श्री गणेशाय नमः

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Friday, January 25, 2019

सुविधाओं की जरूरत नहीं

बंगला छोड़ने के लिए पीएमओ को पत्र
राजनीति समाजसेवा का क्षेत्र है। वक्त बदलने के साथ अब भारतीय राजनीति में भी व्यापक बदलाव आया है। आज राजनीति जनसेवा न रहकर करियर का क्षेत्र बन गई है। अब यहां लोग सुख भोग और लाभ कमाने के उद्देश्य से आते हैं। अगर ऐसे दौर में भी कोई आदर्श स्थापित करता हैतो वह मिसाल बन जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री व दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की दत्तक पुत्री नमितादामाद रंजन भट्टाचार्य और नाती निहारिका आदि ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर कहा है कि उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं की कोई जरूरत नहीं है। यह आदर्श और सराहनीय कदम है।
 निजी स्वार्थ और धनलिप्सा में आज एक ओर जहां राजनीति में ओहदा पाने के बाद ज्यादा से ज्यादा सरकारी सुविधाओं को लपक लेने की होड़ मची हैउसी दौर में ऐसी मांग आश्चर्यचकित करती है। यह स्थिति भी तब हैजब पूर्व प्रधानमंत्रियों की परिजनों को मुफ्त आवास की सुविधामुफ्त चिकित्सा सुविधाएंसरकारी स्टाफघरेलू विमान टिकटेंट्रेन में फ्री यात्रा और एसपीजी सुरक्षा समेत अन्य सुविधाएं मिलती हैं। आज भी देश में अनेक पूर्व प्रधानमंत्रीमुख्यमंत्री आदि के परिजन हैंजो शासन की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं का लाभ किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं।
 अभी कुछ दिनों पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा सपा मुखिया अखिलेश यादव के बंगले को खाली कराने को लेकर मचे हंगामे और की गई तोड़-फोड़ का नजारा सबने देखा है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के सरकारी बंगले को खाली करने का विवाद डेढ़ साल से चल रहा है और पटना हाईकोर्ट के आदेश के करीब दो महीने बाद तक उन्होंने इसे खाली नहीं किया है। अभी हाल ही में एक आरटीआई से खुलासा हुआ था कि पिछले चार साल में लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के वेतन-भत्तों पर सरकारी खजाने से कुल लगभग 20 (19.97) अरब रुपए खर्च हुए थे। इस अवधि हर लोकसभा सांसद ने हर वर्ष औसतन 71.29 लाख रुपए और राज्यसभा सांसद को प्रत्येक साल औसतन 44.33 लाख रुपए के वेतन-भत्ते के तौर पर दिया गया। प्रधानमंत्री की पुकार पर आम जनता ने सरकार से मिलने वाली कई सब्सिडी छोड़ दीलेकिन जनप्रतिनिधि सेवाकाल में वेतन लेते हैं और पांच साल की सेवा में ही पेंशन लाभ भी। इतनी अल्पकाल की सेवा में ही उन्हें आजीवन सुविधा पाने का हक मिल जाता है। ऐसा तो अधिकांश सरकारी मुलाजिम के 58 साल की नौकरी पर भी नहीं मिलता है।
 स्व.अटल जी का परिवार भी चाहतातो शासन की ओर से मिलने वाली सुविधाओं का आजीवन लाभ उठा सकता था। अटल ने जिस तरह राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी और पक्ष और विपक्ष के सभी नेता उनका सम्मान करते थेउन्हीं के परिवार ने अबकी जो मिसाल पेश की हैउसका उदाहरण आगे भविष्य में शायद ही देखने को मिले। हो सकता है कि कुछ और नेताओं के परिजन इससे सीख लेकर आगे आएंलेकिन फिलहाल इसकी कोई संभावना कहीं नहीं दिख रही है।



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