भाजपा ने तय किए चुनावी नारे
सियासी समर में नारों का बहुत महत्व होता है। नारे चुनाव की दिशा और दशा दोनों तय करने का माद्दा रखते हैं। कम से कम भारतीय इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब इन्हीं नारों ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों की दिशा तक मोड़ दी है। कई सियासी दलों को स्थापित करने में भी इन नारों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। नारों के असर से शायद ही कोई ऐसा दल होगा, जो इत्तेफाक न रखता हो। यही वजह है कि सभी दल बहुत सोच-विचार कर ही चुनावों के लिए नारें तय करते हैं और उन्हें इस नारों की पतवार के सहारे जीत हासिल करने की उम्मीद भी होती है।
आगामी लोकसभा चुनाव 2019 के लिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए नारा तय कर दिए हैं। इसमें एक नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’ एक बार फिर रखा गया है। नए नारों में ‘जन-जन का संकल्प अटल, फिर देश में खिले कमल’ और दूसरा ‘2019 में एक बार फिर मोदी सरकार’ है। भाजपा प्रदेश प्रभारियों की बैठक में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ.महेंद्र नाथ पांडेय और प्रदेश महामंत्री सुनील बंसल ने ये फैसला लिया है। इसमें बिल्कुल ही दोराय नहीं कि भाजपा का ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे ने पूर्व में अपना दमखम दिखाया था और कई अन्य जातियों को भी भाजपा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। अब जरा नारों के पिछले इतिहास पर नजर डालें, तो ‘जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में, मरद गया नसबंदी में’ ने आपातकाल और नसबंदी अभियान के खिलाफ काफी चर्चित हुआ था और तत्कालीन कांग्रेस की इंदिरा सरकार के सामने संकट आ गया था। चुनावों में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई। रायबरेली से इंदिरा गांधी और अमेठी सीट से संजय गांधी की हार पर लोगों ने ढोल-नगाड़े बजाए। ‘देखो इंदिरा का ये खेल, खा गई राशन, पी गई तेल’ से तत्कालीन राजनीतिक विरोधियों ने इंदिरा के ‘गरीबी हटाओ’ नारे का जवाब देकर इंदिरा गांधी को जनता के बीच एक खलनायिका की छवि बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। साल 1989 के चुनावों में वीपी सिंह को लेकर बना ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ नारा भी काफी चर्चित रहा। इसके बाद 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ने इसका लाभ उठाने के लिए ‘राजीव तेरा ये बलिदान, याद करेगा हिंदुस्तान’ नारा दिया, जिसने कांग्रेस की एक बार फिर सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद 1996 में भाजपा द्वारा दिया गया नारा ‘सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी’ ने केंद्र में अटल सरकार बनाने में अहम योगदान दिया। इसके अलावा ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे/ ये तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है/रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ ने राम मंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा और संघ के इस नारे ने कमाल दिखाया और यूपी समेत केंद्र तक में सरकार बनाने में अपना अहम योगदान दिया।
यूपी ने विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के नारे ‘उम्मीद की साइकिल’ पर भरोसा जताया था और पार्टी ने विधानसभा में 224 सीटें जीतीं थी। इसके बाद पिछले विस चुनाव में सपा ने यूपी में दो नारा दिया। पहला ‘काम बोलता है’ और दूसरा कांग्रेस के साथ गठबंधन का ‘यूपी को ये साथ पसंद है।’ हालांकि इन दोनों नारों ने यूपी की जनता को खास आकर्षित नहीं किया और सपा को मुंह की खानी पड़ी, जबकि भाजपा ने दमदार जीत दर्ज की। इसके विपरीत भाजपा का नारा था ‘न गुंडाराज, न भ्रष्टाचार, अबकी बार भाजपा सरकार’ का ये नारा कमाल का रहा। वहीं कांग्रेस ने गठबंधन से पहले नारा दिया था ‘27 साल यूपी बेहाल’ कोई दम नहीं दिखा सका, क्यों सपा के गठबंधन के साथ यह नारा पीछे चला गया। वर्ष 2007 उत्तर प्रदेश विधानसभा के समय बसपा द्वारा दिया गया नारा ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ तथा ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश’ है का नारा भी खूब कामयाब रहा। इसी सोशल इंजीनियरिंग के नारे ने कमाल दिखाया था और तब मायावती ने सत्ता भी पाई थी। 2010 में बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस द्वारा दिया गया नारा ‘मां, माटी, मानुष’ भी काफी असरदार रहा हैं।
सियासी दलों की सफलता-असफलता की कहानी गढ़ते ये नारे कितने महत्वपूर्ण रहे हैं, इसका उदाहरण आज तक भारतीय राजनीति में देखने को मिल रहा है। भाजपा को भी उम्मीद है कि अबकी जारी किए गए ये नारे कामयाब होंगे। हालांकि चुनाव के दौरान मंचों से भी कई नारे अनायास ही बन जाते हैं और कई बार यही सफलता की सीढ़ी भी बन जाते हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें, तो अबकी भी ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा एक बार फिर दोहराकर भाजपा ने सभी वर्गों को साथ रखने की कोशिश की है। बहुत संभव है कि भाजपा का ये नारा पिछली बार की तरह एक बार फिर कामयाबी की दास्तां लिखें। हालांकि इसके लिए अभी 2019 चुनाव के परिणामों का इंतजार करना होगा
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