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जफरयाब जिलानी ने बयान दे डाला था कि वंदे मातरम’ गीत शरीयत के खिलाफ है। इसे मुस्लिम बच्चे स्कूल में नहीं गा सकते। सितंबर 2006 में भी जमायत उलेमा ए हिंद के सम्मेलन में ऐसे ही फतवे का शोर उठा। वहीं आज के इस दौर में नई पीढ़ी व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर आर्थिक विकास को ही अपना धर्म और संकल्प मान रही है। इसके लिए ही वह प्रण-प्राण से जुटी है। हांइसका गलत तरीके से फायदा कुछ फिरकापरस्त जरूर उठा रहे हैं। आम मुसलमान अपनी अशिक्षागरीबीरोजगार,   मजहब में बढ़ रही कुरीतियों को ले कर चिंतित है। वह धीरे-धीरे समझ रहा है कि उन्हें कौन लोग महज वोट की खेती’ मान रहे हैं। अब यदि हकीकत में मुसलमान अपनी छवि के लिए चिंतित हैंतो उसे धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलाने वालों के खिलाफ उठ खड़ा होना होगा। आम पढ़ा-लिखा मुसलमान अपनी व्यक्तिगत समृद्धि में इतना तल्लीन है कि वह किसी अन्य बातों पर ध्यान देना माकूल नहीं समझता। उसे वंदे मातरम गाने से रोटी नहीं मिलने वाली। वह यह समझता है कि जब तक मुस्लिम समाज शिक्षित और देश के प्रति वफादार नहीं होगातब तक न देश का ला होने वाला है और न ही उसका।

केवल चमकाई जाती है राजनीति

ऐसा मुद्दा मिलते ही देश के कुछ गिने-चुने लोग इसके जरिये अपनी राजनीति चमकाने की कवायद में जुट जाते हैं। बस मौका मिला नहीं कि उनके बयान मीडिया में आने लगते हैं। हालांकि ऐसी नेतागिरी से मुस्लिम संप्रदाय को समय-समय पर नुकसान ही होता रहा है। इससे ठाकरे बंधुओंप्रवीण तोगड़ियामुख्तार अब्बास नकवी जैसे राजनीतिज्ञों को मुस्लिम वर्ग के खिलाफ जहर उगलने का मौका मिल जाता है। हालांकि अब सवाल तो यह है कि वंदे मातरम गाने वाला देश प्रेमीनहीं तो देशद्रोही कहने वाले संघ परिवार के लोग हैं कौन ?  इस विवाद से उनका ला हो या न होलेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों को एक बार फिर समाज तथा देश में सांप्रदायिक द्वेष को बढ़ाने का मौका जरूर मिल जाता है। हालांकि जिस राष्ट्र में हम रहते हैंअगर वहां की संसद में राष्ट्रीय गीत का गायन चल रहा हैतो उसका अपमान करना भी जायज नहीं है। यह सही है कि इस दौरान बीएसपी सांसद को ऐसा नहीं करना चाहिए था। इसके बाद भी मामला तूल नहीं पकड़ताअगर सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने यह नहीं कहा होता कि वंदे मातरम इस्लाम के खिलाफ हैइसलिए वह लोकसभा छोड़कर चले गए थे। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि अगर विष्य में भी ऐसी स्थिति आएगीतो वह फिर ऐसा ही करेंगे। हालांकि बाद में उन्हें अपने देश के प्रति फर्ज याद आया और उन्होंने यह जरूर कहा कि जहां तक देश की आन-बान का सवाल हैइसके लिए उनकी जान भी हाजिर है। हालांकि इस दौरान मीडिया में यह भी कहा गया कि बसपा सांसद का पेट खराब था और इसी वजह से उन्होंने ऐसा किया।

सांसद की सफाई और बीजेपी का विरोध

हालांकि इस घटना के बाद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि वह जानना चाहती हैं कि ऐसा क्यों हुआ और विष्य में ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। उन्होंने सांसद शफीकुर्रहमान को नोटिस थमा दिया। हालांकि सांसद शफीकुर्रहमान ने सफाई दी कि उनका पेट खराब था और इससे ही वह सदन से बाहर आ गए। इस मुद्दे पर बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने निंदा करते हुए कहा है कि संसद का हर सत्र राष्ट्रीय गान से शुरू होता है और राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम से उसका समापन होता है। ऐसा आज ही नहीं हुआ हैयह पुरानी परंपरा रही है। सदन में सांसद द्वारा राष्ट्रीय गीत का अपमान करना देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि बसपा डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति करती है और उनके ही बनाए संविधान का यहां अपमान किया गया है। उन्होंने साफ शब्दों में यह भी कहा कि जो कोई भी वंदे मातरम का अपमान करता हैउससे न तो संसद का हिस्सा बनने का अधिकार है और न ही देश में रहने का। मतलब साफ हैअब इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी का दौर चल पड़ा है।

Friday, May 17, 2013

चुंगी नहीं, अब ‘एलबीटी’


महाराष्ट्र की कर प्रणाली सुधार की दिशा में एक कदम 
एलबीटी के राज्य हित में होने से सरकार इसे लागू करने के लिए कटिबद्ध है। इसकी गंभीरता को देख एलबीटी के बारे में महाराष्ट्र सरकार की क्या भूमिका है? व्यापारी वर्ग आखिर क्यों कर रहा है विरोध ? वास्तव में एलबीटी क्या है ? जानने के लिए पढ़िए यह रिपोर्ट...
पृथ्वीराज चौहान 
अनीश कुमार उपाध्याय / नई दिल्ली
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की कर प्रणाली में सुधार करते हुए हाल ही में राज्य के आर्थिक हित, वित्तीय अनुशासन और कर संकलन में होने वाली त्रुटियों को दूर करने के लिए राज्य की ए,बी,सी और डी वर्ग की सभी  26 महानगरपालिकाओं में चुंगी के स्थान पर स्थानीय निकाय कर (लोकल बॉडी टैक्स अर्थात एलबीटी) प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया है। हालांकि महाराष्ट्र के व्यापारिक संगठनों ने महाराष्ट्र सरकार की महत्वाकांक्षी एलबीटी प्रणाली के विरोध करना शुरू कर दिया है। इनका कहना है कि व्यापारियों के पंजीकरण और कर अदायगी के निर्धारण के लिए नगरपालिका के पास उपयुक्त प्रणाली उपलब्ध नहीं है। उनकी शिकायत है कि इससे कर भुगतान प्रक्रिया काफी जटिल हो जाएगी। कर भुगतान में विलंब पर उन्हें जुर्माना भी देना होगा। वहीं अधिकारियों के लिए भ्रष्टाचार की एक और दुकान खुल जाएगी। व्यापारियों का कहना है कि एलबीटी से एक ओर जहां आम आदमी एलबीटी से परेशान हो रहा है, वहीं आम व्यापारियों का भी लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है। स्थानीय कारोबारी एलबीटी को व्यापारी हितों के खिलाफ बता रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि इससे व्यापारियों पर टैक्स का बोझ बढ़ जाएगा।
क्या है एलबीटी ?
एलबीटी वह कर है जो उपभोग, उपयोग या बिक्री करने वाले दुकानदारों पर नगर निगमों द्वारा लगाया जाता है। यह टैक्स महानगरपालिका तथा नगरपालिका में शामिल क्षेत्रों में लागू है। इस के तहत सभी छोटे-बड़े व्यापारी जो रोजाना 800 रुपये से अधिक कमाते हैं और महीने में 5000 रुपये से अधिक की जिनकी आमदनी है, उनके लिए एलबीटी रजिस्ट्रेशन कराना और यह कर चुकाना अनिवार्य है। इसके दायरे में पनवाड़ी से लेकर चाय विक्रेता भी शामिल है। इस टैक्स में दुकानदार को हर उस ग्राहक का रिकॉर्ड अपने पास रखना होगा, जो पांच सौ रुपये से ज्यादा की खरीद करता है। यह स्थानीय कर भुगतान की स्व-मूल्यांकन और लेखा आधारित प्रणाली है। इसमें व्यापारी स्वयं अपने कर दायित्व को निभाता है। इसमें चुंगी प्रणाली की तरह सामान ढोने वाले वाहनों को चौकियों पर रुकने की आवश्यकता नहीं होती। 
कैसे काम करता एलबीटी?
एलबीटी प्रणाली के तहत तीन लाख रुपये वार्षिक का कारोबार करने वाले व्यापारियों को नगरपालिका के कार्यालय में पंजीकरण कराना आवश्यक है। माल की खरीदी के आधार पर उसका दो से सात प्रतिशत कर के रूप में अदा किया जाता है। इस प्रणाली में कर अदायगी माह में एक ही बार 20 तारीख से पहले आनलाइन पोर्टल, चेक, डिमांड ड्राफ्ट या स्थानीय निकाय के काउंटर पर करना होगा। यदि तीन बार से अधिक समय में देरी हुई तो जुर्माना भी देना पड़ सकता है। एलबीटी से पहले जब चुंगी प्रणाली लागू थी, तब माल लदे ट्रकों की चेक पोस्ट पर जांच नहीं होती थी, लेकिन व्यापारी खुद आनलाइन पोर्टल, चेक, एक नामित बैंक या नागरिक निकायों के काउंटरों के माध्यम से डिमांड ड्राफ्ट या नकद का उपयोग करते हुए हर 40 दिन में एक बार कर का भुगतान करते थे।
महाराष्ट्र सरकार की भूमिका  
महाराष्ट्र सरकार द्वारा कर प्रणाली में सुधार कर राज्य के विकास में सरकार की भूमिका स्पष्ट करते हुए  मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि आक्ट्राय प्रणाली बेहद पुरानी हो चुकी थी। इसे बदलना जरूरी था। अब हमने स्थानीय निकायों को आर्थिक मजबूती देने के लिए एलबीटी को लागू किया है। इसे तमाम पहलुओं पर विचार के बाद ही लागू किया गया है। ऐसे में इसे हटाया नहीं जाएगा। चुंगी कर से महानगर पालिका (मनपा) को रोजना राजस्व मिलता था। एलबीटी लागू होने से हर माह की 20 तारीख को मनपा को राशि मिलेगी। मुंबई को छोड़कर शेष मनपा में पहली अप्रैल से एलबीटी लागू कर दिया गया है। राज्य के व्यापारियों के साथ हुई बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने पूरी तरह सोच-विचार कर इस प्रणाली को लागू किया है। इसके लागू होने से व्यापारियों को होने वाली दिक्कतों पर विचार के लिए सरकार ने व्यापारियों तथा सरकार के पांच-पांच प्रतिनिधि वाली एक समिति गठित की है। यह जल्द ही अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।
मुख्यमंत्री ने मांगा सहयोग
राज्य के विकास तथा देश में महाराष्ट्र की प्रगति की परंपरा बरकरार रखने की दृष्टि से एलबीटी का निर्णय सोच-समझ कर लिया गया है। अफवाहों को नजरंदाज कर इस कर प्रणाली के क्रियान्वयन में सहयोग करने का आह्वान भी मुख्यमंत्री ने किया है। राज्य की कर प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाकर व्यापारियों से नजदीकी बनाने वाली एलबीटी लागू करने का निर्णय मुख्यमंत्री चव्हाण ने 17 अप्रैल 2013 को अपनी भूमिका विधानमंडल में रखी। तभी से इसे लागू करने में उन्होंने तमाम राजनैतिक दलों तथा राज्य के व्यापारिक संगठनों से सहयोग की अपील कर अपना एजेंडा जनता के सामने रखा है। सुधार की परंपरा वाले महाराष्ट्र को विकास को और अधिक ऊंचाई पर ले जाने के लिए एलबीटी का सही क्रियान्वयन ही राज्य के हित में होगा। स्थानीय निकाय कर प्रणाली राज्य की डी वर्ग की महानगरपालिकाओं में लागू की जा चुकी हैं। इसके सुपरिणाम भी सामने आ चुके हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस प्रणाली के लागू होने से महानगरपालिका की आय में करीब एक प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।  

चुंगी और स्थानीय निकाय कर :  एक नजर में
चुंगी कर                         स्थानीय निकाय कर
1. जांच चौकी पर आधारित जांच चौकी रहित
2. लेखा आधारित लेखा रहित
3. चौकी पर मानव संसाधन, समय और मानव संसाधन, समय और ईंधन की 
     ईंधन का अपव्यय बचत 
4. हर आयात के समय कर देना महीने में एक ही बार कर भुगतान
5 . आर्थिक शोषण कर भुगतान में आसानी
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