अपने ही मंत्री से लिया इस्तीफा
तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गुस्सा जगजाहिर है। वे जिस पर भी गुस्सा हो जाती है, उसे कहीं का नहीं छोड़तीं। गुस्सा भी ऐसा कि वे इसका फायदा—नुकसान भी नहीं देखतीं। यूपीए के शासनकाल में उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनवाने में साथ तो दिया, लेकिन यह ममता की ही नाराजगी थी कि दोनों कार्यकालों में उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दो कार्यकाल में दो रेलमंत्रियों क्रमश: दिनेश त्रिवेदी बौर मुकुल राय समेत कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों को पद छोड़ने के लिए विवश कर दिया था।
अबकी मामला आवास व दमकल मामलों के मंत्री शोभन चटर्जी से जुड़ा है, जिन्हें ममता के दबाव में अपने पारिवारिक विवाद के चलते अपना पद छोड़ना पड़ा है। वर्ष 1970 के दशक में कांग्रेस में बतौर कार्यकर्ता अपना सियासी सफर शुरू करने वाली ममता बनर्जी ने नि:संदेह अपनी काबिलियत के बूते वह मुकाम पाया, जो आसान नहीं था। इन सबके बीच ऐसे कई मौके आए, जब उनका गुस्सा देश के सामने आया। यह दीगर है कि पहले मुद्दे राजनीतिक या फिर समाज से जुड़े होते थे। अबकी मामला एक जनप्रतिनिधि के निजी जीवन की खटपट का है। ममता अपने ही कैबिनेट के मंत्री के घरेलू जीवन की खटपट से इतनी खफा हो गईं कि उन्होंने उनसे इस्तीफा देने का फरमान सुना दिया। आवास व दमकल मामलों के मंत्री शोभन चटर्जी को सियासत में कहीं का नहीं छोड़ने के पीछे मुख्यमंत्री का मानना था कि उनके पारिवारिक जीवन की खटपट का असर उनके मंत्रिमंडलीय कार्यों पर पड़ रहा है।
बीते दिन विधानसभा सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में शोभन ने कहा कि आवासीय योजना के तहत कुल 25 लाख लोगों को घर आवंटित किए गए हैं, जबकि ममता बनर्जी ने कहा कि ऐसे आवासों की संख्या 40 लाख है। इसी को लेकर मुख्यमंत्री शोभन से नाराज हो गईं। यह पहला मौका नहीं था, जब ममता शोभन से खफा हुई हों। कुछ दिन पहले ही मंत्री का वैवाहिक विवाद ममता की चौखट तक पहुंचा था। इसके बाद नियमित रूप से पार्टी नेता को निर्देश जारी किए गए थे।
चटर्जी ने पिछले साल ही अपनी पत्नी रत्ना से तलाक के लिए वाद दायर किया था। अपनी महिला मित्र और कॉलेज प्रोफेसर बायसखी बनर्जी के साथ चटर्जी की रिश्तों की अटकलें लग रही हैं। चटर्जी और बनर्जी दोनों सार्वजनिक सभाओं में और व्यक्तिगत कार्यक्रमों में भी देखे गए थे। इन सभी घटनाक्रमों को लेकर ममता ने अपनी मंत्री पर अपनी ‘ममता’ दिखाना उचित नहीं समझा। ममता बनर्जी ने शोभन की पारिवारिक जिंदगी में हो रही खटपट की जानकारी मिलने के बाद से ही शोभन का पार्टी में लगातार कद घटा और अब तो एक तरह से उनका सियासी सफर पर ही ममता ने ब्रेक लगा दिया है। बीते एक सालों के भीतर उनसे दक्षिण 24 परगना जिले के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया था। उनसे पर्यावरण विभाग की जिम्मेवारी भी वापस ले ली गई थी। और अब उन्हें कैबिनेट से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
वैसे ममता के गुस्से की बानगी वर्ष 1991 में भी तब दिखी, जब नरसिम्हाट राव की सरकार बनी थी। उन्हें मानव संसाधन विकास, युवा मामले और खेल के साथ ही महिला और बाल विकास राज्य मंत्री बनाया गया था। खेल मंत्री के तौर पर उन्होंने देश में खेलों की दशा सुधारने को लेकर सरकार से मतभेद होने पर इस्तीफा देने की घोषणा कर दी थी। इस वजह से 1993 में उन्हें इस मंत्रालय से छुट्टीा दे दी गई थी। इस प्रकार देखें, तो ममता का गुस्सा हमेशा उनकी नाक पर ही रहता है। गुस्सा भी मामूली नहीं होता। ममता की मजबूत पकड़ से हालांकि इस गुस्से का उनकी लोकप्रियता पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता।
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