बहुचर्चित एक हिंदी फिल्म का गाना है कि वादे हैं, वादों का क्या...? यह गाना जितना फिट उस फिल्म के लिए था, उससे कहीं ज्यादा ये राजनीति के लिए फिट माना जाता रहा है। फिलहाल हम बात अगर मध्य प्रदेश के विधानसभा के लिए चल रहे चुनावी समर की करें, तो यहां बेरोजगार युवाओं को लुभाने के लिए सियासी दलों ने अपने घोषणापत्र में उन्हें काफी तरजीह दी है। एक ओर जहां भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 10 लाख नौकरी देने का वादा किया है, तो दूसरी कांग्रेस ने घर बैठे ही बेरोजगारों को 10 हजार रुपए देने का लॉलीपॉप थमा दिया है।
अब इन दोनों के घोषणापत्र में किए इन वादों पर गौर करें, तो ये बात तो समझ में आती है कि भाजपा नौकरी देकर काम लेगी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा, आय आएगी और उससे युवाओं को रोजगार मिलेगा। दूसरी ओर इसके विपरीत कांग्रेस के वादे पर गौर करें, तो पार्टी ने लोकलुभावन घोषणा तो जरूर कर दी है, लेकिन ये नहीं बताया कि बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज के लिए 10 हजार रुपए प्रतिमाह कहां से देगी। वह भी तब तक, जब तक उस बेरोजगार को नौकरी नहीं मिल जाती। मध्य प्रदेश में विधानसभा की 230 सीटों के लिए 28 नवंबर को वोट डाले जाएंगे। राज्य में 15 साल से सत्ता से दूर कांग्रेस इस बार जीत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। इसके लिए ही पार्टी ने अपने घोषणापत्र में कई ऐसे लुभावने वादे किए हैं, जो असंभव तो नहीं, पर कठिन जरूर है। कांग्रेस ने घोषणापत्र का नाम वचन पत्र रखा है।
फिलहाल, घोषणापत्रों पर सामयिक नजर डालने से इतना तो साफ हो ही गया है कि कांग्रेस अपनी जीत मुकम्मल करने के लिए अबकी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। भले ही चुनाव बीतने के बाद हो सकता है कि वह उसे ‘जुमला’ कहकर टाल जाए, लेकिन अगर वह यह सोच रही है कि बेरोजगार युवाओं को बेवकूफ बनाकर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है, तो आज का युवा इतना मूर्ख भी नहीं है। कम से कम वह इतना तो जरूर जानता है कि जब तक सरकार आय का बंदोबस्त नहीं करेगी, तब तक वह प्रति बेरोजगार 10 हजार रुपए वह भी हर महीने नहीं दे सकती। हो सकता है कि घोषणापत्र के अन्य वादों को कांग्रेस सत्ता में आने के बाद पूरा भी कर दे, लेकिन ये वादा उसके लिए गले की फांस जरूर बन सकता है।
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