गन्ने की खेती न करें मराठवाड़ा क्षेत्र के किसान
जलवायु परिवर्तन आज सबसे बड़ी चुनौती है। कहीं जल की पर्याप्त सुलभता है, तो कहीं जल की भयंकर कमी। इस बिगड़ी व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारों की ओर से अक्सर ही ठोस कदम उठाए जाते रहे हैं। कभी सिंचाई परियोजनाएं चलाकर, तो कभी सूखा प्रभावित किसानों को आर्थिक मदद देकर। कई इलाकों में कुछ खास किस्म की फसलों का उत्पादन कर किसानों पीढ़ियों से अपने सपनों को साकार करते आ रहे हैं। ये फसलें इन किसानों के लिए आर्थिक उन्नति की रीढ़ है। ऐसे में मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त जलपुरुष राजेंद्र सिंह की हालिया अनोखी सलाह निराश करती है।
उनका तर्क है कि गन्ना जैसी अधिक जल ग्रहण करने वाली फसलों को सभी सूखा प्रभावित क्षेत्रों में स्थाई रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। खासकर मराठवाड़ा क्षेत्र में, जहां अधिकांश जिलों सूखे प्रभावित होते हैं। कम से कम जलपुरुष को ऐसे बयान देने से बचना चाहिए था। जलपुरुष का ये सुझाव कैसे उचित माना जा सकता है, जब मराठवाड़ा जैसे अनेक क्षेत्र अपने गन्ना और चीनी उत्पादन के बूते ही विकास की इबारत लिख रहे हैं। ऐसे में यहां पानी की आपूर्ति कैसे कम या बाधित की जा सकती है? वैसे भी यहां दिनोंदिन गन्ना उत्पादन में कमी आ रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादन क्षेत्र में इस साल काफी कम बारिश हुई और खेत में खड़ी फसल में भी संक्रमण हो गया है। इस परिस्थिति में जब हर राजनीतिज्ञ, समाजसेवी को किसानों के गिरे मनोबल को ऊंचा उठाने में अपना योगदान देना चाहिए, इसके विपरीत 'जल पुरुष' की ये सलाह हताश करती है।
जलपुरुष ने तर्क दिया है कि उन क्षेत्रों में जहां वर्षा अधिक है और जो गन्ना के लिए अनुकूल हैं, सरकार को इसे ड्रिप सिंचाई के अधीन अनुमति देनी चाहिए, अन्यथा यह विनाश पैदा करेगा। यानी खेती के लिए एक अन्य क्षेत्र और वहां के किसानों को नए सिरे से अधिक जल ग्रहण करने वाली फसलों के लिए तैयार किया जाना चाहिए। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ये सब इतनी आसानी से और इतनी जल्दी तैयार कर पाना क्या संभव हैं? अगर नहीं, तो फिर ऐसे सुझाव का क्या वजूद है? जलपुरुष को ऐसा बयान देने से पहले ये सोचना चाहिए था कि इससे गन्ना उत्पादन क्षेत्रों में जो चीनी मिलें चल रही हैं, उनका भविष्य क्या होगा? उसमें कार्यरत लोग कहां जाएंगे? इस फैलने वाली बेकारी का क्या इलाज होगा? ऐसे अनेक सवाल अनुत्तरित रहेंगे और ये किसी भी तरह किसानों के लिए हितकारी नहीं होंगे।
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