महामहिम ने अपने अभिभाषण से भले ही युवाओं में एक बेहतरी की उम्मीद जगाई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में केंद्र सरकार की योजनाएं युवाओं के खाली हाथों को रोजगार दे पाएंगी। सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर कोई शख्स पकौड़े बेचकर रोज 200 रुपये कमाता है, तो क्या उसे रोजगार नहीं कहा जाएगा। इस बयान पर उनकी काफी आलोचना की गई थी। यहां तक कि पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि अगर पकौड़े बेचना भी नौकरी है, तो फिर भीख मांगने को रोजगार के विकल्प के तौर पर देखना चाहिए। हालांकि इस पर भाजपा ने भी पलटवार किया और कहा था कि कांग्रेस ने ईमानदार और मेहनतकश लोगों का अपमान किया है। वैसे ये कोई नई बात नहीं है। अक्सर विपक्षी दल बेरोजगारी को लेकर निशाना साधते रहे हैं, चाहें वह भाजपा की सरकार हो या कांग्रेसनीत संप्रग सरकार। महामहिम ने अपने अभिभाषण में कहा कि भारत, दुनिया का सबसे युवा देश है। देश के युवा अपने सपने पूरे कर सकें, स्वरोजगार कर सकें, इसके लिए सरकार स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्किल इंडिया मिशन, मुद्रा योजना जैसे कार्यक्रम चला रही है। ये सारी योजनाएं वास्तव में धरातल पर उसी तरह ध्वस्त होती दिख रही हैं, जैसे रेत का महल हो जाता है। इन योजनाओं से अगर कोई युवा स्किल हासिल भी कर ले, तो उसे ऋण लेने के लिए महीनों बैंकों और संबंधित संस्थाओं के चक्कर काटने पड़ते हैं। वहीं भ्रष्टाचार के चलते उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। यह किसी से छिपा नहीं है कि आज अगर कोई युवा ऋण लेने के लिए सरकारी संस्थाओं में आवेदन करता है, तो सबसे पहले उसका सामना भ्रष्टाचार से ही होता है। इसमें हर किसी का कमीशन पहले से तय होता है। ऐसे में एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने के बाद युवा के हाथ में जो लगता है, वह उसकी आर्थिक तरक्की मे मददगार कम, उसको तनाव अधिक देने वाला साबित होता है। जैसा कि राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में कहा कि युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए सक्रिय सरकार देश में 20 इंस्टीट्यूट्स आॅफ एमिनंस बनाने पर काम कर रही है। इस मिशन के तहत चुने हुए शिक्षण संस्थानों को 10,000 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद दी जाएगी। सवाल यह है कि आज शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि आज एक गरीब अपने बच्चे को कलेक्टर बनाने की बात तो दूर, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी पढ़ाने तक के बारे में सोचने से ही कांप उठता है। वहीं मध्यमवर्गीय परिवार का अगर कोई मेधावी बच्चा किसी तरह प्रवेश परीक्षा पास भी कर ले, तो उसके अभिभावक की हैसियत नहीं होती कि वह उसके पढ़ाई का खर्च भी वहन कर सके। महंगी फीस, महंगी किताबों के अलावा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सिस्टम के चलते कई बार न सिर्फ अभिभावक की हसरत मटियामेट हो जाती है, बल्कि मेधावी भी कुंठित होकर बेरोजगारी की राह पर निकल पड़ते हैं।
राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण से केंद्र सरकार की कई योजनाओं पर भी प्रकाश डाला। इसमें बात चाहें महिलाओं के तीन तलाक बिल से जुड़ी हो, या फिर गरीबों, किसानों से जुड़ी योजनाओं की। जनधन योजना की बात हो, या फिर ग्रामीण विकास। डिजिटल इंडिया की बात हो, चाहें प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की। ये सारी योजनाएं तभी कारगर हैं, जब देश से भ्रष्टाचार का समूल विनाश हो। इसके अभाव में जैसे पूर्व की योजनाएं केवल कुछ खास वर्ग को ही लाभ पहुंचाती रही हैं, वैसे ही आगे भी पहुंचाती रहेंगी। वैसे भी मोदी सरकार के इस बजट के लोकलुभावन होने की उम्मीद लोगों को कम ही है, क्योंकि प्रधानमंत्री ने एक इंटरव्यू में पहले ही कह दिया है कि ये बजट लोकलुभावन नहीं होगा। सरकार सुधारों के एजेंडे पर ही चलेगी। जीएसटी लागू होने के बाद मोदी सरकार का यह पहला बजट है और मोदी सरकार का चौथा बजट। ऐसे में सरकार से यह उम्मीद अवश्य ही रहेगी कि वह युवाओं को रोजगार देकर न सिर्फ उनकी बेरोजगारी दूर करे, बल्कि अब आज भारत युवा देश है, तो बिना युवाओं के आर्थिक रूप से सशक्त हुए, देश सशक्त नहीं होगा। युवाओं को आसानी से शिक्षा मिले, तकनीकी कौशल मिले, रोजगार मिले, यह सब कुछ इस बजट में परिलक्षित होना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि जब पहली फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट पेश करें, तो युवाओं की आंखों के सतरंगी सपने एक बार फिर चमक उठें। देश की तकदीर लिखने वाले युवाओं में उम्मीद जगे और हताशा उनसे कोसों दूर हो जाए। तभी यह बजट वास्तव में सार्थक हो सकेगा, अन्यथा यह बजट हर साल की तरह ढपोरशंखी ही बनकर रह जाएगा। अगर सरकार ने इस बजट से युवाओं की आंखों में रोजगार की रोशनी चमका दी, तो न ही कोई युवा कुंठित होगा, न ही वह सिस्टम से हारकर कोई ऐसा कदम उठाएगा, जिसे देश, समाज और राष्ट्र के लिए उचित नहीं कहा जाता है।
No comments:
Post a Comment