श्री गणेशाय नमः

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श्री गणेशाय नमः

Friday, January 25, 2019

मछुआरों का 'मसीहा'

नाडार परियोजना पर रोक से किसानों को भी होगा फायदा
सही मायनों में असली विकास वही हैजो विनाश की ओर न ले जाए। महाराष्ट्र में प्रस्तावित देश की सबसे बड़ी पेट्रोलियम रिफाइनरी नाडार परियोजना’ से भले ही राज्य को काफी मुनाफा होतापर इस 15 हजार एकड़ में प्रस्तावित परियोजना पर काम शुरू होने से 17 गांवों के किसानों और मछुआरों का विस्थापन भी तय था। पर्यावरण को जो नुकसान होतावह अलग। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस वास्तव में इन मछुआरोंकिसानों के मसीहा बन गए हैं और उन्होंने इस परियोजना पर रोक लगा दी है। दो टूक चेतावनी भी दी है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ कोई जबरन उसकी जमीन के अधिग्रहण की कोशिश करेतो उस पर पुलिस अपराधिक मामला दर्ज करे।
 कोंकण तट पर बसे विस्थापित होने वाले इन गांवों में से 15 गांव रत्नागिरि और दो गांव बगल के सिंधुदुर्ग में स्थित हैं। इस इलाकों में पर्याप्त बारिश होती है। यही वजह है कि विदर्भ और मराठवाड़ा के उलट इस उपजाऊ जमीन के किसानों ने बिना सरकारी कर्जमाफी योजनाओं के यहां काफी अच्छा उत्पादन किया है। परियोजना के लिए जरूरी 14,675 एकड़ (5.870 हेक्टेयर) जमीन में से सरकार के पास सिर्फ 126 एकड़ (52 हेक्टेयर) जमीन हैजबकि बाकी जमीन का अधिग्रहण होना था। परियोजना के लिए जिन 17 गांवों को चुना गया है,  उनमें नानर,  सागवे,  तारलकरसिंघेवाड़ीवडापल्लेविल्लयेदत्तावाड़ीपडेकावाड़ीकटरादेवीकरविनेचौकेउपाडे,  पडवे,  सखर,  गोठीवारेगिरये और रामेश्वर शामिल हैं। इस परियोजना को 2022 तक पूरा होना था।
  ऐसा पहली बार नहीं हैजब कोंकण में ये बड़ी परियोजना प्रस्तावित हुई। वहीं यह भी पहली बार नहींजब किसी परियोजना को राज्य में बड़े विरोध-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा। साल 1992 में वेदांता की स्टरलाइट इंडस्ट्रीज को रत्नागिरि के जदगांव गांव में 60 हजार टन सालाना कॉपर स्मेल्टर प्लांट और संबंधित सुविधाओं के लिए राज्य सरकार द्वारा 500 एकड़ जमीन का आवंटन किया गया थापर इस परियोजना को आखिरकार तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्थानांतरित करना पड़ा। इसके बाद 90 के दशक के ही शुरुआती वर्षों में दाभोल पॉवर कंपनी द्वारा निर्माणाधीन एक और परियोजना विवादों में आई।
 फिलहालनाडार परियोजना से न सिर्फ किसानोंमछुआरों को नुकसान होताबल्कि 14 लाख से ज्यादा आमछह लाख काजू के पेड़ों500 एकड़ में फैले धान के खेतों और इलाके के वनस्पतियां और जीव-जंतु भी नष्ट हो जाते। इसका इस क्षेत्र के नाजुक तटीय पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ता। मुख्यमंत्री के हालिया इस आदेश से स्पष्ट है कि फडणवीस सरकार विकास के लिए विनाश को आमंत्रण नहीं देना चाहती है। सीएम देवेंद्र  ने कहा है कि अब कोई भी भूखंड नहीं ले सकता है।


बिखरती एनसीपी, लाचार पवार

सांसद निवेदिता माने ने छोड़ा साथबेटे के साथ शिवसेना में गईं
लगता है कि आजकल एनसीपी के सितारे गार्दिश में चल रहे हैं और हालात ऐसे बन रहे हैं कि इस पार्टी के कई सिपहसालार साथ छोड़कर कांग्रेस समेत अन्य दलों का दामन थामने को बेचैन हों। जिस एनसीपी ने महाराष्ट्र की तीन-तीन बार कमान संभाली,  आज वह बिखरती नजर आ रही है। एक प्रभावशाली नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के संस्थापक और अध्यक्ष शरद पवार भी अपनी खिसकती सियासी जमीन को बचाने में लाचार दिख रहे हैं।
  हालिया घटनाक्रम में एनसीपी की वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद निवेदिता माने के पार्टी से इस्तीफा देना और मुंबई में उनके बेटे एवं जिला परिषद के सदस्य धैर्यशील पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे की उपस्थिति में शिवसेना में शामिल होना ये बता रहा है कि मामला गंभीर है। कहा तो ये जा रहा है कि माने ने यह निर्णय एनसीपी प्रमुख शरद पवार की किसान एवं हातकणंगले से स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के सांसद राजू शेट्टी से बढ़ती निकटता के कारण लिया है। इस संसदीय सीट से पहले माने सांसद हुआ करती थीं। वह पूर्व सांसद दिवंगत बालासाहेब माने की बहू हैं। ऐसा माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में एनसीपी यह सीट शेट्टी के लिए छोड़ देगी। इस संसदीय सीट से मानेशेट्टी से दो बार चुनाव हार चुकी हैं। मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के निवास पर एक साधारण कार्यक्रम में ठाकरे और पार्टी के छह विधायकों की मौजूदगी में निवेदिता माने के पुत्र धैर्यशील शिवसेना में शामिल हुए। कहा जा रहा है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में हातकणंगले सीट से शेट्टी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं।
 हालांकि इससे पहले एनसीपी नेता और लोकसभा सांसद तारिक अनवर ने भी कुछ दिनों पहले ही पार्टी के साथ ही साथ सांसद के पद से भी इस्तीफा दे दिया था। अनवर पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार से नाराज चल रहे थे। अनवर वर्तमान में बिहार के कटिहार से लोकसभा सांसद थे और पवार के काफी करीबी माने जाते हैं। अनवर और लोकसभा स्पीकर पीए संगमा ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर शरद पवार के साथ मिलकर एनसीपी का गठन किया था।
 इनके अलावा एनसीपी के कभी कद्दावर नेता माने जाने वाले और 16वीं लोकसभा में सतारा सीट से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो बार सांसद रह चुके उदयन राजे भोसले भी पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। सतारा सीट से भोसले के बतौर आरपीआई उम्मीदवार चुनाव लड़ने की चर्चा सियासी गलियारों में है। सांसद उदयनराजे भोसले छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज हैं और यहीं वजह है कि लोग इनको आज भी अपना राजा मानती हैं। आम जनता के बीच ये इस कदर लोकप्रिय हैं कि इन्हें लोग बिना मांगे ही वोट दे देते हैं। इनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश में मोदी लहर होने के बावजूद भी इन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में पांच लाख से ज्यादा वोट पाए थे। 16 वीं लोकसभा में सांसद रहने से पहले 2009 में वह कांग्रेस की टिकट पर भी सांसद चुने जा चुके हैं। इसके अलावा वे महाराष्ट्र में भाजपा सरकार के कार्यकाल में राजस्व मंत्री भी रह चुके हैं। उदयन कई विवादों के लिए भी सुर्खियों में रहें हैं।
 शरद पवार एक वरिष्ठ भारतीय राजनेता हैंजो नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के संस्थापक और अध्यक्ष भी हैं। वे तीन अलग-अलग समय पर महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। एक प्रभावशाली नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले शरद पवार केंद्र सरकार में भी रक्षा और कृषि मंत्री भी रह चुके हैं। इसके बावजूद मौजूदा दौर में अपनों का साथ छूटना उनके और उनकी पार्टी के लिए एक चिंता का कारण बन सकती है। तीन-तीन कद्दावर नेताओं को पार्टी से छिटकना नि:संदेह उनकी एनसीपी को कमजोर करेगी। उनके अपनों का ही साथ छोड़कर जाना एनसीपी की गिरती साख का ही परिचायक है।


बुलंद नारे, बुलंद जीत

भाजपा ने तय किए चुनावी नारे
सियासी समर में नारों का बहुत महत्व होता है। नारे चुनाव की दिशा और दशा दोनों तय करने का माद्दा रखते हैं। कम से कम भारतीय इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैंजब इन्हीं नारों ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों की दिशा तक मोड़ दी है। कई सियासी दलों को स्थापित करने में भी इन नारों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। नारों के असर से शायद ही कोई ऐसा दल होगाजो इत्तेफाक न रखता हो। यही वजह है कि सभी दल बहुत सोच-विचार कर ही चुनावों के लिए नारें तय करते हैं और उन्हें इस नारों की पतवार के सहारे जीत हासिल करने की उम्मीद भी होती है।
  आगामी लोकसभा चुनाव 2019 के लिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए नारा तय कर दिए हैं। इसमें एक नारा सबका साथ-सबका विकास’ एक बार फिर रखा गया है। नए नारों में जन-जन का संकल्प अटलफिर देश में खिले कमल’ और दूसरा ‘2019 में एक बार फिर मोदी सरकार’ है। भाजपा प्रदेश प्रभारियों की बैठक में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ.महेंद्र नाथ पांडेय और प्रदेश महामंत्री सुनील बंसल ने ये फैसला लिया है। इसमें बिल्कुल ही दोराय नहीं कि भाजपा का सबका साथ-सबका विकास’ के नारे ने पूर्व में अपना दमखम दिखाया था और कई अन्य जातियों को भी भाजपा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। अब जरा नारों के पिछले इतिहास पर नजर डालेंतो जमीन गई चकबंदी मेंमकान गया हदबंदी मेंमरद गया नसबंदी में’ ने आपातकाल और नसबंदी अभियान के खिलाफ काफी चर्चित हुआ था और तत्कालीन कांग्रेस की इंदिरा सरकार के सामने संकट आ गया था। चुनावों में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई। रायबरेली से इंदिरा गांधी और अमेठी सीट से संजय गांधी की हार पर लोगों ने ढोल-नगाड़े बजाए। देखो इंदिरा का ये खेलखा गई राशनपी गई तेल’ से तत्कालीन राजनीतिक विरोधियों ने इंदिरा के गरीबी हटाओ’ नारे का जवाब देकर इंदिरा गांधी को जनता के बीच एक खलनायिका की छवि बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। साल 1989 के चुनावों में वीपी सिंह को लेकर बना राजा नहीं फकीर हैदेश की तकदीर है’ नारा भी काफी चर्चित रहा। इसके बाद 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ने इसका लाभ उठाने के लिए राजीव तेरा ये बलिदानयाद करेगा हिंदुस्तान’ नारा दियाजिसने कांग्रेस की एक बार फिर सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद 1996 में भाजपा द्वारा दिया गया नारा सबको देखा बारी-बारीअबकी बार अटल बिहारी’ ने केंद्र में अटल सरकार बनाने में अहम योगदान दिया। इसके अलावा सौगंध राम की खाते हैंहम मंदिर वहीं बनाएंगे/ ये तो झांकी हैकाशी मथुरा बाकी है/रामलला हम आएंगेमंदिर वहीं बनाएंगे’ ने राम मंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा और संघ के इस नारे ने कमाल दिखाया और यूपी समेत केंद्र तक में सरकार बनाने में अपना अहम योगदान दिया।
यूपी ने विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के नारे उम्मीद की साइकिल’ पर भरोसा जताया था और पार्टी ने विधानसभा में 224 सीटें जीतीं थी। इसके बाद पिछले विस चुनाव में सपा ने यूपी में दो नारा दिया। पहला काम बोलता है’ और दूसरा कांग्रेस के साथ गठबंधन का यूपी को ये साथ पसंद है।’ हालांकि इन दोनों नारों ने यूपी की जनता को खास आकर्षित नहीं किया और सपा को मुंह की खानी पड़ीजबकि भाजपा ने दमदार जीत दर्ज की। इसके विपरीत भाजपा का नारा था न गुंडाराजन भ्रष्टाचारअबकी बार भाजपा सरकार’ का ये नारा कमाल का रहा। वहीं कांग्रेस ने गठबंधन से पहले नारा दिया था ‘27 साल यूपी बेहाल’ कोई दम नहीं दिखा सकाक्यों सपा के गठबंधन के साथ यह नारा पीछे चला गया। वर्ष 2007 उत्तर प्रदेश विधानसभा के समय बसपा द्वारा दिया गया नारा पंडित शंख बजाएगाहाथी बढ़ता जाएगा’ तथा हाथी नहीं गणेश हैब्रह्मा-विष्णु महेश’ है का नारा भी खूब कामयाब रहा। इसी सोशल इंजीनियरिंग के नारे ने कमाल दिखाया था और तब मायावती ने सत्ता भी पाई थी। 2010 में बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस द्वारा दिया गया नारा मांमाटीमानुष’ भी काफी असरदार रहा हैं।
 सियासी दलों की सफलता-असफलता की कहानी गढ़ते ये नारे कितने महत्वपूर्ण रहे हैंइसका उदाहरण आज तक भारतीय राजनीति में देखने को मिल रहा है। भाजपा को भी उम्मीद है कि अबकी जारी किए गए ये नारे कामयाब होंगे। हालांकि चुनाव के दौरान मंचों से भी कई नारे अनायास ही बन जाते हैं और कई बार यही सफलता की सीढ़ी भी बन जाते हैं। राजनीतिक जानकारों की मानेंतो अबकी भी सबका साथ-सबका विकास’ का नारा एक बार फिर दोहराकर भाजपा ने सभी वर्गों को साथ रखने की कोशिश की है। बहुत संभव है कि भाजपा का ये नारा पिछली बार की तरह एक बार फिर कामयाबी की दास्तां लिखें। हालांकि इसके लिए अभी 2019 चुनाव के परिणामों का इंतजार करना होगा




डरी कांग्रेस

मतदान के बाद ही हार के बहाने की तलाश
लगता है कि मध्य प्रदेश में मतदान के दौरान ही कांग्रेस को आभास हो चुका है कि वह चुनाव हार रही है। यहां मतदान के दौरान जिस तरह कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया और ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की कोशिश कीउससे उनकी हताशा झलकती दिखी। यही नहींजिस कमलनाथ समेत समूची कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव के दौरान कमल’ चिह्न दिखाने का विरोध किया था और हंगामा खड़ा किया था,  वही गलती अबकी खुद कमलनाथ ने ही मतदान के बाद बाहर निकलकर हाथ का पंजा’ दिखाकर कर दी है।
 ईवीएम के मत्थे आरोप मढ़ना विपक्ष के लिए कोई नई बात नहीं है। अब ईवीएम का रोना रोने वालों में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी शामिल हो गए हैं। मतदान के दौरान उन्होंने ट्वीट करते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस के पक्ष के कई मतदान केंद्रों से ईवीएम खराब होने की सूचनाएं आ रही हैं। इससे पहले उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा मुखिया मायावतीदिल्ली के मुख्यमंत्री और आप’ मुखिया अरविंद केजरीवालपश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी सरीखे अनेक विपक्षी नेता भी ऐसे ही आरोप अक्सर लगाते रहे हैं। इस मामले में कांग्रेस की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष कमलनाथ ने कहा कि चुनाव आयोग इस पर फौरन निर्णय लेते हुए मशीनों को बदले। हालांकि दिग्विजय के आरोप पर मप्र के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने कहा कि कांग्रेस का विकास से कोई नाता नहीं हैइसलिए जनता उसे इस बार भी नकार देगी और वे इसीलिए बहाने तलाश रही है।
 अबकी कमलनाथ ने वह गलती भी दोहरा दी हैजिसे लेकर वे खुद और समूची कांग्रेस कभी भाजपा पर हमलावर थी। दरअसलपिछले लोकसभा चुनाव में मतदान के बाद कमल’ का चिन्ह दिखाने को लेकर जो कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदवारी खत्म करने की पैराकारी कर रही थीअब वही गलती मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कमलनाथ ने भी शिकारपुर गांव में मतदान के दौरान कर दी। जब वे पोलिंग बूथ से बाहर निकलेतो उन्होंने स्याही लगी उंगली के साथ पंजा भी दिखाया। यह कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह है। इससे विवाद पैदा हो गया है। भाजपा ने इसके लिए कमलनाथ पर एफआईआर की मांग की है। खंडवा से भाजपा सांसद नंदकुमार सिंह ने कहा कि इस मसले पर चुनाव आयोग को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। लोकतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए। इस पर कमलनाथ ने जवाब दिया कि वे अपना वोट पहले ही डाल चुके थे और जब मीडिया ने पूछा कि वोट किसे दियातो पंजा’ दिखा दिया। इसके अलावा मैं क्या करताक्या उन्हें कमल दिखाता?
 हो सकता है कि कमलनाथ का तर्क सही होलेकिन तब वे और समूची कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यही तर्क क्यों नहीं मान रही थीजब मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान गांधीनगर में वोट डालने के बाद कमल निशान दिखाया थातो चुनाव आयोग से शिकायत क्यों की गई थी?  इसी शिकायत पर तो गुजरात के मुख्य सचिव और डीजीपी को मोदी पर कार्रवाई करने का आदेश देना पड़ गया था। इससे भी कांग्रेस तब संतुष्ट नहीं हुई और उसने वडोदरा से वाराणसी में नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी को खारिज करने की मांग की थी। ये मौजूदा घटनाक्रम इतना बताने के लिए काफी है कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच लगता है कि जैसे मायूस कांग्रेसी नेता अभी से ही हार के बहाने तलाशने लगे हैं। उन्हें ये पूरा भरोसा हो चुका है कि अबकी भी कांग्रेस मध्य प्रदेश में कोई कमाल दिखाने नहीं जा रही हैऐसे में जनता के बीच बने रहने का कोई और बड़ा मुद्दा फिलहाल नहीं हो सकता है।



स्कूलों की कसी नकेल

महाराष्ट्र सरकार ने बनाया फीस बढ़ाने के खिलाफ कानून
महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार हर क्षेत्र में सुधार की दिशा में आगे बढ़ रही है। कई ऐसी योजनाएं ला रही है और कई ऐसे कार्य किए जा रहे हैंजिससे किसाननौकरीपेशाव्यापारीनारी उत्थान जैसे मुद्दों को बल मिला है। विकास के कई मुद्दों पर भी सरकार ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। अब देवेंद्र सरकार ने छात्रों के साथ-साथ उनके अभिभावकों को भी राहत देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। दिनोंदिन महंगी होती शिक्षा के बीच सरकार की इस पहल से स्कूल प्रबंधन की मनमानी पर लगाम लगेगी और संभव है कि इससे एक बार फिर गुदड़ी से लाल’ निकलने लगें।
  महाराष्ट्र सरकार ने विधानसभा में स्कूल फीस को बढ़ाने के खिलाफ नया कानून पास किया है। इस नए कानून के तहत राज्य में स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के खिलाफ आवाज उठाने का हक अभिभावकों को मिल गया है। यह कानून अब विधान परिषद में भेजा जाएगाजहां पर पास होने के बाद गर्वनर के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा। इससे शिक्षण संस्थाओं द्वारा फीस बढ़ाने पर लगाम कसी जा सकेगी। शिक्षण संस्थाए अगर शुल्क बढ़ाती हैतो अभिभावक उसके खिलाफ आवाज उठा सकते है। शुल्क बढ़ोतरी करने के बाद 30 दिनों के अंदर अभिभावक राज्य सरकार द्वारा बनाई गई। कार्यकारी समिति के सामने उसके खिलाफ अपनी अपील कर सकते हैं।
 वास्तव में अब तक होता ये है कि अनेक स्कूल मनमाने तौर पर शुल्क लगाकर अभिभावकों की जेब ढीली करते रहते हैं। इससे कई बार मध्यम और गरीब परिवारों के सामने संकट की स्थिति पैदा हो जाती हैं। इससे उनके पास दो ही विकल्प बचते हैं। या तो वे अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित कर देंया फिर किसी तरह कर्ज वगैरह लेकर इस फीस की भरपाई करें। एक नियत फीस होने पर अभिभावक को ये पता होता है कि उसे कितनी फीस हर माह स्कूल में भरनी है। इसके लिए वह तैयार है या उसकी जेब इसे स्वीकार करती है या नहींइसके विपरीत मनमाना शुल्क वसूली किए जाने से वे आर्थिक संकट में फंस जाते हैं। अब अगर महाराष्ट्र सरकार की इस पहल पर गर्वनर के हस्ताक्षर हो जाते हैंतो ये देवेंद्र फडणवीस सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। इससे वे मध्यम और लघु आयवर्ग के परिवारों को एक बड़ी राहत दे सकेंगे।


फडणवीस की बढ़ती लोकप्रियता

मध्य प्रदेश में भी उमड़ रही भीड़
जिस तरह प्रखर हिंदुत्व और अपनी वेष-भूषा को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज देशभर में लोकप्रिय हैंठीक उसी तरह महाराष्ट्र को तेजी से विकास की राह पर ले जाते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी लोकप्रिय हो रहे हैं। अभी तक वे सिर्फ महाराष्ट्र में ही लोकप्रिय थेलेकिन महाराष्ट्र की सफलता की कहानियां जहां-जहां पहुंच रही हैंमुख्यमंत्री की लोकप्रियता अपने आप वहां पहुंच जा रही हैं। शायद यही वजह है कि पांच राज्यों में हो रहे चुनाव प्रचारों के लिए जिन मुख्यमंत्रियों को स्टार प्रचारक के रूप में रखा गया हैउनमें योगी आदित्यनाथ के साथ ही देवेंद्र फडणवीस भी हैं। चुनाव प्रचार के लिए मध्य प्रदेश पहुंचे देवेंद्र फड़णवीस की लोकप्रियता देखते ही बन रही थी। उन्हें सुनने के लिए मध्य प्रदेश में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
 मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस ने कई तर्कों को देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पार्ट टाइम’ नेता,  तो इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 24 घंटे गरीबों की चिंता करने वाला बताकर तुलनात्मक रूप से जनता के सामने भाजपा की नीतियों की तस्वीर पेश की है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जानती है कि वह यहां कभी जीत नहीं सकती,  इसलिए उसने यहां जो घोषणाएं की हैवह झूठ का पुलिंदा है। अगर उन्हें मध्य प्रदेश का 15 साल का बजट भी दे दिया जाएतो भी वे पूरा नहीं हो सकतीं। कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी आधे समय देश से बाहर रहते हैं। लौटकर आते हैंतो दोचार सभाएं भी कर लेते हैंपर उनको पता नहीं रहता। मध्य प्रदेश की बातें छत्तीसगढ़ में कहते हैं और छत्तीसगढ़ की बातें मध्य प्रदेश में कहते हैं।
वास्तव में राजनीति में राहुल को लेकर पहलू यह है कि राजीव के बेटे राहुल गांधी भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखने की कोशिशों में जुटे हैंऐसे में पिता-पुत्र की तुलना भी जरूरी है। राजीव आए ही थे लोकप्रियता के रथ पर सवार होकर। दूसरी तरफ राहुल गांधी की लोकप्रियता का चरम राजनीति में कदम रखने के करीब छह साल बाद यानी 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद आयालेकिन उसके बाद से राहुल लगातार फिसलते चले गए। यह सिलसिला 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद शुरू हुआ। उसके बाद उनकी छवि एक ऐसे राजनेता की बनी,  जो अपनी राजनीति को लेकर गंभीर नहीं है। वो रहस्यमय तरीके से छुट्टी पर चला जाता है और लाख कोशिशों के बावजूद अपनी पार्टी को चुनाव नहीं जिता पाता है। वास्तव में यही वह समय थाजब राहुल राजनीति में अपना स्थान बनाने में सफल हो सकते थे,  लेकिन उन्होंने इस सुनहरे अवसर को गंवा दिया था। अब हाल के बरसों में राहुल ने इस छवि को बदलने की भरपूर कोशिश की हैलेकिन उन्हें कामयाबी अभी तक मिली नहीं है। यह कुछ ऐसी कमियां हैंजिसने राहुल का ग्राफ तेजी से गिरा दिया है।
 राजीव गांधी को कोई बच्चा पॉलीटिशियन नहीं कह पाता थाजबकि राहुल गांधी पर चिपकाया गया पप्पू’ टैग अब भी चस्पा है। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थेदूसरी तरफ राहुल गांधी सर्वस्वीकार्य नेता की छवि बनाने के लिए जूझ रहे हैं और उनका सामना नरेंद्र मोदी जैसे एक ऐसे पॉलीटिशियन से हैजिसका भीड़ बटोरने में कोई सानी नहीं है। राहुल उस दौर के नेता हैं,  जहां भाषण से वोटरों का दिल जीतने वाले एकमात्र बड़े नेता नरेंद्र मोदी हैं। राहुल की सीधी तुलना नाटकीय उतार-चढ़ाव वाली भाषण शैली के धनी मोदी से की जाती है। राहुल पर बहुत समय तक रटा-रटाया भाषण देने का इल्जाम लगता रहा है। ऐसे में मध्य प्रदेश में देवेंद्र फडणवीस ने राहुल के बहाने भाजपा की नीतियों और नेतत्व को बखूबी जनता के सामने रखा है। कांग्रेस का वह चेहरा भी सामने रखने की कोशिश की हैजिसे आज कांग्रेस के सिपहसालार खुद ही नहीं समझ पा रहे हैं।


मुंबई टू गोवा

-महाराष्ट्र सरकार की पहल
छोटी-छोटी चीजों से भविष्य में बड़ी-बड़ी चीजें और खुशियां उभरकर सामने आती हैं। मुंबई-गोवा क्रूज को लेकर मिल रही सफलता महाराष्ट्र की देवेंद्र फणनवीस सरकार के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। लोगों को इस क्रूज के प्रति जो उत्साह दिख रहा हैवह वाकई उत्साहजनक है। इस क्रूज पर सवारी के लिए पहली खेप में ही यात्री फुल हो गए हैं। भले ही ये बात छोटी हो,  लेकिन पर्यटन व्यवसाय में इसका बड़ा लाभ महाराष्ट्र सरकार को मिल सकता है।
 क्रूज की सवारी वैसे भी एक अलग अनुभव का अहसास कराती है। इस अहसास को आम यात्रियों तक पहुंचाने में महाराष्ट्र सरकार की पहल काफी कारगर साबित हुई है। सिर्फ सात हजार से 12 हजार रुपए की रेंज में यात्री इन सुहाने पल का आनंद उठा सकते हैं। यही कारण रहा कि पहली ही खेप में यात्रियों का टोटा नहीं रहा और यात्रियों ने दिल खोलकर इस यात्रा से लिए बुकिंग कराई है। मुंबई के नए डोमेस्टिक क्रूज टर्मिनल से शुरू होने वाले इस क्रूज का नाम अंग्रीया हैजो मराठा नेवी के पहले एडमिरल कनहोजी आंग्रे के नाम पर रखा गया है। नए उद्घाटन घरेलू क्रूज टर्मिनल (डीसीटी) से शुरू होने वाले अंगिया पर मुंबई-गोवा क्रूज ने 15 दिसंबर तक बुकिंग के साथ शत-प्रतिशत यात्री अधिग्रहण किया है।
फिलहाल देंवेंद्र सरकार की इस पहल के बाद उम्मीद की जा सकती है कि ये क्रूज पर्यटन व्यवसाय को काफी तीव्र गति दे सकेगा। इससे आने वाले राजस्व से राज्य विकास की ओर बढ़ सकेगा। कम कीमत में अधिक से अधिक यात्रियों को इस यात्रा के प्रति लुभाने में महाराष्ट्र सरकार की कोशिश कारगर होती दिख रही है। हर रोज शाम 5 बजे क्रूज मुंबई से चलेगा और अगले दिन सुबह 9 बजे गोवा पहुंचेगा। इस बीच यात्री जो नजारा देखेंगेवह उनके लिए किसी यादगार लम्हे से कम नहीं होगा और वे इसे भूलना नहीं चाहेंगे।



विचित्र सलाह

गन्ने की खेती न करें मराठवाड़ा क्षेत्र के किसान
जलवायु परिवर्तन आज सबसे बड़ी चुनौती है। कहीं जल की पर्याप्त सुलभता हैतो कहीं जल की भयंकर कमी। इस बिगड़ी व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारों की ओर से अक्सर ही ठोस कदम उठाए जाते रहे हैं। कभी सिंचाई परियोजनाएं चलाकरतो कभी सूखा प्रभावित किसानों को आर्थिक मदद देकर। कई इलाकों में कुछ खास किस्म की फसलों का उत्पादन कर किसानों पीढ़ियों से अपने सपनों को साकार करते आ रहे हैं। ये फसलें इन किसानों के लिए आर्थिक उन्नति की रीढ़ है। ऐसे में मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त जलपुरुष राजेंद्र सिंह की हालिया अनोखी सलाह निराश करती है।
  उनका तर्क है कि गन्ना जैसी अधिक जल ग्रहण करने वाली फसलों को सभी सूखा प्रभावित क्षेत्रों में स्थाई रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। खासकर मराठवाड़ा क्षेत्र मेंजहां अधिकांश जिलों सूखे प्रभावित होते हैं। कम से कम जलपुरुष को ऐसे बयान देने से बचना चाहिए था। जलपुरुष का ये सुझाव कैसे उचित माना जा सकता हैजब मराठवाड़ा जैसे अनेक क्षेत्र अपने गन्ना और चीनी उत्पादन के बूते ही विकास की इबारत लिख रहे हैं। ऐसे में यहां पानी की आपूर्ति कैसे कम या बाधित की जा सकती हैवैसे भी यहां दिनोंदिन गन्ना उत्पादन में कमी आ रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादन क्षेत्र में इस साल काफी कम बारिश हुई और खेत में खड़ी फसल में भी संक्रमण हो गया है। इस परिस्थिति में जब हर राजनीतिज्ञसमाजसेवी को किसानों के गिरे मनोबल को ऊंचा उठाने में अपना योगदान देना चाहिएइसके विपरीत 'जल पुरुषकी ये सलाह हताश करती है।
 जलपुरुष ने तर्क दिया है कि उन क्षेत्रों में जहां वर्षा अधिक है और जो गन्ना के लिए अनुकूल हैंसरकार को इसे ड्रिप सिंचाई के अधीन अनुमति देनी चाहिएअन्यथा यह विनाश पैदा करेगा। यानी खेती के लिए एक अन्य क्षेत्र और वहां के किसानों को नए सिरे से अधिक जल ग्रहण करने वाली फसलों के लिए तैयार किया जाना चाहिए। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ये सब इतनी आसानी से और इतनी जल्दी तैयार कर पाना क्या संभव हैंअगर नहींतो फिर ऐसे सुझाव का क्या वजूद हैजलपुरुष को ऐसा बयान देने से पहले ये सोचना चाहिए था कि इससे गन्ना उत्पादन क्षेत्रों में जो चीनी मिलें चल रही हैंउनका भविष्य क्या होगाउसमें कार्यरत लोग कहां जाएंगेइस फैलने वाली बेकारी का क्या इलाज होगाऐसे अनेक सवाल अनु​त्तरित रहेंगे और ये किसी भी तरह किसानों के लिए हितकारी नहीं होंगे।


ऐतिहासिक दिन

दशकों पुरानी सिखों की उम्मीदें पूरी हुई...

साल 2008 में जबसे मुंबई में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया थातब से 26/11 का नाम आते ही हमारे दिमाग में उसी घटना का खौफनाक मंजर घूम जाता है। लेकिन अब जब 26/11 का नाम आएगातो हमारे दिमाग में सिर्फ मुंबई हमले की घटना पटल पर नहीं आएंगीबल्कि करतारपुर साहिब गुरुद्वारा और संविधान दिवस जैसी घटनाएं भी घूमेंगी। आज इसकी भारत ने करतारपुर साहिब गुरुद्वारा की आधारशिला रखकर शुरुआत की है। भारत में आने वाले हिस्से का निर्माण केंद्र सरकारजबकि पाकिस्तान में आने वाले हिस्से का निर्माण पाकिस्तान सरकार करेगी। 28 नवंबर को पाकिस्तान में भी ऐसा ही आयोजन होगा।
 केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरीकेंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादलहरदीप पुरीविजय सांपलाराज्यपाल बीपी सिंह बदनौरपूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की मौजूदगी में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने करतारपुर कॉरीडोर का नींव पत्थर रखा। आजादी के बाद सिखों की ये सबसे बड़ी घटना है। अब तक श्रद्धालु वहां जा नहीं पाते थे। कॉरीडोर से अब ये दरवाजा खुल गया है। ऐसे में अब 26/11 करतारपुर साहिब गुरुद्वारा के कॉरीडोर खुलने के लिए भी जाना जाएगा। कॉरिडोर पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा तक जाएगा। इस कॉरिडोर से भारत के लाखों तीर्थयात्रियों को पाकिस्तान में रावी नदी के तट पर स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर जाने की सुविधा मिलेगीजहां गुरु नानक देव ने अपने 18 साल बिताए थे। अब तक यहां जाने के लिए तीर्थयात्रियों को काफी मशक्कत कर वीजा लेना पड़ता थाजो अब नहीं होगी। वे 1539 में गुरु नानक जी के निधन के बाद निर्मित कराए गए इस पवित्र गुरुद्वारे पर मत्था टेक सकेंगे।
 26/11 को ही संविधान दिवस भी मनाया जाता हैलेकिन ये अब तक किताबों तक ही सीमित रहा है। हाल ही डॉ.भीमराव अंबेडकर को लेकर जो बातें चलींउससे सभी लोग जान गए कि संविधान दिवस क्यों और कब मनाया जाता है। 26 नवंबर 1949 को ही भारतीय संविधान सभा की तरफ से इसे अपनाया गया और 26 नवंबर 1950 को इसे लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया। यही वजह है कि 26 नवंबर को संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर चल रही हलचल के बीच भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज अयोध्या पहुंचे और वे अपने साथ संविधान के एक प्रति भी ले गए। इसे उन्होंने अयोध्या को जिलाधिकारी को सौंपकर जिले में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन करने के लिए कहकर संविधान दिवस की याद ताजा कर दी है।
   यह सही है कि 26 नवंबर 2008 को लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकवादियों ने मुंबई को बम धमाकों और गोलीबारी से दहला दिया था। इस आतंकी हमले को 10 साल हो गए हैंलेकिन यह भारत के इतिहास का वो काला दिन हैजिसे कोई भूल नहीं सकता। हमले में 160 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। मुंबई हमले को याद करके आज भी लोगों को दिल दहल उठता है। अब जब इस दहशतभरे माहौल में अगर कुछ सकारात्मक पहलें हुई हैंवे भी अब हमेशा याद रहेंगी।