श्री गणेशाय नमः

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Friday, January 25, 2019

छठ पर देवेंद्र की सूर्योपासना


महाराष्ट्र की सियासत को नए सिरे से गढ़ने का माद्दा रखने वाले उत्तर भारतीयों को लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस की कोशिशें अब रंग लाती दिखने लगी है। कल तक मनसे जैसे दल के पदाधिकारी और कार्यकर्ता उत्तर भारतीयों को भैया’ और घाण’ कहकर हमले किया करते थेआज मुख्यमंत्री की कोशिशों का ही नतीजा है कि वे भी उनके सम्मान में अब उठने लगे हैं।
  सूर्यषष्ठी यानी छठ व्रत के समापन पर मुंबई में बुधवार को उगते सूरज को अर्घ्य देने के लिए लाखों श्रद्धालु जुहू बीच पर जुटे। इनमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस और पार्टी की मुंबई इकाई के अध्यक्ष आशीष शेलार भी थे। फडणवीस ने पूजा की और सूर्य की प्रार्थना भी की। इसके जरिए उन्होंने उत्तर भारतीयों का अनादर करने वाले दलों को जोरदार झटका दिया है। यह हकीकत है कि मराठी मानुस’ के मुद्दे पर सियासत करने वाले राजनीतिज्ञों के बीच अगर उत्तर भारतीय आज सम्मान पा रहे हैंतो इसका श्रेय नि:संदेह देवेंद्र सरकार को है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल आने वाले दिनों में सामने आएगा कि मुख्यमंत्री और अन्य दलों के बीच उत्तर भारतीयों का झुकाव किधर होता है। हालांकि मुख्यमंत्री की ओर से यह पहली बार नहीं हुआ हैजब उन्होंने छठ जैसे पर्व पर उत्तर भारतीयों को सम्मान दिया है। कई ऐसे मौके आए हैंजब उन्होंने महाराष्ट्र में राष्ट्रीय एकता’ और अखंडता का सूत्रपात करते हुए मनसे जैसे सीमित मानसिकता वाले दलों को आइना दिखाया है। अभी कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई के घाटकोपर में हिंदी विद्या समिति के कार्यक्रम में कहा था कि बाहरी राज्यों से आने वाले लोग मुंबई को महान् बनाते हैं। ऐसे लोगों ने मुंबई का गौरव और बढ़ाया है। क्योंकि भाषा लोगों को जोड़ती है। भाषा विवाद का कारण नहीं हो सकती। वोट बैंक के लिए कोई भी भाषा को लेकर विवाद न करे। मराठी संस्कृति का हमें अभिमान हैलेकिन साथ में उत्तर भारत की संस्कृति भी हमें अच्छी लगती है।’ राजनीति के जानकारों की मानेंतो मुख्यमंत्री के इस बयान के सियासी मायने बेहद खास और गहरे हैं। ये मायने आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की सियासत को नए सिरे से गढ़ने की ताकत रखते हैं।
मुख्यमंत्री का सबका साथसबका विकास’ का दावा केवल बयानों में ही नहीं दिखताबल्कि धरातल पर भी इसका असर दिखने लगा है। मुख्यमंत्री के प्रयास ही हैं कि कल तक जिन दलों को उत्तर भारतीय फूटी आंख नहीं सुहाते थेआज वे दल भी उन्हें अपना बनाने का कोई मौका हाथ से जाने देना नहीं चाहते। उत्तर भारतीयों की पिटाई कर सुर्खियां बटोरने वाले राज ठाकरे भी अब उन्हीं से संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। उत्तर भारतीय महापंचायत के दो दिसंबर को कांदिवली में आयोजित कार्यक्रम में राज उत्तर भारतीयों से सीधे संपर्क करेंगे। यह मुख्यमंत्री की कोशिशों का ही नतीजा है कि अब सभी दल उत्तर भारतीयों की ओर अपना रुख नरम करने लगे हैं।
 अगर विकास की ही बात करेंतो इस मुद्दे पर भी यहां की सरकार ने नए कीर्तिमान गढ़े हैं। हाल ही में महाराष्ट्र की सरकार ने धारावी एक बार फिर से बसाने आैर उसके पुनर्विकास की मंजूरी दे दी है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबर्इ में लाखों लोग कर्इ साल रहने के बाद भी बाद भी अपने सपनों का आशियाना नहीं बना सके हैं। पहले तो वहां पर मकान काफी महंगे हैं। अगर रुपए हो भीतो घर नहीं मिलता है। सरकार ने एेसे लोगों के सपने को पूरा करने के लिए आने वाले एक दशक में सात लाख घरों का निर्माण करने जा रही है। इसकी कीमत में 25 फीसदी की कमी आने की संभावना है। सरकार का दावा है कि लोगों को 2020 तक नए घर मिलने शुरू हो जाएंगे। सरकार ने धारावी पर स्पेशल परपज वीइकल मॉडल लागू करने मन बनाया है। इसके तहत 80 फीसदी भागीदारी अंतरराष्ट्रीय निजी कंपनी और 20 फीसदी हिस्सेदारी राज्य सरकार की होगी। धारावी के विकास को विशेष परियोजना का दर्जा देने से जीएसटीस्टैंप ड्यूटी और संपत्ति कर जैसे अन्य करों में सहूलियत भी दी जाएगी। वहीं दूसरी आेर फंजिबल प्रीमियम और प्रीमियम माफी की भी संभावना है। एसआरएम्हाडाधारावी पुनर्विकासबीडीडी चालप्रधानमंत्री आवास योजना के अलावा निजी बिल्डर बड़ी संख्या में घर मुहैया करा रहे हैं। इस कदम से मुंबई जैसे बड़े शहर में भी घर सस्ते मिलेंगे।
 उधरदक्षिण मुंबई स्थित बीडीडी चाल की विकास प्रक्रिया शुरू हो गई है। निर्माण कार्य करने वाली कंपनियों की नियुक्ति कर दी गई है। करीब तीन साल बाद बीडीडी चाल के विकास से 10 हजार नए घर दक्षिण मुंबई में उपलब्ध होंगे। झोपड़पट्टी पुनर्वसन प्राधिकरण (एसआरए) के अंतर्गत मुंबई में 2.50 लाख नए घर बनाने का काम चल रहा है। नए डेवलपमेंट प्लान और दूसरे कदमों से भी मुंबई महानगरपालिका क्षेत्र में तीन लाख से ज्यादा घर बनकर तैयार होंगे। ऐसे में यह बेबाकी से कहा जा सकता है कि सरकार सभी का समान रूप से विकास करने में तत्पर है।
दरअसलमहाराष्ट्र की राजनीति में मराठी और उत्तर भारतीय दोनों बहुत मायने रखते हैं। वैसे तो महाराष्ट्र की सत्ता में लंबे वक्त तक कांग्रेस का दबदबा रहा हैलेकिन मराठी अस्मिता के नाम पर पहले शिवसेना और कुछ हद तक महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) भी राजनीति में अपनी पैठ बनाने में कामयाब रही है। शिवसेना और एमएनएस दोनों ही मराठी’ की राजनीति करते हैं। इस बीच साल 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा 122 सीटें हासिल कर पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके बाद भाजपा ने एनडीए में सहयोगी दल शिवसेना (63 सीट) के साथ मिलकर सरकार बनाई। सरकार में भाजपा-शिवसेना साथ भले ही होंलेकिन मराठी-गैर मराठी के मुद्दे पर दोनों ही एक दूसरे से बंटे रहते हैंकटे रहते हैं। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा को महाराष्ट्र में गैर-मराठियों का भी खूब साथ मिला। राजनीतिक दलों के पास मौजूद आंकड़ों को मानेंतो महाराष्ट्र में 10 से 12 फीसदी उत्तर भारतीय वोटर हैं। ये वोटरचुनावों के रुख पर असर डालने का माद्दा रखते हैं।



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