मध्य प्रदेश में भी उमड़ रही भीड़
जिस तरह प्रखर हिंदुत्व और अपनी वेष-भूषा को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज देशभर में लोकप्रिय हैं, ठीक उसी तरह महाराष्ट्र को तेजी से विकास की राह पर ले जाते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी लोकप्रिय हो रहे हैं। अभी तक वे सिर्फ महाराष्ट्र में ही लोकप्रिय थे, लेकिन महाराष्ट्र की सफलता की कहानियां जहां-जहां पहुंच रही हैं, मुख्यमंत्री की लोकप्रियता अपने आप वहां पहुंच जा रही हैं। शायद यही वजह है कि पांच राज्यों में हो रहे चुनाव प्रचारों के लिए जिन मुख्यमंत्रियों को स्टार प्रचारक के रूप में रखा गया है, उनमें योगी आदित्यनाथ के साथ ही देवेंद्र फडणवीस भी हैं। चुनाव प्रचार के लिए मध्य प्रदेश पहुंचे देवेंद्र फड़णवीस की लोकप्रियता देखते ही बन रही थी। उन्हें सुनने के लिए मध्य प्रदेश में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस ने कई तर्कों को देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘पार्ट टाइम’ नेता, तो इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 24 घंटे गरीबों की चिंता करने वाला बताकर तुलनात्मक रूप से जनता के सामने भाजपा की नीतियों की तस्वीर पेश की है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जानती है कि वह यहां कभी जीत नहीं सकती, इसलिए उसने यहां जो घोषणाएं की है, वह झूठ का पुलिंदा है। अगर उन्हें मध्य प्रदेश का 15 साल का बजट भी दे दिया जाए, तो भी वे पूरा नहीं हो सकतीं। कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी आधे समय देश से बाहर रहते हैं। लौटकर आते हैं, तो दो—चार सभाएं भी कर लेते हैं, पर उनको पता नहीं रहता। मध्य प्रदेश की बातें छत्तीसगढ़ में कहते हैं और छत्तीसगढ़ की बातें मध्य प्रदेश में कहते हैं।’
वास्तव में राजनीति में राहुल को लेकर पहलू यह है कि राजीव के बेटे राहुल गांधी भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखने की कोशिशों में जुटे हैं, ऐसे में पिता-पुत्र की तुलना भी जरूरी है। राजीव आए ही थे लोकप्रियता के रथ पर सवार होकर। दूसरी तरफ राहुल गांधी की लोकप्रियता का चरम राजनीति में कदम रखने के करीब छह साल बाद यानी 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद आया, लेकिन उसके बाद से राहुल लगातार फिसलते चले गए। यह सिलसिला 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद शुरू हुआ। उसके बाद उनकी छवि एक ऐसे राजनेता की बनी, जो अपनी राजनीति को लेकर गंभीर नहीं है। वो रहस्यमय तरीके से छुट्टी पर चला जाता है और लाख कोशिशों के बावजूद अपनी पार्टी को चुनाव नहीं जिता पाता है। वास्तव में यही वह समय था, जब राहुल राजनीति में अपना स्थान बनाने में सफल हो सकते थे, लेकिन उन्होंने इस सुनहरे अवसर को गंवा दिया था। अब हाल के बरसों में राहुल ने इस छवि को बदलने की भरपूर कोशिश की है, लेकिन उन्हें कामयाबी अभी तक मिली नहीं है। यह कुछ ऐसी कमियां हैं, जिसने राहुल का ग्राफ तेजी से गिरा दिया है।
राजीव गांधी को कोई बच्चा पॉलीटिशियन नहीं कह पाता था, जबकि राहुल गांधी पर चिपकाया गया ‘पप्पू’ टैग अब भी चस्पा है। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, दूसरी तरफ राहुल गांधी सर्वस्वीकार्य नेता की छवि बनाने के लिए जूझ रहे हैं और उनका सामना नरेंद्र मोदी जैसे एक ऐसे पॉलीटिशियन से है, जिसका भीड़ बटोरने में कोई सानी नहीं है। राहुल उस दौर के नेता हैं, जहां भाषण से वोटरों का दिल जीतने वाले एकमात्र बड़े नेता नरेंद्र मोदी हैं। राहुल की सीधी तुलना नाटकीय उतार-चढ़ाव वाली भाषण शैली के धनी मोदी से की जाती है। राहुल पर बहुत समय तक रटा-रटाया भाषण देने का इल्जाम लगता रहा है। ऐसे में मध्य प्रदेश में देवेंद्र फडणवीस ने राहुल के बहाने भाजपा की नीतियों और नेतत्व को बखूबी जनता के सामने रखा है। कांग्रेस का वह चेहरा भी सामने रखने की कोशिश की है, जिसे आज कांग्रेस के सिपहसालार खुद ही नहीं समझ पा रहे हैं।
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