श्री गणेशाय नमः

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Friday, January 25, 2019

आंदोलन या सिर्फ सियासत ?

विपक्ष के सॉफ्ट टारगेट बने किसान
भारत एक कृषि प्रधान देश है। पिछले 70 वर्षों में देश अथवा प्रदेशों में जितनी भी सरकारें बनी उनके घोषणा पत्रों में किसानों के उत्थान के लिए बड़े-बड़े वादे किए गए। गेहूं धान का समर्थन मूल्य हो या गन्ना का। खाद पानी की सुविधा से लेकर विद्युत तक की मूलभूत सुविधाओं के बारे में सभी राजनैतिक दलो ने बड़ी-बड़ी बाते कहीं। सरकारों ने उस दिशा में अपने स्तर से कार्य भी किए जो सरकारी ऑकड़ो में नजर भी आते हैं। सरकारों ने आसी अनेको योजनाएं बनाई जो किसान हित में थी फिर भी आज तक किसानों के आंदोलन बदास्तूर जारी हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि आखिर वो कौन से कारण है जिनकी वजह से सरकारों द्वारा बनाई योजनाओं का पूरा पूरा लाभ हमारे अन्नदाताओं को नही मिल पा रहा है।
मार्च माह में 50 हजार किसानों का मुंबई में मार्चनवम्बर माह में उत्तर प्रदेश-हरिद्वार से दिल्ली तक लाखों किसानों का मार्च और अब फिर मुंबई में किसानों द्वारा शीतकालीन सत्र में विधान सभा का घेराव कहीं न कहीं ये प्रदर्शित करते है कि किसानों की समस्या असल में कुछ और तो नहीं। मार्च माह में महाराष्ट्र में 50 हजार किसानों ने जो मार्च किया था यदि उस पर पैनी निगाह डाली जाए तो वह केवल सीधे-साधे किसानों का प्रदर्शन मात्र नही था बल्कि शानदार अंग्रजी याफता लोगों द्वार संचालित एक राजनैतिक आंदोलन लग रहा था जिसमें किसानों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया था। उस मार्च में विभिन्न राजनैतिक दलों के लोग अपने-अपने प्रतीम चिन्हों के साथ मार्च कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में भी इसी माह कुछ उस प्रकार का प्रदर्शन शांतिपूर्ण ठंग से हुआ था जिसको परिणति एक हिंसक आंदोलन में तब्दील हुई। शुक्र था कि कहीं कोई बड़ी घटना नहीं हुई और अब पुन: महाराष्ट्र में किसान आंदोलन?
इस बार महाराष्ट्र का किसान सखे की मार भी झेल रहा है महाराष्ट्र सरकार ने प्रदेश के तीन जिलो की आठ तहसीलों को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया। प्रदेश के राजस्व विभाग की तरफ से सम्बंधित शासनादेश भी जारी कर दिए गए। उन जिलो में सरकार कासन हित में कार्य करती नजर भी आती है। इस आंदोलन की एक विशेषता यह भी है कि इसकी प्रतिनिधितिव अन्नपुरूष नही बल्कि जल पुरूष मेगसेस पुरस्कार से सम्मानित डॉ. राजेंद्र सिंह कर रहे है। सवाल उठता है कि जल क्षेत्र में कार्य करते करते अचानक जलपुरूष अन्न क्षेत्र में आ गए जबकि प्रदेश के तीन जिले जल की मार से ग्रस्त है। हो सरता है कि उस आंदोलन में कहीं कुछ जल की भी समस्या हो। सरकारें किसानों की कर्ज माफी से लेकर घटे दरों पर बिजली पानी खादबीच मुहैया कराने की बात करते हैं फिर ऐसा क्या है कि भारत का अन्नदाता भूखा ही रहा जाता है।
राजनैतिक दलों ने जबसे किसान आंदोलनों की बागडोर अपने हाथों में ली या विपक्षी राजनैतिक दोलं का किसानों को समर्थन देना ऐसे बड़े कारण है जिससे किसान अपने वास्तविक अधिकार से वंचित रह जाता है। होता यह है कि जब भी कोई राजनैतिक दल किसान आंदोलन को समर्थन देता है तो उसका श्रैय भी लेकर चुनावों में पसंद नही आती। दूसरा कारण जब राजनैतिक दल समर्थन  करता है तो सरकारों द्वारा करे हुए कार्यों पर पानी फेरता है और जनता को अधिक से अधिक यह संदेश देने की कोशिश करता है कि वर्तमान सरकार किसान विरोधी है।
यह बात भी सरकार के गले नहीं उतरती और अन्तोगत्वा नुकसान किसान को ही उठाना पड़ता है। अन्नदाता किसानों एवं आदिवासियों को इस बात की गंभीरता को समझना पड़ेगा वरना विचौलिए और राजनेता किसानों को मूल समस्या का कभी अंत नही होने देते क्योंकि ऐसे लोग जानते है कि यदि समस्या खत्म हो गई तो उनकी दाल रोटी एव राजनीति समाप्त हो जाएगी। महाराष्ट्र किसान आंदोलन में भई कुछ ऐसी ही तस्वीर नजर आती है। किसान जब तक सॉफ्ट टारगेट बनते रहेंगे अपनी समस्याओं के बीच ही खड़े रहेंगे। किसानों को स्वमं जागना होगा और अपने व सरकारों के बीच की दूरी को स्वयं खत्म करना होगा। तब ही समस्याओं का समाधान निकलेगा।


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