श्री गणेशाय नमः

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Friday, January 25, 2019

सही तरीके से दी जाए शिक्षा

शिक्षा का सिर्फ अधिकार मिलने से कुछ नहीं होगा
केवल शिक्षा का अधिकार मिल जाने मात्र से बेहतर शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है। शिक्षा का अधिकार सही अर्थों में तभी सफल माना जा सकता हैजब सही और सही तरीके से दी जाने वाली शिक्षा बच्चों को दी जाए। शिक्षा का अधिकार समाज के उत्थान से जुड़ा मुद्दा थाइसलिए इससे उम्मीद भी कहीं जरूरत से ज्यादा पाल ली गई। सही मायनों में क्या ये अपने मकसद में कामयाब हो पाईइस पर नजर डालने की कोशिश किसी भी सरकार ने नहीं की।
जाने-माने वैज्ञानिक प्रो.रघुनाथ अनंत मशेलकर की काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के 100वें दीक्षांत समारोह में दिए भाषण को सियासी अर्थों में लेने की जरूरत है। यह इसलिएक्योंकि शिक्षा का अधिकार लागू करने के पीछे सरकार की मंशा यही थी कि शिक्षा के प्रकाश से कोई भी गरीब या कमजोर तबका वंचित न रहे। उत्तर प्रदेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को लागू हुए चौथा साल है। इस अधिनियम के तहत गैर वित्त पोषित या निजी विद्यालयों में कक्षा पहली से आठवीं तक में गरीब और कमजोर वर्ग के कम से कम 25 प्रतिशत बच्चों को मुफ्त दाखिले का प्रावधान है। इस प्रावधान के तहत पूरे उत्तर प्रदेश में साल 2015-16 में 3,135, साल 2016-17 में 17,136 और साल 2017-18 में 27,662 दाखिले हुए।
 यह सही है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस अधिकार के तहत दाखिले तो ले लिए गएलेकिन शिक्षा का जो पैटर्न थाउसे पुराने ढर्रे पर ही चलने दिया गया। अब जब केंद्र व प्रदेश की सरकारें टोटल इनोवेशन पर जोर दे रही हैंतो उससे लगता है कि अब कहीं जाकर उसका सही मायनों में लाभ मिले। सबसे बड़ी बात यह कि अब बचपन से ही बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है। बच्चों की सोच में भी क्रांतिकारी बदलाव आया है। अब बच्चे गूगल या माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ बनने की नहीं सोचते। वो अमेरिका या अन्य विकसित देशों में जा कर काम नहीं करना चाहतेबल्कि वो गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी खुद भारत में ही खोलना चाहते हैं। प्रो.माशेलकर ने ठीक ही कहा है कि प्रौद्योगिकी की वजह से उत्पन्न बेरोजगारी की वृद्धि से बचने के लिए शिक्षा का अधिकार से सही शिक्षा और शिक्षा का सही तरीका की ओर बढ़ना होगा। नि:संदेह जिस तेजी से वक्त बदलाजरूरतें बदलींनित नए अविष्कार हुएलेकिन इसके बावजूद बच्चों को समयानुकूल शिक्षा के प्रकाश से आलोकित नहीं किया गया। अब भी वक्त हैअगर इस अधिकार को सही मायनों में बच्चों तक पहुंचाया जाएतो ये योजना वास्तव में एक जनकल्याणकारी योजना कही जा सकेगी।



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