‘भाजपा बंधन’ क्या तोड़ पाएगा ‘गठबंधन’ !
जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, तमाम दलों के गठबंधनों के बनने-बिगड़ने का गणित भी तेज है। वर्तमान में भाजपा से इतर पार्टियां एकजुट हो रही हैं। पहले खबर आई कि महाराष्ट्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) कुछ अन्य छोटे दलों संग गठबंधन बनाएगा। इसी बीच अचानक खबर आई कि भारतीय रिपब्लिकन पार्टी-बहुजन महासंघ (भरिप-बहुजन महासंघ) के नेता प्रकाश आंबेडकर ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के साथ जा रही है।
महाराष्ट्र की मौजूदा विधानसभा में भरिप और एमआईएम के दो-दो सदस्य हैं। दोनों दल अपने-अपने स्तर पर एक फीसदी से अधिक मत नहीं ले पाए थे। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इस गठबंधन का कितना महत्व होगा और यह एंटी-भाजपा गठबंधन के रूप में कितना कारगर होगा। दरअसल, विपक्षी दलों के पास भाजपा का विरोध करने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है। सभी विपक्षी दलों के लिए वोटों का बंटवारा बेहद अहम है। यह भी हकीकत है कि मौजूदा समय में कोई भी पार्टी चुनाव में अकेले दम पर भाजपा को हराने में सक्षम नहीं है। जैसे इतिहास में कभी कांग्रेस बेहद मजबूत थी और तब तमाम दूसरे विपक्षी दल उसे हराने के लिए एकजुट थे, वैसे ही आज भाजपा को मात देने के लिए साथ-साथ हैं।
आज भी यहां मुद्दा अकेले भाजपा के विरोध का है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रकाश आंबेडकर के मतदाता अपना वोट किसी मुसलमान उम्मीदवार को देंगे? ओवैसी भी इस विरोधाभास को जानते हैं। यही वजह है कि जब वे आंबेडकर की तारीफ करते हैं, तो उसमें गांधी बनाम आंबेडकर के दशकों पुराने विचार रखते हैं। वे खुद को प्रकाश आंबेडकर से अधिक बड़ा आंबेडकरवादी बताते हैं। सवाल तो यह उठता है कि आखिर इस गठबंधन से दोनों को लाभ कितना होगा। यह गठबंधन जिस सामाजिक गणित को बनाता दिख रहा है कि उससे प्रकाश आंबेडकर की बहुजन योजना को बल मिलेगा या वह कमजोर पड़ जाएगी? अभी फिलहाल यह सवाल अनुत्तरित है। वहीं जहां तक महाराष्ट्र में ओवैसी का सवाल है, तो यह दावा करना मुश्किल है कि महाराष्ट्र में उनकी पार्टी का मतदाता दूसरी तरफ नहीं जाएगा। यहां तक कि हैदराबाद के अलावा ओवैसी ने जब कभी किसी अन्य राज्य में अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहा, उन्हें मात खानी पड़ी है। हो सकता है कि महाराष्ट्र में भाजपा के सामने भी ओवैसी की वही दुर्गति हो।
2019 लोकसभा चुनावों को लेकर विपक्ष का एक ही बड़ा मुद्दा दिखाई देता है और वह है साम, दाम, दंड, भेद के द्वारा भाजपा को हटाना। वोटों की राजनीति में कौन किसके साथ गठबंधन कर रहा है, उसके पीछे जनहित की भावना तो बिल्कुल नजर नहीं आती। व्यक्तिगत लाभ के लिए जनहित को दांव पर लगाना अब राजनैतिक दलों का शगल बनता जा रहा है, जो अब राष्ट्र की उन्नति के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है। जनता भली-भांति समझ रही है कि अस्तित्वहीन छोटे-छोटे दल आपस में मिलकर आपस में लड़ तो सकते हैं, लेकिन कोई स्थिर सरकार देश को नहीं दे सकते। प्रकाश आंबेडकर एवं असदुद्दीन ओवैसी का गठबंधन देश को क्या दे सकता है, यह जनता से छिपा नहीं है। ऐसे गठबंधनों द्वारा वोट पाना तो दूर की बात है, अब ये लोग जनता को भ्रमित भी करने में सक्षम नहीं हैं। हां, कुछ काल के लिए मीडिया में कुछ सुर्खियां अवश्य बटोर सकते हैं।
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