श्री गणेशाय नमः

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Friday, January 25, 2019

किसके साथ आदिवासी?

मध्य प्रदेश में पिछले तीन चुनाव से अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को भरोसा है कि इस बार न सिर्फ भाजपा को कड़ी टक्कर देगीबल्कि सरकार बनाने में भी सफल होगी। हालांकि मध्य प्रदेश के शीर्ष नेताओं की आपसी खींचतान के चलते उसका दावा अभी तक तो ख्याली पुलाव ही लग रहा है। पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस जमीनी स्तर पर बुरी तरह से बिखर चुकी है और अभी कोई ऐसा चमत्कार होने की भी कोई उम्मीद नहीं दिखतीजिससे कि उसके वोट बैंक में अचानक उछाल आ सके।
  यहां तक कि अब तक जो कांग्रेस आदिवासियों को अपना वोट बैंक समझते रही है और कांग्रेसी नेता उनके साथ वनवासियों के परिधान में कमर लचकाते रहे हैंवे भी उनसे अलग हो चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक आदिवासी परिधान में आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाने में कामयाब रहे थेलेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज आदिवासियों का कांग्रेस से मोहभंग हो चुका है। हालात ऐसे हैं कि मध्य प्रदेश में आदिवासी लगभग 23 प्रतिशत हैं और इनके लिए 47 सीटें सुरक्षित हैं। पिछले तीन विधानसभा चुनावों से आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीटों पर भाजपा जीत हासिल करती रही है। इस दौरान आदिवासियों ने भी विकास की नई इबारत लिखी और वे विकास की मुख्यधारा में शामिल होते गए।
यह कहने की जरूरत नहीं कि इस दौरान भाजपा और हिंदुत्व के प्रति भी उनका लगाव खूब बढ़ा है। साल 1985 तक जो महिलाएं मांग में सिंदूर नहीं लगाती थीआज लगा रही हैं। अब आदिवासियों की पुरानी सौंदर्य प्रसाधन कौड़ीसिपिया की जगह हिंदू रीति-रिवाज तेजी से पैठ बनाने लगे हैं। अब वे गणपति पूजन में भी खूब रूचि दिखा रहे हैं। आदिवासियों के उत्थान में उठाए गए कदमों की बदौलत आज आदिवासी समाज अब अपना अच्छा और बुरा खुद समझने लगा है। अब उसे बरगला पाना आसान नहीं है। यही वजह है कि दिनोंदिन उनका कांग्रेस से मोहभंग होता जा रहा है।



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